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Posts tagged ‘विज्ञान’

जेम्स वाट और भाप की शक्ति


250px-James_Watt_by_Henry_Howardस्कॉट्लैंड में रहने वाला एक छोटा बालक अपनी दादी की रसोई में बैठा हुआ था. चूल्हे पर बर्तन चढ़े हुए थे और वह उनमें खाना बनता देखते हुए बहुत सारी चीज़ों के होने का कारण तलाश रहा था. वह हमेशा ही यह जानना चाहता था कि हमारे आसपास जो कुछ भी होता है वह क्यों होता है.

“दादी” – उसने पूछा – “आग क्यों जलती है?”

यह पहला मौका नहीं था जब उसने अपनी दादी से वह सवाल पूछा था जिसका जवाब वह नहीं जानती थी. उसने बच्चे के प्रश्न पर कोई ध्यान नहीं दिया और खाना बनाने में जुटी रही.

चूल्हे में जल रही आग पर एक पुरानी केतली रखी हुई थी. केतली के भीतर पानी उबलना शुरू हो गया था और उसकी नाली से भाप निकलने लगी थी. थोडी देर में केतली हिलने लगी और उसकी नली से जोरों से भाप बाहर निकलने लगी. बच्चे ने जब केतली का ढक्कन उठाकर अन्दर झाँका तो उसे उबलते पानी के सिवा कुछ और दिखाई नहीं दिया.

“दादी, ये केतली क्यों हिल रही है?” – उसने पूछा.

“उसमें पानी उबल रहा है बेटा”.

“हाँ, लेकिन उसमें कुछ और भी है! तभी तो उसका ढक्कन हिल रहा है और आवाज़ कर रहा है”.

दादी हंसकर बोली – “अरे, वो तो भाप है. देखो भाप कितनी तेजी से उसकी नली से निकल रही है और ढक्कन को हिला रही है”.

“लेकिन आपने तो कहा था कि उसमें सिर्फ पानी है. तो फिर भाप ढक्कन को कैसे हिलाने लगी?”

“बेटा, भाप पानी के गरम होने से बनती है. पानी उबलने लगता है तो वो तेजी से बाहर निकलती है” – दादी इससे बेहतर नहीं समझा सकती थी.

बच्चे ने दोबारा ढक्कन उठाकर देखा तो उसे पानी ही उबलता हुआ दिखा. भाप केवल केतली की नली से बाहर आती ही दिख रही थी.

“अजीब बात है!” – बच्चा बोला – “भाप में तो ढक्कन को हिलाने की ताकत है. दादी, आपने केतली में कितना पानी डाला था?”

“बस आधा लीटर पानी डाला था, जेमी बेटा”

“अच्छा, यदि सिर्फ इतने से पानी से निकलनेवाली भाप में इतनी ताकत है तो बहुत सारा पानी उबलने पर तो बहुत सारी ताकत पैदा होगी! तो हम उससे भारी सामान क्यों नहीं उठाते? हम उससे पहिये क्यों नहीं घुमाते?”

दादी ने कोई जवाब नहीं दिया. उसने सोचा कि जेमी के ये सवाल किसी काम के नहीं हैं. जेमी बैठा-बैठा केतली से निकलती भाप को देखता रहा.

*     *     *     *     *     *

भाप में कैसी ताकत होती है और उस ताकत को दूसरी चीज़ों को चलाने और घुमाने में कैसे लगाया जाए, जेम्स वाट नामक वह स्कॉटिश बालक कई दिनों तक सोचता 800px-James_Watt's_Workshopरहा. केतली की नली के आगे तरह-तरह की चरखियां बनाकर उसने उन्हें घुमाया और थोड़ा बड़ा होने पर उनसे छोटे-छोटे यंत्र भी चलाना शुरू कर दिया. युवा होने पर तो वह अपना पूरा समय भाप की शक्ति के अध्ययन में लगाने लगा.

“भाप में तो कमाल की ताकत है!” – वह स्वयं से कहता था – “किसी दानव में भी इतनी शक्ति नहीं होती. अगर हम इस शक्ति को काबू में करके इससे अपने काम करना सीख लें तो हम इतना कुछ कर सकते हैं जो कोई सोच भी नहीं सकता. ये सिर्फ भारी वजन ही नहीं उठाएगी बल्कि बड़े-बड़े यंत्रों को भी गति प्रदान करेगी. ये विराट चक्कियों को घुमाएगी और नौकाओं को चलाएगी. ये चरखों को भी चलाएगी और खेतों में हलों को भी धक्का देगी. हजारों सालों से मनुष्य इसे प्रतिदिन खाना बनाते समय देखता आ रहा है लेकिन इसकी उपयोगिता पर किसी का भी ध्यान नहीं गया. लेकिन भाप की शक्ति को वश में कैसे करें, यही सबसे बड़ा प्रश्न है”.

एक के बाद दूसरा, वह सैकडों प्रयोग करके देखता गया. हर बार वह असफल रहता लेकिन अपनी हर असफलता से उसने कुछ-न-कुछ सीखा. लोगों ने उसका मजाक उड़ाया – “कैसा मूर्ख आदमी है जो यह सोचता है कि भाप से मशीनें चला सकता है!”

steam engineलेकिन जेम्स वाट ने हार नहीं मानी. कठोर परिश्रम और लगन के फलस्वरूप उन्होंने अपना पहला स्टीम इंजन बना लिया. उस इंजन के द्वारा उन्होंने भांति-भांति के कठिन कार्य आसानी से करके दिखाए. उनमें सुधार होते होते एक दिन भाप के इंजनों से रेलगाडियां चलने लगीं. लगभग 200 सालों तक भाप के इंजन सवारियों को ढोते रहे और अभी भी कई देशों में भाप के लोकोमोटिव चल रहे हैं.

(भाप के इंजन का चित्र फ्लिकर से, बाकी दोनों विकिपीडिया से)

(A motivational / inspiring anecdote of James Watt and the power of steam – in Hindi)

विक्रम साराभाई की सरलता


Vikram_Sarabhai

वर्ष १९४८ में अहमदाबाद की महात्मा गाँधी विज्ञान अन्वेषणशाला में कुछ विद्यार्थी भौतिकी के महत्वपूर्ण प्रयोग कर रहे थे. यह प्रयोगशाला विक्रम साराभाई ने हाल में ही शुरू की थी. प्रयोग के दौरान भारी विद्युत प्रवाह के कारण एक बहुमूल्य यंत्र जल गया. वह यंत्र विदेश से मंगाया गया था और भारत में उपलब्ध नहीं था. यंत्र के अभाव में अनेक महत्वपूर्ण प्रयोग स्थगित करने पड़ जाते.

विद्यार्थी डर गए कि वे साराभाई को इस बारे में कैसे बताएं. साराभाई कुछ ही क्षणों में प्रयोगस्थल पर आनेवाले थे.

“वे आ रहे हैं. तुम बता दो कि यंत्र जल गया है”.

“हमने जानबूझ कर तो ऐसा नहीं किया! कहीं वे नाराज़ हो गए तो?”

“क्या करें, कैसे बताएं? मुझे डर लग रहा है”.

साराभाई ने उन्हें फुसफुसाते हुए सुन लिया. उन्होंने पूछा – “क्या बात है? कोई समस्या है क्या?”

“सर, प्रयोग के दौरान विद्युत मीटर जल गया. उसमें से भारी विद्युत प्रवाह हो गया. हम…”

“इतनी सी बात! परेशान मत हो. वैज्ञानिक अध्ययन और प्रयोगों में ऐसी घटनाएँ होती रहती हैं. विद्यार्थी गलतियों से ही तो सीखते हैं! अगली बार प्रयोग से पहले अच्छे से जांच कर लेना” – साराभाई बहुत सरलता से बोले.

उनके इस उत्तर को सुनकर दोनों युवा वैज्ञानिकों के मन में उनके प्रति असीम श्रद्धा भर गई. भविष्य में वे प्रयोगों के दौरान पर्याप्त सावधानी बरतने लगे.

साराभाई इस हानि पर न तो क्रोधित हुए और न ही उन्होंने इसके लिए दुःख व्यक्त किया.

भाग्यशाली विद्यार्थियों को ही ऐसा गुरु मिलता है.

(A motivational / inspiring anecdote of Vikram Sarabhai – in Hindi)

महान भौतिकशास्त्री ‘मैक्स प्लांक’


मैक्स प्लांक (23 अप्रैल, 1858 – 4 अक्तूबर, 1947) महान भौतिकशास्त्री थे जिन्होंने क्वांटम फिजिक्स की नींव रखी. वे बीसवीं शताब्दी के महानतम वैज्ञानिक थे और उन्हें 1918 में नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उन्होंने अपने जीवन के पश्च भाग में बहुत से कष्ट झेले और जर्मनी में नाजी हुकूमत के दौरान उनका पूरा परिवार तबाह हो गया. आइंस्टाइन की भांति बड़े वैज्ञानिक उनके लिए भी यह कहते हैं कि आज भी उनके सिद्धांतों को पूरी तरह से समझनेवाले लोग बहुत कम हैं.

पंद्रह वर्ष की उम्र में मैक्स प्लांक ने अपने विद्यालय के भौतिकी के विभागाध्यक्ष से कहा कि वे भौतिकशास्त्री बनना चाहते हैं. विभागाध्यक्ष ने प्लांक से कहा – “भौतिकी विज्ञान की वह शाखा है जिसमें अब नया करने को कुछ नहीं रह गया है. जितनी चीज़ें खोजी जा सकती थीं उन्हें ढूँढ लिया गया है और भौतिकी का भविष्य धूमिल है. ऐसे में तुम्हें भौतिकी को छोड़कर कोई दूसरा विषय पढ़ना चाहिए.” – वास्तव में यह मत केवल प्लांक के विभागाध्यक्ष का ही नहीं थे. उस काल के कुछ बड़े वैज्ञानिक भी ऐसा ही सोचते थे.

लेकिन प्लांक ने किसी की न सुनी. लगभग 25 साल बाद क्वांटम फिजिक्स का आविर्भाव हुआ और प्लांक ने इसमें बहुत बड़ी भूमिका निभाई. क्वांटम फिजिक्स के आते ही क्लासिकल फिजिक्स औंधे मुंह गिर गई.

* * * * *

1879 में प्लांक ने इक्कीस वर्ष की उम्र में भौतिकी में पीएचडी कर ली और बहुत कम उम्र में ही वे बर्लिन विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्रोफेसर बन गए. एक दिन वे यह भूल गए कि उन्हें किस कमरे में लेक्चर देना था. वे बिल्डिंग में यहाँ-वहां घूमते रहे और उन्होंने एक बुजुर्ग कर्मचारी से पूछा – “क्या आप मुझे बता सकते हैं कि प्रोफेसर प्लांक का लेक्चर आज किस कमरे में है?”

बुजुर्ग कर्मचारी ने प्लांक का कन्धा थपथपाते हुए कहा – “वहां मत जाओ, बच्चे. अभी तुम हमारे बुद्धिमान प्रोफेसर प्लांक का लेक्चर समझने के लिए बहुत छोटे हो.”

* * * * *

कहते हैं कि प्लांक के आने-जाने से लोग घड़ियाँ मिलाते थे. एक युवा भौतिकविद को इसपर विश्वास नहीं था इसलिए एक दिन वह उनके कमरे के बाहर खड़े होकर घड़ी के घंटे बजने की प्रतीक्षा करने लगा. जैसे ही घड़ी का घंटा बजा, प्लांक कमरे से बाहर निकले और गलियारे में से होते हुए चले गए. वह युवक उस कमरे तक गया जहाँ वे पढाने के लिए गए थे. जैसे ही प्लांक पढाकर चलने लगे, घड़ी ने अपने घंटे बजाए. गौरतलब है कि प्लांक अपने पास कोई भी घड़ी नहीं रखते थे.

* * * * *

जिस कार्य की नींव प्लांक ने रखी, उसे अलबर्ट आइंस्टाइन ने आगे बढाया. आइंस्टाइन ने एक बार प्लांक के बारे में कहा – “मैं जितने भी भौतिकशास्त्रियों से मिला हूँ उनमें वे सर्वाधिक बुद्धिमान थे… लेकिन भौतिकी की उनकी सोच मुझसे मेल नहीं खाती क्योंकि 1919 के ग्रहणों के दौरान वे रात-रात भर जाग कर यह देखने का प्रयास करते थे कि प्रकाश पर गुरुत्वाकर्षण बल का क्या प्रभाव पड़ता है. यदि उनमें सापेक्षता के सिद्धांत की समझ होती तो वे मेरी तरह आराम से सोया करते.”

(Anecdotes of Max Plank – Physicist – Hindi)

आइन्स्टीन के बहुत सारे प्रसंग और संस्मरण


नेशनल अकैडमी ऑफ़ साइंस, वाशिंगटन में बनाए गए आइंस्टाइन मेमोरियल में आइंस्टाइन की नायब मूर्ति

नेशनल अकैडमी ऑफ़ साइंस, वाशिंगटन में बनाए गए आइंस्टाइन मेमोरियल में आइंस्टाइन की नायब मूर्ति

अलबर्ट आइन्स्टीन ने तीन साल का होने से पहले बोलना और सात साल का होने से पहले पढ़ना शुरू नहीं कियावे हमेशा लथड़ते हुए स्कूल जाते थेअपने घर का पता याद रखने में उन्हें दिक्कत होती थी

उन्होंने देखा कि प्रकाश तरंगों और कणिकाओं दोनों के रूप में चलता है जिसे क्वानटा कहते हैं क्योंकि उनके अनुसार ऐसा ही होता हैउन्होंने उस समय प्रचलित ईथर सम्बंधित सशक्त अवधारणा को हवा में उड़ा दियाबाद में उन्होंने यह भी बताया कि प्रकाश में भी द्रव्यमान होता है और स्पेस और टाइम भिन्न-भिन्न नहीं हैं बल्कि स्पेस-टाइम हैं, और ब्रम्हांड घोड़े की जीन की तरह हो सकता है

अमेरिका चले जाने के बाद आइंस्टाइन की एक-एक गतिविधि का रिकार्ड हैउनकी सनकें प्रसिद्द हैंजैसे मोजे नहीं पहनना आदिइन सबसे आइंस्टाइन के इर्द-गिर्द ऐसा प्रभामंडल बन गया जो किसी और भौतिकविद को नसीब नहीं हुआ

आइन्स्टीन बहुत अब्सेंट माइंड रहते थेइसके परिणाम सदैव रोचक नहीं थेउनकी पहली पत्नी भौतिकविद मिलेवा मैरिक के प्रति वे कुछ कठोर भी थे और अपनी दूसरी पत्नी एल्सा और अपने पुत्र से उनका दूर-के-जैसा सम्बन्ध था

* * * * *

आइन्स्टीन को एक १५ वर्षीय लड़की ने अपने होमवर्क में कुछ मदद करने के लिए चिठ्ठी लिखीआइन्स्टीन ने उसे पढ़ाई से सम्बंधित कुछ चित्र बनाकर भेजे और जवाब में लिखा – “अपनी पढ़ाई में गणित की कठिनाइयों से चिंतित मत हो, मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूँ कि मेरी कठिनाइयाँ कहीं बड़ी हैं“।

* * * * *

सोर्बोन में १९३० में आइन्स्टीन ने एक बार कहा – “यदि मेरे सापेक्षता के सिद्धांत की पुष्टि हो जाती है तो जर्मनी मुझे आदर्श जर्मन कहेगा, और फ्रांस मुझे विश्व-नागरिक का सम्मान देगालेकिन यदि मेरा सिद्धांत ग़लत साबित होगा तो फ्रांस मुझे जर्मन कहेगा और जर्मनी मुझे यहूदी कहेगा“।

* * * * *

किसी समारोह में एक महिला ने आइंस्टीन से सापेक्षता का सिद्धांत समझाने का अनुरोध कियाआइन्स्टीन ने कहा:

मैडम, एक बार मैं देहात में अपने अंधे मित्र के साथ घूम रहा था और मैंने उससे कहा कि मुझे दूध पीने की इच्छा हो रही है“।

दूध?” – मेरे मित्र ने कहा – “पीना तो मैं समझता हूँ लेकिन दूध क्या होता है?”

दूध एक सफ़ेद द्रव होता है” – मैंने जवाब दिया

द्रव तो मैं जानता हूँ लेकिन सफ़ेद क्या होता है?”

सफ़ेदजैसे हंस के पंख“।

पंख तो मैं महसूस कर सकता हूँ लेकिन ये हंस क्या होता है?”

एक पक्षी जिसकी गरदन मुडी सी होती है“।

गरदन तो मैं जानता हूँ लेकिन यह मुडी सी क्या है?”

अब मेरा धैर्य जवाब देने लगामैंने उसकी बांह पकड़ी और सीधी तानकर कहा – “यह सीधी है!” – फ़िर मैंने उसे मोड़ दिया और कहा – “यह मुडी हुई है“।

ओह!” – अंधे मित्र ने कहा – “अब मैं समझ गया दूध क्या होता है“।

* * * * *

जब आइन्स्टीन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे तब एक दिन एक छात्र उनके पास आया। वह बोला – “इस साल की परीक्षा में वही प्रश्न आए हैं जो पिछले साल की परीक्षा में आए थे”।

“हाँ” – आइन्स्टीन ने कहा – “लेकिन इस साल उत्तर बदल गए हैं”।

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एक बार किसी ने आइन्स्टीन की पत्नी से पूछा – “क्या आप अपने पति का सापेक्षता का सिद्धांत समझ सकती हैं?”

“नहीं” – उन्होंने बहुत आदरपूर्वक उत्तर दिया – “लेकिन मैं अपने पति को समझती हूँ और उनपर यकीन किया जा सकता है।”

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१९३१ में चार्ली चैपलिन ने आइन्स्टीन को हौलीवुड में आमंत्रित किया जहाँ चैपलिन अपनी फ़िल्म ‘सिटी लाइट्स’ की शूटिंग कर रहे थे। वे दोनों जब अपनी खुली कार में बाहर घूमने निकले तो सड़क पर आनेजाने वालों ने हाथ हिलाकर दोनों का अभिवादन किया।

चैपलिन ने आइन्स्टीन से कहा – “ये सभी आपका अभिवादन इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इनमें से कोई भी आपको नहीं समझ सकता; और मेरा अभिवादन इसलिए कर रहे हैं क्योंकि मुझे सभी समझ सकते हैं”।

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बर्लिन में सर विलियम रोथेन्स्तीन को आइन्स्टीन का एक पोर्ट्रेट बनाने के लिए कहा गया। आइन्स्टीन उनके स्टूडियो में एक वयोवृद्ध सज्जन के साथ आते थे जो एक कोने में बैठकर चुपचाप कुछ लिखता रहता था। आइन्स्टीन वहां भी समय की बर्बादी नहीं करते थे और परिकल्पनाओं और सिद्धांतों पर कुछ न कुछ कहते रहते थे जिसका समर्थन या विरोध वे सज्जन अपना सर हिलाकर कर दिया करते थे। जब उनका काम ख़त्म हो गया तब रोथेन्स्तीन ने आइन्स्टीन से उन सज्जन के बारे में पूछा:

“वे बहुत बड़े गणितज्ञ हैं” – आइन्स्टीन ने कहा – “मैं अपनी संकल्पनाओं की वैधता को गणितीय आधार पर परखने के लिए उनकी सहायता लेता हूँ क्योंकि मैं गणित में कमज़ोर हूँ”।

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१९१५ में आइन्स्टीन के सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत के प्रकाशन के बाद रूसी गणितज्ञ अलेक्सेंडर फ्रीडमैन को यह जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि आइन्स्टीन अपने सूत्रों के आधार पर यह देखने से चूक गए थे कि ब्रम्हांड फ़ैल रहा थाब्रम्हांड के फैलने का पता एडविन हबल ने १९२० में लगाया था

आइन्स्टीन से इतनी बड़ी गलती कैसे हो गई? असल में उन्होंने अपने सूत्रों में एक बहुत बेवकूफी भरी गलती कर दी थीउन्होंने इसे शून्य से गुणा कर दिया थाप्राचीन काल से ही गणित के साधारण छात्र भी यह जानते हैं कि किसी भी संख्या को शून्य से गुणा कर देना गणित की दृष्टि से बहुत बड़ा पाप है

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आइन्स्टीन ने एक बार कहा – “बचपन में मेरे पैर के अंगूठे से मेरे मोजों में छेद हो जाते थे इसलिए मैंने मोजे पहनना बंद कर दिया”।

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आइन्स्टीन के एक सहकर्मी ने उनसे उनका टेलीफोन नंबर पूछा। आइन्स्टीन पास रखी टेलीफोन डायरेक्टरी में अपना नंबर ढूँढने लगे। सहकर्मी चकित होकर बोला – “आपको अपना ख़ुद का टेलीफोन नंबर भी याद नहीं है?”

“नहीं” – आइन्स्टीन बोले – “किसी ऐसी चीज़ को मैं भला क्यों याद रखूँ जो मुझे किताब में ढूँढने से मिल जाती है”।

आइन्स्टीन कहा करते थे कि वे कोई भी ऐसी चीज़ याद नहीं रखते जिसे दो मिनट में ही ढूँढा जा सकता हो।

चित्र साभार – फ्लिकर

आइंस्टाइन के उपकरण


कैलटेक (कैलिफोर्निया इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) ने अलबर्ट आइंस्टाइन को एक समारोह में आमंत्रित कियाआइंस्टाइन अपनी पत्नी के साथ कार्यक्रम में हिस्सा लेने गएउन्होंने माउन्ट विल्सन पर स्थित अन्तरिक्ष वेधशाला भी देखीउस वेधशाला में उस समय तक बनी दुनिया की सबसे बड़ी अन्तरिक्ष दूरबीन स्थापित थी

उतनी बड़ी दूरबीन को देखने के बाद श्रीमती आइंस्टाइन ने वेधशाला के प्रभारी से पूछा – “इतनी बड़ी दूरबीन से आप क्या देखते हैं?”

प्रभारी को यह लगा कि श्रीमती आइंस्टाइन का खगोलशास्त्रीय ज्ञान कुछ कम है। उसने बड़े रौब से उत्तर दिया – “इससे हम ब्रम्हांड के रहस्यों का पता लगाते हैं।”

“बड़ी अजीब बात है। मेरे पति तो यह सब उनको मिली चिठ्ठियों के लिफाफों पर ही कर लेते हैं” – श्रीमती आइंस्टाइन ने कहा।

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नाजी गतिविधियों के कारण आइंस्टाइन को जर्मनी छोड़कर अमेरिका में शरण लेनी पड़ी। उन्हें बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों ने अपने यहाँ आचार्य का पद देने के लिए निमंत्रित किया लेकिन आइंस्टाइन ने प्रिंसटन विश्वविद्यालय को उसके शांत बौद्धिक वातावरण के कारण चुन लिया।

पहली बार प्रिंसटन पहुँचने पर वहां के प्रशासनिक अधिकारी ने आइंस्टाइन से कहा – “आप प्रयोग के लिए आवश्यक उपकरणों की सूची दे दें ताकि आपके कार्य के लिए उन्हें जल्दी ही उपलब्ध कराया जा सके।”

आइंस्टाइन ने सहजता से कहा – “आप मुझे केवल एक ब्लैकबोर्ड, कुछ चाक, कागज़ और पेन्सिल दे दीजिये।”

यह सुनकर अधिकारी हैरान हो गया। इससे पहले कि वह कुछ और कहता, आइंस्टाइन ने कहा – “और एक बड़ी टोकरी भी मंगा लीजिये क्योंकि अपना काम करते समय मैं बहुत सारी गलतियाँ भी करता हूँ और छोटी टोकरी बहुत जल्दी रद्दी से भर जाती है।”

* * * * *

जब लोग आइंस्टाइन से उनकी प्रयोगशाला के बारे में पूछते थे तो वे केवल अपने सर की ओर इशारा करके मुस्कुरा देते थे। एक वैज्ञानिक ने उनसे उनके सबसे प्रिय उपकरण के बारे में पूछा तो आइन्स्टीन ने उसे अपना फाउंटन पेन दिखाया। उनका दिमाग उनकी प्रयोगशाला थी और फाउंटन पेन उनका उपकरण।

(अलबर्ट आइंस्टाइन के बचपन का एक प्रसंग इसी ब्लॉग में यहाँ पढ़ें। उनका चित्र विकिपीडिया से लिया गया है)

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