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सुविधाओं की असली कीमत

पिछले सौ सालों में मानव और समाज की गति की दिशा के बारे में विचार करता हूँ तो पाता हूँ कि यह केवल सुविधा की ओर दौड़ा जा रहा है. पिछले सौ सालों में हुई खोजों और अविष्कारों पर नज़र डालें तो पाएंगे कि वाशिंग मशीन और ड्रायर, डिशवाशर, मोटरगाड़ियां, हवाई जहाज, टीवी, माइक्रोवेव, कम्प्युटर, ई-मेल, इन्टरनेट, फास्ट फ़ूड, लंच पैक्स और ऐसी हजारों चीज़ों ने हमें आधुनिक तो बनाया पर बेहद सुविधाभोगी भी बना दिया.

किसी और बात से भी अधिक हमारा समाज सुविधा पर आश्रित है और उसी पर जीता है. इस सुविधा की क्या कीमत चुकाते हैं हम?

ग्लोबल वार्मिंग. कहते हैं कि हमारे सुविधाभोगी व्यवहार ने ही ग्लोबल वार्मिंग रुपी दैत्य को जन्म दिया है जो देर-सबेर पृथ्वी को निगल ही जाएगा. ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए जो उपाय बताये जा रहे हैं वे सुविधा को और भी सुप्राप्य और सस्ती बना देंगे जैसे विद्युत् चालित मोटर वाहन, स्वच्छ ऊर्जा, स्मार्ट फोन, ऑर्गेनिक फ़ूड… ऐसे में मुझे लग रहा है कि हमें अपने सुविधा के प्रति अपने प्रेम पर पुनः विचार करना चाहिए.

मोटापे की महामारी का जन्म भी सुविधाभोगी बनने का ही नतीजा है. फास्ट फ़ूड, माइक्रोवेव फ़ूड, रेडी-टु-ईट पैक्ड फ़ूड के साथ ही ऐसे भोज्य पदार्थ जिनमें कृत्रिम फ्लेवर और प्रोसेसिंग एजेंट मिलाये जाते हैं वे खाने में इतने एंगेजिंग और हलके होते हैं कि उनकी आवश्यक से अधिक मात्रा पेट में पहुँच जाती है. बहुत बड़ा तबका इन भोज्य पदार्थों को अपने दैनिक भोजन का अंग बना चुका है. लोगों के पास समय कम है और अपना खाना खुद बनाना उनके लिए सुविधाजनक नहीं है. मुझे दिल्ली में रेड लाईट पर रुकी गाड़ियों में जल्दी-जल्दी अपना नाश्ता ठूंसते कामकाजी लोग दिखते हैं. चलती गाड़ी में सुरुचिपूर्ण तरीके से थाली में परोसा गया खाना खाना संभव नहीं है और ऐसे में सैंडविच या पराठे जैसी रोल की हुई चीज़ ही खाई जा सकती है. कभी-कभी तो चलती गाड़ी में बैठी महिला अपने पति को खाना खिलाते हुए दिख जाती है. यह सब बहुत मजाकिया लगता है पर आधुनिक जीवन की विवशतापूर्ण त्रासदी की ओर इंगित करता है. आराम से खाने का वक्त भी नहीं है!

सभी लोग पोषक भोजन करना चाहते हैं पर ऐसा जो झटपट बन जाये या बना-बनाया मिल जाये. पहले फुरसत होती थी और घर-परिवार के लोग बैठे-बैठे बातें करते हुए साग-भाजी काट लेते थे. आजकल सब्जीवाले से ही भाजी खरीदकर उसी से फटाफट कटवाने का चलन है. भाजी के साथ इल्ली और कीड़े-मकोड़े कटते हों तो कटने दो. खैर, जब टीवी पर सीरियल न्यूज़ देखते समय खाने से पेट का आकार बढ़ता है तो ज्यादा कुशल मशीनें बनाई जाती हैं जो कसरत को बेहद आसान बना दें सबसे कम समय में. यदि आप घर से बाहर दौड़ नहीं सकते तो घर के भीतर ट्रेडमिल पर दौडिए. ट्रेडमिल पर दौड़ना नहीं चाहते तो मोर्निंग वाकर भी उपलब्ध है. यह भी नहीं तो स्लिमिंग पिल्स, यहाँ तक कि स्लिमिंग चाय भी मिल जाएगी. सबसे जल्दी दुबला होना चाहते हों तो अपने पेट में मोटी नालियाँ घुसवाकर सारी चर्बी मिनटों में निकलवा लीजिये. घबराइये नहीं, इसमें बिलकुल दर्द नहीं होता और आप उसी दिन उठकर काम पर भी जा सकते हैं!

मैं खुद तो कसरत नहीं करता इसलिए मुझे किसी को पसीना बहानेवाली कसरत करने का लेक्चर नहीं देना चाहिए. लेकिन मैं लगभग रोज़ ही सामान लाने के बहाने लंबा चलता हूँ, लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का इस्तेमाल करता हूँ, अपने कपडे खुद ही धोता हूँ… इसमें बहुत कसरत हो जाती है. असली कसरत तो वही है जिसमें कमरतोड़ मेहनत की जाय और जिसे करने में मज़ा भी आये. ये दोनों ही होना चाहिए. और ऐसी कठोर चर्या के बाद खुद ही अपना खाना बनाकर खाने में जो मजा है वह पिज्जा हट या डोमिनोज को फोन खड़खडाने में नहीं है. एक बात और, सादा और संतुलित भोजन बनाने में अधिक समय नहीं लगता है और उसे चैन से बैठकर खाने का आनंद ही क्या!

मोटर कार भी आवागमन का बहुत सुविधाजनक साधन है हांलाकि किश्तें भरने, सर्विस करवाने, साफ़ करने, पेट्रोल भरवाने, धक्का लगाने, ट्रेफिक में दूसरों से भिड़ने, और पार्किंग की जगह ढूँढने में कभी-कभी घोर असुविधा होती है. इस सुविधा का मोल आप अपनी और पर्यावरण की सेहत से चुका सकते हैं जो शायद सभी के लिए बहुत मामूली है.

यदि आप बारीकी से देखें तो पायेंगे कि सुविधाएँ हमेशा हिडन कॉस्ट या ‘कंडीशंस अप्लाई’ के साथ आती हैं. कभी-कभी ये हिडन कॉस्ट तीसरी दुनिया के देश भुगतते हैं या पर्यावरण को उनका हर्जाना भरना पड़ता है. उनका सबसे तगड़ा झटका तो भविष्य की पीढ़ियों को सहना पड़ता है लेकिन इसके बारे में भला क्यों सोचें? ये सब तो दूसरों की समस्याएं हैं!

मैंने कभी यह कहा था की हम सबको अस्वचालित हो जाना चाहिए. इसपर विचार करने की ज़रुरत है. चिलचिलाती धुप में बाल्टीभर कपड़े उठाकर उन्हें छत में तार पर टांगकर सुखाने का आइडिया बहुतों को झंझट भरा लग सकता है पर इसमें रोमानियत और वहनीयता है. घर के किचन गार्डन में ज़रुरत भर का धनिया या टमाटर उगा लेना किसी को टुच्चापन लग सकता है पर मैं इसे बाज़ार में मिलनेवाले सूखे पत्तों और टोमैटो प्यूरी पर तरजीह दूंगा. पैदल चलना, सायकिल चलाना, और मैट्रो में जाना आरामदायक भले न हो पर मोटर गाड़ी में अकड़े बैठे रहने की तुलना में ज्यादा रोमांचक और चिरस्थाई है.

और हमारे दैनिक जीवन की ऐसी कौन सी असुविधाएं है जो वास्तव में हमारे लिए वरदान के समान हैं? मेरे पास केवल प्रश्न हैं, उत्तर नहीं.

(यह पोस्ट इस पोस्ट का अनुवाद/रूपांतरण है)

(The Real Cost of Convenience by Leo Babauta)

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धरती पर पैर धरो धीरे

(वसंत ऋतु में) “जरा धीरे चलो मेरे भाई, धरती मैया पेट से है” – उत्तर अमेरिकी आदिवासी उक्ति

अपने लोक जीवन और पारंपरिक ज्ञान से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं. पृथ्वी माता के प्रति सम्मान की अनेक कथाएं भारतीय मानस में जीवित हैं. हजारों सालों तक भारत के आदिवासी सिर्फ इसलिए पिछड़े रह गए क्योंकि धरती माता के शरीर पर लोहे के हल और कुदाल चलाना उन्हें स्वीकार नहीं था. अपने मतलब भर की लकड़ी वे जंगल से लेते थे जिसका उपयोग केवल जलावन के लिए होता था. अभी भी बहुतेरी आदिवासी संस्कृतियाँ अपने झोपड़ों में लकड़ी के दरवाजे-खिड़कियाँ नहीं लगातीं. कोई क्या चुरा के ले जाएगा?

आजकल कार्बन फुटप्रिंट की बहुत चर्चा होती है. इसका सम्बन्ध ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से है. इसके बारे में मैंने अभी विस्तार से नहीं पढ़ा है. बस इतना जानता हूँ कि आधुनिकता और विकास की अंधी दौड़ में धरती को रौंदनेवाले पैर उसे स्थाई क्षति पहुंचा रहे हैं. जितना अधिक विकास, उतना अधिक कार्बन उत्सर्जन. जितना अधिक कार्बन उत्सर्जन, उतना ही बड़ा कार्बन फुटप्रिंट. अमेरिकियों और यूरोपियों के कार्बन फुटप्रिंट भारतीयों और अफ्रीकियों के कार्बन फुटप्रिंट की तुलना में न केवल कई गुने बड़े हैं बल्कि धरती को गहरे तक चोटिल करते हैं.

धरती की रक्षा करने का केवल एक ही उपाय है. उसपर कम भार डालो. उसे मत रौंदो.

पिछले सौ सालों में ज्यादा से ज्यादा प्राप्त करने और संचय करने की होड़ में हम बहुत कुछ भूलते जा रहे हैं. हमारी संस्कृतियों ने हमें हमेशा यह सिखाया कि जितना हम पाते हैं उससे ज्यादा लौटाने की हमारे ऊपर नैतिक जिम्मेदारी स्वतः बनती है. धरती को गहरे तक खोदकर उससे बहुमूल्य रत्न, धातुएं, और अयस्क निकाले जा चुके हैं. नदियाँ नगरों के सीवेज और रसायनों से भरी हुई हैं. जंगलों से पेड़ और प्राणी नदारद हो रहे हैं. प्राकृतिक दृश्यों को मनमाफिक रूप दे दिया गया है. कहते हैं कि आज धरती से जितना लिया जा रहा है उसके लिए भविष्य में एक धरती कम पड़ेगी.

इन मसलों पर इतना कुछ लिखा-पढ़ा जा रहा है कि इससे किसी को अनभिज्ञता नहीं है. हमें समस्याओं की जानकारी है लेकिन प्रत्यक्ष उपायों को हम नज़रंदाज़ कर रहे हैं. कचरे को रिसाइकल करना, इलेक्ट्रिक कार खरीदना या साईकिल चलाना ज़रूरी लेकिन फैशनेबल विकल्प हैं. इनसे ज्यादा भी बहुत कुछ किया जा सकता है.

मितव्ययता और अपरिग्रह कुछ-कुछ एक जैसे सिद्धांत प्रतीत होते हैं. मितव्ययता याने अपने खर्चे कम करना. अपरिग्रह याने अपनी ज़रूरतें कम करना. मुझे अपरिग्रह का विचार भाता है. यह जैन दर्शन का एक रत्न है. देखिये भगवान् महावीर ने इस विषय पर क्या कहा है:-

”चित्तमंतमचित्तं वा परिगिज्झ किसामवि।
अन्नं वा अणुजाणाइ एव्रं दुक्खाण मुच्चइ॥”


अर्थात जो आदमी खुद सजीव या निर्जीव चीजों का संग्रह करता है, दूसरों से ऐसा संग्रह कराता है या दूसरों को ऐसा संग्रह करने की सम्मति देता है, उसका दुःख से कभी भी छुटकारा नहीं हो सकता. और…

”जहा लाहो तहा लोहो लाहा लोहो पवड्ढई।
दोमासकयं कज्जं कोडीए वि न निट्ठियं॥”


ज्यों-ज्यों लाभ होता है, त्यों-त्यों लोभ भी बढ़ता है। ‘जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।’ पहले केवल दो मासा सोने की जरूरत थी, बाद में वह बढ़ते-बढ़ते करोड़ों तक पहुँच गई, फिर भी पूरी न पड़ी! (स्रोत)

अपरिग्रह का अर्थ अभाव में जीने से नहीं है. इच्छाओं में कमी होने से उपभोग एवं उपयोग में भी कमी आती है. जिसके परिणामस्वरूप संसाधनों का दोहन और उनपर निर्भरता कम होती जाती है. इसका प्रभाव हमारे पर्यावरण और वातावरण पर भी पड़ता है. गाँव-देहात की हवा यूं ही शुद्ध तो नहीं होती! वहां विकास के चरण नहीं पड़े तो विकास के दुष्परिणामों से भी वे दूर हैं.

अपरिग्रह या मिनिमलिज्म का दर्शन सरल और स्थाई है. रिसाइकलिंग का अपना महत्व है लेकिन अपरिग्रह का पालन करने पर उसकी ज़रुरत भी नहीं पड़ती. पर्यावरण या वातावरण को नुकसान पहुंचाए बिना भी बहुत से पदार्थों का निर्माण और उपयोग किया जा सकता है लेकिन समझदारी इसी में है कि ज़रूरतें ही कम कर दी जाएँ. ऐसा करने के बहुत से तरीके संभव हैं और उनमें से कुछेक पर यहाँ बिंदुवार चर्चा की जाएगी.

* सीमित खरीददारी – अधिक से अधिक उपभोग की लालसा के फलस्वरूप बहुतेरी वस्तुओं का निर्माण किया जाता है जिन्हें हम खरीदते हैं. कम खरीदने की आदत विकसित करना चाहिए. इसपर मैं पहले एक-दो पोस्टें लिख चुका हूँ. आप अंग्रेजी की ये पोस्टें भी पढ़कर देखें. पहली, दूसरी, और तीसरी.

* अन्न का निरादर न करें – अमेरिका जैसे देश में लोगों को कम खाने की नसीहत दी जाती है जो अपने देश में बेमानी है. इसके बावजूद हमारे यहाँ बड़े पैमाने पर अन्न की बर्बादी होती रहती है. सरकारी नीतियों के कारण होनेवाली बर्बादी की बहुत चर्चा होती है पर घरों और पार्टियों में बर्बाद किये जाने वाले अन्न की भी सीमा नहीं है. अन्न के उत्पादन में बहुत बड़ी मात्रा में संसाधनों और मानव श्रम की खपत होती है. मैं अक्सर ही रेस्टौरेंट्स और पार्टियों में लोगों को खाने से भरी हुई प्लेटें कचरे के डिब्बे में डालते देखता हूँ. यह बहुत दुखदाई है.

* शाकाहार अपनाएं – अन्न उपजाने की तुलना में मांस के उत्पादन में ऊर्जा कई गुना अधिक प्रयुक्त होती है. शाकाहार अपनाने के अपने बहुत से आधार और फायदे हैं.

* पैकेजिंग कम करें – आजकल चीज़ों को लपेटने और पैक करने में अंधाधुंध सामग्री का उपयोग किया जाता है. किसी भी सामान को खरीदने से पहले इसपर विचार करना तो संभव नहीं है लेकिन ऐसे प्रयास किये जा सकते हैं कि कंपनियों को हलकी पैकेजिंग के लिए प्रेरित किया जा सके. कंपनियों को पैकेजिंग वापस लेकर कुछ उपहार देने का विकल्प रखना चाहिए.

* गाड़ी कम – पैदल ज्यादा – साईकिल चलाये हुए आपको कितना समय हो गया? शायद आपके पास साइकिल न हो. मेरे पास भी नहीं है लेकिन मैं कभी-कभार यूं ही किसी की साईकिल मांगकर ज़रा दूर तक चला लेता हूँ. पब्लिक ट्रांसपोर्ट की दशा बेहतर हो तो मैं उसे अपनाने में गुरेज़ न करूँ. पैदल खूब चलता हूँ. बाइक पूल या कार पूल भी अच्छी चीज़ है. सबसे बढ़िया तो है घर में बैठना और मज़े से बच्चों के साथ खेलना, पढना, टी वी देखना, ब्लौग चैक करना.

* घर कितना भी बड़ा हो, उसमें बेतहाशा खरीदकर बाहरी हुई चीज़ें देखना नहीं सुहाता. जितनी ज्यादा चीज़ें, उतना ज्यादा कबाड़. व्यवस्थित रखने का खर्चा और भारी-भरकम बिल अलग से. छोटा घर – संसाधनों की कम बर्बादी. बिजली-पानी की कम खपत.

ये सब तो कुछ उदाहरण और उपाय हैं. असली चीज़ तो है मानसिकता और मनोवृत्ति में परिवर्तन लाना. सभी करें तो कितना अच्छा हो. जीवन की गुणवता के पैमाने पर हमारा देश बहुतेरे विकसित देशों से पीछे है. कहा जाता है कि हमारे नागरिकों में सिविक सेन्स भी नहीं है और आदेशों का उल्लंघन करना हमारी फितरत है. कुछ बातें सही हैं पर दोषदर्शन से क्या होगा. पहल तो सभी को करनी ही पड़ेगी. आखिर हमारे भविष्य का सवाल है.

(इस पोस्ट की प्रेरणा इस पोस्ट से मिली है)

पोस्ट अपडेट
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उन्मुक्त जी ने कमेन्ट में अपनी एक पोस्ट की लिंक दी. उनकी पोस्ट में दिए गए कुछ बिन्दुओं को यहाँ पुनःप्रस्तुत कर रहा हूँ क्योंकि वे सामयिक हैं और पोस्ट की प्रकृति के अनुरूप भी हैं. इसके लिए आपको धन्यवाद, उन्मुक्त जी!

छोटे-छोटे कदम ही हमारी पृथ्वी मां को बचा सकेंगे। यह हमारी जिम्मेवारी है कि यह काम सुचारु रूप से हो। क्योंकि किसी ने सच कहा है कि,

‘We have not inherited this planet from our parents. But have merely borrowed it from our children’
यह पृथ्वी हमें अपने पूर्वजों से नहीं मिली है. यह हमारे पास वशंजों की धरोहर है.

यह हमारी जिम्मेवारी है कि हम वशंजों की धरोहर, उन्हें ठीक प्रकार से उन्हें वापस दे सकें।  क्या आप जानना चाहते हैं कि आप इसमें किस तरह से सहयोग कर सकते हैं। बहुत कुछ – देखिये आप क्या कर सकते हैं:

1. आप समान ऐसे पैकेटों में खरीदिये जो फिर से प्रयोग हो सकें और उन्हें बार बार प्रयोग करें।

2. शॉपिंग पर अपना बैग ले जायें।

3. पेपर को बेकार न करें। दोनों तरफ प्रयोग करें।

4. हो सके तो, लिफाफों को फाड़ कर, अन्दर की तरफ सादी जगह को, लिखने के लिये प्रयोग करें।

5. सारे बेकार कागजों को पुनर्चक्रण (recycling) के लिये इकट्ठा करें।

6. प्लास्टिक के पैकेटों का कम प्रयोग करें। सब्जी, फल या मांस को सुरक्षित रखने के लिये प्लास्टिक की जरूरत नहीं।

7. उन उत्पादनों को लें, जो हर बार पुनः फिर से भरने वाले पैकटों में मिलते हों। यदि आपकी प्रिय वस्तु  ऐसे पैकेटों में न आती हो तो कम्पनी को इस तरह के पैकेटों में बेचने के लिये लिखें।

8. खाने की वस्तुओं को हवा-बन्द बर्तनों में रखें। उन्हें चिपकती हुई प्लास्टिक में रखने की जरूरत नहीं।

9. पेट्रोल बचायें, प्रदूषण कम करें।

10. अपने सहयोगियों और पड़ोसियों के साथ कार पूल कर प्रयोग करने का प्रयत्न करें।

11. बिना बात बिजली का प्रयोग न करें – बत्ती की जरूरत न हो तो बन्द कर दें।

12. पेड़ों, जंगलों के कटने को रोके। इनके कटने के खिलाफ लोगों को जागरूक करें।

13. पुनरावर्तित (recycled) वस्तुओं का प्रयोग करें।

14. ऐसे बिजली के उपकरण प्रयोग करें जो कम बिजली खर्च करते हों। इस समय इस तरह के नये तकनीक पर बने बल्ब आ रहें हैं। उनका प्रयोग करें।

15. पर्यावरण-मित्रवत उत्पादकों (environment friendly products) का प्रयोग करें।

आप इन पन्द्रह बिन्दुओं में से, कितने बिन्दुओं का पालन करते हैं। मैं इसमें सब तो नहीं, पर अधिकतर का पालन करता हूं। मेरे साइकिल  चलाने के बारे में तो आप जानते ही हैं और शायद कोपेनहेगन व्हील (Copenhagen Wheel)  बहुत कुछ बदल दे।
(A post on caring about the environment and mother Earth – in Hindi)

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खोखली सुरक्षा का भ्रम

कुछ दिनों पहले मेरी पिताजी से एक मसले पर बहुत कहा-सुनी हो गयी. मैं होली पर घर जानेवाला था. पिताजी ने होली के पहले घर की सफाई-पुताई कराई. घर में बहुत सा कबाड़ का सामान था जिसे निकालकर फेंकना ज़रूरी था. मैंने पिताजी से कह रखा था कि होली में घर आने पर मैं चीज़ों की छंटनी करा दूंगा.

भोपाल में मेरे घर में हमारे पास लगभग तीन हज़ार किताबें हैं. बहुत सी तो पिताजी ने पिछले चालीस साल में खरीदीं. उन्हें यहाँ-वहां से समीक्षा के लिए भी बहुत सारी किताबें मिलती रहतीं हैं. मेरी खुद की किताबें भी बहुत हैं. इनमें से कई मैंने पिछले दस-पंद्रह सालों में खरीदीं. ज्यादातर किताबों को मैंने पढ़ा नहीं था. हमेशा यह सोचता रहता था कि अभी तो खूब लम्बा जीवन पड़ा है किताबें पढ़ने के लिए. फुर्सत मिलने पर इन्हें पढ़ेंगे. इसी चक्कर में पुरानी किताबें पढ़ीं नहीं और नई खरीदता गया.

होली के पहले साफ़-सफाई के जोश में पिताजी ने मेरी बहुत सी किताबों को (लगभग 150-200) ग़ैरज़रूरी समझकर रद्दी में बेच दिया. बेचने के बाद घर में इस बात का अंदेशा हुआ कि यह समाचार मिलने पर मैं तो उबल ही जाऊँगा. ऐसा ही हुआ भी. फोन पर कुछ दिनों बाद मुझे बहन ने यह समाचार सुनाया और…

चंद रोज़ बाद मैं होली पर भोपाल पहुंचा. तब तक मेरा गुस्सा तो ठंडा पड़ चुका था इसलिए भोपाल में समय शांतिपूर्वक बिताया. आज इस बात को एक महीने से भी ज्यादा हो चला है और अब मुझे अपनी बिक चुकी किताबों की याद तो आती है पर मैं इस बात को भी समझता हूँ कि मैं यूं ही ताउम्र उन्हें अलमारी की शोभा बनाये रखता और उनको पढ़ने की नौबत कम ही आती. अफ़सोस सिर्फ दो बातों का है कि यह काम करने के पहले घरवालों ने मुझसे पूछा नहीं, और यह कि हजारों रुपयों की किताबों को कौड़ियों के मोल बेच दिया गया.

खैर, चीज़ गयी सो गयी. अब उसका कितना अफ़सोस मनाया जाये! जब तक वे किताबें मेरे पास थीं तब तक मुझमें उनके स्वामित्व का अहंकार था. जहाँ मेरे हमउम्र लड़के हमेशा गैजेट्स और फैशनेबल आयटम्स में अपनी सेक्योरिटी तलाशते थे वहां मैं अपनी किताबगाह में दुबके दीन-दुनिया से बेख़बर सुरक्षित महसूस करता था.

इस वाकये का ताल्लुक इस पोस्ट से भी है. न केवल किताबें बल्कि और भी बहुत सी वस्तुएं हममें से बहुतों के लिए सुरक्षा की भावना का जरिया होतीं हैं.  वे हमारे पास होतीं हैं तो हम बेहतर अनुभव करते हैं और उनके उपयोग-उपभोग के बहाने तलाशते हैं.

मुझे लगता है कि मनुष्य और पशुओं में समानता आहार-भय-निद्रा-संतानोत्पत्ति के स्तर पर तो है ही लेकिन मनुष्य में पशुओं के विपरीत संग्रह की भावना अति प्रबल है. अपने घर-आँगन में हम नानाविध वस्तुओं को भरके उनमें अपना सुकून खोजते हैं, अपना अकेलापन दूर करते हैं. वस्तुओं से भावनात्मक सम्बन्ध जोड़कर हम उनके साए में यादों को संजो कर रखते हैं.


वस्तुओं से भावनात्मक सम्बन्ध जोड़ लेना सहज है. आज भी मेरे परिवार की महिलाओं ने अपनी शादी की साड़ी और पुराने जेवरों को संभाल कर रखा है. “यह कड़ा तुम्हारी दादी के हाथ का है. अब ऐसा सोना नहीं मिलता” – माँ मुझसे कहती हैं. मैं सर हिलाता हूँ. घर में और भी नए-पुराने जेवर हैं लेकिन माँ जब इस कड़े के बारे में बताती हैं तो उनकी आंखों में सोने की कोई और किरण चमकती है. माँ के पास यह कड़ा हिफाज़त से है और माँ इसमें अपनी हिफाज़त ढूंढ रही है.

यह सुरक्षा की भावना बड़ी विकट है. यह इन रूपों में भी झलकती है:-

* अलमारी भर कपड़ों में इस बात का इत्मीनान है कि किसी भी मौके में पहनने के लिए कपडे़ हैं. आजकल लोग गमी में पहनने वाले कपडे़ भी नील-कलफ लगाकर तैयार रखते हैं.

* बड़ा घर इसलिए चाहिए क्योंकि घर में मांगलिक कार्य के मौके पर जगह कम नहीं पड़ेगी. घर बड़ा हो तो हर मौसम में अनुकूलता रहती है. गर्मी में छत पर भी सो सकते हैं. दोनों बेटों की शादी हो जाएगी तो वे अपनी पसंद के फ्लोर पे रहेंगे.

* कार होनी ज़रूरी है. फिर इमरजेंसी में किसी का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा.

* गैरेज में अच्छी टूल-किट, ऊंचा सामान रखने के लिए सीढ़ी, और बागवानी के औजार रखना चाहिए. क्या पता कब किस चीज़ की ज़रुरत पड़ जाये!

* नया गैजेट (ब्लैकबेरी, आईफोन, आइपैड आदि) पास हों तो हम तकनीक से ताल-से-ताल मिलकर चल सकते हैं. आउट-ऑफ़-डेट कौन कहलाना चाहेगा? और फिर ये हों तो आप कहीं से भी काम करो, मेल, करो, ब्लौग पढ़ो, टच में रहो.

और भी न जाने क्या-क्या. ऐसे ही बहुत से कारण और भी हो सकते हैं जब हम वस्तुओं में सुरक्षा तलाशने लगते हों.

पर क्या वाकई इन चीज़ों का पास में होना कुछ सुरक्षा देता है? कहीं यह सुरक्षा भ्रम तो नहीं!

आज मेरे पिता मुझे समझाते हैं कि ऐसी बहुत सी चीज़ें हम अपने आसपास कबाड़ बनाकर रखे रहते हैं जिनकी हमें वाकई ज़रुरत नहीं होती. यदि वे हमारे पास न भी हों तो हम उतने ‘अभाव’ में नहीं होते जितना हमें लगता है. देखिये:-

* आप साल भर में पहने जाने वाले कपड़ों का लेखा-जोखा करें तो आप जान जायेंगे कि आपको ‘क्या-पता-कब-इसकी-ज़रुरत-पड़-जाये’ जैसे कपड़ों को पहनने के मौके न के बराबर ही मिलते हैं. ज्यादातर अवसरों पर हम सिर्फ-और-सिर्फ वही कपडे़ पहनते हैं जिन्हें पहनना ज़रूरी होता है (या जिन्हें ही पहनना चाहिए). गैरज़रूरी कपड़ों को बिना किसी इमोशनल अत्याचार झेले किसी और को दिया जा सकता है (और उसे भी शायद उनकी ज़रुरत न हो).

* छोटे घरों में रहने के कुछ फायदों को अनदेखा किया जाता है. जैसे – छोटा घर, कम कचरा. छोटा घर, कम कर्जा. छोटा घर, ज़रुरत भर का सामान.

* कार न भी हो तो बाइक से, ऑटो से, बस से, या पैदल भी काम चल जाता है बशर्ते ज़रूरतें कम हों. वाकई कोई इमरजेंसी हो तो एम्बुलेंस की ही ज़रुरत पड़ती है जिसे शायद कोई भी खरीद के रखना नहीं चाहेगा.

* लेटेस्ट गैजेट लेने में कोई तुक नहीं है. मैं यह सब दस साल पुराने कम्प्यूटर पर लिख रहा हूँ जिसे वक़्त-ज़रुरत के हिसाब से मैं अपग्रेड कर चुका हूँ. बहुत कम ही ऐसे मौके आते हैं जब नया लिए बगैर काम करना नामुमकिन हो जाये. सच में!

* हर जगह हर समय कनेक्ट रहने की ज़रुरत नहीं है. इस बात को ज्यादा अरसा नहीं हुआ जब कोई भी कहीं भी कनेक्टेड नहीं रहता था और फिर भी सब जीते रहे! मैं गाड़ी चलाते वक़्त, खाने के समय, और यूं ही कभी एकांत के लिए फोन बंद रखता हूँ. मेरा फोन केवल बातचीत ही करा सकता है. बाकी इंटरटेनमेंट के लिए टीवी/कम्प्यूटर है.

अब यह सोचकर बड़ी राहत मिलती है कि कभी एक रात को इन्टरनेट बंद पड़ जाये तो मैं झुंझलाते हुए कम्पनी फोन नहीं करने लगूंगा. “कोई बात नहीं. कल देख लेंगे.”

अब आप बताएं कि आप उन हालत में क्या करेंगे:-

1. जब आपके कलेजे के टुकड़े के मानिंद कोई चीज़ या सुविधा आप अपने करीब नहीं पायें.

2. ऐसा होने की संभावना कितनी है, और,

3. तब क्या होगा यदि वह चीज़ या सुविधा आपसे हमेशा के लिए छिन जाये!

कम-से-कम चीज़ों और सुविधाओं के साथ रहकर देखें. यह देखें कि क्या जीवन दुनियावी वस्तुओं से उपजती खोखली सुरक्षा के बिना वाकई कष्टदायक है! अपना बैक-अप प्लान तैयार रखें.

(यह पोस्ट इस पोस्ट का अनुवाद/रूपांतरण है)

(A personal post about the illusion of being safe and secured – inspired by Leo Babauta – in Hindi)

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गांधीजी के सिखाये हुए मितव्ययता और अपरिग्रह के पांच पाठ

क्या आप मितव्ययता और अपरिग्रह के पाठ ग्रहण करना चाहते हैं?

गांधीजी के जीवन और दर्शन में मितव्ययता और अपरिग्रह के सर्वश्रेष्ठ सूत्रों का सार मिलता है. उन्होंने अपने जीवन के हर पक्ष में सादगी और मितव्ययता को अपनाया और इन्हीं के कारण उनका जीवन एक अनुकरणीय उदाहरण है.

गांधीजी के जैसा जीवन जीनेवाला और कोई व्यक्ति दोबारा न होगा. अपनी मृत्यु के समय वे उसी दरिद्रनारायण की प्रतिमूर्ति थे जिनके श्रेय के लिए उन्होंने अपने शरीर को भी ढंकना उचित न जाना. उनके जीवन प्रसंग युगों-युगों तक सभी को प्रेरणा देते रहेंगे.

अपने अंतिम दिनों में गांधीजी के पास कुल जमा दस-बारह वस्तुएं ही रह गईं थीं जो उनके निजी उपयोग में आती थीं. ये थीं उनका चश्मा, घड़ी, चप्पलें, लाठी और खाने के बर्तन. अपना घर और फ़ार्म आदि वे बहुत पहले ही लोक को अर्पित कर चुके थे.

“सांसारिक वस्तुओं के उपभोग और स्वामित्व से कौन दूर रह सकता है? लेकिन जीवन का रहस्य इसमें है कि उनकी कमी कभी न खले” – महात्मा गांधी

यह तो हम जानते ही हैं कि गांधीजी का जन्म धनाढ्य परिवार में हुआ था और उन्हें वे सभी सुख-सुविधाएँ मिलीं जो आज भी अधिकांश भारतीयों को दुर्लभ हैं. उन दिनों क़ानून की पढ़ाई के लिए लन्दन जाने में कई सप्ताह लग जाते थे. बचपन में धन-संपत्ति के बीच पले-बढ़े युवा मोहनदास ने जीवन के हर मोड़ पर सबक सीखे और अंततः स्वयं को व्यय और अर्जन के जंजाल से मुक्त कर दिया. जिस अवस्था में युवाओं को नित-नूतनता आकर्षित करती है उसमें उन्होंने कठोरतापूर्वक न केवल स्वयं को बल्कि अपने सानिध्य में आनेवाले हर व्यक्ति को सादगी पूर्ण जीवन जीने में प्रवृत्त किया. इसके महत्वपूर्ण सूत्र ये थे:-

1. कम संचित करें  - अपने पहनने के दो जोड़ी कपड़ों और बनाने-खाने के बर्तनों के अलावा उन्होंने किसी चीज़ की चाह नहीं की. उन्हें प्रतिदिन कई उपहार मिलते थे जिन्हें वे दूसरों को दे देते थे या उनकी नीलामी कर देते थे. हमारे लिए आज यह संभव नहीं है कि हम भी अपनी आवश्यकताओं को इतना कम कर लें. एक बार मैंने उन चीज़ों की सूची बनाने का सोचा जिनके बिना मेरा जीना दुश्वार हो जायेगा और सूची में चालीस-पचास आइटम आ गए. फिर भी, कम वस्तुओं का संचय ही संतुष्टिकारक होता है. आवश्यकता से अधिक वस्तुओं को ऐसे व्यक्तियों को दे देना चाहिए जिन्हें उसकी आवश्यकता है या जो उन्हें खरीद नहीं सकते.


आप भी 100 वस्तुओं का चैलेन्ज लेकर देखें कि क्या आप 100 से कम या 50 से भी कम वस्तुओं से अपना काम चला सकते हैं?

हम सभी अपने संचय को बढ़ाने और उसे व्यवस्थित रखने में बहुत सी ऊर्जा और बहुत सारा समय लगाते हैं. कम वस्तुओं को रखने और उनकी देखभाल करने से जीवन सरल और सहज हो जाता है.

2. सादा भोजन करें - गांधीजी को कभी भी मोटापे के डर ने नहीं सताया. वे अपना शाकाहारी भोजन स्वयं उगाते और बनाते थे. धातु के एक ही पात्र में वे भोजन करते थे. इस प्रकार भोजन संतुलित मात्रा में ग्रहण कर लिया जाता है. भोजन के पहले और बाद में वे प्रार्थना भी करते थे.

3. सादे वस्त्र पहनें - गांधीजी के सादे वस्त्रों में कपडा तो कम होता था पर उनका सन्देश बड़ा था. जब वे लन्दन में किंग से मिलने गए तब भी उन्होंने छोटी धोती और शाल पहना हुआ था. इस बारे में एक पत्रकार ने उनसे पूछा – “मिस्टर गांधी, किंग से मिलते समय आपको यह नहीं लगा कि आपने वास्तव में लगभग कुछ-नहीं पहना हुआ था?” गांधीजी ने इसका उत्तर दिया – “नहीं. किंग ने इतने वस्त्र पहने थे जो हम दोनों के लिए पर्याप्त थे.”

आज के समय में खुद अपने हाथों से करघा चलाकर सूत कातकर कपड़ा बुनना अप्रासंगिक हो चला है. वैसे भी, करघा चलाकर वस्त्र बुनना प्रतीकात्मक अधिक था, आज यह व्यावहारिक नहीं है. जो भी हो, सादे-सरल वस्त्रों में जो गरिमा है वह दिखावटी और तड़क-भड़क वाले डिजायनर कपड़ों में नहीं है.

4. तनावमुक्त जीवन जियें - गांधीजी को कभी किसी ने तनावग्रस्त नहीं देखा. कई अवसरों पर वे विषादग्रस्त और व्यथित ज़रूर हुए लेकिन दुःख के क्षणों में उन्होंने आत्ममंथन और प्रार्थना का ही सहारा लिया.

गांधीजी वैश्विक स्तर के नेता थे भले ही वे किसी राजनैतिक पद पर कभी नहीं रहे. करोड़ों व्यक्ति आज भी उन्हें पूजते हैं और उनके प्रति असीम श्रद्धा रखते हैं. अपने सरल जीवन में उन्होंने किसी भटकाव या वचनबद्धता को नहीं आने दिया. बच्चों के साथ समय बिताने के लिए वे अपनी राजनैतिक बैठकें भी निरस्त कर दिया करते थे.

गांधीजी के आसपास हर समय उपस्थित रहनेवाले लोग उनकी हर ज़रुरत और सुविधा का ध्यान रखते थे लेकिन उन्होंने हमेशा अपने हाथों से ही सभी काम करने को तरजीह दी. आत्मनिर्भरता उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण सद्गुण था.

आप भी जीवन को गंभीरता से लें पर इसका भी ध्यान रखें कि जीवन-यापन के कार्य और रोज़मर्रा की प्रतिबद्धताएं सुखी और संतोषी जीवन का विकल्प नहीं हैं.

5. अपने जीवन को अपना सन्देश बनायें - गांधीजी बहुत अच्छे लेखक और प्रभावशाली वक्ता थे पर निजी माहौल में वे शांत ही रहा करते थे और उतना ही बोलते थे जितना ज़रूरी हो. उनका लेखन टु-द-पॉइंट होता था. अपनी लेखनी से अधिक शब्द उन्होंने अपने जीवन के मार्फ़त दिए.

सरल-सहज जीवन जीने की योग्यता ने गांधीजी को सदैव महत्तर उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए गतिमान रखा. जनता और विश्व के प्रति उनकी प्रतिबद्धताएं उनकी प्राथमिकता थीं.

गांधीजी जैसा न तो कोई दोबारा कभी होगा और न ही कोई हो सकता है. हम सिर्फ इतना ही कर सकते हैं कि उनके जीवन का कुछ अनुकरण करने का प्रयास करें ताकि हमारा जीवन भी शांति और संतुष्टि से युक्त हो जाये.

“धन-दौलत की बहुतायत हो तो इसका परित्याग करके परिजनों को बेघर कर देने का कोई औचित्य नहीं है. महत्वपूर्ण केवल यह है कि इन सांसारिक विषयों से आसक्ति न हो” – महात्मा गांधी.

अपने जीवन में सरलता को उतार कर देखें. आप पाएंगे कि आपके लिए समय और ऊर्जा में बढ़ोतरी हो रही है. इससे आपको अवसर मिलेगा कि आप परिपूर्ण और प्रेरणास्पद जीवन जी सकें.

(यह पोस्ट इस ब्लौग पर प्रकाशित अरविन्द देवलिया की अतिथि पोस्ट का स्वतन्त्र अनुवाद है. अरविन्द ने ‘गेट द लाइफ यू लव’ ई-बुक लिखी है और उनका ब्लौग यह है)

(The lessons in minimalism/frugality by Mahatma Gandhi – in Hindi)

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