Tag Archives: शांति

मनुष्यता से दिव्यता की ओर


तुम्हारी आत्मा, चेतना, और जीवन दिव्यता का अंश है. यह ईश्वर का ही विस्तार है. तुम स्वयं को ईश्वर तो नहीं कह सकते पर ईश्वर से एकात्म्य तुम्हारा जन्मसिद्द अधिकार है. पानी की एक बूँद सागर नहीं हो सकती लेकिन यह सागर से ही निकली है और इसमें सागर के सारे गुण हैं. ~ एकहार्ट टोल

Eckhart Tolle

“कोई भी तुम्हें यह नहीं बता सकता कि तुम कौन हो, क्या हो. वह जो कुछ भी कहेगा वह एक नयी अवधारणा होगी, इसलिए वह तुम्हें बदल न सकेगी. तुम जो भी हो इसका संबंध किसी मान्यता से नहीं है. वास्तव में, हर मान्यता, हर विश्वास एक अवरोध ही है. तुम्हें इसके लिए बोधिसंपन्न होने की आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि तुम उसके साथ ही जन्मे हो. लेकिन जब तक तुम्हें इस तथ्य का ज्ञान नहीं होता तब तक तुम इस जगत में अपनी आभा नहीं बिखेर सकते. तुम्हारा बोध, तुम्हारी जागृति वही कहीं छुपी रहती है जो तुम्हारा वास्तविक आश्रय है. यह ऐसा ही है जैसे कोई दरिद्र व्यक्ति सड़कों पर ठोकर खाने के लिए बाध्य हो और उसे इस बात का पता ही न हो कि उसके नाम कहीं एक खाता भी खुला है जिसमें लाखों करोड़ों रुपये उसकी राह देख रहे हैं.”

“जीवन के प्रति किसी भी प्रतिरोध का न होना ही ईश्वरीय कृपा, आत्मिक शांति और सहजता की दशा है. जब यह दशा उपलब्ध हो तो आसपास बिखरे हुए संसार के शुभ-अशुभ का द्वंद्व मायने नहीं रखता. यह विरोधाभास प्रतीत होता है पर जब नाम-रूप आदि पर हमारी आतंरिक निर्भरता समाप्त हो जाती है तब जीवन की बाहरी-भीतरी स्वाभाविक अवस्था अपने शुद्ध रूप में प्रकट होती है. जिन वस्तुओं, व्यक्तियों, और परिस्थितियों को हम अपनी प्रसन्नता के लिए अनिवार्य मानते हैं वे हमारी ओर निष्प्रयास ही आने लगती हैं और हम उनका आनंद मुक्त रूप से उठा सकते हैं… और जब तक वे टिके रहें तब तक के लिए उनके महत्व को आंक सकते हैं. सृष्टि के नियमों के अंतर्गत वे सभी वस्तुएं और व्यक्ति कभी-न-कभी हमारा साथ छोड़ ही देंगीं, आने-जाने का चक्र चलता रहेगा, लेकिन उनपर निर्भरता की शर्त टूट जाने पर उनके खोने का भय नहीं सताएगा. जीवन की सरिता स्वाभाविक गति से बहती रहेगी.”

एकहार्ट टोल जर्मन मूल के कनाडावासी आध्यात्मिक गुरु और बेस्ट सेलिंग लेखक हैं. इनकी दो पुस्तकों यथा The Power of Now और The New Earth की लाखों प्रतियाँ बिक चुकी हैं.

About these ads

12 Comments

Filed under प्रेरक लेख, Quotations

प्रसन्नता या शांति?


एक दिन बातों ही बातों में एक अन्तरंग मित्र यह पूछ बैठे, “तुम बहुत अच्छी बातें शेयर करते हो और तुमसे बातें करके अच्छा लगता है. लेकिन तुम हमेशा शांति की बात क्यों करते हो? प्रसन्नता, आनंद, और उत्सव की बात क्यों नहीं करते? वही सब तो हमें चाहिए? लोग चाहते हैं कि उनकी तकलीफें कम हों और जीवन में भरपूर आनंद हो. क्या प्रसन्नता की चाह रखना बुरी बात है?”

मेरे मित्र किसी गुरु के अधीन एक ध्यान समुदाय से जुड़े हैं जिसके सदस्य जीवन के आनंद की प्राप्ति के लिए कोई जप साधना आदि करते हैं. उस समय तो मैंने उन्हें यही कहकर टाल दिया कि मेरे लिए शांति अधिक महत्वपूर्ण विचार है पर बाद में विस्तार से सोचने पर मेरे मन में जो विचार आये उन्हें मैं आपसे शेयर करना चाहता हूँ.

यह सच है कि हम अपने हर उद्देश्य में सुख और प्रसन्नता की ही खोज करते हैं. संसार की बहुत सी समस्याओं से जूझते हुए हमारे मन में यही कामना सतत बनी रहती है कि हम सदैव सुखी रहें, प्रसन्नचित्त रहें. मैं भी सुख और प्रसन्नता की बातें करता हूँ लेकिन मेरे अब तक के जीवन का निचोड़ यह कहता है कि सुख और प्रसन्नता को लेकर हम सबके विचार भिन्न हैं. इन्हें किसी तय सांचे में परिभाषित नहीं किया जा सकता.

बहुत सरसरे अंदाज़ में कहूं तो प्रसन्नता आनंद की वह अनुभूति है जब हम किन्हीं दुःख-दर्द का अनुभव नहीं कर रहे हों. लेकिन यह प्रसन्नता की बहुत औसत परिभाषा है. प्रसन्नता बहुत उथला और अयथार्थ भाव है. उथला इसलिए क्योंकि यह देर तक साथ नहीं रहता. यह परिवर्तनशील है और बहुत सारे बाहरी तत्वों पर निर्भर करता है. इसके साथ ही यह अयथार्थ भी है क्योंकि जीवन में कुछ भी नियत नहीं है एवं दुःख-दर्द कभी भी सर उठा सकते हैं.

जीवन में आनंद प्राप्त करने और प्रसन्नता का मार्ग दिखानेवाली पुस्तकों के बारे में भी मेरी राय विषम है हांलांकि मैं उन्हें बुरा नहीं मानता. यदि आप उनमें दी गयी टिप्स को अपने जीवन में उतारकर स्वयं में आनंद और आशा का संचार कर सकते हैं तो मैं उन्हें पढ़ने का समर्थन करता हूँ. लेकिन ऐसी किताबों के साथ सबसे अधिक अखरने वाली बात मुझे यह लगती है कि ये किताबें लोगों को यह मानने पर विवश कर देती हैं कि आनंद की प्राप्ति ही जीवन का ध्येय है और मनुष्य को हर परिस्तिथि में प्रसन्न ही रहना चाहिए. समाज के बड़े अंश में इस धारणा के दुष्प्रचार के कारण ही अब उन औषधियों (mood elevating drugs) की मांग और खपत बढ़ती जा रही है जो रसायनों के द्वारा चित्त की अवस्था में बदलाव लाती हैं. ज़ाहिर है कि इस सबके पीछे अरबों डॉलर का व्यवसाय करनेवाली कंपनियों की सोची-समझी नीति है जिसके कारण आयेदिन नए-नवेले डिसॉर्डर और कॉम्प्लेक्स खोजे जा रहे हैं जिन्हें एक मैजिक पिल लेकर चुटकियों में दूर भगाया जा सकता है. इस बात की ओर बहुत कम लोगों का ध्यान जाता है कि पेड़ को हरा-भरा रखने के लिए उसकी पत्तियों को नहीं बल्कि जड़ को सींचा जाता है. जीवन में होने वाली तमाम विसंगतियों और उतार-चढ़ाव का उपचार हम बाहरी तत्वों में खोज रहे हैं जबकि वास्तविक समस्या हमारे भीतर है.

मुझे यह भी लगता है कि हमारे धर्मों और आध्यात्मिक परम्पराओं ने हमारे मन में आनंद की ऐसी छवि गढ़ दी है जिससे हम नहीं निकल पा रहे हैं. जो व्यक्ति किसी-न-किसी साधना या पद्धति का पालन कर रहे हैं उनमें भी अधिकांश का यह मानना है कि अपने ध्येय में सफल होने पर उन्हें अतीव आनंददायक पारलौकिक अनुभूतियों की प्राप्ति होगी. स्वर्ग की प्राप्ति, अमरता की संकल्पना, ध्यान, समाधि, आत्मज्ञान, निर्वाण आदि को हमने परमानंद से सम्बद्ध कर दिया है. मानव जीवन के हर संघर्ष और दुःख के लिए मैं आनंदपूर्ण दीर्घजीवन तथा ईश्वर-दर्शन की कामना, स्वार्थमय सुख-संचय, और अनात्म की भावना को उत्तरदायी मानता हूँ.

मैं स्वयं को पारंपरिक अर्थ में आध्यात्मिक नहीं मानता. कभी तो मैं ईश्वरवादी बन जाता हूँ और कभी जड़ नास्तिक. चाहे जो हो, आध्यात्म मेरे लिए आनंद की खोज नहीं बल्कि जीवन को क्षण-प्रतिक्षण उसकी पूर्णता और विहंगमता में जीने का अनुशासन है. मैं इसे शांति से देखता और अनुभव करता रहता हूँ… या ईमानदारी से कहूं तो ऐसा करने का सजग प्रयास करता रहता हूँ. मुझे लगता है कि यह संभव है. इसके लिए मुझे किसी आसन में बैठकर कोई ध्यान या जप करने की ज़रुरत नहीं है. आध्यात्म के प्रति मेरी यह धारणा प्रारंभ से ही ऐसी नहीं थी. मुझे हमेशा से ही यह लगता था कि कोई ईश्वर न भी हो तो भी हमारे भीतर आत्मा जैसा कुछ है जिसे कुछ विधियों के कठोर अभ्यास से देखा या अनुभूत किया जा सकता है. इस विषय पर मैं किसी प्रामाणिकता का दावा नहीं करता पर बहुत वर्षों के चिंतन-मनन और अभ्यास के बाद मुझे यह लगने लगा है कि हम बाहरी या भीतरी आनंद के छलावे में अपने जीवन को रेत की मांनिंद फिसलने दे रहे हैं. सिर्फ मन की सरल सहज शांति ही वह चीज़ है जिसे हम चाहें तो आसानी से प्राप्त कर सकते हैं पर उसे हम अवास्तविक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पीछे धकेल देते हैं.

मैं अपने अनुभव से यह कह सकता हूँ कि वास्तविकता में घट रही घटनाओं को साक्षी भाव से देखने से हमारे मानस और काया को शांति मिलती है, भले ही यह श्रमसाध्य और अप्रीतिकर हो. यह हमें उस दशा में ले जाता है जिसमें द्वैत नहीं होता. आप इसे आनंद भी कह सकते हैं पर इसमें कोई हिलोर नहीं है. यह संभवतः मथते हुए सागर की तलहटी है जहाँ सब कुछ एकसम है, जिसका अपना आनंद है. यह सुनने में आश्चर्यजनक लग सकता है पर किसी घोर वेदना से गुज़रनेवाले व्यक्ति के भीतर भी ऐसी ही भावना उपज सकती है क्योंकि उसके सामने कोई विकल्प नहीं होते. आपने भी किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में पढ़ा होगा या आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते होंगे जो बड़े-से-बड़े दर्द को भी अपार शांति से झेल गया होगा. यदि आप उसे निर्मोही कहेंगे तो मैं उसे अनासक्त कहूँगा. उस व्यक्ति का वर्णन करने के लिए ये दो भिन्न दृष्टिकोण हैं जिसमें आप किसी एक में अधिक सकारात्मकता देख सकते हैं.

सभी धार्मिक-दार्शनिक मान्यताओं में मैंने बौद्ध धर्म का गहराई से अध्ययन किया है और उससे अधिक साम्य रखता हूँ. बौद्ध मत में यह विचार बहुत प्रबल है कि प्रसन्नता और सुख की कामना अंतत दुःख की उत्पत्ति का कारण बनती है. आप इसे कर्म सिद्धांत और अन्य संबंधित प्रत्ययों से जोड़कर भी देख सकते हैं. इस विषय पर गंभीर मतभेद हो सकते हैं पर मुझे अब यही लगने लगा है कि सुखी या प्रसन्न रहने की चाह हमें ऐसे संघर्ष तक ले जाती है जिसकी परिणति निराशा और पश्चाताप में होती है.

जीवन अनुभवों की सतत धारा है. आप इसमें बहकर डूब भी सकते हैं और इसके विपरीत तैरने की जद्दोजहद में स्वयं को नष्ट भी कर सकते हैं. दोनों ही स्थितियों में आपका मिटना तय है. यदि आप इसे केवल बहते हुए देखेंगे तो सुरक्षित रहेंगे. तब आप स्थिर रहेंगे, शांत रहेंगे, और अन्तःप्रज्ञ बनेंगे. उस दशा में आपके भीतर मौलिक बोध उपजेगा और आप सभी वस्तुओं को खंड-खंड उनके परिदृश्य में देख पायेंगे. आवश्यकता सिर्फ दर्शक बनने की है, न तो नाटक का निर्देशन करना है और न ही उसमें कूद पड़ना है. आप जागृत अवस्था में जो कुछ भी करेंगे वही आपका ध्यान बन जाएगा. आप कितनी ही पुस्तकें पढ़ लें या पद्धतियाँ सीख लें पर स्वयं के भीतर उतरे बिना और स्वयं में परिवर्तन लाये बिना वे सब व्यर्थ ही रहेंगीं और आप प्रसन्नता या शांति (जो भी आपका ध्येय हो) से सदैव दूर रहेंगे.

19 Comments

Filed under प्रेरक लेख

Muddy Mind And Pure Consciousness – मन और शांति


मनुष्य का मन अद्भुत है. वही संसार का और मोक्ष का रहस्य है. पाप और पुण्य, बंधन और मुक्ति, स्वर्ग और नर्क सब उसमें ही समाये हुए हैं. अन्धकार और प्रकाश उसी का है. उसमें ही जन्म है, उसमें ही मृत्यु है. वही है द्वार बाह्य जगत का, वही है सीढ़ी अंतस की. उसका ही न हो जाना दोनों के पार हो जाना हो जाता है.

मन सब कुछ है. सब उसकी लीला और कल्पना है. वह खो जाए, तो सब लीला विलीन हो जाती है.

कल यही कहा था. कोई पूछने आया, ‘मन तो बड़ा चंचल है, वह खोये कैसे? मन तो बड़ा गंदा है, वह निर्मल कैसे हो?’

मैंने फिर एक कहानी कही : बुद्ध जब वृद्ध हो गये थे, तब एक दोपहर एक वन में एक वृक्ष तले विश्राम को रुके थे. उन्हें प्यास लगी तो आनंद पास की पहाड़ी झरने पर पानी लेने गया था. पर झरने से अभी-अभी गाड़ियां निकली थी और उसका पानी गंदा हो गया था. कीचड़ ही कीचड़ और सड़े पत्ते उसमें उभर कर आ गये थे. आनंद उसका पानी बिना लिए लौट आया. उसने बुद्ध से कहा, ‘झरने का पानी निर्मल नहीं है, मैं पीछे लौट कर नदी से पानी ले आता हूं.’ नदी बहुत दूर थी. बुद्ध ने उसे झरने का पानी ही लाने को वापस लौटा दिया. आनंद थोड़ी देर में फिर खाली लौट आया. पानी उसे लाने जैसा नहीं लगा. पर बुद्ध ने उसे इस बार भी वापस लौटा दिया. तीसरी बार आनंद जब झरने पर पहुंचा, तो देखकर चकित हो गया. झरना अब बिलकुल निर्मल और शांत हो गया था, कीचड़ बैठ गयी थी और जल बिलकुल निर्मल हो गया था.

यह कहानी मुझे बड़ी प्रीतिकर है. यही स्थिति मन की भी है. जीवन की गाड़ियां उसे विक्षुब्ध कर जाती हैं, मथ देती हैं. पर कोई यदि शांति और धीरज से उसे बैठा देखता है रहे, तो कीचड़ अपने से नीचे बैठ जाती है और सहज निर्मलता का आगमन हो जाता है. बात केवल धीरज और शांति प्रतीक्षा की है और ‘बिना कुछ किये’ मन की कीचड़ बैठ सकती है.

केवल साक्षी होना है और मन निर्मल हो जाता है. मन को निर्मल करना नहीं होता है. करने से ही कठिनाई बन जाती है. उसे तो केवल किनारे पर बैठ कर देखें और फिर देखें कि क्या होता है!

ओशो के पत्रों के संकलन ‘क्रांतिबीज’ से. प्रस्तुति – ओशो शैलेन्द्र

A beautiful Buddhist story illustrates the state of pure consciousness.

Buddha was once on His way to deliver a sermon in a village with His disciple Ananda. On their way, they crossed over a small canal and proceeded further. It was a hot day and the sun was blazing. Buddha felt thirsty and rested under a tree.

He asked Ananda to get Him some water to quench His thirst from the canal that they had just crossed. In the meantime, a bullock cart had crossed the canal making the water muddy.

Ananda on finding the water muddy returned back to Buddha saying that the water was not clean.

Buddha insisted Ananda to wait for sometime until the water becomes clean and then fetch some to quench His thirst.

So when Ananda went back he still found the water not good enough to drink. He waited for a while and went into meditation.

After his meditation, Ananda was surprised to find the mud settled and the crystal clear water fit to be drunk.

Osho says that same is the case with our minds too. Thoughts are like the mud which pollutes the consciousness. Our consciousness gets cleared the moment we cease paying attention to thoughts, cooperating with them, analysing them and bothering them. It is only then that silence descends in pure consciousness.

17 Comments

Filed under Osho

जीवन का सौंदर्य


हर दिन, हर समय… दिव्य सौंदर्य हमें घेरे हुए है.

क्या आप इसका अनुभव कर पाते हैं? क्या यह आपको छू भी पाता है?

हममें से बहुतेरे तो दिन-रात की आपाधापी में इसका अंशमात्र भी देख नहीं पाते. उगते हुए सूरज की अद्भुत लालिमा, बच्चे की मनभावन खिलखिलाहट, चाय के पतीले से उठती हुई महक, दफ्तर में या सड़क में किसी परिचित की कुछ कहती हुई-सी झलक, ये सभी सुंदर लम्हे हैं.

जब हम सौंदर्य पर विचार करते हैं तो ज्यादातर लोगों में मानस में खूबसूरत वादियाँ और सागरतट, फ़िल्मी तारिका, महान पेंटिंग या अन्य किसी भौतिक वस्तु की छवि उभर आती है. मैं जब इस बारे में गहराई से सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि जीवन में मुझे वे वस्तुएं या विचार सर्वाधिक सुंदर प्रतीत होते हैं जो इन्द्रियातीत हैं अर्थात जिन्हें मैं छूकर, या चखकर, यहाँ तक कि देखकर भी अनुभव नहीं कर सकता.

वे अनुभव अदृश्य हैं फिर भी मेरे मन-मष्तिष्क पर वे सबसे गहरी छाप छोड़ जाते हैं. मुझे यह भी लगता है कि वे प्रयोजनहीन नहीं हैं. उनके मूल में भी ईश्वरीय विचार या योजना है. ईश्वर ने उनकी रचना की पर उन्हें हमारी इन्द्रियों की परिधि से बाहर रख दिया ताकि हम उन्हें औसत और उथली बातों के साथ मिलाने की गलती नहीं करें.

हमें वास्तविक प्रसन्नता और सौंदर्य का बोध करानेवाले वे अदृश्य या अमूर्त प्रत्यय कौन से हैं? वे सहज सुलभ होते हुए भी हाथ क्यों नहीं आते? इसमें कैसा रहस्य है?

ऐसे पांच प्रत्ययों का मैंने चुनाव किया है जो किसी विशेष क्रम में नहीं हैं.

1. ध्वनि/संगीत – मुझे आपके बारे में नहीं पता पर मेरे लिए संगीत कला की सबसे गतिशील विधा है. ऐसे कई गीत हैं जो मुझे किसी दूसरी दुनिया में ले जाते हैं और मेरे भीतर वैसा भाव जगा देते हैं जो शायद साधकों को समाधिस्थ होने पर ही मिलता होगा.

संगीत में अद्भुत शक्ति है और यह हमारे विचारों को ही नहीं बल्कि विश्व को भी प्रभावित करती है. एक अपुष्ट जानकारी के अनुसार हम लय और ताल पर इसलिए थिरकते हैं क्योंकि हमारे मन के किसी कोने में माता के गर्भ में महीनों तक सुनाई देती उसकी दिल की धड़कन गूंजती रहती है. ये बड़ी अजीब बात है पर यह सही न भी हो तो मैं इसपर विश्वास कर लूँगा.

“यदि मैं भौतिकविद नहीं होता तो संभवतः संगीतकार बनता. मैं अक्सर स्वरलहरियों में सोचता हूँ. मेरे दिवास्वप्न संगीत से अनुप्राणित रहते हैं. मुझे लगता है कि मानव जीवन एक सरगम की भांति है. संगीत मेरे लिए मनोरंजन का सबसे बड़ा माध्यम है” – अलबर्ट आइंस्टीन

संगीत की अनुपस्थिति में साधारण ध्वनियाँ भी मुझे उससे कमतर नहीं लगतीं. बादलों का गर्जन हो या बच्चे की किलकारी, टपरे पर बारिश की बूँदें हों या पत्तों की सरसराहट – साधारण ध्वनियाँ भी मन को प्रफुल्लित करती हैं. सारी ध्वनियाँ और संगीत अदृश्य है पर मन को एक ओर हर्षित करता है तो दूसरी ओर विषाद को बढ़ा भी सकता है.

आपको कौन सी ध्वनियाँ और संगीत सबसे अधिक प्रभावित करतीं हैं? आपका सबसे प्रिय गीत कौन सा है? क्या कहा, मेरे प्रिय गीत के बारे में पूछ रहे हैं? पचास के दशक की फिल्म ‘पतिता’ का तलत महमूद द्वारा गया गया गीत ‘है सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं’ मेरा सर्वप्रिय गीत है. पिछले तीस सालों से कोई ऐसा महीना नहीं गुज़रा होगा जब मैंने यह गीत नहीं सुना या गुनगुनाया. यह तो रही मेरी बात. हो सकता है आप मेरी पसंद से इत्तेफाक न रखें. आदमी-आदमी की बात है.

2. निस्तब्धता/मौन – देखिये, पहले तो मैंने संगीत की बात छेड़ी थी और अब एकदम से चुप्पी पर आ गया. पर यह तो आप जानते ही हैं कि एक सुरीली ध्वनि के पीछे दस या सौ कोलाहलपूर्ण या बेसुरी आवाजें होतीं हैं. मुझे फर्श की टाइलें काटनेवाली आरी की आवाज़ या गाड़ियों के रिवर्स हौर्न बहुत बुरे लगते हैं. आपको भी कुछ आवाजें बहुत खिझाती होंगी.

ऐसी कर्कश ध्वनियों से तो अच्छा है कि कुछ समय के लिए पूर्ण शांति हो, सन्नाटा हो. यही मौन में होता है. जब कहीं से कोई आवाज़ नहीं आती तो निस्तब्धता छा जाती है. पिन-ड्रॉप सायलेंस! आजकल का संगीत भी एक तरह के शोरगुल से कुछ कम नहीं है! सबसे अच्छा अपना सुन्न बटा सन्नाटा:)

पर मौन अपने आप में एक बड़ी साधना भी है, अनुशासन पर्व है. जैसे हर गैजेट या मशीन में आजकल रीसेट का बटन होता है वैसा ही मौन का बटन मैंने आजमा कर देखा हुआ है. इस बटन को दबाते ही भीतर शांति छा जाती है. थोड़ी कोशिश करके देखें तो कोलाहल में भी मौन को साध सकते हैं. किसी हल्ला-हू पार्टी में कॉफ़ी या कोल्ड-ड्रिंक का ग्लास थामकर एक कोने में दुबक जाएँ और यह बटन दबा दें. फिर देखें लोग आपको शांत और संयमित देखकर कैसे खुन्नस खायेंगे. उपद्रवियों की जले जान तो आपका बढ़े मान.

किसी ने कहा है “Silense is Golden” – बड़ी गहरी बात है भाई! इसके कई मतलब हैं. कुछ कहकर किसी अप्रिय स्थिति में पड़ने से बेहतर लोग इसी पर अमल करना पसंद करते हैं.

एक और बात भी है – अब व्यस्तता दिनभर की नहीं रह गयी है. शोरगुल और कोलाहल का सामना तड़के ही होने लगा है और सोने के लिए लेटने तक मेंटल स्टैटिक जारी रहती है. इससे बचने का एक ही उपाय है कि टीवी और किवाड़ को बंद करें और लोगों को लगने दें कि आप वाकई भूतिया महल में ही रहते हैं.

3. गंध/सुगंध – भगवान ने नाक सिर्फ सांस लेने या ऊंची रखने के लिए ही नहीं दी है! सांस लेने के लिए तो मुंह भी काफी है. पर नाक न हो तो तपती धरती पर बारिश की पहली फुहारों से उठती सोंधी महक और लिफ्ट में किसी अकड़ू आत्म-मुग्धा के बदन से आती परफ्यूम की महक का जायका कैसे कर पाते? वैसे इनके अलावा भी बहुत सी सुगंध हैं जो दिल को लुभा लेती हैं! मुझे हवन के समय घर में भर जानेवाली सुगंध बहुत भाती है. एक ओर ये सुगंध मन में शांति और दिव्यता भरती है वहीं दूसरी ओर दूसरी सुगंध भी हैं जिन्हें पकड़ते ही दिल से आह निकलती है और मैं बुदबुदा उठता हूँ ‘हाय, मार डाला!’

खुशबुओं से जुड़ा हुआ एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कभी-कभी उनका अहसास होते ही अतीत की कोई धुंधली सी स्मृति जाग उठती है. ऐसी खुशबू बहुत ही यादगार-से लम्हों को बिसरने से पहले ही जिंदा कर देती है. वैसे, ऐसा ही कुछ बदबू के में भी कहा जा सकता है.

मैं निजी ज़िंदगी में किसी सुगंधित प्रोडक्ट का उपयोग नहीं करता. कोई डियो या परफ्यूम नहीं लगाता. सुगंधित साबुन से स्नान भी नहीं करता. पाउडर भी नहीं लगाता. बहुत से लोग हद से ज्यादा सुगंध का उपयोग करते हैं जो अरुचिकर लगता है. लेकिन जीवन सुगंध से रिक्त नहीं होना चाहिए, इसीलिए मुझे बदल-बदलकर सुगंधित अगरबत्तियां लगाने का चस्का है. इससे सुगंध भी बनी रहती है और पत्नी इस भ्रम में भी रहती है कि मैं बहुत भक्ति-भावना से ओतप्रोत हूँ.

4. संतुष्टि/शांति – जीवन में संतुष्टि और शांति का कोई विकल्प नहीं है. इन्हें ध्वनि या सुगंध की तरह महसूस भी नहीं किया जा सकता. केवल अंतरात्मा ही इनकी उपस्थिति की गवाही दे सकती है. इन्हें न तो खरीदा जा सकता है और न ही किसी से उधार ले सकते हैं. इन्हें अर्जित करने के मार्ग सबके लिए भिन्न-भिन्न हैं. ज्यादातर लोग ज़िंदगी में सब कुछ पा लेना चाहते हैं, सबसे ज्यादा, और सबसे पहले. उन्हें इसकी बहुत ज़रुरत है. मुझे लगता है कि बड़ी-बड़ी बातों में इन्हें तलाश करना अपना समय और ऊर्जा नष्ट करना ही है.

जीवन में संतुष्टि और शांति पाने के लिए बुद्ध या गाँधी या कोई मसीहा बनने की ज़रुरत नहीं है. छोटे-छोटे पलों में भी परिपूर्णता से अपने सभी ज़रूरी कामों को पूरा करते रहना मेरे लिए इन्हें पाने का उपाय है. अपने दैनिक कार्यों को पूरा करना ही नहीं बल्कि और भी कई चीज़ें करना, जैसे बच्चों को सैर पर ले जाना, किसी पड़ोसी की मदद कर देना, सैल्समैन को पानी के लिए पूछना भी कुछ ऐसे काम हैं जिन्हें नहीं करने पर कोई नुकसान नहीं होता पर इन्हें करनेपर मिलनेवाला आत्मिक संतोष असली पूंजी है.

आपके अनुसार वास्तविक संतुष्टि और शांति किसमें निहित है?

संभव है इन्हें अर्जित करने के सूत्र आपके सामने ही बिखरे हों पर आप उन्हें देख नहीं पा रहे हों.

5. प्रेम – प्रेम दुनिया में सबसे सुंदर और सबसे कीमती है. यही हमें इस दुनिया में लाता है और हम इसी के सहारे यहाँ बने रहते हैं. जीवन को सतत गतिमान रखने के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रेम से ही मिलती है. गौर करें तो हमारा दिन-रात का खटना और ज्यादा कमाने के फेर में पड़े रहने के पीछे भी प्रेम की भावना ही है हांलांकि जिनके लिए हम यह सब करते हैं उन्हें प्यार के दो मीठे बोल ज्यादा ख़ुशी देंगे. प्यार के बारे में और क्या लिखूं…

आप किससे प्रेम करते हैं? आप प्रेम बांटते हैं या इसकी खोज में हैं?

प्यार की राह में केवल एक ही चीज़ आती है, और वह है हमारा अहंकार. ज़माना बदल गया है और अब लोग निस्वार्थ भाव से आचरण नहीं करते. हमारा विश्वास इस बात से उठ गया है कि बहुत सी अच्छी चीज़ें बाँटने से ही बढ़ती हैं. इस बारे में आपका क्या ख़याल है?

इस लिस्ट में आप और क्या इजाफा कर सकते हैं? आप जीवन का वास्तविक सौंदर्य किन वस्तुओं या विचारों में देखते हैं?

मेरा प्रिय गीत सुनें.

हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें, हम दर्द के सुर में गाते हैं
जब हद से गुज़र जाती है खुशी, आँसू भी छलकते आते हैं
हैं सबसे मधुर वो गीत

(पहलू में पराये दर्द बसाके, हँसना हँसाना सीख ज़रा
तू हँसना हँसाना सीख ज़रा ) – २
तूफ़ान से कह दे घिर के उठे, हम प्यार के दीप जलाते हैं
हम प्यार के दीप जलाते हैं
हैं सबसे मधुर वो गीत …

(काँटों में खिले हैं फूल हमारे, रंग भरे अरमानों के
रंग भरे अरमानों के ) – २
नादान हैं जो इन काँटों से, दामन को बचाये जाते हैं
दामन को बचाये जाते हैं
हैं सबसे मधुर वो गीत …

(जब ग़म का अन्धेरा घिर आये, समझो के सवेरा दूर नहीं
समझो के सवेरा दूर नहीं ) – २
हर रात की है सौगात यही, तारे भी यही दोहराते हैं
तारे भी यही दोहराते हैं
हैं सबसे मधुर वो गीत …

7 Comments

Filed under प्रेरक लेख