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Posts tagged ‘व्यक्तित्व विकास’

कितनी आदतें? कितने उपाय?


इंटरनेट पर व्यक्तित्व विकास के ऊपर बहुत उपयोगी लेखों की भरमार सी हो गयी है. यह स्वाभाविक है कि हर व्यक्ति अपने जीवन के किसी-न-किसी पक्ष में हमेशा ही कुछ सुधार लाना चाहता है इसलिए यहाँ ऐसे बहुत से लोग हैं जो इसकी उपयोगिता को समझते हैं और दूसरों को जाग्रत करने के लिए इसके बारे में बहुत कुछ लिखते भी हैं. जो कोई भी इसपर कुछ लिखता है उसका अपना कुछ अनुभव और रणनीतियां होती हैं इसलिए मैं यह मानता हूँ कि उसकी सलाह में कुछ वज़न होना चाहिए. किसी दूसरे के अनुभव से कुछ सीखने में कोई बुराई नहीं है क्योंकि यह ज़रूरी तो नहीं कि हम सदैव स्वयं ही गलतियाँ करके सीखते रहें!

तो यह अच्छी बात है कि बहुत से लोग जीवन और कामकाज को बेहतर बनाने के लिए अपने विचार और अनुभव हमसे बांटते हैं. मैं तो यही मानकर चलता हूँ कि ये व्यक्ति जेनुइन हैं और इन विषयों पर जितना पढ़ा-लिखा जाये उतना ही अच्छा होगा. सफलता का कोई एक मार्ग नहीं है जिसपर चलकर आप निश्चित रूप से इसे पा सकें. हर व्यक्ति अपनी बनाई राह पर चलकर ही सफल होता है या स्वयं में उल्लेखनीय परिवर्तन कर पाता है – यह बात और है कि आप दूसरों द्वारा बनाई पगडंडियों का सहारा लेकर आगे बढ़ने का हौसला जुटाते हैं.

इतना सब होने के बाद भी यहाँ ऐसा कुछ है कि बहुत सारे लोग (मैं भी) व्यक्तित्व विकास के भंवर में कूदकर फंस जाते हैं. ज्यादातर लोग ढेरों ब्लॉग्स को बुकमार्क या सबस्क्राइब कर लेते हैं. वे ऐसे बिन्दुओं के बारे में तय कर लेते हैं जिनपर उन्हें काम करना है और अगले दिन से ही जीवन में आशातीत परिवर्तन की अपेक्षा करने लगते हैं. उसके दूसरे दिन वे अपने जीवन में उतारने के लिए कुछ और बातें छांट लेते हैं और नित-नए खयाली पुलाव बनाने लगते हैं.

यहाँ एक ही समस्या है जिससे सभी जूझते हैं और वह यह है कि शॉर्ट-टर्म उपाय कभी भी लॉंग-टर्म सुधार की ओर नहीं ले जा सकते. अपने व्यक्तित्व में दस नए सुधार लाने के स्थान पर यदि लोग केवल चार सुधार ही लागू करने के बारे में सोचें तो भी इसमें सफलता पाने का प्रतिशत नगण्य है. किसी भी व्यक्ति के चित्त की दशा और उसके कामकाज की व्यस्तता के आधार पर तीन या अधिकतम दो सुधार ला सकना ही बहुत कठिन है.

आप चाहें तो एक झटके में ही स्वयं में पांच सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं. उदाहरण के लिए: आप सुबह जल्दी उठना, रोजाना व्यायाम करना, शक्कर का कम सेवन करना, अपनी टेबल को व्यवस्थित रखना, स्वभाव में खुशमिजाजी लाना आदि कर सकते हैं हांलांकि लंबी अवधि के लिए इन सरल उपायों को साध पाना ही कठिन है और अक्सर ही इनमें से एक-एक करके सभी सकारात्मक उपाय आपका साथ छोड़ देते हैं.

आपकी असफलता के पीछे आपका मानसिक अनुकूलन (mental conditioning) है. कुछ रिसर्च में यह पता चला है कि एक सरल आदत को व्यवहार में लाने के लिए अठारह दिन लग जाते हैं और कठिन आदत को साधने में तीस से चालीस दिन लगते हैं. ऐसी रिसर्च कई बार बेतुकी भी होती हैं पर क्या आपको वाकई यह लगता है कि आप अपनी घोर व्यस्त दिनचर्या में तमाम ज़रूरी काम को अंजाम देते हुए अपना पूरा ध्यान पांच नयी आदतें ढालने या सुधारने में लगा सकते हैं?

नहीं. मुझे तो ऐसा नहीं लगता.

ठहरिये. ज़रा सांस लीजिये…

कुछ पल के लिए रुकें. ऐसी एक दो बातों को तलाशिये जो आप वाकई कर सकते हों और अगले दो-तीन सप्ताह तक पूरे मनोयोग से उन्हें साधने का प्रयत्न करें. कुछ समय बाद आपको उन्हें यत्नपूर्वक नहीं करना पड़ेगा और वे आपकी प्रकृति का अंग बन जायेंगीं.

और ऐसा कर लेने के बाद ही आपको यह पता चल पायेगा कि आप किसी नयी आदत या कौशल को साधने के लिए कितने अनुकूल हैं.

मैं आपसे यह नहीं कह रहा हूँ कि व्यक्तित्व विकास के ब्लॉग्स पढ़ना बंद कर दें. कई बार तो ऐसा होता है कि किसी चीज़ को पढ़ने से होनेवाले मनोरंजन से भी उसे पढ़ने का महत्व बढ़ जाता है. जब भी आप मेरे ब्लॉग या अन्य ब्लौगों की पोस्ट पढ़ें तो यह न सोचें कि आपको इन बातों को अपने रोज़मर्रा के जीवन में उतारना ही है – यदि ऐसा है तो आप मेरे प्रयासों को व्यर्थ ही कर रहे हैं. यदि आपको कुछ अच्छा लगे तो आप उसे कहीं लिख डालें और प्राथमिकता के अनुसार उन्हें सूचीबद्ध कर लें. इस सूची में आप वरीयता के अनुसार अपने जीवन में छोटे-छोटे परिवर्तन लाने के लिए किये जाने वाले उपायों को लिख सकते हैं. केवल एक या दो उपायों को अपना लें, उन्हें अच्छी आदत में विकसित करें, और आगे बढ़ जाएँ. इस तरह आप वाकई अपने में कुछ सुधार का अनुभव करेंगे अन्यथा आप केवल सतही बदलाव का अनुभव की करते रह जायेंगे. ध्यान दें, यदि मनोयोग से कुछ भी नहीं किया जाए तो सारे प्रयत्न व्यर्थ जाते हैं और झूठी सफलता को उड़न-छू होते देर नहीं लगती.

अब सबसे ज़रूरी काम यह करें कि इस पोस्ट को स्वयं में सुधार लाने का सबसे पहला जरिया बनाएं… न पांचवां, न सातवाँ, बल्कि सबसे पहला.

Editor/translator’s Note: This is a guest post from Ross Hudgens. He blogs at Authentic Marketing, where he brings together insights about personal development, marketing, search and social media.

व्यक्तित्व विकास : पाठक व कर्ता में अंतर


यह पोस्ट व्यक्तित्व विकास (Personal Development) के बारे में है. इसमें यह जानने का प्रयास किया गया है कि व्यक्तित्व विकास की पुस्तकें पढ़कर या अन्य स्रोतों से इस विषय का ज्ञान लेकर कितने लोग स्वयं में अपेक्षित परिवर्तन ला पाते हैं. पोस्ट के लेखक एडुआर्ड एज़ीनु कम्युनिकेशन कोच हैं. मनोविज्ञान में स्नातक एडुआर्ड एज़ीनु www.peopleskillsdecoded.com ब्लॉग में व्यक्तित्व विकास और कम्युनिकेशन स्किल्स पर पोस्ट लिखते हैं.

आपके अनुमान से कितने लोग होंगे जो व्यक्तित्व विकास की पुस्तकें या लेख आदि पढ़ते हैं और अपने जीवन में अपेक्षित परिवर्तन ला पाते हैं? आप कहेंगे कि ऐसे लोग कम ही हैं. इस लेख को पढ़िए और आप यह जान जायेंगे कि ऐसे लोग कम नहीं बल्कि नगण्य ही हैं.

मैं ऐसा इसलिए कहता हूँ क्योंकि मैं यह जानता हूँ कि स्वयं में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए बहुत परिश्रम करना पड़ता है और बचपन से पनप चुके हमारे स्वभाव और आदतों में बदलाव ला सकना सहज नहीं है. चाहते तो सभी यही हैं कि उनमें ये ज़रूरी परिवर्तन आ जाएँ पर अधिकांश लोग सिर्फ किताबें, लेख, ब्लॉग, पत्रिकाएं, पढ़ते या डीवीडी देखते और ट्रेनिंग/कोर्स आदि में भाग लेते ही रह जाते हैं.

व्यक्तित्व विकास को मैं इस नज़रिए से देखता हूँ कि यह मूलतः नयी जानकारियाँ जुटाने का नहीं बल्कि नए कौशल एवं मनोवृत्ति को अपनाने का कर्म है. लेकिन नए कौशलों को विकसित करने और नई मनोवृत्ति को अपनाने के लिए बहुत धैर्य, अनुशासन और अभ्यास की ज़रुरत होती है. स्वयं में छोटे-बड़े परिवर्तन ला पाना इतना सहज नहीं है जितना प्रतीत होता है. यह बहुत दुरूह, संगठित, निर्मम, और सतत क्रिया है. यह दुरूह इसलिए है क्योंकि क्योंकि इस मामले में हम बहुत कुछ स्वयं के विरोध में करते हैं.

व्यक्तित्व विकास की कामना करने वाले व्यक्ति इसके बारे में बहुत कुछ पढ़ते हैं पर उनमें से अधिकांश जन इस महत्वपूर्ण तथ्य को नहीं समझ पाते कि उन्हें पढ़ी गयी कीमती बातों को अपने व्यवहार का अंग बनाने के लिए कुछ कर्म भी करना पड़ता है. यह मूलतः अभ्यास की विषयवस्तु है. यह जाने बिना वे केवल सतह पर ही मंडराते रह जाते हैं और गहराइयों को नहीं देख पाते.

ऐसे लोग किसी अच्छी किताब को पढ़ना शुरू करते हैं. उन्हें किताब में कोई बेहतरीन प्रेरक एवं व्यावहारिक विचार मिलता है जिसे वे अपने ऊपर कुछ दिनों तक लागू करने का प्रयास करते हैं पर इसमें सफल नहीं होनेपर किसी अन्य पुस्तक में ‘प्रेरणा’ को खोजने लगते हैं. ऐसे लोग केवल ‘पाठक’ हैं.

मैं भी ऐसा ही करता था… फिर एक दिन मुझे यह पता चला कि मुझे तो व्यक्तित्व विकास की बातें पढ़ने में केवल आनंद आने लगा था. जिस तरह कुछ लोग रोमांटिक नॉवेल पढ़ना पसंद करते हैं वैसे ही मैं व्यक्तित्व विकास की पुस्तकें पढ़ना पसंद करता था. अभी भी मुझे ये किताबें पढ़ना बहुत अच्छा लगता है पर मुझे इस बात का बोध भी हो गया है कि व्यक्तित्व विकास की बातें पढ़ना और स्वयं में मौलिक परिवर्तन लाना दो अलग-अलग बातें हैं इसलिए मैं पढ़ी गयी बातों को व्यवहार में लाता हूँ. अब मैं ‘कर्ता’ बन गया हूँ.

व्यक्तित्व विकास के संबंध में ‘पाठक’ और ‘कर्ता’ के मध्य यह मुख्य अंतर है कि पहला व्यक्ति जहां रुचिपूर्वक पुस्तकें और विचार आदि पढ़ने में ही लगा रह जाता है वहीं दूसरा व्यक्ति पढ़ी हुई बातों से उपयुक्त सन्देश लेकर उन्हें अमल में लाता है और लाभ पाता है. इसके अतिरिक्त नीचे दी हुईं तीन बातों का भी मैंने अनुभव किया है जिनके बारे में जानना ज़रूरी होगा:

  • कर्ता व्यक्ति जो कुछ भी पढ़ते या अनुभव करते हैं उसमें से सबसे मूल्यवान सन्देश या विचार को मनन करने के बाद चुनते हैं, याद रखते हैं, और फिर उसे अपनी विकास यात्रा का वाहन बनाते हैं.
  • कर्ता व्यक्ति कामकाज की रणनीतियां बनाते हैं. वे लक्ष्य निर्धारित करते हैं और नियमित अभ्यास भी करते रहते हैं. स्वयं को सकारात्मकता की राह पर अटल रखने के लिए वे नित-नए तरीके खोजते हैं और अपनी प्रगति पर दृष्टि जमाये रखते हैं.
  • कर्ता व्यक्ति कभी-कभी ध्यानपूर्वक अपने अध्ययन को सीमित कर लेते हैं ताकि वे अधिकाधिक सूचनाओं और बातों के जंजाल में नहीं उलझें. बहुत अधिक प्रेरणा भी अपने लक्ष्य से ध्यान भटका सकती है यदि वह कोरे अध्ययन तक ही सीमित हो. जिन बातों को वे अपने जीवन में उतारने लगे हैं उन्हें ही वे बार-बार दुहराते हैं.

इसका परिणाम यह होता है कि व्यक्ति में सतत और संतुलित परिवर्तन होता रहता है. आप निरे पाठक और कर्मठ कर्ता में हमेशा ही अंतर कर सकते हैं एवं आपने कुछ ऐसे व्यक्ति ज़रूर होंगे जिनसे लंबे अंतराल के बाद मिलने पर आपने उनमें शानदार परिवर्तन का अनुभव किया होगा – उनका बोलचाल सुधरा होगा, उनका व्यक्तित्व अधिक आकर्षक बन गया होगा, वे अधिक प्रसन्न, आत्मविश्वास से लबरेज़ और संभवतः अधिक… धनी प्रतीत होते होंगे. मुझे भी ऐसे कुछ लोग मिले हैं जिनमें आये परिवर्तनों से मैं चमत्कृत रह गया हूँ.

तो… इस लेख को पढ़ने के बाद आप एक गहरी सांस लेकर कोई और पोस्ट पढ़ने के लिए बढ़ जायेंगे या अपनी आरामकुर्सी से उठकर स्वयं में कोई पौज़िटिव परिवर्तन लाने का बीड़ा उठाएंगे? यदि आप व्यक्तित्व/आत्म विकास पर पुस्तकें पढ़ने में रूचि लेते हैं तो आपने स्वयं में कितना परिवर्तन अनुभव किया है?

‘हां’ या ‘ना’


दुनिया बहुत जटिल है और हमें चलायमान रहने के लिए अपने अनुभवों पर निर्भर रहना पड़ता है.

जब हम छोटे होते हैं तो एक अनुभवजन्य नियम (heuristic) हमारे हमेशा काम आता है और वह यह है कि “अपने माता-पिता की बात मानो”. बचपन में हम ऐसा नहीं करते हैं तो नुकसान हमारा ही होता है. वयस्क हो जाने पर हम इस बात को मानने लगते हैं कि “किसी विशेषज्ञ की सलाह लो और उसके बताये अनुसार ही काम करो”, हांलांकि इस सिद्धांत का पालन करना दिन-बदिन मुश्किल होता जा रहा है.

एक दिन मैंने अपने निजी अनुभवजन्य नियम को दोहराया जिसे मैं लंबे समय से मानता आया हूँ. इसने मुझे अवसर की पहचान करना, अपने मेलबौक्स के साथ निपटना, और मेरी उम्मीद से भी ज्यादा गति से आगे बढ़ने में मदद की है.

अब मैं आपको बता ही दूं कि वह सिद्धांत क्या है:

निर्णय जल्दी लो और परिणाम के साथ जियो.

जब सामने बहुत कुछ करने के लिए होता है तो बहुत से लोग जड़वत हो जाते हैं. वे बहक जाते हैं और अनिर्णय से पंगु हो जाते हैं. उनके मन में यह चिंता बनी रहती है कि वे सही हैं या गलत हैं.

सच कहूं तो आपके निर्णय इतने परिणामी नहीं होते जितना आप समझते हैं.

यही कारण है कि यह सिद्धांत बेहतरीन है. यदि आप तनाव के क्षणों में इसका उपयोग करेंगे तो पायेंगे कि आप कठिन समस्याओं को पीछे छोड़कर बड़ी फुर्ती से आगे बढ़ जाते हैं. यदि आप स्मार्ट हैं तो यह बहुत अच्छे से काम करेगा क्योंकि यह आपके सोच में उलझे हुए मष्तिष्क को पलट देता है और लिए गए निर्णयों के साथ जीने में आपकी मदद करता है.

एक अन्य नियम जो इसके बरअक्स काम करता है वह ये है:

यदि अनिश्चित हो तो “हाँ” कह दो.

‘त्वरित निर्णय’ के नियम के समान ही यह नियम भी शानदार है क्योंकि यह अवसर चूके बिना आपको त्वरित गलतियाँ करने में मदद करता है.

फ़र्ज़ करें कि आपको किसी बात के लिए “नहीं” कहना चाहिए था पर आपने “हाँ” कह दिया और बात बिगड़ गयी – तो इसमें चिंता की बात नहीं है क्योंकि आप इस गलती से सीख ले चुके हैं और अगली बार आप अनिश्चित नहीं रहेंगे और बेझिझक “नहीं” कहेंगे.

ये दोनों नियम निर्णय लेते समय रोज़मर्रा के जीवन में बहुत काम आते हैं. ये नियम परिपूर्ण नहीं हैं पर इनसे जीवन और कामकाज में बहुत अच्छा सुधार आता है.

जब आप पहली बार कुछ करते हैं पर उसमें असफल रहते हैं तो आपको उससे बहुत कुछ सीखने को मिलता है. यदि आप इसे सकारात्मक रूप से ग्रहण करते हैं तो आप मानसिक और भावनात्मक धरातल पर और मजबूती से खड़े होते हैं.

जब कोई आपसे यह कह देता है कि ‘असफलता की परवाह नहीं करो’ तो आप अधिक उत्साह और मनोयोग से अपना काम बखूबी करते हैं. जब कभी आप कोई बिलकुल अलग चीज़ करते हैं तो सारे ‘सामान्य व्यक्ति’ आपको सनकी समझते हैं. ऐसे में मैं यही कहूँगा कि आप नए विचारों को मन में लायें और नए काम हाथ में लेते रहें. यदि आप यह भांप लें कि असफलता तय है तो जल्दी असफल होकर अपनी भूल सुधार लें और आगे बढ़ जाएँ. लोग असफलता से इतना भय खाते हैं कि निर्णय लेना ही नहीं चाहते.

This is a guest post of Julien Smith of inoveryourhead.net. Julien is a New York Times bestselling author, consultant, and speaker who has been involved in online communities for over 15 years.

कुछ करिए…


स्टीवन कोवी (Steven Covey) की पुस्तक The 7 Habits of Highly Effective People में एक चित्र है जिसे मैं हमेशा ध्यान में रखता हूँ. बाईं ओर दिए चित्र को देखिये:

इस चित्र में वर्तुलों द्वारा दो क्षेत्र प्रदर्शित किये गए हैं जिनपर हम अपने समय और शक्तियों को केन्द्रित करते हैं. अधिकांश लोग प्रभाव क्षेत्र के बाहर अपने समय और शक्ति को लगाते हैं जो कि चिंताओं का क्षेत्र है. ऐसे लोग आमतौर पर ऐसी बातों पर सोच-विचार करते हैं जिनपर उनका नियंत्रण नहीं होता, जैसे अगले सप्ताह का मौसम या मध्य पूर्व के देशों की दशा. ऐसे ही विषयों पर स्वयं को चिंतन या विवाद में व्यस्त रखकर वे अपने मूल्यवान समय और ऊर्जा को व्यर्थ कर देते हैं.

कोवी के अनुसार सफल व्यक्ति मुख्यतः अपने प्रभाव क्षेत्र के दायरे में ही चिंतन-मनन करते हैं. वे उन बातों की परवाह नहीं करते जिनपर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता. वे अपने समय और सामर्थ्य का निवेश एवं नियोजन उन क्षेत्रों में करते हैं जिनसे वास्तव में कुछ मूल्यवान और महत्वपूर्ण की प्राप्ति हो. अपने प्रभाव क्षेत्र को क्रमशः बढ़ाते हुए वे अधिक शक्तिसंपन्न व प्रभावशाली होते जाते हैं.

आप अपने समय और सामर्थ्य का उपयोग किस प्रकार करते हैं?

यदि आप रोज़ शाम को टीवी पर ख़बरों में बढ़ते अपराध और बिगड़ते हालात को देखकर यह अफसोस करते रहते हैं कि दुनिया रसातल में जा रही है तो आप चिंता के वर्तुल में भ्रमण कर रहे हैं. इसके विपरीत यदि आप प्रभाव क्षेत्र में हैं तो आप ऐसे सकारात्मक प्रयास करते हैं जिनसे लोगों में जागरूकता आये. आप नए विचारों के साथ आगे आते हैं, लोगों को उनकी योग्यताओं और शक्तियों का अहसास कराते हैं, और उनका मार्गदर्शन करते हैं ताकि अधिकाधिक लोगों के जीवन में सुधार आये.

मैं कई लोगों के बीच में वार्ता करने से झिझकता था क्योंकि मेरे भीतर यह भय व्याप्त था कि मैं कुछ भी ठीक से नहीं कह पाऊंगा और सभी मुझे मूर्ख समझेंगे. मैं इतना संकोची था कि किसी गोष्ठी में कुछ पूछने के लिए या अपने विचार रखने के लिए हाथ उठाने से भी हिचकिचाता था. यदि मैं कुछ पूछता भी तो मेरा दिल बेतहाशा धड़कने लगता और मैं खुद से यह पूछता रहता कि मैं कोई बेवकूफी भरा सवाल तो नहीं पूछ रहा हूँ! मैं हमेशा चिंताओं के क्षेत्र में ही फंसा रहता था. किसी तरह मैं उसमें से निकलकर प्रभाव क्षेत्र में जा सका. ऐसा करने के लिए मुझे पब्लिक स्पीकिंग कोचिंग से बड़ी मदद मिली. अपने चिंता क्षेत्र से बाहर निकले बिना मैं लोगों के सामने बिना किसी तैयारी के भाषण देने के बारे में सोच भी नहीं सकता था.

अब मैं आपको यह बताता हूँ कि वे कौन सी बातें (चिंता का क्षेत्र) हैं जिनके बारे में लोग बड़ी चिंता करते हैं. उसके ठीक बाद मैं उन उपायों (प्रभाव क्षेत्र) को इंगित करूंगा जो खराब दशाओं में सुधार ला सकते हैं:

पर्यावरण/प्रदूषण – रिसाइकल करें. कम उपयोग करें. आवश्यकताएं घटाएं.
आय-व्यय/घरेलू खर्च – आमदनी बढ़ाएं. खर्चे कम करें. छोटी-छोटी बचत करें.
स्वास्थ्य – व्यायाम करें. पैदल चलें.
अकेलापन/अवसाद – अपने मेलजोल का दायरा बढ़ाएं. खुशमिजाज़ बनें.
भविष्य – टाइम मशीन बनाएं.

जब भी आप किसी मसले पर काम करें तो खुद से यह ज़रूर पूछें, “मैं इस स्थिति में किस प्रकार सुधार ला सकता हूँ? मैं इसे बेहतर कैसे बना सकता हूँ?”

कुछ नए विचार एकत्र करें और उनपर कार्रवाई शुरू कर दें. यदि आप कुछ नहीं सोच पा रहे हों तो यह अवश्य अनुभव करें कि किसी समस्या के बारे में चिंता करना केवल अपने समय और शक्तियों की बर्बादी है. फिर अपने संसाधनों को उस दिशा में मोड़ दें जहां आप वाकई कुछ करके दिखा सकते हों.

This is a guest post of Niall Doherty of ‘Disrupting the Rabblement’. Niall is on a mission to become a self-employed vagabond, pursuing his passions and helping other people escape mediocrity while he travels the world.

“अच्छा” आदमी बने रहने के खतरे


“आप बहुत अच्छे आदमी हैं” या “you are very nice”. अक्सर ही किसी से भी यह सुनकर मुझे बहुत ख़ुशी होती थी. मुझे लगता था कि यह किसी भी व्यक्ति से मिलनेवाली सबसे बढ़िया प्रशंसोक्ति है.

फिर मुझे अपने और अन्य “अच्छे आदमियों” के जीवन को ध्यान से देखने पर यह अनुभव होने लगा कि इस लेबल का लग जाना अमूमन ही कोई बहुत प्रतिष्ठा या महत्व की बात नहीं है. अब तक कुछ अनदेखे रह गए पैटर्न मेरे सामने उभरकर आने लगे और मैं यह समझने लगा कि दूसरों की नज़रों में “अच्छा” बने रहना किसी आदमी के लिए कितना तकलीफदेह हो सकता है.

और फिर मैंने ये कोशिश की कि मेरे ऊपर चढ़ चुका अच्छाई का मुखौटा कुछ उतरे और मैं भी दूसरों की तरह बेफिक्री से सांस ले सकूं. अपने साथ मैंने कभी कोई बेहतरीन चीज़ की है तो वह यही है.

कम्युनिकेशन कोच के तौर पर मैंने दूसरों को भी यह सिखाना शुरू कर दिया कि बहुत अच्छे बने बिना कैसे जियें.

अब मैं और मेरे कुछ करीबी दोस्त इस बात को बहुत अच्छे से समझ चुके हैं. जब कभी हम किसी व्यक्ति को किसी और व्यक्ति से यह कहते हुए सुनते हैं कि “आप बहुत अच्छे आदमी हैं” या “वह बड़ी सज्जन महिला हैं” तो हम समझ जाते हैं कि जिस व्यक्ति के बारे में बात की जा रही है वह दूसरों की दृष्टि में भला और अच्छा बने रहने के लिए हर तरह की दिक्कतें झेलता है और दूसरे उसका जमकर फायदा उठाते हैं.

“अच्छा” आदमी बनने का क्या अर्थ है?

मुझे लगता है कि जब कभी कोई आपको “अच्छा आदमी”, “नाइस गर्ल”, या “सज्जन पुरुष” कहता है तो इसके दो मतलब होते हैं:

कभी-कभी यह होता है कि सामनेवाले व्यक्ति के पास आपको कहने के लिए कोई उपयुक्त और सटीक पौज़िटिव शब्द नहीं होता. वे आपसे यह कहना चाहते हैं कि आप रोचक, या मजाकिया, या दयालु, या प्रभावशाली वक्ता हैं, पर ऐसे बेहतर शब्द नहीं सोच पाने के कारण वे कामचलाऊ अभिव्यक्ति के तौर पर आपको अच्छा, बढ़िया, या ओके कहकर काम चला लेते हैं.

यदि ऐसी ही बात है तो आप इसमें कुछ ख़ास नहीं कर सकते और आपको परेशान होने की ज़रुरत भी नहीं है. आपके बारे में कुछ पौज़िटिव कहने के लिए “अच्छा” या “नाइस” बहुत ही साधारण विकल्प हैं. इन्हें सुनकर यदि आप बहुत अधिक खुश नहीं होते तो इसमें कोई बुरा मानने वाली बात भी नहीं है.

अब मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि “अच्छा” या “नाइस” का लेबल ऐसी चीज़ को दिखता है जो बाहरी तौर पर तो आपके बारे में पौज़िटिव बात कहती है पर सही मायनों में यह आपके खिलाफ जाती है.

दूसरों की बात बड़ी आसानी से मान जानेवाले और दूसरों के लिए खुद को तकलीफ में डालने के लिए हमेशा तैयार बैठे हुए आदमी को सभी “भला मानस” और “नाइस” कहते हैं.

तो ये शब्द सुनने में भले ही अच्छे लगें पर ये आपको मनोवृत्तियों और स्वभाव को दर्शाते हैं जिनसे आपको आगे जाकर बहुत नुक्सान भी उठाना पड़ सकता है.

“अच्छा” आदमी बने रहने के खतरे

हम लोगों में से अधिकतर यह मानते हैं कि हमें भले बने रहना चाहिए, दूसरों की सहायता के लिए तत्पर होना चाहिए भले ही इसके कारण कभी कुछ कष्ट भी उठाना पड़ जाए. इससे समाज में हमारी छवि भी बेहतर बनी रहती है. लेकिन यदि आप दूसरों की नज़र में हमेशा ही हद से ज्यादा भले बने हुए हैं तो यह इस बात का संकेत है कि आपने स्वयं की इच्छाओं का सम्मान करना नहीं सीखा है.

मैं दूसरों के प्रति उदारता बरतने और किसी की सहायता करने का विरोधी नहीं हूँ. लेकिन मैं यह भी मानता हूँ कि कुछ लोग इस नीति के पालन के चक्कर में अपनी सुख-शांति को हाशिये पर रख देते हैं. वे यह मानते हैं कि उनके इस व्यवहार से दूसरे उनसे हमेशा खुश रहेंगे और ऐसा करने से उनकी समस्याएँ भी सुलझ जायेंगीं. दुर्भाग्यवश, इस बात में बहुत कम सच्चाई है.

मनोविज्ञान के क्षेत्र में इस विषय पर हाल में ही बहुत शोध हुआ है और इसे nice guy syndrome के नाम से जाना जाता है.

भलामानस बने रहने के नुकसान धीरे-धीरे सामने आने लगे हैं. इनमें से कुछ ये हैं:

1. दूसरों को खुश रखने के लिए खुद को हलकान कर लेना – हर सज्जन पुरुष या भद्र महिला को यह पता होता है कि हर किसी को खुश रखना और समाज में इस छवि को बनाए रखने के लिए उन्हें कितनी दिक्कतें झेलनी पडतीं हैं. ज्यादातर भलेमानस अपना अधिकांश समय, ऊर्जा, और संसाधन दूसरों पे इसलिए लुटाते फिरते हैं ताकि दूसरों की नज़र में वे अच्छे बने रहें.

2. स्वयं को नज़रंदाज़ करना – यह स्पष्ट है कि यदि आप हमेशा दूसरों का ही ध्यान रखते रहेंगे तो आपको अपनी देखरेख और आराम के लिए समय नहीं मिलेगा. यही कारण है कि ज्यादातर भलेमानस थकेमांदे, तनावग्रस्त, और बुझे-बुझे से रहते हैं. उनमें से कई अवसाद के शिकार हो जाते हैं.

3. दूसरों द्वारा आपका अनुचित लाभ उठाना – एक बहुत खतरनाक झूठ है जिसमें हम लोगों में से ज्यादातर यकीन करते हैं – और वह यह है कि यदि हम दूसरों के लिए अच्छे बने रहेंगे तो वे भी हमसे अच्छा बर्ताव करेंगे. व्यवहार में ऐसा कभी-कभार ही होता है. अधिकांश मौकों पर आपकी अच्छाई के कारण आपका गलत फायदा उठाया जाता है. लोग आपसे बिना पूछे या जबरिया आपकी चीज़ें मांग लेते हैं आप संकोचवश ना नहीं कहते, यहाँ तक कि आपसे अपनी ही चीज़ें दोबारा मांगते नहीं बनता क्योंकि आप किसी को नाराज़ नहीं करना चाहते.

4. इसी छवि में सिमटकर रह जाना – एक कोच के तौर पर मैं ऐसे भलेमानुषों के साथ काम करता हूँ और उन्हें यह सिखाता हूँ कि वे अपने दिल के कहने पर चलना सीख जाएँ एवं निश्चयात्मक बनें. लेकिन दूसरे लोग उनमें आए परिवर्तनों से बड़ी हैरत में पड़ जाते हैं. लोगों को उनके ‘अच्छेपन’ की इतनी आदत हो जाती है कि जब वे दहलीज को छोड़कर बाहर निकलते हैं तो इसे विश्वासघात समझा जाता है.

अच्छी बात यह है कि ‘सज्जन पुरुष’ की छवि से बाहर निकला जा सकता है. इसका सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप अपनी बेहद विनीत और मुलायम छवि में परिवर्तन लायें.

ऐसा करने के ये तीन तरीके हैं:

1. अपनी ज़रूरतों को पहचानें – अपनी ज़रूरतों को पहचानने के लिए यह ज़रूरी है कि आपको उनका पता चले. दूसरों के प्रति हमेशा अच्छे बने रहने वाले व्यक्तियों की यह मानसिकता होती है कि हमेशा औरों के मनमुआफिक चलकर सबकी नज़रों में भले बने रहते हैं पर यह सच है कि उनकी भी बहुत सी भावनात्मक और दुनियावी ज़रूरतें होतीं हैं. उनके लिए यह बहुत ज़रूरी है कि वे अपनी ज़रूरतों की कद्र करें और खुद से बेहतर सम्बद्ध होकर जियें.

2. आत्मविश्वास जगाएं – मेरे अनुभव में यह देखने में आया है कि बहुतेरे ‘भलेमानुषों’ में आत्मसम्मान और आत्मविश्वास की कमी होती है. उन्हें अपने बंधनकारी विचारों को तोड़कर संकोच और चिंताओं से उबरना चाहिए. यदि आपके साथ ऐसा हो रहा हो अपने भीतर घट रहे परिवर्तनों का ध्यानपूर्वक अवलोकन करें और आत्मविश्वास जगाएं.

3. अपने काम में व्यस्त रहें - आपको जो कुछ भी करना अच्छा लगता हो उसे करने में भरपूर समय लगायें और दूसरों के लिए समय नहीं होने पर उन्हें खुलकर मना कर दें. ऐसे में यदि आपके और दूसरों के बीच संबंधों में खटास भी आती हो तो इसमें कोई हर्ज़ नहीं है क्योंकि आप दूसरों को हद से ज्यादा अपना फायदा नहीं उठाने दे सकते. शुरू में यह सब करना आसान नहीं होगा लेकिन आपके बेहतर निजी जीवन के लिए यह सब करना ज़रूरी है.

हर समय लोगों को खुश रखने के बजाय जब आप ज्यादा निश्चयात्मक (assertive) रुख अख्तियार कर लेते हैं तो आपके आसपास मौजूद लोग आपके समय और काम की कद्र करना सीख जाते हैं और आपसे अपना काम निकलवाने के लिए सोचसमझकर ही प्रयास करते हैं.

अब हो सकता कि लोग आपको ‘परोपकारी’ या ‘देवता स्वरूप’ संबोधनों से नवाज़ना कम कर दें. लोग आपको रूखा या स्वार्थी भी कह सकते हैं, पर यह तय है कि इन सभी लेबलों से इतर आपके औरों से संबंध अधिक परिपक्व व प्रोफेशनल होंगे और आपके जीवन में सुधार होगा.

इस पोस्ट के लेखक Eduard Ezeanu कम्युनिकेशन कोच हैं. उनका ब्लॉग है People Skills Decoded. यह पोस्ट अरविन्द देवलिया के ब्लॉग से ली गयी है.

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