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आख़री सफ़र


(अमरीकन लेखक केंट नेर्बर्न ने आध्यात्मिक विषयों और नेटिव अमरीकन थीम पर कई पुस्तकें लिखीं हैं. नीचे दिया गया प्रसंग उनकी एक पुस्तक से लिया गया है)

बीस साल पहले मैं आजीविका के लिए टैक्सी चलाने का काम करता था. घुमंतू जीवन था, सर पर हुक्म चलानेवाला कोई बॉस भी नहीं था.

इस पेशे से जुडी जो बात मुझे बहुत बाद में समझ आई वह यह है कि जाने-अनजाने मैं चर्च के पादरी की भूमिका में भी आ जाता था. मैं रात में टैक्सी चलाता था इसलिए मेरी टैक्सी कन्फेशन रूम बन जाती थी. अनजान सवारियां टैक्सी में पीछे बैठतीं और मुझे अपनी ज़िंदगी का हाल बयान करने लगतीं. मुझे बहुत से लोग मिले जिन्होंने मुझे आश्चर्यचकित किया, बेहतर होने का अहसास दिलाया, मुझे हंसाया, कभी रुलाया भी.

इन सारे वाकयों में से मुझे जिसने सबसे ज्यादा प्रभावित किया वह मैं आपको बताता हूँ. एक बार मुझे देर रात शहर के एक शांत और संभ्रांत इलाके से एक महिला का फोन आया. हमेशा की तरह मुझे लगा कि मुझे किन्हीं पार्टीबाज, झगड़ालू पति-पत्नी-प्रेमिका, या रात की शिफ्ट में काम करनेवाले कर्मचारी को लिवाने जाना है.

रात के ढाई बजे मैं एक छोटी बिल्डिंग के सामने पहुंचा जिसके सिर्फ ग्राउंड फ्लोर के एक कमरे की बत्ती जल रही थी. ऐसे समय पर ज्यादातर टैक्सी ड्राईवर दो-तीन बार हॉर्न बजाकर कुछ मिनट इंतज़ार करते हैं, फिर लौट जाते हैं. लेकिन मैंने बहुत से ज़रूरतमंद देखे थे जो रात के इस पहर में टैक्सी पर ही निर्भर रहते हैं इसलिए मैं रुका रहा.

यदि कोई खतरे की बात न हो तो मैं यात्री के दरवाजे पर पहुँच जाता हूँ. शायद यात्री को मेरी मदद चाहिए, मैंने सोचा.

मैंने दरवाजे को खटखटाकर आहट की. “बस एक मिनट” – भीतर से किसी कमज़ोर वृद्ध की आवाज़ आई. कमरे से किसी चीज़ को खसकाने की आवाज़ आ रही थी.

लम्बी ख़ामोशी के बाद दरवाज़ा खुला. लगभग अस्सी साल की एक छोटी सी वृद्धा मेरे सामने खड़ी थी. उसने चालीस के दशक से मिलती-जुलती पोशाक पहनी हुई थी. उसके पैरों के पास एक छोटा सूटकेस रखा था.

घर को देखकर यह लग रहा था जैसे वहां सालों से कोई नहीं रहा है. फर्नीचर को चादरों से ढांका हुआ था. दीवार पर कोई घड़ी नहीं थी, कोई सजावटी सामान या बर्तन आदि भी नहीं थे. एक कोने में रखे हुए खोखे में पुराने फोटो और कांच का सामान रखा हुआ था.

“क्या तुम मेरा बैग कार में रख दोगे?” – वृद्धा ने कहा.

सूटकेस कार में रखने के बाद मैं वृद्धा की सहायता के लिए पहुंचा. मेरी बांह थामकर वह धीमे-धीमे कार तक गयी. उसने मुझे मदद के लिए धन्यवाद दिया.

“कोई बात नहीं” – मैंने कहा – “मैंने आपकी सहायता उसी तरह की जैसे मैं अपनी माँ की मदद करता.”

“तुम बहुत अच्छे आदमी हो” – उसने कहा और टैक्सी में मुझे एक पता देकर कहा – “क्या तुम डाउनटाउन की तरफ से चल सकते हो?”

“लेकिन वह तो लम्बा रास्ता है? – मैंने फ़ौरन कहा.

“मुझे कोई जल्दी नहीं है” – वृद्धा ने कहा – “मैं होस्पिस जा रही हूँ”.
(होस्पिस में मरणासन्न बूढ़े और रोगी व्यक्ति अपने अंतिम दिन काटते हैं.)

मैंने रियर-व्यू-मिरर में देखा. उसकी गीली आंखें चमक रहीं थीं.

“मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है” – उसने कहा – “डॉक्टर कहते हैं कि मेरा समय निकट है”.

मैंने मीटर बंद करके कहा – “आप जिस रास्ते से जाना चाहें मुझे बताते जाइए”.

अगले दो घंटे तक हम शहर की भूलभुलैया से गुज़रते रहे. उसने मुझे वह बिल्डिंग दिखाई जहाँ वह बहुत पहले लिफ्ट ऑपरेटर का काम करती थी. हम उस मोहल्ले से गुज़रे जहाँ वह अपने पति के साथ नव-ब्याहता बनकर आई थी. मुझे एक फर्नीचर शोरूम दिखाकर बताया कि दसियों साल पहले वहां एक बालरूम था जहाँ वह डांस करने जाती थी. कभी-कभी वह मुझे किसी ख़ास बिल्डिंग के सामने गाड़ी रोकने को कहती और अपनी नम आँखों से चुपचाप उस बिल्डिंग को निहारते रहती.

सुबह की लाली आसमान में छाने लगी. उसने अचानक कहा – “बस, अब और नहीं. मैं थक गयी हूँ. सीधे पते तक चलो”.

हम दोनों खामोश बैठे हुए उस पते तक चलते रहे जो उसने मुझे दिया था. यह पुराने टाइप की बिल्डिंग थी जिसमें ड्राइव-वे पोर्टिको तक जाता था. कार के वहां पहुँचते ही दो अर्दली आ गए. वे शायद हमारी प्रतीक्षा  कर रहे थे. मैंने ट्रंक खोलकर सूटकेस निकाला और उन्हें दे दिया. महिला तब तक व्हीलचेयर में बैठ चुकी थी.

“कितने रुपये हुए” – वृद्धा ने पर्स खोलते हुए पूछा.

“कुछ नहीं” – मैंने कहा.

“तुम्हारा कुछ तो बनता है” – वह बोली.

“सवारियां मिलती रहती हैं” – मैं बोला.

अनायास ही पता नहीं क्या हुआ और मैंने आगे बढ़कर वृद्धा को गले से लगा लिया. उन्होंने मुझे हौले से थाम लिया.

“तुमने एक अनजान वृद्धा को बिन मांगे ही थोड़ी सी ख़ुशी दे दी” – उसने कहा – “धन्यवाद”.

मैंने उनसे हाथ मिलाया और सुबह की मद्धम रोशनी में बाहर आ गया. मेरे पीछे एक दरवाज़ा बंद हुआ और उसके साथ ही एक ज़िंदगी भी ख़ामोशी में गुम हो गयी.

उस दिन मैंने कोई और सवारी नहीं ली. विचारों में खोया हुआ मैं निरुद्देश्य-सा फिरता रहा. मैं दिन भर चुप रहा और सोचता रहा कि मेरी जगह यदि कोई बेसब्र या झुंझलाने वाला ड्राईवर होता तो क्या होता? क्या होता अगर मैं बाहर से ही लौट जाता और उसके दरवाज़े तक नहीं जाता?

आज मैं उस घटनाक्रम पर निगाह डालता हूँ तो मुझे लगता है कि मैंने अपनी ज़िंदगी में उससे ज्यादा ज़रूरी और महत्वपूर्ण कोई दूसरा काम नहीं किया है.

हम लोगों में से अधिकांश जन यह सोचते हैं कि हमारी ज़िंदगी बहुत बड़ी-बड़ी बातों से चलती है. लेकिन ऐसे बहुत से छोटे दिखनेवाले असाधारण लम्हे भी हैं जो हमें खूबसूरती और ख़ामोशी से अपने आगोश में ले लेते हैं.

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ज़िंदगी की शाम


कुछ सप्ताह पहले मुझे अपने फूफाजी के गुज़र जाने का दुखद समाचार मिला. उससे पहले मेरे पिताजी के एकमात्र चचेरे भाई चल बसे. बीते कुछ सालों में मेरा परिवार कितना सिकुड़ गया! कई दफा ऐसा भी हुआ कि परिवार में जिन्हें कम दिनों का मेहमान मानते थे वे बने रहे और भले-चंगे संबंधी चल बसे. इसे विधि की विडम्बना मानकर दिलासा दे बैठते हैं कि परिवार के बड़े-बूढ़े तमाम रोगों और कमज़ोरियों के बाद भी बने रहते हैं और घर का कोई नौजवान पता नहीं किस बहाने से सबसे दूर चला जाता है.

पिछले पांच सालों में मेरे दोनों बच्चों का और मेरी बहन के घर में बच्चों का जन्म हुआ. लेकिन अब परिवार बढ़ता कम है और सिकुड़ता ज्यादा है. यह कोई मेरे घराने की ही बात नहीं है. कमोबेश, हर परिवार में यही हो रहा होगा.

मैं दिल्ली में नौकरी करने के कारण अपने गृहनगर भोपाल कम ही जा पाता हूँ. मोबाइल फोन पर तो माता-पिता से संपर्क बना ही रहता है. साल में एक-दो बार जब वहां जाता हूँ या जब वे यहाँ आते हैं तब अनायास ही कितने ही परिजनों और परिचितों के गुज़र जाने का समाचार मन में उदासी भर देता है. सबसे बुरा तो यह सोचकर लगता है कि माता-पिता अपने हमउम्र लोगों को एक-एक कर साथ छोड़ते देखते रहते हैं और इसका उनकी मनःस्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है.

अपनी अनश्वरता का बोध होने पर मनुष्यों में गहन आतंरिक परिवर्तन आता है हांलांकि यह आत्मविकास का कोई मापदंड नहीं है. जीवन-मरण तो सब विधि के हाथ है पर जीवन की नश्वरता का विचार मानव मन में मृत्यु का अस्वीकरण, भय, क्रोध, मनोव्यथा, खेद, और अंततः अपराजेय शत्रु के हाथों मिलनेवाली पराजय को स्वीकार करने की भावना को जन्म देता है.

अपने बड़े कुनबे में मैंने ऐसे बहुत से बुजुर्ग देखे हैं जो उदास ख़ामोशी से अपने अंत समय के करीब पहुंचते जाते हैं. इंटरनेट पर मृत्यु का सामना कर रहे लोगों के कई फोरम भी मैंने तलाशे. उनमें मैंने यह पाया कि अधिकांश व्यक्ति गंभीर रोगों से ग्रस्त रहते हैं और उनका अपना कोई भी नहीं है. ये वृद्धाश्रम या होस्पिस में अपने जैसे लोगों के बीच अपने आखिरी दिन काट रहे हैं. शुक्र है कि भारत में हालात अभी इतने खराब नहीं हैं लेकिन हाल में ही हमने ऐसे कई समाचार सुने जिनमें अकेले पड़ गए बुजुर्गों के साथ बड़ी बुरी गुज़री. किसी-किसी मामले में तो पड़ोसियों को भी उनके चल बसने का पता कई दिन बाद चला.

मेरे एक विदेशी मित्र ने ऐसे ही एक स्थान पर कई साल प्रशामक उपचार (palliative care) का काम किया है और अपनी एक मेल में उसने ऐसे व्यक्तियों से होनेवाली चर्चा के निष्कर्षों को लिखा था. अपने बीत चुके जीवन के बारे में पूछे जाने पर वे सभी बहुधा एक जैसी ही शब्दावली और थीम में अपने मन का गुबार निकालने लगते हैं. जिन बातों का ज़िक्र वे आमतौर पर करते हैं वह ये हैं:

1. काश मैंने जीवन अपने मुताबिक़ जिया होता - यह अफ़सोस करने की सबसे आम बात है. जब लोगों को यह लगने लगता है कि उनका जीवन लगभग पूर्ण हो चुका है और वे पीछे मुड़कर देखते हैं तो उन्हें स्पष्ट दिखता है कि उनकी बहुत सी इच्छाएं और सपने तो कभी पूरे नहीं हुए. ज्यादातर लोग तो अपनी ज़िंदगी में तो अपना सोचा हुआ आधा भी साकार होता नहीं देख सके और उन्हें अपने मन को यह समझाना बहुत कठिन था कि इस सबका सम्बन्ध उनके चुनाव से था. ऐसे में यह बहुत महत्वपूर्ण है कि जीवन में जो कुछ भी अच्छा मिले उसके महत्व को सराहा और स्वीकार किया जाए. जब स्वास्थ्य गिरने लगता है तब तक तो बहुत देर हो चुकती है. अच्छा स्वास्थ्य स्वयं में बहुत बड़ी स्वतंत्रता है जिसका भान कम लोगों को ही होता है. जीवन की संध्या में स्वास्थ्य के बिगड़ जाने पर उसमें सुधार की बहुत गुंजाइश नहीं होती.

2. काश मैंने इतनी मेहनत नहीं की होती - अधिकांश पुरुष यह खेद व्यक्त करते हैं. उन्हें अफ़सोस होता है कि वे अपने बच्चों और परिवार को अधिक समय नहीं दे सके. पश्चिमी देशों में परिवार में गहरा भावनात्मक जुड़ाव नहीं होना भी इसका एक कारण है. कई स्त्रियाँ भी यही खेद व्यक्त करतीं हैं. अभी मैं देखता हूँ कि भारत में 1990 के बाद काम में जी जान से जुटी युवा पीढ़ी अभी उम्र के इस दौर में नहीं पहुंची है कि उसे हाड़तोड़ मेहनत करने का अफ़सोस होने लगे पर वह दिन बहुत अधिक दूर भी नहीं हैं. जैसे-जैसे जीवन अधिक मशीनी होता जाएगा, संवेदनाएं शून्य होती जायेंगीं और आत्मिक शांति और संतोष के विकल्प या तो समाप्त हो जायेंगे या उन्हें अपनाना अत्यंत कठिन हो जाएगा. इसलिए अपने जीवन में आज से ही work-life balance स्थापित कर लेना चाहिए.

3. काश मुझमें स्वयं को व्यक्त करने की शक्ति होती - बहुत से लोग दूसरों को नाराज़ नहीं करने के लिए अपने मन को मसोसते रहते हैं. परिणामस्वरूप, वे दोयम दर्जे की ज़िंदगी बिताते हैं और उन्हें वह सब नहीं मिल पाता जो उनका हक होता है. ऐसे लोग भीतर ही भीतर घुलते जाते हैं और अवसाद का शिकार हो जाते हैं. मैंने ऐसे कई वृद्ध जनों को देखा हैं जिनमें दूसरों के लिए बेतरह कड़वाहट होती है और कोई भी उनके पास फटकना नहीं चाहता. यदि आप लोगों से वार्तालाप और संबंधों में पूरी ईमानदारी बरतते हैं तो स्वार्थी लोग भले आपसे नाता तोड़ लें पर बहुत से लोगों से आपके स्वस्थ संबंध स्थापित होते हैं. अब या तो आप हमेशा दूसरों के मन मुताबिक़ चलते रहें या दूसरों के कहने में आकार अपने सुख-शांति को तिलांजलि देते रहें.

4. काश मैं अपने दोस्तों से कभी दूर न जाता - बहुत से लोग दोस्ती-यारी कायम रखने और उसे निभाने को तरजीह नहीं देते. एक उम्र गुज़र जाने के बाद सभी अकेले पड़ जाते हैं. बच्चे अपनी-अपनी राह पर चल देते हैं. परिवार में कोई भी दो घड़ी साथ नहीं बैठना चाहता. ऐसे में करीबी लोगों की कमी खलने लगती है. पुराने दोस्त सब यहाँ-वहां हो जाते हैं और उनकी खोजखबर रखना कठिन हो जाता है. वृद्ध व्यक्तियों को साहचर्य की बड़ी गहरी आवश्यकता होती है. जो व्यक्ति पूरी तरह अकेले रह जाते हैं उन्हें अपने दोस्त नहीं होने का गम सालता रहता है. आनेवाले कठिन समय में तो सभी को अकेलेपन की दिक्कतों से दो-चार होना पड़ेगा इसलिए सभीको अपनी दोस्ती-यारी बरकरार रखनी चाहिए. वर्तमान जीवनशैली में अपने दोस्तों से कट कर रह जाना एक सामान्य बात हो गयी है. उम्र के आख़िरी दौर में आर्थिक या सामाजिक हैसियत का उतना महत्व नहीं होता जितना व्यक्ति के संबंधों का होता है. सिर्फ प्यार और अपनापन ही बुजुर्गों को संयत रखने में सक्षम है.

5. काश मैंने खुद को खुश होने के मौके दिए होते - यह भी बड़ी अजीब बात है. अंत समय तक भी बहुत से लोग यह नहीं जान पाते कि खुश रहना हमारे ऊपर ही निर्भर करता है. मैं अपने आसपास बहुत से वृद्धजनों को देखता हूँ जो बड़ी बोझिल ज़िन्दगी जी रहे हैं. ऐसे लोग हमेशा पुराने पैटर्न पर चलते हुए अपनी ज़िन्दगी बिताते रहे. किसी भी बदलाव का उन्होंने हमेशा विरोध किया. सारी दुनिया आगे चली गयी और वे पीछे रह गए. बाहरी तौर पर तो वे सभी को यह जताते रहे कि उनके भीतर आत्मिक संतोष है पर वास्तविकता में वे खिन्नता से भरे हुए थे. उनका मन भी यह करता रहता था कि वे भी बाहर की रौनक में अपना मन बहलायें पर कुछ तो संकोच और कुछ अकड़ के कारण वे लोगों में घुलने-मिलने और आनंदित होने के अवसर चूकते रहे. दूसरी ओर मैं ऐसे भी कुछ बुज़ुर्ग देखता हूँ जो जोश और जिंदादिली से भरपूर हैं और नयी पीढ़ी के साथ कदम से कदम मिलकर चलते हैं. ऐसे लोग यह जानते हैं कि जीवन और खुशियाँ भी हमें विकल्पों के रूप में मिलती हैं. पूरे होश-ओ-हवास, ईमानदारी, और बुद्धिमानी से अपने हिस्से की खुशियाँ बटोर लेना ही सबके हित में है अन्यथा मृत्युपर्यंत खेद होता रहेगा.

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जब मैं ज़िंदगी से हार बैठा


मेरे इंटरनेटी मित्र स्टीवन ऐचिंसन अपने ब्लॉग में आत्मविकास और प्रेरणा पर चार सौ से भी अधिक पोस्टें लिख चुके हैं. नीचे उनकी एक पोस्ट का अनुवाद दिया गया है जिसमें उन्होंने बताया है कि अवसाद के किन क्षणों में उन्होंने खुद को बस खो ही दिया होता:

मुझे नहीं पता कि मैं अपने जीवन की यह नितांत निजी कथा आपके समक्ष क्यों उद्घाटित कर रहा हूँ. मेरे भीतर से ही एक स्वर उठ रहा है जो मुझसे ऐसा करने के लिए कह रहा है और मैंने उसकी बात मान ली है.

कुछ लोगों को मेरी यह पोस्ट असहज और क्रुद्ध कर सकती है इसलिए मैं उनसे पहले ही क्षमा मांग लेता हूँ.

मैं आपको उस रात के बारे में बताने जा रहा हूँ जब मैंने अपनी ज़िंदगी बस तमाम कर ही ली थी.

90 के दशक के अंत की बात है. बाहर से यह लग रहा था कि ज़िंदगी मज़े में कट रही है. बहुत से दोस्त थे, बढ़िया नौकरी थी. नई-नई जगहें देखने को मिलतीं थीं. मैं दिखने में भी अच्छा था और जेब में पैसे भी रहते थे. कुल मिलाकर सब कुछ ठीक-ठाक था. लेकिन कुछ तो था कि मैं खुश नहीं था और मुझे इसका पता भी न था कि मेरे भीतर अवसाद क्यों गहराता जा रहा है. मैं खुद को ख़त्म करने के बारे में सोचता रहता था और यह सोचने में ही शांति मिलती थी कि मुझे अब जीने और मरने में से सिर्फ एक चीज़ का चुनाव ही करना है.

मैं अपने जीवन को ख़त्म करने की ऐसी योजनायें बनाता रहता था कि लोगों को मेरी मौत एक दुर्घटना लगे और मेरे परिजनों को ज्यादा दुःख न हो. ऊंची बिल्डिंग से कूदकर जान देने का ख़याल मुझे बहुत लुभा रहा था.

एक रात मैं बार से निकलकर रात के एक बजे दो मील दूर अपने घर पैदल जा रहा था. हल्की बारिश शुरू हो चुकी थी और मुझे अपने शरीर पर बूंदों के गिरने का अहसास अच्छा लग रहा था जिसका लुत्फ़ लेने के लिए मैं धीरे-धीरे चल रहा था.

सड़क पर कुछ दूर मैंने एक कुत्ते को आते देखा. वह बहुत लंगड़ा कर चल रहा था. जब वह मेरे करीब से गुज़रा तो मैंने देखा कि उसकी एक टांग ही नहीं है. मुझे यह देखकर न जाने क्या हुआ कि मैं फूट-फूट कर रोने लगा. दूसरे दिन तक भी मेरे ज़हन से उस अभागे कुत्ते का ख़याल नहीं निकला और मैं समझ नहीं पा रहा था कि मैं उसके कारण इतना दुखी क्यों हो गया. शायद मैं उस कुत्ते में खुद को ही देख रहा था – अकेला, तरबतर, अपूर्ण, और बेघर.

इसके कुछ दिनों बाद ही एक रात मुझमें जीवन के आवरण की कैद से बाहर निकलने की छटपटाहट तेज़ हो गयी और मैंने इसे उतारने का फैसला कर लिया. मैंने अपने माता-पिता को गुडनाईट कहा और बहन से फोन पर प्यार से बातें की. मैंने पिता से कहा कि मुझे छुट्टी के दिन दूसरी सुबह देर तक सोने दें और बैडरूम में नीद की 26 गोलियां लेकर चला गया. अपने बिस्तर पर बैठकर मैंने रोते-रोते सारी गोलियां दूध के साथ गटक लीं. मुझे माँ का ख़याल आया कि दूसरे दिन उन्हें कितना दुःख होगा और यह कि मैंने अपने पिता को ज़िंदगी में एक बार ही कहा था कि मैं उनसे प्यार करता हूँ. मैं अपनी बहन के लिए रोया कि मैं उससे हमेशा के लिए बिछुड़ जाऊंगा. सारी गोलियां लेने के बाद मैं तकिये पर सर रखकर अंतिम पलों की प्रतीक्षा करने लगा. इस समय आपको यह बताते हुए भी मेरी रुलाई फूट रही है.

मुझे नहीं पता कि मैं नींद से कब जागा. मैं अस्पताल में था और मेरे माता-पिता, बहन और दो दोस्त मेरे साथ थे. मैं बहुत लम्बे समय तक बेहोश रहा. कितना? मुझे नहीं मालूम क्योंकि इस बारे में किसी ने मुझे कुछ नहीं बताया, न मैंने कुछ पूछा. मुझे बस इतना ही पता चला कि जिस रात मैंने नींद की गोलियां लीं थीं उस रात मेरे पिता अपने समय से सुबह पांच बजे उठे. मैंने उन्हें मुझे नहीं जगाने के लिए कह रखा था इसलिए वह मुझे उठाने नहीं आये लेकिन उन्हें मेरे पलंग से गिरने की आवाज़ सुनाई दी. पलंग से गिरने और पिता को उसकी आवाज़ सुनाई देने ने मेरी जान बचा ली, अन्यथा…

मेरे होश में आने पर सभी खूब रोये. बहुत सवाल-जवाब और पूछताछ हुई. अस्पताल की मनोचिकित्सक ने मेरी मदद करने की पेशकश की. मैंने उसे सब कुछ बता दिया कि मैं अपनी ज़िंदगी के मसले नहीं हल कर पा रहा था. मेरे भीतर बहुत शर्मिन्दगी, अपराधबोध, असहजता, और नाराज़गी थी कि मेरी वज़ह से मेरे परिवार को ये दिन देखने पड़े, सिर्फ इसलिए क्योंकि मुझमें ज़िंदगी की दुश्वारियों का सामना करने की ताक़त नहीं थी.

मुझे यह लग रहा था कि मैं अपने दोस्तों, नौकरी, और हर किसी चीज़ से तालमेल नहीं बिठा पा रहा था. फिर मैंने क्या किया? मैंने नए सिरे से अपने जीवन की शुरुआत की. मैंने अपने दोस्तों से किनारा कर लिया क्योंकि मैं यह जान गया था कि वे बस खाने-पीने के यार थे. मैंने अपनी नौकरी बदली, नई चीज़ें सीखीं, पैसों की दिक्कत से छुटकारा पाया, और दूसरे शहर चला गया. तब से मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा है और अच्छी बातों को दूसरों से बांटने लगा हूँ.

उस रात का सबक – मैं जोर देकर यह कहूँगा कि ज़िंदगी में कुछ भी इतना बुरा नहीं होता कि हमें मरने की ख्वाहिश होने लगे. राहें कभी बंद नहीं होतीं, गर कभी बहुत बुरा भी हो जाए तो भी नई शुरुआत संभव है. यदि आप मेरी जैसी परिस्तिथियों से गुज़र रहे हों तो मैं आपको यह यकीन दिलाना चाहता हूँ कि मौसम ज़रूर बदलेगा और आपकी मदद के लिए कोई-न-कोई ज़रूर मिलेगा.

मैं यह सीख गया हूँ कि मुझे हमेशा ही लोगों को यह महसूस कराना है कि मैं उनसे बहुत प्यार करता हूँ और मेरी ज़िंदगी में उनकी बहुत अहमियत है.

जिन हृदयविदारक अनुभूतियों से मैं गुज़र चुका हूँ उन्हें मैं दूसरों में जल्द पहचान लेता हूँ और उनकी मदद कर सकता हूँ.

मैंने आपको ऊपर यह बताया है कि मैं ज़िंदगी के आवरण में खुद को समा नहीं पा रहा था. अस्पताल में होश आने पर मुझे यह समझ में आ गया कि इस आवरण को हम अपने मुताबिक़ ढाल सकते हैं. हमें इसके अनुसार खुद को बदलने की ज़रुरत नहीं है.

उस कठोर रात के बाद बीते सालों में मैं इस बात को समझ गया हूँ कि मेरी लंबी हताशा और अवसाद मेरे सिर्फ एक निर्णय से छंट गए – यह कि मैं अपनी ख़ुशी और सलामती के लिए अपने जीवन को रूपांतरित करने के लिए हमेशा तत्पर रहूँगा.

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पांच मिनट


रेगिस्तान में एक आदमी के पास यमदूत आया लेकिन आदमी उसे पहचान नहीं सका और उसने उसे पानी पिलाया.

“मैं मृत्युलोक से तुम्हारे प्राण लेने आया हूँ” – यमदूत ने कहा – “लेकिन तुम अच्छे आदमी लगते हो इसलिए मैं तुम्हें पांच मिनट के लिए नियति की पुस्तक दे सकता हूँ. इतने समय में तुम जो कुछ बदलना चाहो, बदल सकते हो”.

यमदूत ने उसे नियति की पुस्तक दे दी. पुस्तक के पन्ने पलटते हुए आदमी को उसमें अपने पड़ोसियों के जीवन की झलकियाँ दिखीं. उनका खुशहाल जीवन देखकर वह ईर्ष्या और क्रोध से भर गया.

“ये लोग इतने अच्छे जीवन के हक़दार नहीं हैं” – उसने कहा, और कलम लेकर उनके भावी जीवन में भरपूर बिगाड़ कर दिया.

अंत में वह अपने जीवन के पन्नों तक भी पहुंचा. उसे अपनी मौत अगले ही पल आती दिखी. इससे पहले कि वह अपने जीवन में कोई फेरबदल कर पाता, मौत ने उसे अपने आगोश में ले लिया.

अपने जीवन के पन्नों तक पहुँचते-पहुँचते उसे मिले पांच मिनट पूरे हो चुके थे.

(पाउलो कोएलो के ब्लौग से – from the blog of Paulo Coelho)

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Origin of Death – मृत्यु की उत्पत्ति


दुनिया नई-नई बनी थी और एक बूढ़ा आदमी अपनी बुढ़िया पत्नी के साथ टहल रहा था. बूढ़े ने बुढ़िया से कहा – “चलो, हम यह तय करते हैं कि यह दुनिया कैसे चले.”

“ठीक है” – बुढ़िया ने कहा – “यह कैसे होगा?”

“हम्म…” – बूढ़े ने कहा – “चूंकि यह बात मेरे मन में पहले आई है इसलिए किसी भी मामले में मेरी बात पहले मानी जाएगी”.

“ठीक है” – बुढ़िया बोली – “फिर तुम्हारे बाद मैं जो भी कहूं उसे मान लिया जायेगा.”

बूढ़ा इससे सहमत हो गया.

वे अपने आसपास देखते हुए घूमते-फिरते रहे. बूढ़े ने कहा – “मैं शिकार के तरीके के बारे में सोच रहा हूँ. आदमी शिकार किया करेंगे. जब भी वे किसी जानवर को पकड़ना चाहेंगे तो उसे इशारा करके अपने पास बुला लिया करेंगे. जानवर के पास आ जाने पर उसका शिकार कर लेंगे.”

“मैं यह बात तो मानती हूँ कि आदमी शिकार करेंगे” – बुढ़िया ने कहा – “लेकिन यदि जानवर इस तरह इशारा करने पर ही पास आने लगेंगे तो लोगों का जीवन बहुत आसान हो जायेगा. मैं चाहती हूँ कि मनुष्यों को देखकर जानवर डर के भाग जाएँ. इस तरह उनका शिकार करना मुश्किल हो जायेगा और आदमी हमेशा मजबूत और होशियार बने रहेंगे.”

“जैसा हम तय कर चुके हैं, तुम्हारी बात तो माननी ही पड़ेगी” – बूढ़े ने कहा.

वे घूमते-फिरते रहे.

कुछ समय बाद बूढ़े ने कहा – “मैं लोगों के नाक-नक्श के बारे में सोच रहा हूँ. उनके सर के एक ओर आँखें होंगी और दूसरी ओर मुंह. उनके हर हाथ में दस उँगलियाँ होनी चाहिए.”

“मैं भी यह मानती हूँ कि लोगों के सर में आँखें और मुंह होना चाहिए” – बुढ़िया ने कहा – “लेकिन उनकी आँखें एक ओर ऊपर की तरफ होंगी और उनका मुंह उसी ओर कुछ नीचे होना चाहिए. उनके हांथों में उँगलियाँ होनी चाहिए पर हर हाथ में दस उँगलियाँ होने से कामकाज में अड़चन होगी इसलिए हर हाथ में पांच उँगलियाँ होना ठीक रहेगा.”

“तुम्हारी बात तो माननी ही पड़ेगी” – बूढ़ा बोला.

चलते-चलते वे नदी के पास आ गए. “चलो अब ज़िंदगी और मौत के बारे में भी तय कर लेते हैं” – बूढ़े ने कहा – “इसके लिए मैं इस नदी में भैंस की खाल फेंकूंगा. यदि यह तैरती रहेगी तो लोग मरने के चार दिनों के बाद फिर से जिन्दा हो उठेंगे और फिर हमेशा जीते रहेंगे.”

बूढ़े ने नदी में खाल फेंक दी. एक डुबकी लगाने के बाद खाल नदी की सतह पर आ गयी. बुढ़िया ने कहा – “मैं इस तरीके से सहमत हूँ पर मुझे लगता है कि इस काम के लिए भैंस की खाल का उपयोग ठीक नहीं है. उसके बजाय मैं यह पत्थर नदी में फेंकूँगी. यदि यह तैरता रहेगा तो लोग मरने के चार दिनों के बाद फिर से जिन्दा हो उठेंगे और फिर हमेशा जीते रहेंगे, लेकिन यदि यह डूब जायेगा तो लोग मरने के बाद कभी वापस नहीं आयेंगे.”

बुढ़िया ने पत्थर नदी में फेंक दिया और वह एकदम से डूब गया.

“तो ऐसा ही होगा” – बुढ़िया ने कहा – “यदि लोग हमेशा जीवित रहेंगे तो दुनिया में बहुत भीड़ हो जाएगी और खाने की कमी भी पड़ जाएगी. जब लोग मरने के बाद कभी भी वापस नहीं आयेंगे तो लोगों को उनकी कमी खलेगी और दुनिया में सहानुभूति का अभाव नहीं होगा.”

बूढ़े ने कुछ नहीं कहा.

कुछ समय बीत गया. बुढ़िया ने एक बच्चे को जन्म दिया. बूढ़ा और बुढ़िया अपने बच्चे पर जान छिड़कते थे. वे बहुत खुश थे. फिर एक दिन बच्चा बहुत बीमार पड़ गया और उसकी मौत हो गयी.

बुढ़िया अपने पति के पास गयी और उससे बोली – “चलो हम ज़िंदगी और मौत के बारे में फिर से तय कर लेते हैं.”

बूढ़े ने बहुत नाउम्मीदी से कहा – “अब कुछ नहीं हो सकता. हम सबसे पहले यह तय कर चुके हैं कि बाद में तुम्हारी बात ही मानी जाएगी.”

* * * * * * * * * *

When the world was new, Old Man and Old Woman were walking around. “Let us decide how things will be,” Old Man said.

“That is good,” said Old Woman. “How shall we do it?”

“Well,” Old Man said, “since it was my idea I think I should have the first say in everything.”

“That is good,” said Old Woman, “just as long as I have the last say.”

So they walked around and looked at things. Then Old Man spoke. “I have been thinking about hunting,” he said. “The men will be the hunters. Anytime they want to shoot an animal, they will call it and it will come to them.”

“I agree men should be the hunters,” Old Woman said. “But if the animals come when they are called, life will be too easy for the people. The animals should run away when they see thepeople. Then it will be hard for the men to kill them. That way people will be smarter and stronger.”

“You have the last say,” Old Man agreed. Then they walked around some more.

After a while, Old Man spoke again. “I have been thinking about what people will look like,” he said. “They will have eyes on one side of their face and their mouth on the other. Their mouths will go straight up and down. They will have ten fingers on each hand.”

“I agree that people should have their eyes and their mouth on their face,” Old Woman said. “But their eyes will be at the top of their face and their mouth at the bottom and they will be set across. I agree they should have fingers on their hands, but ten on each hand will make them clumsy. They will have five fingers on each hand.”

“You have the last say,” Old Man agreed.

Now they were walking by the river. “Let us decide about life and death,” Old Man said. “I will do it this way. I will throw this buffalo chip into the river. If it floats, when people die they will come back to life after four days and then live forever.”

Old Man threw the buffalo chip into the water. It bobbed up and floated. “I agree we should decide it this way,” Old Woman said. “But I do not think it should be done with a buffalo chip. I will throw this stone into the water instead. If it floats, the people will die for four days and then come back to life and live forever. If it sinks, the people will not come back to life after they die.”

Old Woman threw the stone into the water. It sank immediately.

“That is the way it should be,” Old Woman said. “If people lived forever, the Earth would be too crowded. There would not be enough food. This way people will feel sorry for each other. There will be sympathy in the world.”

Old Man said nothing.

Some time passed. Old Woman had a child. She and Old Man loved the child very much and they were happy. One day, though, the child became sick and died. Then Old Woman went to Old Man.

“Let us have our say again about death,” she said.

But Old Man shook his head. “No,” he said, “you had the last say.”

(Ancient Spiritual Story retold by Joseph Bruchac)

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