Tag Archives: विज्ञान

वैज्ञानिक और ईश्वर : A Scientist Meets God

Cornelia Kopp Photography

एक वैज्ञानिक ने ईश्वर को खोज लिया और उससे कहा, “ईश्वर, हमें अब तुम्हारी कोई ज़रूरत नहीं है. विज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली है कि अब हम जीवन के किसी भी रूप की रचना कर सकते हैं. आदिकाल में तुमने जो किया वह हम अब करके दिखा सकते हैं.”

“अच्छा! बताओ तुम क्या कर सकते हो?”, ईश्वर ने पूछा.

वैज्ञानिक ने कहा, “हम मिट्टी से जीवन के विविध रूपों की रचना कर सकते हैं. हम इसे तुम्हारी आकृति में ढालकर इसमें प्राण फूंक सकते हैं. हम पुरुष, स्त्री और जीवन के हर उस रूप की रचना कर सकते हैं जो कभी अस्तित्व में रहा हो.”

“वाह! यह तो बहुत अच्छी बात है”, ईश्वर ने कहा, “मुझे दिखाओ तुम ऐसा कैसे करते हो”.

वैज्ञानिक नीचे झुकता है और अपनी परखनली में थोड़ी सी मिट्टी भरता है…

“रूको! ज़रा ठहरो!”, ईश्वर ने उसे टोकते हुए कहा, “वह तो मेरी मिट्टी है! तुम अपनी मिट्टी से यह काम करो!”

(~_~)

A scientist one day discovered the God and said to Him, “God, we don’t need you any more. Science has finally figured out a way to create life out of nothing – in other words, we can now do what you did in the beginning.

“Oh, is that so? Tell Me…” replies God.

“Well,” says the scientist, “we can take dirt and create life forms from it. We can make it into the likeness of you and breathe life into it. We are able to create man, woman or any living thing that ever existed.”

“Well, that’s very interesting…show Me how you do it.”

So the scientist bends down to the ground and picks up some dirt in his his test tube…

“No, no, no…” interrupts God, “That’s the dirt I created! Get your own dirt.”

About these ads

9 Comments

Filed under Stories

सर जगदीशचंद्र बोस का संकल्प

J.C.Boseआज बात करेंगे भारत के महान वैज्ञानिक सर जगदीशचंद्र बोस की, जिन्होंने पेड़-पौधों में संवेदनाएं होने की बात सिद्ध करके संसार को आश्चर्यचकित कर दिया था. इस महान खोज के अलावा बोस ने बेतार (wireless) तकनीक का प्रयोग करके रेडियो तरंगों के संप्रेषण के क्षेत्र में भी अद्वितीय कार्य किया. उनकी इस खोज को स्वयं बोस और तत्कालीन वैज्ञानिकों ने गंभीरतापूर्वक नहीं लिया और इटली के वैज्ञानिक मारकोनी ने इस विषय पर दो वर्ष बाद की गई स्वतंत्र खोज के व्यावसायिक खोज का पेटेंट ले लिया, अर्थात मारकोनी को रेडियो के आविष्कारक के रूप में मान लिया गया. मारकोनी ने बाद में यह कहा कि उन्हें सर बोस के कार्यों की कुछ जानकारी थी जिसे उन्होंने निरंतर अनुसंधान द्वारा परिष्कृत किया.

कलकत्ता में भौतिकी का अध्ययन करने के बाद बोस इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविश्यालय चले गए जहाँ से स्नातक की उपाधि लेकर वे भारत लौट आये. उन्होंने प्रेसिडेंसी कॉलेज में प्राध्यापक का पद ग्रहण कर लिया. उन दिनों अंग्रेज और भारतीय शिक्षकों के बीच भेदभाव किया जाता था. अंग्रेज अध्यापकों की तुलना में भारतीय अध्यापकों को केवल दो-तिहाई वेतन दिया जाता था. बोस अस्थाई पद पर कार्य कर रहे थे इसलिए उन्हें केवल आधा वेतन ही मिलता था. बोस इससे बहुत क्षुब्ध हुए और उन्होंने यह घोषणा कर दी कि समान कार्य के लिए वे समान वेतन ही स्वीकार करेंगे – “मैं पूरा वेतन ही लूँगा, अन्यथा वेतन नहीं लूँगा!”

तीन साल तक बोस ने वेतन नहीं लिया. वे आर्थिक संकटों में पड़ गए और कलकत्ते का बढ़िया घर छोड़कर उन्हें शहर से दूर सस्ता मकान लेना पड़ गया. कलकत्ता काम पर आने के लिए वे अपनी पत्नी के साथ हुगली नदी में नाव खेते हुए आते थे. उनकी पत्नी नाव लेकर अकेली लौट जाती और शाम को वापस नाव लेकर उन्हें लेने आतीं. लम्बे समय तक दृढनिश्चयी पति-पत्नी इसी प्रकार नाव खेकर अपने आने-जाने का खर्चा बचाते रहे.

अंग्रेज अधिकारी लंबे समय तक बोस के झुकने का इंतज़ार करते रहे पर अंततः उन्हें ही झुकना पड़ा. बोस को अंग्रेज अध्यापकों के बराबर मिलनेवाला वेतन देना स्वीकार कर लिया गया.

चित्र साभार – विकीपीडिया

(A motivational / inspirational anecdote of Sir Jagdish Chandra Bose – in Hindi)

6 Comments

Filed under वैज्ञानिक

नास्तिक प्रोफेसर और विद्यार्थी के मध्य संवाद : An Atheist Professor and His Student

2946205825_0bbd4dceacएक नास्तिक प्रोफेसर और विद्यार्थी के मध्य ईश्वर के अस्तित्व और विज्ञान के बारे में एक दिन कक्षा में वार्तालाप हुआ.

प्रोफेसर ने अपने नए विद्यार्थी को खड़ा होने के लिए कहा और उससे पूछा :-

प्रोफेसर – क्या तुम ईश्वर में विश्वास करते हो?

विद्यार्थी – हां सर.

प्रोफेसर – क्या ईश्वर शुभ है?

विद्यार्थी – जी सर.

प्रोफेसर – क्या ईश्वर सर्वशक्तिमान है?

विद्यार्थी – जी है.

प्रोफेसर – पिछले साल मेरे भाई की मृत्यु कैंसर से हो गई जबकि वह अंत तक ईश्वर से अच्छा होने की प्रार्थना करता रहा. हममें से बहुत से लोग ईश्वर से ऐसी ही प्रार्थना करते रहते हैं लेकिन ईश्वर कुछ नहीं करता. ऐसा ईश्वर अच्छा कैसे हो सकता है? बताओ.

(विद्यार्थी कुछ नहीं कहता)

प्रोफेसर – लगता है तुम्हारे पास इस बात का कोई जवाब नहीं है. चलो हम आगे बढ़ते हैं. मुझे बताओ, क्या ईश्वर अच्छा है?

विद्यार्थी – जी, है.

प्रोफेसर – और क्या शैतान भी अच्छा है?

विद्यार्थी – नहीं.

प्रोफेसर – लेकिन कहा जाता है कि सब कुछ ईश्वर से ही उत्पन्न हुआ है. तो फिर शैतान कहां से आया?

विद्यार्थी – जी… ईश्वर से.

प्रोफेसर – ठीक है. तो अब तुम मुझे बताओ, क्या संसार में बुराइयां हैं?

विद्यार्थी – जी, हैं.

प्रोफेसर – हां. बुराइयां हर तरफ हैं. और तुम्हारे अनुसार ईश्वर ने सब कुछ बनाया है न?

विद्यार्थी – जी.

प्रोफेसर – तो बुराइयां किसने बनाई हैं?

(विद्यार्थी कुछ नहीं बोलता)

प्रोफेसर – संसार में बीमारी, भुखमरी, युद्ध, अराजकता है. ये सभी और दूसरी बहुत सी बुराइयां संसार में हैं न?

विद्यार्थी – जी, हैं.

प्रोफेसर – इन बुराइयों को किसने बनाया है?

(विद्यार्थी कुछ नहीं कहता)

प्रोफेसर – विज्ञान कहता है कि हम अपनी पांच ज्ञानेंद्रियों से सभी प्रकार का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं. मुझे बताओ, क्या तुमने ईश्वर को कभी देखा है?

विद्यार्थी – नहीं.

प्रोफेसर – क्या तुमने ईश्वर की आवाज़ सुनी है?

विद्यार्थी – नहीं सर.

प्रोफेसर – क्या तुमने कभी ईश्वर का स्पर्श किया, उसका स्वाद या सुगंध लिया? क्या तुम्हें ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव हुआ?

विद्यार्थी – नहीं सर. ऐसा कभी नहीं हुआ.

प्रोफेसर – फिर भी तुम उसमें आस्था रखते हो!

विद्यार्थी – … जी.

प्रोफेसर – लेकिन विज्ञान के अनुसार तुम्हारे ईश्वर के अस्तित्व का कोई वैधानिक, तर्कसंगत, अनुभवाधारित कोई प्रमाण नहीं है. इस बारे में तुम क्या कहोगे?

विद्यार्थी – कुछ नहीं. मुझे केवल अपनी आस्था पर विश्वास है.

प्रोफेसर – बहुत खूब! लेकिन विज्ञान तुम्हारी इस कोरी आस्था को दो कौड़ी की भी नहीं मानता.

विद्यार्थी – मैं जानता हूं, सर. क्या मैं आपसे कुछ प्रश्न कर सकता हूं?

प्रोफेसर – हां, पूछो क्या पूछना चाहते हो.

विद्यार्थी – क्या ठंडा या ठंड जैसा कुछ वास्तव में होता है?

प्रोफेसर – हां, इसमें क्या संदेह है!

विद्यार्थी – नहीं सर. आप गलत कह रहे हैं.

(कक्षा में अब गहन शांति छा जाती है)

प्रोफेसर – क्या? तुम कहना क्या चाहते हो?

विद्यार्थी – सर, ऊष्मा या ताप कम या अधिक हो सकता है – जैसे निम्नताप, उच्चताप, चरमताप, परमताप, या फिर शून्य ताप आदि. लेकिन ठंड जैसा कुछ नहीं होता. हम शून्य से 273 डिग्री नीचे के तापमान को छू सकते हैं जब कोई ऊष्मा नहीं होती पर उससे नीचे नहीं जा सकते. ठंड जैसा कुछ नहीं होता. ठंड केवल एक शब्द है जिससे हम ताप की अनुपस्थति को वर्णित करते हैं. हम ठंड को नहीं माप सकते. ताप ऊर्जा है. ठंड ताप के ठीक विपरीत नहीं है बल्कि उसकी अनुपस्थिति है.

(कक्षा में सभी इस बात को समझने का प्रयास करने लगते हैं)

विद्यार्थी – और अंधकार क्या है, सर? क्या अंधकार जैसी कोई चीज होती है?

प्रोफेसर – यदि अंधकार नहीं होता तो भला रात क्या होती है?

विद्यार्थी – आप गलत कह रहे हैं, सर. अंधकार भी किसी चीज की अनुपस्थिति ही है. प्रकाश कम या अधिक हो सकता है, मंद या चौंधियाता हुआ हो सकता है, झिलमिलाता या लुपलुपाता हो सकता है, लेकिन यदि प्रकाश का कोई स्रोत नहीं हो वह अवस्था अंधकार की होती है. नहीं क्या? वास्तव में अंधकार का कोई अस्तित्व नहीं होता. यदि ऐसा होता तो हम अंधकार को और अधिक गहरा बना पाते, जैसा हम प्रकाश का साथ कर सकते हैं.eye-of-god

प्रोफेसर – मैं समझ नहीं पा रहा कि तुम क्या साबित करना चाहते हो?

विद्यार्थी – मैं यह कहना चाहता हूं कि आपका दृष्टिकोण दोषपूर्ण है.

प्रोफेसर – दोषपूर्ण! तुम ऐसा कैसे कह सकते हो?

विद्यार्थी – आप द्वैत की अवधारणा को मान रहे हैं. आप कह रहे हैं कि जिस प्रकार जीवन और मृत्यु हैं उसी प्रकार अच्छा और बुरा ईश्वर होता है. आप ईश्वर की धारणा को सीमित रूप में ले रहे हैं… वह जिसे आप माप सकते हैं. क्या आप जानते हैं कि विज्ञान इसकी व्याख्या तक नहीं कर सकता कि विचार क्या होता है. आप विद्युत और चुंबकत्व के प्रयोग करते हैं लेकिन आपने इन्हें न तो देखा है और न ही इनको पूरी तरह से जान पाए हैं. आप मृत्यु को जीवन के ठीक विलोम के रूप में देखते हैं जबकि मृत्यु का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, वह जो जीवन की अनुपस्थिति मात्र है.

अब आप मुझे बताएं सर, क्या आप अपने छात्रों को यह नहीं बताते कि मनुष्यों की उत्पत्ति वानरों से हुई है?

प्रोफेसर – यदि तुम्हारा आशय प्राकृतिक विकासवाद की प्रक्रिया से है तो… हाँ बताता हूँ.

विद्यार्थी – क्या आपने अपनी आँखों से इस विकास की प्रक्रिया को घटते देखा है?

(प्रोफेसर मुस्कुराते हुए अपना सर न की मुद्रा में हिलाता है, वह समझ गया है कि यह बहस किस दिशा में जा रही है)

विद्यार्थी – चूंकि आज तक किसी ने भी विकास की प्रक्रिया को घटते हुए नहीं देखा है और किसी ने यह सिद्ध भी नहीं किया है कि यह प्रक्रिया अनवरत है, क्या फिर भी आप इसे अपने छात्रों को दावे से नहीं पढाते हैं? ऐसा है तो आप वैज्ञानिक में और एक उपदेशक में कोई फर्क रह जाता है?

(कक्षा में खुसरफुसर होने लगती है)

विद्यार्थी – (ऊंचे स्वर में) क्या कक्षा में कोई ऐसा है जिसने प्रोफेसर का मष्तिष्क देखा हो?

(सारे विद्यार्थी हंसने लगते हैं)

विद्यार्थी – क्या यहाँ कोई है जिसने प्रोफेसर के मष्तिष्क को सुना हो, छुआ हो, सूंघा, चखा, या अनुभव किया हो?

शायद यहाँ ऐसा कोई नहीं है. इस प्रकार, विज्ञान के स्थापित मानदंडों के अनुसार मैं यह कह सकता हूँ सर कि आपके दिमाग नहीं है. मेरी बात का बुरा न मानें सर, लेकिन यदि आपके दिमाग ही नहीं है तो हम आपकी शिक्षाओं पर कैसे भरोसा कर लें?

(कक्षा में शांति छा जाती है. प्रोफेसर विद्यार्थी की ओर टकटकी लगाए देखते हैं. उनका चेहरा गहन सोच में डूबा है)

प्रोफेसर – कैसी बातें करते हो! यह तो हम अपने विश्वास से जानते ही हैं.

विद्यार्थी – वही तो मैं भी कहना चाहता हूँ सर कि मनुष्य और ईश्वर को जोड़नेवाली कड़ी आस्था ही है. यही सभी चर-अचर को गतिमान रखती है.

* * * * * * * * * * * * * * * * * * * *

ऊपर दिया गया संवाद इन्टरनेट पर चैन ई-मेल के रूप में सालों से घूम रहा है. कहा जाता है कि उस विद्यार्थी का नाम ए पी जे अबुल कलाम था, लेकिन ऐसा दावे से नहीं कहा जा सकता.

आप इस बारे में क्या सोचते हैं? आपकी दृष्टि में कौन सही है? क्या आपको प्रोफेसर की तर्कशीलता प्रभावित करती है या विद्यार्थी की निपट आस्था लुभाती है?

(A motivational / inspirational dialogues between an atheist professor and his believer student – in Hindi)

(~_~)

An Atheist Professor of Philosophy was speaking to his Class on the Problem Science has with GOD , the ALMIGHTY. He asked one of his New Students to stand and . . .

Professor :Do you Believe in GOD ?
Student : Absolutely, sir.
Professor : Is GOD Good ?
Student : Sure.
Professor : Is GOD ALL – POWERFUL ?
Student : Yes.
Professor : My Brother died of Cancer even though he prayed to GOD to heal him. Most of us would attempt to help others who are ill. But GOD didn’t. How is this GOD good then? Hmm?

(Student was silent )

Professor : You can’t answer, can you ? Let’s start again, Young man. Is GOD Good?
Student : Yes.
Professor : Is Satan good ?
Student : No.
Professor : Where does Satan come from ?
Student : From . . . GOD . . .
Professor : That’s right. Tell me son, is there evil in this world?
Student : Yes.
Professor : Evil is everywhere, isn’t it ? And GOD did make everything.
Correct?
Student : Yes.
Professor : So who created evil ?

(Student did not answer)

Professor : Is there Sickness? Immorality? Hatred? Ugliness? All these terrible things exist in the world, don’t they?
Student : Yes, sir.
Professor : So, who created them ?

(Student had no answer)

Professor : Science says you have 5 senses you use to identify and observe the world around you. Tell me, son . . . Have you ever seen GOD?
Student : No, sir.
Professor : Tell us if you have ever heard your GOD?
Student : No , sir.
Professor : Have you ever felt your GOD, tasted your GOD , smelt your GOD ? Have you ever had any sensory perception of GOD for that matter?
Student : No, sir. I’m afraid I haven’t.
Professor : Yet you still believe in HIM?
Student : Yes.
Professor : According to empirical, testable, demonstrable protocol, science says your GOD doesn’t exist. What do you say to that, son?
Student : Nothing. I only have my faith.
Professor : Yes, faith. And that is the problem science has.

Student asks and professor answers

Student : Professor, is there such a thing as heat?
Professor : Yes.
Student : And is there such a thing as cold?
Professor : Yes.
Student : No, sir. There isn’t, 

(The Lecture Theatre became very quiet with this turn of events )

Student : Sir, you can have lots of heat, even more heat, superheat, red hot, white hot, a little heat or no heat. But we don’t have anything called cold. We can hit 458 degrees below zero which is no heat, but we can’t go any further after that. There is no such thing as cold. Cold is only a word we use to describe the absence of heat. We cannot measure cold. Heat is energy. Cold is not the opposite of heat, sir, just the absence of it.

(There was pin-drop silence in the Lecture Theatre )

Student : What about darkness, Professor? Is there such a thing as darkness?
Professor : Yes. What is night if there isn’t darkness?
Student : You’re wrong again, sir. Darkness is the absence of something. You can have low light, normal light, bright light, flashing light . . but if you have no light constantly, you have nothing and its called darkness, isn’t it? In reality, darkness isn’t. If it is, you would be able to make darkness darker, wouldn’t you?

Professor : So what is the point you are making, Young Man ?
Student : Sir, my point is your Philosophical premise is flawed.
Professor : Flawed ? Can you explain how?
Student : Sir, you are working on the premise of duality. You argue there is life and then there is death, a Good GOD and a Bad GOD. You are viewing the concept of GOD as something finite, something we can measure. Sir, science can’t even explain a thought. It uses electricity and magnetism, but has never seen, much less fully understood either one. To view death as the opposite of life is to be ignorant of the fact that death cannot exist as a substantive thing. Death is not the opposite of life: just the absence of it. Now tell me, Professor, do you teach your students that they evolved from a monkey?
Professor : If you are referring to the natural evolutionary process, yes, of course, I do.

Student : Have you ever observed evolution with your own eyes, sir?

(The Professor shook his head with a smile, beginning to realize where the argument was going)

Student : Since no one has ever observed the process of evolution at work and cannot even prove that this process is an on-going endeavour, are you not teaching your opinion, sir? Are you not a scientist but a preacher?

(The class was in uproar )

Student : Is there anyone in the class who has ever seen the professor’s brain?

(The class broke out into laughter)

Student : Is there anyone here who has ever heard the Professor’s brain, felt it, touched or smelt it? . . .No one appears to have done so. So, according to the established rules of empirical, stable, demonstrable protocol, Science says that you have no brain, sir. With all due respect, sir, how do we then trust your lectures,sir?

(The room was silent. The Professor stared at the student, his face unfathomable)

Professor : I guess you’ll have to take them on faith, son.
Student : That is it sir . . . exactly ! The link between MAN & GOD is FAITH. That is all that keeps things alive and moving.

44 Comments

Filed under Stories

माइकल फैराडे की कहानी

क्या आप विद्युत् के बिना जीवन की कल्पना कर सकते हैं? एक घंटे के लिए बिजली गोल हो जाए तो लोग बुरी तरह से परेशान हो जाते हैं। एक दिन के लिए बिजली गोल हो जाने पर तो हाहाकार ही मच जाता है।

विद्युत् व्यवस्था की खोज में कई लोगों का योगदान है लेकिन इसमें सबसे बड़ी खोज माइकल फैराडे ने की। फैराडे ने डायनेमो का आविष्कार किया जिसके सिद्धांत पर ही जेनरेटर और मोटर बनते हैं।

विज्ञान के इतिहास में माइकल फैराडे और थॉमस अल्वा एडिसन ऐसे महान अविष्कारक हैं जो गरीबी और लाचारी के कारण ज़रूरी स्कूली शिक्षा भी नहीं प्राप्त कर सके। प्रस्तुत है डायनेमो की खोज से जुड़ा फैराडे का प्रेरक प्रसंग:

डायनेमो या जेनरेटर के बारे में जानकारी रखनेवाले यह जानते हैं कि यह ऐसा यंत्र है जिसमें चुम्बकों के भीतर तारों की कुंडली या कुंडली के भीतर चुम्बक को घुमाने पर विद्युत् बनती है। एक बार फैराडे ने अपने सरल विद्युत् चुम्बकीय प्रेरण के प्रयोग की प्रदर्शनी लगाई। कौतूहलवश इस प्रयोग को देखने दूर-दूर से लोग आए। दर्शकों की भीड़ में एक औरत भी अपने बच्चे को गोदी में लेकर खड़ी थी। एक मेज पर फैराडे ने अपने प्रयोग का प्रदर्शन किया। तांबे के तारों की कुंडली के दोनों सिरों को एक सुई हिलानेवाले मीटर से जोड़ दिया। इसके बाद कुंडली के भीतर एक छड़ चुम्बक को तेजी से घुमाया। इस क्रिया से विद्युत् उत्पन्न हुई और मीटर की सुई हिलने लगी। यह दिखाने के बाद फैराडे ने दर्शकों को बताया कि इस प्रकार विद्युत् उत्पन्न की जा सकती है।

यह सुनकर वह महिला क्रोधित होकर चिल्लाने लगी – “यह भी कोई प्रयोग है!? यही दिखाने के लिए तुमने इतनी दूर-दूर से लोगों को बुलाया! इसका क्या उपयोग है?”

यह सुनकर फैराडे ने विनम्रतापूर्वक कहा – “मैडम, जिस प्रकार आपका बच्चा अभी छोटा है, मेरा प्रयोग भी अभी शैशवकाल में ही है। आज आपका बच्चा कोई काम नहीं करता अर्थात उसका कोई उपयोग नहीं है, उसी प्रकार मेरा प्रयोग भी आज निरर्थक लगता है। लेकिन मुझे विश्वास है कि मेरा प्रयोग एक-न-एक दिन बड़ा होकर बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।”

यह सुनकर वह महिला चुप हो गई। फैराडे अपने जीवनकाल में विद्युत् व्यवस्था को पूरी तरह विकसित होते नहीं देख सके लेकिन अन्य वैज्ञानिकों ने इस दिशा में सुधार व् खोज करते-करते उनके प्रयोग की सार्थकता सिद्ध कर दी।

(माइकल फैराडे का चित्र विकिपीडिया में यहाँ से लिया गया है)

(A motivational / inspirational anecdote about Michael Faraday- in Hindi)

18 Comments

Filed under वैज्ञानिक

100 वें बंदर की क्रांति

Snow_Macaqueप्रकृतिविज्ञानियों ने जापान के प्रसिद्द और खूबसूरत मकाक बंदरों का उनके प्राकृतिक परिवेश में 30 सालों तक अध्ययन किया.

1952 में जापान के कोशिमा द्वीप पर प्रकृतिविज्ञानियों ने बंदरों को खाने के लिए शकरकंद दिए जो रेत में गिर जाते थे. बंदरों को शकरकंद का स्वाद भा गया लेकिन रेत के कारण उनके मुंह में किरकिरी हो जाती थी.

18 माह की इमो नामक एक मादा बन्दर ने इस समस्या का हल शकरकंद को समीप बहती स्वच्छ जलधारा में धोकर निकाल लिया. उसने यह तरकीब अपनी माँ को भी सिखा दी. देखते-ही-देखते बहुत सारे बच्चे और उनकी माएँ पानी में धोकर शकरकंद खाने लगे.

प्रकृतिविज्ञानियों के सामने ही बहुत सारे बंदरों ने इस नायब तरीके को अपना लिया. 1952 से 1958 के दौरान सभी वयस्क बन्दर शकाराकंदों को पानी में धोकर खाने लायक बनाना सीख गए. केवल वे वयस्क बन्दर ही इसे सीख पाए जिन्होंने अपने बच्चों को ऐसा करते देखा था. वे बन्दर जिनकी कोई संतान नहीं थीं, वे पहले की भांति गंदे शकरकंद खाते रहे.

तभी एक अनूठी घटना हुई. 1958 के वसंत में कोशिमा द्वीप के बहुत सारे बंदर शकरकंदों को धोकर खा रहे थे – उनकी निश्चित संख्या का पता नहीं है. मान लें कि एक सुबह वहां 99 बंदर थे जिन्हें पानी में धोकर खाना आ गया था. अब यह भी मान लें कि अगली सुबह 100 वें बंदर ने भी पानी में धोकर शकरकंद खाना सीख लिया.

इसके बाद तो चमत्कार हो गया!

उस शाम तक द्वीप के सभी बंदर पानी में धोकर फल खाने लगे. उस 100 वें बन्दर द्वारा उठाये गए कदम ने एक वैचारिक क्रांति को जन्म दे दिया था.

यह चमत्कार यहीं पर नहीं रुका बल्कि समुद्र को लांघकर दूसरे द्वीपों तक जा पहुंचा! ताकासकियामा द्वीप के सारे बंदर भी अपने फल को पानी में धोकर खाते देखे गए. और भी द्वीपों पर मौजूद बंदर अपने फल धोकर खा रहे थे.

इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि जब किसी समूह में निश्चित संख्या में सदस्यों में जागरूकता आ जाती है तो वह जागरूकता चेतना के रहस्यमयी मानसिक स्तर पर फ़ैल जाती है. सही-सही संख्या का अनुमान लगाना संभव नहीं है लेकिन 100 वें बन्दर की क्रान्ति यह बताती है कि जब सुनिश्चित संख्या में यह जागरूकता उत्पन्न हो जाती है तो वह चेतना में घर कर लेती है.

ऐसे में यदि केवल एक अतिरिक्त जीव में इस जागरूकता का प्रसार हो जाये तो वह चेतना एकाएक विराट समुदाय में फ़ैल जाती है.

क्या मनुष्यों के विषय में भी ऐसा कहा जा सकता है?

(The revolution of 100th monkey – in Hindi)

7 Comments

Filed under Stories