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मानसिक जंजाल से मुक्ति के उपाय

इस पोस्ट के लेखक हैं जिआनपाओलो पिएत्री. हैंडसम जिआनपाओलो डिजायनर और वास्तुकार हैं. इस समय इंटरनेट पर बहुत से प्रभावशाली युवा मिनिमलिस्ट ब्लौगरों में से एक जिआनपाओलो का ब्लॉग है simplyoptimal.net. यह पोस्ट उनकी इस पोस्ट का अनुवाद है.

हमारी समस्या यह नहीं है कि मौलिक और अभिनव विचार कैसे आयें बल्कि यह है कि लम्बे समय से भीतर जड़ जमा चुके नकारात्मक विचार कैसे निकलें. हमारा मष्तिष्क ऐसा भवन है जिसमें पुराना फर्नीचर भरा हुआ है. इसके कुछ कोनों को साफ़-सुथरा कर दीजिये और रचनात्मकता इसमें तुरत अपना स्थान ढूंढ लेगी.

मैं ऐसे बहुत से ब्लॉग पढता रहता हूँ जिनमें अपने जीवन और परिवेश से अनुपयुक्त और अनावश्यक विचारों एवं वस्तुओं को निकालकर जीवन और कार्य को सहज-सरल बनाया जा सकता है.  इन ब्लौगों में Zenhabits सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे ब्लौगों में जीवन की उपादेयता, रचनात्मकता, उत्पादकता, और सरलता को बढ़ानेवाले विचारों और उपायों पर चर्चा की जाती है. इनमें न केवल हमारे घर, रसोई, कार्यालय, और फेसबुक फ्रेंड्स लिस्ट बल्कि अपने विचारों को भी जंजाल-मुक्त और निर्मल बनाने के तत्व और सूत्र मिलते हैं. ये हमें बताते हैं कि स्वास्थ्यप्रद आहार कैसे लें, अपनी आवश्यकता से अधिक वस्तुओं के संग्रह से कैसे बचें और अपरिग्रही प्रवृत्ति की ओर कैसे उन्मुख हों. मैं इन ब्लौगों को पढना पसंद करता हूँ क्योंकि मैं उनमें विश्वास करता हूँ. मैं इनमें सुझाए गए उत्पादों को भी खरीदता हूँ.

लेकिन यह भी सच है कि इन ब्लौगों को लम्बे समय तक पढ़ते रहने के बावजूद भी मेरे भीतर वस्तु-संग्रह की इच्छा उत्पन्न होती रहती है या मैं उनकी खोज-परख करता रहता हूँ. अपनी प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करने के लिए मैं अपनी डेस्क और दराज़ को साफ़ रखता हूँ. अपनी किताबों और सीडी की बेरहमी से छंटनी करता हूँ, अनुपयोगी वस्त्रों को ज़रूरतमंदों को देता हूँ और बेकार कागजों को रद्दी में डालता रहता हूँ. इन कार्यों को करने से रोज़मर्रा के जीवन में बड़ी मदद मिलती है. काम ख़त्म हो जाने पर मन में संतोष बढ़ जाता है. लेकिन कम-से-कम अपने मामले में तो मैंने यह पाया है कि कुछ ही हफ़्तों में कचरा और अनुपयोगी वस्तुएं फिर से बढ़ने लगतीं हैं. और कभी ऐसा भी होता है कि बाहरी तौर पर तो सब कुछ सरल और व्यवस्थित दिखता है पर अपने भीतर मैं खुद को बड़े असमंजस और उलझन में पाता हूँ. इस समय भी मेरे मन में ऊहापोह है और यह मुझे इस निष्कर्ष तक ले आया है:

सच्चे अर्थों में स्वतन्त्र होने, अधिक उत्पादक बनने, तनावरहित बने रहने, स्पष्ट विचार रखने, और सरल व रचनात्मक जीवन जीने के लिए हमें अपनी क्षमताओं से अधिक कर्म करने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए. चीज़ों को हमेशा अलग-अलग कोण से देखकर समझने का प्रयास करना चाहिए.यह ज़रूरी है कि हम अपने भीतर झांककर देखें, स्वयं का निरीक्षण करें, और अपने मन-मष्तिष्क को अव्यवस्था और कोलाहल से मुक्त करने के लिए कदम उठायें. यदि हम यह नहीं करेंगे तो बाहर किये जाने वाले सारे प्रयत्न निष्फल जायेंगे और हमें शांति-संतोष नहीं मिलेगा.

नीचे दिए गए छः तरीकों से आप अपने भीतर उन्मुख हो सकते हैं, अपने बारे में मनन कर सकते हैं, और उन चीज़ों से छुटकारा पा सकते हैं जो जंजाल की भांति आपको घेरे रहतीं है और अच्छी चीज़ों के होने में रुकावट डालतीं हैं:

1. सोचिये नहीं, फोकस कीजिये –
अपने उद्देश्यों, सपनों, और इच्छाओं पर फोकस कीजिये. आपके चाहने और होने के बीच हमेशा कुछ फासला रहेगा ही पर इससे अपने हौसले को पस्त नहीं करें. अपना ध्यान बीच की रुकावटों पर नहीं वरन मंजिल पर केन्द्रित करें और आप पायेंगे कि पॉज़िटिव रवैया रखने से सोचने और होने के बीच की दूरियां बड़ी नहीं लगतीं.


2. बीती ताहि बिसार दें –
भूल नहीं सकें तो बेशक न भूलें पर उसे अपने ऊपर हावी नहीं होनें दें.

3. विचार प्रक्रिया का सरलीकरण करें –
बहुत सीधा सा फॉर्मूला है. अच्छे और सकारात्मक विचारों को आने दें. बुरे और नकारात्मक विचारों को दरकिनार कर दें.


4. जो कुछ हमारे वश में न हो उसके लिए व्यथित न हों –
इसे साध पाना सरल नहीं है. यहाँ कही गयी सारी बातों में यह सबसे कठिन है लेकिन शांतिपूर्ण जीवन के लिए इस नीति का पालन करना बहुत ज़रूरी है. यदि आप ऐसी चीज़ों से घिरें हो जो आपके वश में नहीं हैं तो उनके बारे में सोचविचार करके चिंतित होने में कोई सार नहीं है. उस समय तक प्रतीक्षा करें जब तक चीज़ें बदल नहीं जातीं. ध्यान दें कि
सब कुछ लुट जाने के बाद भी भविष्य बचा रहता है.

5. अपने अंतर्मन को जागृत करें – कभी-कभी खुद पर भी पूरा ध्यान देना चाहिए और अपने भीतर झांककर देखना चाहिए. यह सोचिये कि कौन सी चीज़ें आपको प्रेरित करतीं हैं, आपको गतिमान रखतीं हैं. किन परिस्थितियों में आप सर्वाधिक सक्रिय, रचनाशील, और चिंतामुक्त रहते हैं? इन बातों पर फोकस कीजिये. कभी-कभार यूं ही ध्यान में बैठ जाइए और दिन भर में सिर्फ दस मिनट ही सही पर अपने आप को भीतर ही टटोलिये और खोजिये कि आप असल में क्या हैं.

6. अकेलेपन से घबराइये नहीं –
एकांत के भी अनेक फायदे हैं. क्या आप कभी अकेले ही फिल्म देखने गए हैं? रेस्तरां में अकेले खाना खाया है? अकेले ही लम्बी चहलकदमी की है? कभी करके देखिये. जब आप निपट अकेले होते हैं तो आपकी विचार प्रक्रिया बदल जाती है. आप अधिक गहराई से सोचने लगते हैं क्योंकि आपके चारों ओर अक्सर ही मौजूद रहनेवाला कोलाहल कम हो जाता है और शांति से कुछ भी करने के लिए समय मिल जाता है.

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ब्लैकबेरी – बुद्ध – 80%

मेरे एक मित्र ने नया ब्लैकबेरी फोन खरीदा. ये स्मार्टफोन बहुत शानदार हैं और उनमें ईमेल, सैट-नेव, सैंकड़ों वेब एप्लीकेशंस – न जाने क्या-क्या हैं. फोन मिलते ही वह उसके फीचर जानने में जुट गया और घंटों तक बटनों को दबाकर चीजें जांचता रहा. इस खोजबीन से उसे पता चला कि किसी खास एप्लीकेशन को इस्तेमाल करने में समस्या आ रही थी.

फोन कंपनी और टेलीकॉम के सपोर्ट सिस्टम से जूझने और कस्टमर एक्जीक्यूटिव से बात करने पर उसे यह जानकारी मिली कि जो खास फीचर वह इस्तेमाल करना चाहता है उसके लिए प्रतिमाह अतिरिक्त राशि का भुगतान करना पड़ेगा क्योंकि वह फीचर कंट्री स्पेसिफिक था.

उसने अतिरिक्त भुगतान करने का तय कर लिया. पैसा देने के बाद एक नई दिक्कत शुरू हो गयी. वह फीचर एक्टीवेट तो हो गया था लेकिन उस तरह से काम नहीं कर रहा था जैसा उसे करना चाहिए. कहीं-न-कहीं कोई कमी ज़रूर थी.

कस्टमर केयर से दोबारा बात की गयी. तकनीक के जानकारों से पूछा. इंटरनेट पर सर्च करके देखा. अंततः यह पता चला कि ब्लैकबेरी कितने ही अच्छे फोन क्यों न हों, उनकी भी कुछ सीमायें हैं. अब या तो उन कमियों के साथ फोन इस्तेमाल करो या कोई और फोन ढूंढो.

उसने मुझसे पूछा कि अब और क्या किया जा सकता है.

मैंने एक पल के लिए सोचा और जो बात मुझे समझ में आई वह यह थी कि:

मैं तकनीक के मामले में इस सरल नियम का पालन करता हूँ कि यदि कोई चीज़ मेरी आशाओं पर सिर्फ 80% खरी ही उतरे तो मुझे उससे पूर्ण संतुष्ट होना चाहिए. इससे ज्यादा की उम्मीद करना व्यर्थ ही है.

इन चीज़ों के विज्ञापनों में 100% से भी ज्यादा संतुष्टि देने का वादा या दावा किया जाता है. वस्तुतः देखें तो ‘100% से ज्यादा’ जैसा कुछ नहीं होता. दुनिया में कोई भी, कुछ भी इतना परफेक्ट नहीं है”.

अब हमें यह बात समझ में आ जाए और हम इससे संतुष्ट हो जाएँ – तो 80% मिल गया मतलब मान लो कि बहुत मिल गया. उससे ज्यादा अब और मिलने की उम्मीद करना बेमानी है.

और यदि आप इसके परफेक्ट होने की ख्वाहिश नहीं करते और 80% काम चलने से राजी हो जाते हैं तो बचे रह गए 20% नैराश्य को गहराने से बच सकते हैं.”

और क्या पता आगे चलके आपको बचे रह गए 20% की अनुपयोगिता अनुभव होने लगे और ऐसे मामलों से उपजी कुंठा का उपचार हो जाए! इससे बेहतर और क्या होगा? यह भी ज़िंदगी का एक बहुत ज़रूरी सबक ही तो है!

जब कभी मैं पुराने स्तूपों, मंदिरों और ध्वस्त अवशेषों को देखने जाता हूँ तो उनकी कला और गौरव से अभिभूत हो जाता हूँ. इनमें कई स्थानों पर मुख्य स्तंभों, मूर्तियों, या दीवारों पर दरारें भी दिखती हैं. इन दरारों या टूट-फूट के बारे में कुछ लोग यह कहते हैं कि – “कैसे कारीगर थे वे! शर्म की बात है कि इतना कुछ अच्छा बना गए लेकिन यहाँ एक कसर रह गयी!”

ऐसे में मैं उनसे यह कहना चाहता हूँ कि – “यदि ऐसा होता तो कहीं बुद्धों की विराट प्रतिमाएं नहीं बनतीं और मंदिरों के प्राचीर शिखर भी नहीं दिखते. तब न कोई धर्म होता, न संस्कृति जीवित रहती. इन अद्भुत भवनों और मूर्तियों में किसी खोट का होना भी मुझे शास्त्रसम्मत ही प्रतीत होता है.”

विश्व में जो कुछ भी बनता है वह भविष्य में बिखर जाता है. हर उगनेवाली चीज़ अंततः मिट्टी में मिल जाती है. जो भी आता है, चला जाता है. यही प्रकृति का नियम है. विश्व में चिरस्थाई और परिपूर्ण कुछ भी नहीं है. असंतुष्टि अवश्यम्भावी है.

ब्लैकबेरी हो या बुद्ध प्रतिमाएं – यह बात उनपर और उनके बीच आनेवाली हर चीज़ पर लागू होती है.

यदि हर वस्तु परिपूर्ण और संतुष्टिदायक होती तो मानव मन में निराशा कभी न उपजती. धरती पर ही स्वर्ग हो जाता. हम मुक्ति, निर्वाण, आत्मज्ञान, और ईश्वर के बारे में भी कुछ नहीं सोचते. पूर्ण-अपूर्ण का कोई बखेड़ा नहीं होता.

लेकिन पूर्णता या पूर्ण संतुष्टि जैसा कुछ नहीं है. यहाँ तक कि इनके पास भी कुछ नहीं फटकता.

80% का मिल जाना पर्याप्त है.

यह समझ में आ जाये और हम इससे संगत बिठा लें तो हम खुद में और दूसरों में परिपूर्णता की न तो खोज करेंगे न ही कोई उम्मीद रखेंगे. जीवन फिर सहज-सरल होगा.

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जीवन का सौंदर्य

हर दिन, हर समय… दिव्य सौंदर्य हमें घेरे हुए है.

क्या आप इसका अनुभव कर पाते हैं? क्या यह आपको छू भी पाता है?

हममें से बहुतेरे तो दिन-रात की आपाधापी में इसका अंशमात्र भी देख नहीं पाते. उगते हुए सूरज की अद्भुत लालिमा, बच्चे की मनभावन खिलखिलाहट, चाय के पतीले से उठती हुई महक, दफ्तर में या सड़क में किसी परिचित की कुछ कहती हुई-सी झलक, ये सभी सुंदर लम्हे हैं.

जब हम सौंदर्य पर विचार करते हैं तो ज्यादातर लोगों में मानस में खूबसूरत वादियाँ और सागरतट, फ़िल्मी तारिका, महान पेंटिंग या अन्य किसी भौतिक वस्तु की छवि उभर आती है. मैं जब इस बारे में गहराई से सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि जीवन में मुझे वे वस्तुएं या विचार सर्वाधिक सुंदर प्रतीत होते हैं जो इन्द्रियातीत हैं अर्थात जिन्हें मैं छूकर, या चखकर, यहाँ तक कि देखकर भी अनुभव नहीं कर सकता.

वे अनुभव अदृश्य हैं फिर भी मेरे मन-मष्तिष्क पर वे सबसे गहरी छाप छोड़ जाते हैं. मुझे यह भी लगता है कि वे प्रयोजनहीन नहीं हैं. उनके मूल में भी ईश्वरीय विचार या योजना है. ईश्वर ने उनकी रचना की पर उन्हें हमारी इन्द्रियों की परिधि से बाहर रख दिया ताकि हम उन्हें औसत और उथली बातों के साथ मिलाने की गलती नहीं करें.

हमें वास्तविक प्रसन्नता और सौंदर्य का बोध करानेवाले वे अदृश्य या अमूर्त प्रत्यय कौन से हैं? वे सहज सुलभ होते हुए भी हाथ क्यों नहीं आते? इसमें कैसा रहस्य है?

ऐसे पांच प्रत्ययों का मैंने चुनाव किया है जो किसी विशेष क्रम में नहीं हैं.

1. ध्वनि/संगीत – मुझे आपके बारे में नहीं पता पर मेरे लिए संगीत कला की सबसे गतिशील विधा है. ऐसे कई गीत हैं जो मुझे किसी दूसरी दुनिया में ले जाते हैं और मेरे भीतर वैसा भाव जगा देते हैं जो शायद साधकों को समाधिस्थ होने पर ही मिलता होगा.

संगीत में अद्भुत शक्ति है और यह हमारे विचारों को ही नहीं बल्कि विश्व को भी प्रभावित करती है. एक अपुष्ट जानकारी के अनुसार हम लय और ताल पर इसलिए थिरकते हैं क्योंकि हमारे मन के किसी कोने में माता के गर्भ में महीनों तक सुनाई देती उसकी दिल की धड़कन गूंजती रहती है. ये बड़ी अजीब बात है पर यह सही न भी हो तो मैं इसपर विश्वास कर लूँगा.

“यदि मैं भौतिकविद नहीं होता तो संभवतः संगीतकार बनता. मैं अक्सर स्वरलहरियों में सोचता हूँ. मेरे दिवास्वप्न संगीत से अनुप्राणित रहते हैं. मुझे लगता है कि मानव जीवन एक सरगम की भांति है. संगीत मेरे लिए मनोरंजन का सबसे बड़ा माध्यम है” – अलबर्ट आइंस्टीन

संगीत की अनुपस्थिति में साधारण ध्वनियाँ भी मुझे उससे कमतर नहीं लगतीं. बादलों का गर्जन हो या बच्चे की किलकारी, टपरे पर बारिश की बूँदें हों या पत्तों की सरसराहट – साधारण ध्वनियाँ भी मन को प्रफुल्लित करती हैं. सारी ध्वनियाँ और संगीत अदृश्य है पर मन को एक ओर हर्षित करता है तो दूसरी ओर विषाद को बढ़ा भी सकता है.

आपको कौन सी ध्वनियाँ और संगीत सबसे अधिक प्रभावित करतीं हैं? आपका सबसे प्रिय गीत कौन सा है? क्या कहा, मेरे प्रिय गीत के बारे में पूछ रहे हैं? पचास के दशक की फिल्म ‘पतिता’ का तलत महमूद द्वारा गया गया गीत ‘है सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं’ मेरा सर्वप्रिय गीत है. पिछले तीस सालों से कोई ऐसा महीना नहीं गुज़रा होगा जब मैंने यह गीत नहीं सुना या गुनगुनाया. यह तो रही मेरी बात. हो सकता है आप मेरी पसंद से इत्तेफाक न रखें. आदमी-आदमी की बात है.

2. निस्तब्धता/मौन – देखिये, पहले तो मैंने संगीत की बात छेड़ी थी और अब एकदम से चुप्पी पर आ गया. पर यह तो आप जानते ही हैं कि एक सुरीली ध्वनि के पीछे दस या सौ कोलाहलपूर्ण या बेसुरी आवाजें होतीं हैं. मुझे फर्श की टाइलें काटनेवाली आरी की आवाज़ या गाड़ियों के रिवर्स हौर्न बहुत बुरे लगते हैं. आपको भी कुछ आवाजें बहुत खिझाती होंगी.

ऐसी कर्कश ध्वनियों से तो अच्छा है कि कुछ समय के लिए पूर्ण शांति हो, सन्नाटा हो. यही मौन में होता है. जब कहीं से कोई आवाज़ नहीं आती तो निस्तब्धता छा जाती है. पिन-ड्रॉप सायलेंस! आजकल का संगीत भी एक तरह के शोरगुल से कुछ कम नहीं है! सबसे अच्छा अपना सुन्न बटा सन्नाटा:)

पर मौन अपने आप में एक बड़ी साधना भी है, अनुशासन पर्व है. जैसे हर गैजेट या मशीन में आजकल रीसेट का बटन होता है वैसा ही मौन का बटन मैंने आजमा कर देखा हुआ है. इस बटन को दबाते ही भीतर शांति छा जाती है. थोड़ी कोशिश करके देखें तो कोलाहल में भी मौन को साध सकते हैं. किसी हल्ला-हू पार्टी में कॉफ़ी या कोल्ड-ड्रिंक का ग्लास थामकर एक कोने में दुबक जाएँ और यह बटन दबा दें. फिर देखें लोग आपको शांत और संयमित देखकर कैसे खुन्नस खायेंगे. उपद्रवियों की जले जान तो आपका बढ़े मान.

किसी ने कहा है “Silense is Golden” – बड़ी गहरी बात है भाई! इसके कई मतलब हैं. कुछ कहकर किसी अप्रिय स्थिति में पड़ने से बेहतर लोग इसी पर अमल करना पसंद करते हैं.

एक और बात भी है – अब व्यस्तता दिनभर की नहीं रह गयी है. शोरगुल और कोलाहल का सामना तड़के ही होने लगा है और सोने के लिए लेटने तक मेंटल स्टैटिक जारी रहती है. इससे बचने का एक ही उपाय है कि टीवी और किवाड़ को बंद करें और लोगों को लगने दें कि आप वाकई भूतिया महल में ही रहते हैं.

3. गंध/सुगंध – भगवान ने नाक सिर्फ सांस लेने या ऊंची रखने के लिए ही नहीं दी है! सांस लेने के लिए तो मुंह भी काफी है. पर नाक न हो तो तपती धरती पर बारिश की पहली फुहारों से उठती सोंधी महक और लिफ्ट में किसी अकड़ू आत्म-मुग्धा के बदन से आती परफ्यूम की महक का जायका कैसे कर पाते? वैसे इनके अलावा भी बहुत सी सुगंध हैं जो दिल को लुभा लेती हैं! मुझे हवन के समय घर में भर जानेवाली सुगंध बहुत भाती है. एक ओर ये सुगंध मन में शांति और दिव्यता भरती है वहीं दूसरी ओर दूसरी सुगंध भी हैं जिन्हें पकड़ते ही दिल से आह निकलती है और मैं बुदबुदा उठता हूँ ‘हाय, मार डाला!’

खुशबुओं से जुड़ा हुआ एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कभी-कभी उनका अहसास होते ही अतीत की कोई धुंधली सी स्मृति जाग उठती है. ऐसी खुशबू बहुत ही यादगार-से लम्हों को बिसरने से पहले ही जिंदा कर देती है. वैसे, ऐसा ही कुछ बदबू के में भी कहा जा सकता है.

मैं निजी ज़िंदगी में किसी सुगंधित प्रोडक्ट का उपयोग नहीं करता. कोई डियो या परफ्यूम नहीं लगाता. सुगंधित साबुन से स्नान भी नहीं करता. पाउडर भी नहीं लगाता. बहुत से लोग हद से ज्यादा सुगंध का उपयोग करते हैं जो अरुचिकर लगता है. लेकिन जीवन सुगंध से रिक्त नहीं होना चाहिए, इसीलिए मुझे बदल-बदलकर सुगंधित अगरबत्तियां लगाने का चस्का है. इससे सुगंध भी बनी रहती है और पत्नी इस भ्रम में भी रहती है कि मैं बहुत भक्ति-भावना से ओतप्रोत हूँ.

4. संतुष्टि/शांति – जीवन में संतुष्टि और शांति का कोई विकल्प नहीं है. इन्हें ध्वनि या सुगंध की तरह महसूस भी नहीं किया जा सकता. केवल अंतरात्मा ही इनकी उपस्थिति की गवाही दे सकती है. इन्हें न तो खरीदा जा सकता है और न ही किसी से उधार ले सकते हैं. इन्हें अर्जित करने के मार्ग सबके लिए भिन्न-भिन्न हैं. ज्यादातर लोग ज़िंदगी में सब कुछ पा लेना चाहते हैं, सबसे ज्यादा, और सबसे पहले. उन्हें इसकी बहुत ज़रुरत है. मुझे लगता है कि बड़ी-बड़ी बातों में इन्हें तलाश करना अपना समय और ऊर्जा नष्ट करना ही है.

जीवन में संतुष्टि और शांति पाने के लिए बुद्ध या गाँधी या कोई मसीहा बनने की ज़रुरत नहीं है. छोटे-छोटे पलों में भी परिपूर्णता से अपने सभी ज़रूरी कामों को पूरा करते रहना मेरे लिए इन्हें पाने का उपाय है. अपने दैनिक कार्यों को पूरा करना ही नहीं बल्कि और भी कई चीज़ें करना, जैसे बच्चों को सैर पर ले जाना, किसी पड़ोसी की मदद कर देना, सैल्समैन को पानी के लिए पूछना भी कुछ ऐसे काम हैं जिन्हें नहीं करने पर कोई नुकसान नहीं होता पर इन्हें करनेपर मिलनेवाला आत्मिक संतोष असली पूंजी है.

आपके अनुसार वास्तविक संतुष्टि और शांति किसमें निहित है?

संभव है इन्हें अर्जित करने के सूत्र आपके सामने ही बिखरे हों पर आप उन्हें देख नहीं पा रहे हों.

5. प्रेम – प्रेम दुनिया में सबसे सुंदर और सबसे कीमती है. यही हमें इस दुनिया में लाता है और हम इसी के सहारे यहाँ बने रहते हैं. जीवन को सतत गतिमान रखने के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रेम से ही मिलती है. गौर करें तो हमारा दिन-रात का खटना और ज्यादा कमाने के फेर में पड़े रहने के पीछे भी प्रेम की भावना ही है हांलांकि जिनके लिए हम यह सब करते हैं उन्हें प्यार के दो मीठे बोल ज्यादा ख़ुशी देंगे. प्यार के बारे में और क्या लिखूं…

आप किससे प्रेम करते हैं? आप प्रेम बांटते हैं या इसकी खोज में हैं?

प्यार की राह में केवल एक ही चीज़ आती है, और वह है हमारा अहंकार. ज़माना बदल गया है और अब लोग निस्वार्थ भाव से आचरण नहीं करते. हमारा विश्वास इस बात से उठ गया है कि बहुत सी अच्छी चीज़ें बाँटने से ही बढ़ती हैं. इस बारे में आपका क्या ख़याल है?

इस लिस्ट में आप और क्या इजाफा कर सकते हैं? आप जीवन का वास्तविक सौंदर्य किन वस्तुओं या विचारों में देखते हैं?

मेरा प्रिय गीत सुनें.

हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें, हम दर्द के सुर में गाते हैं
जब हद से गुज़र जाती है खुशी, आँसू भी छलकते आते हैं
हैं सबसे मधुर वो गीत

(पहलू में पराये दर्द बसाके, हँसना हँसाना सीख ज़रा
तू हँसना हँसाना सीख ज़रा ) – २
तूफ़ान से कह दे घिर के उठे, हम प्यार के दीप जलाते हैं
हम प्यार के दीप जलाते हैं
हैं सबसे मधुर वो गीत …

(काँटों में खिले हैं फूल हमारे, रंग भरे अरमानों के
रंग भरे अरमानों के ) – २
नादान हैं जो इन काँटों से, दामन को बचाये जाते हैं
दामन को बचाये जाते हैं
हैं सबसे मधुर वो गीत …

(जब ग़म का अन्धेरा घिर आये, समझो के सवेरा दूर नहीं
समझो के सवेरा दूर नहीं ) – २
हर रात की है सौगात यही, तारे भी यही दोहराते हैं
तारे भी यही दोहराते हैं
हैं सबसे मधुर वो गीत …

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खोखली सुरक्षा का भ्रम

कुछ दिनों पहले मेरी पिताजी से एक मसले पर बहुत कहा-सुनी हो गयी. मैं होली पर घर जानेवाला था. पिताजी ने होली के पहले घर की सफाई-पुताई कराई. घर में बहुत सा कबाड़ का सामान था जिसे निकालकर फेंकना ज़रूरी था. मैंने पिताजी से कह रखा था कि होली में घर आने पर मैं चीज़ों की छंटनी करा दूंगा.

भोपाल में मेरे घर में हमारे पास लगभग तीन हज़ार किताबें हैं. बहुत सी तो पिताजी ने पिछले चालीस साल में खरीदीं. उन्हें यहाँ-वहां से समीक्षा के लिए भी बहुत सारी किताबें मिलती रहतीं हैं. मेरी खुद की किताबें भी बहुत हैं. इनमें से कई मैंने पिछले दस-पंद्रह सालों में खरीदीं. ज्यादातर किताबों को मैंने पढ़ा नहीं था. हमेशा यह सोचता रहता था कि अभी तो खूब लम्बा जीवन पड़ा है किताबें पढ़ने के लिए. फुर्सत मिलने पर इन्हें पढ़ेंगे. इसी चक्कर में पुरानी किताबें पढ़ीं नहीं और नई खरीदता गया.

होली के पहले साफ़-सफाई के जोश में पिताजी ने मेरी बहुत सी किताबों को (लगभग 150-200) ग़ैरज़रूरी समझकर रद्दी में बेच दिया. बेचने के बाद घर में इस बात का अंदेशा हुआ कि यह समाचार मिलने पर मैं तो उबल ही जाऊँगा. ऐसा ही हुआ भी. फोन पर कुछ दिनों बाद मुझे बहन ने यह समाचार सुनाया और…

चंद रोज़ बाद मैं होली पर भोपाल पहुंचा. तब तक मेरा गुस्सा तो ठंडा पड़ चुका था इसलिए भोपाल में समय शांतिपूर्वक बिताया. आज इस बात को एक महीने से भी ज्यादा हो चला है और अब मुझे अपनी बिक चुकी किताबों की याद तो आती है पर मैं इस बात को भी समझता हूँ कि मैं यूं ही ताउम्र उन्हें अलमारी की शोभा बनाये रखता और उनको पढ़ने की नौबत कम ही आती. अफ़सोस सिर्फ दो बातों का है कि यह काम करने के पहले घरवालों ने मुझसे पूछा नहीं, और यह कि हजारों रुपयों की किताबों को कौड़ियों के मोल बेच दिया गया.

खैर, चीज़ गयी सो गयी. अब उसका कितना अफ़सोस मनाया जाये! जब तक वे किताबें मेरे पास थीं तब तक मुझमें उनके स्वामित्व का अहंकार था. जहाँ मेरे हमउम्र लड़के हमेशा गैजेट्स और फैशनेबल आयटम्स में अपनी सेक्योरिटी तलाशते थे वहां मैं अपनी किताबगाह में दुबके दीन-दुनिया से बेख़बर सुरक्षित महसूस करता था.

इस वाकये का ताल्लुक इस पोस्ट से भी है. न केवल किताबें बल्कि और भी बहुत सी वस्तुएं हममें से बहुतों के लिए सुरक्षा की भावना का जरिया होतीं हैं.  वे हमारे पास होतीं हैं तो हम बेहतर अनुभव करते हैं और उनके उपयोग-उपभोग के बहाने तलाशते हैं.

मुझे लगता है कि मनुष्य और पशुओं में समानता आहार-भय-निद्रा-संतानोत्पत्ति के स्तर पर तो है ही लेकिन मनुष्य में पशुओं के विपरीत संग्रह की भावना अति प्रबल है. अपने घर-आँगन में हम नानाविध वस्तुओं को भरके उनमें अपना सुकून खोजते हैं, अपना अकेलापन दूर करते हैं. वस्तुओं से भावनात्मक सम्बन्ध जोड़कर हम उनके साए में यादों को संजो कर रखते हैं.


वस्तुओं से भावनात्मक सम्बन्ध जोड़ लेना सहज है. आज भी मेरे परिवार की महिलाओं ने अपनी शादी की साड़ी और पुराने जेवरों को संभाल कर रखा है. “यह कड़ा तुम्हारी दादी के हाथ का है. अब ऐसा सोना नहीं मिलता” – माँ मुझसे कहती हैं. मैं सर हिलाता हूँ. घर में और भी नए-पुराने जेवर हैं लेकिन माँ जब इस कड़े के बारे में बताती हैं तो उनकी आंखों में सोने की कोई और किरण चमकती है. माँ के पास यह कड़ा हिफाज़त से है और माँ इसमें अपनी हिफाज़त ढूंढ रही है.

यह सुरक्षा की भावना बड़ी विकट है. यह इन रूपों में भी झलकती है:-

* अलमारी भर कपड़ों में इस बात का इत्मीनान है कि किसी भी मौके में पहनने के लिए कपडे़ हैं. आजकल लोग गमी में पहनने वाले कपडे़ भी नील-कलफ लगाकर तैयार रखते हैं.

* बड़ा घर इसलिए चाहिए क्योंकि घर में मांगलिक कार्य के मौके पर जगह कम नहीं पड़ेगी. घर बड़ा हो तो हर मौसम में अनुकूलता रहती है. गर्मी में छत पर भी सो सकते हैं. दोनों बेटों की शादी हो जाएगी तो वे अपनी पसंद के फ्लोर पे रहेंगे.

* कार होनी ज़रूरी है. फिर इमरजेंसी में किसी का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा.

* गैरेज में अच्छी टूल-किट, ऊंचा सामान रखने के लिए सीढ़ी, और बागवानी के औजार रखना चाहिए. क्या पता कब किस चीज़ की ज़रुरत पड़ जाये!

* नया गैजेट (ब्लैकबेरी, आईफोन, आइपैड आदि) पास हों तो हम तकनीक से ताल-से-ताल मिलकर चल सकते हैं. आउट-ऑफ़-डेट कौन कहलाना चाहेगा? और फिर ये हों तो आप कहीं से भी काम करो, मेल, करो, ब्लौग पढ़ो, टच में रहो.

और भी न जाने क्या-क्या. ऐसे ही बहुत से कारण और भी हो सकते हैं जब हम वस्तुओं में सुरक्षा तलाशने लगते हों.

पर क्या वाकई इन चीज़ों का पास में होना कुछ सुरक्षा देता है? कहीं यह सुरक्षा भ्रम तो नहीं!

आज मेरे पिता मुझे समझाते हैं कि ऐसी बहुत सी चीज़ें हम अपने आसपास कबाड़ बनाकर रखे रहते हैं जिनकी हमें वाकई ज़रुरत नहीं होती. यदि वे हमारे पास न भी हों तो हम उतने ‘अभाव’ में नहीं होते जितना हमें लगता है. देखिये:-

* आप साल भर में पहने जाने वाले कपड़ों का लेखा-जोखा करें तो आप जान जायेंगे कि आपको ‘क्या-पता-कब-इसकी-ज़रुरत-पड़-जाये’ जैसे कपड़ों को पहनने के मौके न के बराबर ही मिलते हैं. ज्यादातर अवसरों पर हम सिर्फ-और-सिर्फ वही कपडे़ पहनते हैं जिन्हें पहनना ज़रूरी होता है (या जिन्हें ही पहनना चाहिए). गैरज़रूरी कपड़ों को बिना किसी इमोशनल अत्याचार झेले किसी और को दिया जा सकता है (और उसे भी शायद उनकी ज़रुरत न हो).

* छोटे घरों में रहने के कुछ फायदों को अनदेखा किया जाता है. जैसे – छोटा घर, कम कचरा. छोटा घर, कम कर्जा. छोटा घर, ज़रुरत भर का सामान.

* कार न भी हो तो बाइक से, ऑटो से, बस से, या पैदल भी काम चल जाता है बशर्ते ज़रूरतें कम हों. वाकई कोई इमरजेंसी हो तो एम्बुलेंस की ही ज़रुरत पड़ती है जिसे शायद कोई भी खरीद के रखना नहीं चाहेगा.

* लेटेस्ट गैजेट लेने में कोई तुक नहीं है. मैं यह सब दस साल पुराने कम्प्यूटर पर लिख रहा हूँ जिसे वक़्त-ज़रुरत के हिसाब से मैं अपग्रेड कर चुका हूँ. बहुत कम ही ऐसे मौके आते हैं जब नया लिए बगैर काम करना नामुमकिन हो जाये. सच में!

* हर जगह हर समय कनेक्ट रहने की ज़रुरत नहीं है. इस बात को ज्यादा अरसा नहीं हुआ जब कोई भी कहीं भी कनेक्टेड नहीं रहता था और फिर भी सब जीते रहे! मैं गाड़ी चलाते वक़्त, खाने के समय, और यूं ही कभी एकांत के लिए फोन बंद रखता हूँ. मेरा फोन केवल बातचीत ही करा सकता है. बाकी इंटरटेनमेंट के लिए टीवी/कम्प्यूटर है.

अब यह सोचकर बड़ी राहत मिलती है कि कभी एक रात को इन्टरनेट बंद पड़ जाये तो मैं झुंझलाते हुए कम्पनी फोन नहीं करने लगूंगा. “कोई बात नहीं. कल देख लेंगे.”

अब आप बताएं कि आप उन हालत में क्या करेंगे:-

1. जब आपके कलेजे के टुकड़े के मानिंद कोई चीज़ या सुविधा आप अपने करीब नहीं पायें.

2. ऐसा होने की संभावना कितनी है, और,

3. तब क्या होगा यदि वह चीज़ या सुविधा आपसे हमेशा के लिए छिन जाये!

कम-से-कम चीज़ों और सुविधाओं के साथ रहकर देखें. यह देखें कि क्या जीवन दुनियावी वस्तुओं से उपजती खोखली सुरक्षा के बिना वाकई कष्टदायक है! अपना बैक-अप प्लान तैयार रखें.

(यह पोस्ट इस पोस्ट का अनुवाद/रूपांतरण है)

(A personal post about the illusion of being safe and secured – inspired by Leo Babauta – in Hindi)

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ज़िन्दगी कैसे जियें

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“ज़िन्दगी लम्बी नहीं, गहरी होनी चाहिए” – रौल्फ वाल्डो इमर्सन

क्योंकि ज़िन्दगी जीने में और जीवित रहने में बहुत बड़ा अंतर है

* जब तक जियें तब तक सीखते रहें - हमेशा नया कुछ सीखने और पढने में हम जितना समय और ऊर्जा लगाते हैं वह हमारे जीवन को रूपांतरित करता रहता है. हम सभी हमारे ज्ञान का ही प्रतिबिम्ब हैं. जितना अधिक हम ज़िन्दगी से सीखते हैं उतना अधिक हम इसपर नियंत्रण रख पाते हैं.

* अपने शरीर और स्वास्थ्य की रक्षा करें - हमारा शरीर हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण यन्त्र या औजार है. हम जो कुछ भी सही-गलत करते हैं उसका हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है. हमें अपने शरीर को पोषण, व्यायाम, और आराम देना चाहिए और स्वास्थ्य की रक्षा करनी चाहिए.

* प्रियजनों के साथ अधिकाधिक समय व्यतीत करना - हम सभी भावुक प्राणी हैं. हमें सदैव अपने परिजनों और मित्रों के सहारे की ज़रुरत होती है. जितना अधिक हम उनका ध्यान रखते हैं उतना ही अधिक वे हमारी परवाह करते हैं.

* अपने विश्वासों के प्रति समर्पण रखें - कुछ लोग अपने सामजिक परिवेश में सक्रीय होते हैं, कुछ लोग धार्मिक आस्था से सम्बद्ध हो जाते हैं, कोई व्यक्ति लोगों का जीवन सुधरने की दिशा में प्रयास करता है, अधिकांश लोग अपने काम और नौकरी के प्रति समर्पण भाव रखते हैं. प्रत्येक स्थिति में उन्हें एक समान मनोवैज्ञानिक परिणाम मिलता है. वे स्वयं को ऐसी गतिविधि में लिप्त रखते हैं जिससे उन्हें मानसिक शांति और संतुष्टि मिलती है. इससे उनके जीवन को मनोवांछित अर्थ मिलता है.

* जो भी करें सर्वश्रेष्ठ करें - यदि आप कोई काम बेहतर तरीके से नहीं कर सकते तो उसे करने में कोई तुक नहीं है. अपने काम और अपनी अन्य गतिविधियों जैसे रूचियों आदि में सबसे बेहतर साबित होकर निखरें. लोगों में अपनी धाक जमायें कि आप जो कुछ भी करते हैं वह सदैव सर्वश्रेष्ठ ही होता है.

* अपने पैर चादर के भीतर ही रखें - अच्छी ज़िन्दगी जियें लेकिन किसी तरह का अपव्यय न करें. दूसरों को दिखाने के लिए पैसा न उडाएं. याद रखें कि वास्तविक संपत्ति दुनियावी चीज़ों में निहित नहीं होती.  अपने धन का नियोजन करें, धन को अपना नियोजन न करने दें. अपने से कम आर्थिक हैसियत रखनेवाले को देखकर जियें.

* संतोषी जीवन जियें - स्वतंत्रता सबसे बड़ा वरदान है. संतोष सबसे बड़ी स्वतंत्रता है.

* अपना प्रेमाश्रय बनायें - घर वहीँ है, ह्रदय है जहाँ. आपका घर कैसा भी हो, उसे प्यार के पलस्तर से बांधे रखें. याद रखें, घर और परिवार एक दुसरे के पूरक हैं.

* स्वयं और दूसरों के प्रति ईमानदार रहें - ईमानदारी भरा जीवन मानसिक शांति की गारंटी है और मानसिक शांति अनमोल होती है.

* दूसरों का आदर करें - बड़ों का आदर करें, छोटों का भी सम्मान करें. ऐसी कोई श्रेणी नहीं होती जो किसी मानव को दूसरे मानव से पृथक कर सकती हो. सभी को एक समान इज्ज़त बख्शें. जितना धैर्य आप अपने नवजात शिशु के प्रति दिखाते हैं उतने ही धैर्य से अपने वृद्ध पिता से भी व्यवहार करें.

* नया करते रहें - अपने प्रियजनों के साथ आप भांति-भांति प्रकार के अनुभव साझा करें. आपकी जीवन गाथा विस्तृत अनुभवों की लड़ी ही तो है! जितने अच्छे अनुभव आप उठाएंगे, आपका जीवन उतना ही अधिक रोचक बनेगा.

* अपने कर्मों की जिम्मेदारी से न बचें - आप कुछ भी करें, भले ही वह सही हो या गलत, उसकी जिम्मेदारी उठाने से न कतराएँ. यदि आप स्वयं जिम्मेदारी ले लेंगे तो आपको जिम्मेदार नहीं ठहराया जायेगा.

* अपने वायदों को हद से भी ज्यादा पूरा करें - बहुत सारे लोग दूसरों से बिना सोचविचार किये ही वायदे कर बैठते हैं और उन्हें निभा नहीं पाते. वे वादा करते हैं काम पूरा करने का लेकिन काम शुरू भी नहीं करते. यदि आप लोगों की दृष्टि में ऊंचा उठना चाहते हैं तो इसका ठीक उल्टा करें. अपनी योग्यताओं कों यदि आप कम प्रदर्शित करेंगे तो आप सदैव लोगों की दृष्टि में वांछित से अधिक उपयोगी साबित होंगे. लोगों में आपकी कर्तव्यनिष्ठ और कार्यकुशल व्यक्ति की छवि बनेगी.

* सुनें ज्यादा, बोलें कम - ज्यादा सुनने और कम बोलने से आप ज्यादा सीखते हैं और आपका ध्यान विषय से कम भटकता है.

* अपना ध्यान कम विषयों पर केन्द्रित करें - कराटे के बारे में सोचें, ब्लैक बैल्ट कम सुन्दर दिखती है बनिस्पत ब्राउन बैल्ट के. लेकिन क्या एक ब्राउन बैल्ट किसी रेड बैल्ट से अधिक सुन्दर दिखती है? बहुत से लोग ऐसा नहीं सोचेंगे. हमारा समाज प्रबुद्ध और महत्वपूर्ण लोगों कों बहुत ऊंची पदवी पर बिठाता है. परिश्रम बहुत मायने रखता है लेकिन इसे केन्द्रित होना चाहिए. अपना ध्यान अनेक विषयों में लगाकर आप किसी एक में पारंगत नहीं हो पायेंगे. एक को साधने का विचार ही सर्वोत्तम है.

* उपलब्ध साधनों का भरपूर दोहन करें - साधारण व्यक्ति जब किसी बहुत प्रसन्नचित्त अपाहिज व्यक्ति कों देखते हैं तो उन्हें इसपर आर्श्चय होता है. ऐसी शारीरिक असमर्थता की दशा में भी कोई इतना खुश कैसे रह सकता है!? इसका उत्तर इसमें निहित है कि वे ऐसे व्यक्ति अपने पास उपलब्ध सीमित शक्ति और क्षमता का परिपूर्ण दोहन करने में सक्षम हो जाते हैं. अश्वेत गायक स्टीवी वंडर देख नहीं पाते लेकिन अपनी सुनने और गाने की प्रतिभा को विकसित करने के परिणामस्वरूप उन्होंने 25 ग्रैमी पुरस्कार जीत लिए हैं.

* छोटी-छोटी खुशियों से ज़िन्दगी बनती है - मैं यह हमेशा ही कहता हूँ कि जीवन में जो कुछ भी सबसे अच्छा है वह हमें मुफ्त में ही मिल जाता है. वह सब हमारे सामने नन्हे-नन्हे पलों में मामूली खुशियों के रूप में जाने-अनजाने आता रहता है. प्रकृति स्वयं उन क्षणों कों हमारी गोदी में डालती रहती है. अपने प्रियजन के साथ हाथों में हाथ डालकर बैठना और सरोवर में डूब रहे सूर्य के अप्रतिम सौन्दर्य कों देखने में मिलनेवाले आनंद का मुकाबला और कोई बात कर सकती है क्या? ऐसे ही अनेक क्षण देखते-देखते रोज़ आँखों से ओझल हो जाते हैं और हम व्यर्थ की बातों में खुशियों की तलाश करते रहते हैं.

* लक्ष्य पर निगाह लगायें रखें - लक्ष्य की दिशा में न चलने से और भटकाव में पड़ जाने से कब किसका भला हुआ है! आप आज जहाँ हैं और कल आपको जहाँ पहुंचना है इसपर सतत मनन करते रहने से लक्ष्य स्पष्ट हो जाता है और नई दिशाएं सूझने लगती हैं. इससे आपमें स्वयं कों सम्भालकर पुनः शक्ति जुटाकर नए हौसले के साथ चल देने की प्रेरणा मिलती है.

* अवसरों कों न चूकें - कभी-कभी अवसर अत्प्रश्याशित समय पर हमारा द्वार खटखटाता है. ऐसे में उसे पहचानकर स्वयं कों उसके लिए परिवर्तित कर लेना ही श्रेयस्कर होता है. सभी बदलाव बुरे या भले के लिए ही नहीं होते.

* इसी क्षण में जीना सीखें - जो पल इस समय आपके हाथों में है वही पल आपके पास है. इसी पल में ज़िन्दगी है. इस पल कों जी लें. यह दोबारा लौटकर नहीं आएगा.

(यह पोस्ट यहाँ से साभार लेकर अनूदित/संपादित की गई है)

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