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क्या लोगों को आपकी कमी खलेगी?

225px-AlfredNobel_adjustedलगभग सौ साल पहले एक व्यक्ति ने सुबह समाचार पत्र में स्वयं की मृत्यु का समाचार छपा देखा और वह स्तब्ध रह गया. वास्तव में समाचार पत्र से बहुत बड़ी गलती हो गई थी और गलत व्यक्ति की मृत्यु का समाचार छप गया. उस व्यक्ति ने समाचार पत्र में पढ़ा – “डायनामाईट किंग अल्फ्रेड नोबेल की मृत्यु… वह मौत का सौदागर था”.

अल्फ्रेड नोबेल ने जब डायनामाईट की खोज की थी तब उन्हें पता नहीं था कि खदानों और निर्माणकार्य में उपयोग के लिए खोजी गई विध्वंसक शक्ति का उपयोग युद्घ और हिंसक प्रयोजनों में होने लगेगा. अपनी मृत्यु का समाचार पढ़कर नोबेल के मन में पहला विचार यही आया – “क्या मैं जीवित हूँ? ‘मौत का सौदागर ‘अल्फ्रेड नोबेल’… क्या दुनिया मेरी मृत्यु के बाद मुझे यही कहकर याद रखेगी?”

उस दिन के बाद से नोबेल ने अपने सभी काम छोड़कर विश्व-शांति के प्रसार के लिए प्रयत्न आरम्भ कर दिए.

स्वयं को अल्फ्रेड नोबेल के स्थान पर रखकर देखें और सोचें:

* आपकी धरोहर क्या है?

* आप कैसे व्यक्ति के रूप में याद किया जाना पसंद करेंगे?

* क्या लोग आपके बारे में अच्छी बातें करेंगे?

* क्या लोग आपको मृत्यु के बाद भी प्रेम और आदर देंगे?

* क्या लोगों को आपकी कमी खलेगी?

चित्र साभार : विकिपीडिया

(A motivational / inspiring anecdote of Alfred Noble – in Hindi)

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सुकरात के प्रसंग

प्राचीन यूनान में डेल्फी नामक स्थान के बारे में लोग यह मानते थे कि वह विश्व के केंद्र पर स्थित है. वहां स्थित एक मंदिर के लिए यह मान्यता थी कि उस मंदिर का पुजारी (ऑरेकल) समाधिस्थ होने पर अपोलो देवता की वाणी में दिव्य सन्देश सुनाता है.

एक बार किसी ने ऑरेकल से पूछा कि यूनान का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति कौन है. ऑरेकल ने उत्तर दिया – “एथेनियन दार्शनिक सुकरात यूनान का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति है.”

लोगों ने सुकरात को ऑरेकल के कथन के बारे में बताया. यह सुनकर सुकरात ने कहा – “यदि देवता मुझे यूनान का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति बताते हैं तो मुझे इसपर विश्वास करना चाहिए. इसका एकमात्र कारण यह हो सकता है कि समस्त यूनानियों में केवल मैं ही यह बात जानता हूँ कि मैं कुछ भी नहीं जानता.”

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ऊपर दिया गया चित्र 'सुकरात की मृत्यु' प्रसिद्द फ्रांसीसी चित्रकार ज़ाक-लुइ डेविड ने 1787 में बनाया था. चित्र विकिपीडिया से.

अपनी पुस्तक अपोलोजिया में प्लेटो सुकरात के अंतिम शब्दों के बारे में लिखते हैं – “मृत्यु से पहले सुकरात ने हमसे कहा ‘विदा लेने का समय आ गया है… और हम सब अपने-अपने मार्ग को जायेंगे… मैं मृत्यु की ओर, और तुम जीवन की ओर. कौन सा मार्ग श्रेष्ठ है, यह ईश्वर ही जानता है.”

(सामान्यतः इन्हें सुकरात के अंतिम शब्द कहा जाता है: “क्रितो, मुझे एस्कुलापियास को एक मुर्गा देना था. क्या तुम मेरा उधार चुका दोगे?’)

इस ब्लॉग में सुकरात के अन्य प्रसंग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.

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अमरता का रहस्य

immortalityकिसी गाँव में एक वैद्य रहता था जो यह दावा करता था कि उसे अमरता का रहस्य पता है। बहुत से लोग उसके पास यह रहस्य मालूम करने के लिए आते थे। वैद्य उन सभी से कुछ धन ले लेता और बदले में उनको कुछ भी अगड़म-बगड़म बता देता था। उनमें से कोई यदि बाद में मर जाता था तो वैद्य लोगों को यह कह देता था कि उस व्यक्ति को अमरता का रहस्य ठीक से समझ में नहीं आया।

उस देश के राजा ने वैद्य के बारे में सुना और उसको लिवा लाने के लिए एक दूत भेजा। किसी कारणवश दूत को यात्रा में कुछ विलंब हो गया और जब वह वैद्य के घर पहुँचा तब उसे समाचार मिला कि वैद्य कुछ समय पहले चल बसा था।

दूत डरते-डरते राजा के महल वापस आया और उसने राजा से कहा कि उसे यात्रा में विलंब हो गया था और इस बीच वैद्य की मृत्यु हो गई। राजा यह सुनकर बहुत क्रोधित हो गया और उसने दूत को प्राणदंड देने का आदेश दे दिया।

च्वांग-त्जु ने दूत पर आए संकट के बारे में सुना। वह राजा के महल गया और उससे बोला – “आपके दूत ने पहुँचने में विलंब करके गलती की पर आपने भी उसे वहां भेजने की गलती की। वैद्य की मृत्यु यह सिद्ध करती है की उसे अमरता के किसी भी रहस्य का पता नहीं था अन्यथा उसकी मृत्यु ही नहीं हुई होती। रहस्य सिर्फ़ यही है कि ऐसा कोई भी रहस्य नहीं है। केवल अज्ञानी ही ऐसी बातों पर भरोसा कर बैठते हैं।

राजा ने दूत को क्षमादान दे दिया और मरने-जीने की चिंता से मुक्त होकर जीवन व्यतीत करने लगा।

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The Broken Cup – बेजोड़ कप

इकक्यु नामक एक ज़ेन साधक बचपन से ही बहुत विद्वान् थे। उनके गुरु के पास एक बेजोड़ और बेशकीमती चाय का कप था। एक दिन साफ़-सफाई के दौरान इकक्यु से वह कप टूट गया। इकक्यु परेशान हो गए। उन्हें अपने गुरु के आने की आहट सुनाई दी। इकक्यु ने कप को अपने पीछे छुपा लिया। गुरु के सामने आ जाने पर उन्होंने पूछा – “लोग मरते क्यों हैं?”

“मरना तो प्राकृतिक है” – गुरु ने कहा – “हर वह चीज़ जिसकी उम्र हो जाती है वह मर जाती है।”

इकक्यु ने गुरु को टूटा हुआ कप दिखाया और बोले – “आपके कप की भी उम्र हो चली थी.”

* * * * *

The Zen master Ikkyu was clever even as a boy. One day he happened to break a tea cup that his teacher had cherished it. It was a precious cup. Hearing the footsteps of his teacher, Ikkyu crossed his hands back holding the broken pieces behind him.

When the teacher arrived, Ikkyu asked : “Why do people have to die someday?”

The teacher replied “This is natural”. “All that exists will have to perish someday when it will have to”

Ikkyu immediately produced the broken cup and said ” The time has come for your cup to die”

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