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मन

“मेरे मन के साथ कुछ गड़बड़ है” शिष्य ने कहा, “मेरे विचार तर्कसंगत नहीं हैं”.

गुरु ने कहा, “शांत सरोवर और उफनती नदी, दोनों जल ही हैं”

शिष्य गुरु की बात नहीं समझ पाया और मुंह बाए देखता रहा.

गुरु ने अपने कथन की व्याख्या की, “तुम्हारे सबसे शुद्ध, सचेत, उन्नत विचार और सबसे विकृत, दूषित, भद्दे विचार – तुम्हारा मन ही इनका सृजन करता है.”

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मन और पत्थर

एक ज़ेन शिष्य ने गुरु से प्रश्न किया, “ज़ेन में ऐसा क्या है जो बहुत बुद्धिमान लोग भी इसे समझ नहीं पाते?”

ज़ेन गुरु उठे, उन्होंने एक पत्थर उठाया और पूछा, “यदि झाड़ियों से एक शेर निकलकर हमारी ओर बढ़ने लगे और हमपर हमले के लिए तैयार हो तो क्या इस पत्थर से हमें कुछ मदद मिलेगी?”

“हाँ, बिलकुल!”, शिष्य ने कहा, “हम यह पत्थर उसपर फेंककर उसे डरा सकते हैं और जान बचाने के लिए भाग सकते हैं, लेकिन इस सबका ज़ेन से क्या लेना….”

“अब तुम मुझे बताओ”, गुरु ने शिष्य से पूछा, “यदि मैं तुम्हें यह पत्थर फेंककर मारूं, क्या तब भी इसकी कोई उपयोगिता है?”

“हरगिज़ नहीं!”, शिष्य ने हैरान होकर कहा, “यह तो बहुत ही बुरा विचार होगा. लेकिन इसका मेरे प्रश्न से क्या संबंध है?”

गुरु ने पत्थर नीचे गिरा दिया और बोले, “हमारा मन बहुत शक्तिशाली है पर वह इस पत्थर की ही भांति है. इसे अच्छाई और बुराई दोनों के लिए ही प्रयुक्त किया जा सकता है”.

“ओह”, शिष्य ने कहा, “इसका अर्थ यह है कि ज़ेन को समझने के लिए अच्छा मन होना चाहिए”.

“नहीं”, गुरु ने कहा, “केवल पत्थर गिरा देना ही पर्याप्त है”.

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चित्त की धूल

प्रत्येक व्यक्ति एक दर्पण है. सुबह से सांझ तक इस दर्पण पर धूल जमती है. जो मनुष्य इस धूल को जमते ही जाने देते हैं, वे दर्पण नहीं रह जाते. और जैसा स्वयं का दर्पण होता है, वैसा ही ज्ञान होता है. जो जिस मात्रा में दर्पण है, उस मात्रा में ही सत्य उसमें प्रतिफलित होता है.

एक साधु से किसी व्यक्ति ने कहा कि विचारों का प्रवाह उसे बहुत परेशान कर रहा है. उस साधु ने उसे निदान और चिकित्सा के लिए अपने एक मित्र साधु के पास भेजा और उससे कहा, “जाओ और उसकी समग्र जीवन-चर्या ध्यान से देखो. उससे ही तुम्हें मार्ग मिलने को है.”

वह व्यक्ति गया. जिस साधु के पास उसे भेजा गया था, वह सराय में रखवाला था. उसने वहां जाकर कुछ दिन तक उसकी चर्या देखी. लेकिन उसे उसमें कोई खास बात सीखने जैसी दिखाई नहीं पड़ी. वह साधु अत्यंत सामान्य और साधारण व्यक्ति था. उसमें कोई ज्ञान के लक्षण भी दिखाई नहीं पड़ते थे. हां, बहुत सरल था और शिशुओं जैसा निर्दोष मालूम होता था, लेकिन उसकी चर्या में तो कुछ भी न था. उस व्यक्ति ने साधु की पूरी दैनिक चर्या देखी थी, केवल रात्रि में सोने के पहले और सुबह जागने के बाद वह क्या करता था, वही भर उसे ज्ञात नहीं हुआ था. उसने उससे ही पूछा.

साधु ने कहा, “कुछ भी नहीं. रात्रि को मैं सारे बर्तन मांजता हूं और चूंकि रात्रि भर में उनमें थोड़ी बहुत धूल पुन: जम जाती है, इसलिए सुबह उन्हें फिर धोता हूं. बरतन गंदे और धूल भरे न हों, यह ध्यान रखना आवश्यक है. मैं इस सराय का रखवाला जो हूं.”

वह व्यक्ति इस साधु के पास से अत्यंत निराश हो अपने गुरु के पास लौटा. उसने साधु की दैनिक चर्या और उससे हुई बातचीत गुरु को बताई.

उसके गुरु ने कहा, “जो जानने योग्य था, वह तुम सुन और देख आये हो. लेकिन समझ नहीं सके. रात्रि तुम भी अपने मन को मांजो और सुबह उसे पुन: धो डालो. धीरे-धीरे चित्त निर्मल हो जाएगा. सराय के रखवाले को इस सबका ध्यान रखना बहुत आवश्यक है.”

चित्त की नित्य सफाई अत्यंत आवश्यक है. उसके स्वच्छ होने पर ही समग्र जीवन की स्वच्छता या अस्वच्छता निर्भर है. जो उसे विस्मरण कर देते हैं, वे अपने हाथों अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हैं.

ओशो के पत्रों के संकलन ‘पथ के प्रदीप’ से. प्रस्तुति – ओशो शैलेन्द्र.

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मन के छिद्र बंद करो

रात्रि बीत गई है और खेतों में सुबह का सूरज फैल रहा है. एक छोटा सा नाला अभी-अभी पार हुआ है. गाड़ी की आवाज सुन चांदनी के फूलों से सफेद बगुलों की एक पंक्ति सूरज की ओर उड़ गई है.

फिर कुछ हुआ है और गाड़ी रुक गई है. इस निर्जन में उसका रुकना भला लगा है. मेरे अपरिचित सहयात्री भी उठ आए हैं. रात्रि किसी स्टेशन पर उनका आना हुआ था. शायद मुझे संन्यासी समझ कर प्रणाम किया है. कुछ पूछने की उत्सुकता उनकी आंखों में है. आखिर वे बोल रहे हैं, ”अगर कोई बाधा आपको न हो तो मैं एक बात पूछना चाहता हूं. मैं प्रभु में उत्सुक हूं और उसे पाने का बहुत प्रयास किया है, पर कुछ परिणाम नहीं निकला. क्या प्रभु मुझ पर कृपालु नहीं है?”

मैंने कहा, ”कल मैं एक बगीचे में गया था. कुछ साथी साथ थे. एक को प्यास लगी थी. उसने बाल्टी कुएं में डाली. कुआं कुछ गहरा था. बाल्टी खींचने में श्रम पड़ा पर बाल्टी जब लौटी तो खाली थी. सब हंसने लगे.”

”मुझे लगा, यह बाल्टी तो मनुष्य के मन जैसी है. उसमें छेद ही छेद थे. बाल्टी नाममात्र की थी, बस छेद ही छेद थे. पानी भरा था, पर सब बह गया. ऐसे ही मन भी छेद ही छेद है. इस छेद वाले मन को कितना ही प्रभु की ओर फेंकों, वह खाली ही वापस लौट आता है.

”मित्र पहले बाल्टी ठीक कर लें फिर पानी खींच लेना एकदम आसान है. हां, छेद वाली बाल्टी से तपश्चर्या तो खूब होगी, पर तृप्ति नहीं हो सकती है.”

”और स्मरण रहे कि प्रभु न कृपालु हैं, न अकृपालु. बस आपकी बाल्टी भर ठीक होनी चाहिए. कुआं तो हमेशा पानी देने को राजी होता है. उसकी ओर से कभी कोई इनकार नहीं है.”

ओशो के पत्रों के संकलन ‘क्रांतिबीज’ से. प्रस्तुति – ओशो शैलेंद्र

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Muddy Mind And Pure Consciousness – मन और शांति

मनुष्य का मन अद्भुत है. वही संसार का और मोक्ष का रहस्य है. पाप और पुण्य, बंधन और मुक्ति, स्वर्ग और नर्क सब उसमें ही समाये हुए हैं. अन्धकार और प्रकाश उसी का है. उसमें ही जन्म है, उसमें ही मृत्यु है. वही है द्वार बाह्य जगत का, वही है सीढ़ी अंतस की. उसका ही न हो जाना दोनों के पार हो जाना हो जाता है.

मन सब कुछ है. सब उसकी लीला और कल्पना है. वह खो जाए, तो सब लीला विलीन हो जाती है.

कल यही कहा था. कोई पूछने आया, ‘मन तो बड़ा चंचल है, वह खोये कैसे? मन तो बड़ा गंदा है, वह निर्मल कैसे हो?’

मैंने फिर एक कहानी कही : बुद्ध जब वृद्ध हो गये थे, तब एक दोपहर एक वन में एक वृक्ष तले विश्राम को रुके थे. उन्हें प्यास लगी तो आनंद पास की पहाड़ी झरने पर पानी लेने गया था. पर झरने से अभी-अभी गाड़ियां निकली थी और उसका पानी गंदा हो गया था. कीचड़ ही कीचड़ और सड़े पत्ते उसमें उभर कर आ गये थे. आनंद उसका पानी बिना लिए लौट आया. उसने बुद्ध से कहा, ‘झरने का पानी निर्मल नहीं है, मैं पीछे लौट कर नदी से पानी ले आता हूं.’ नदी बहुत दूर थी. बुद्ध ने उसे झरने का पानी ही लाने को वापस लौटा दिया. आनंद थोड़ी देर में फिर खाली लौट आया. पानी उसे लाने जैसा नहीं लगा. पर बुद्ध ने उसे इस बार भी वापस लौटा दिया. तीसरी बार आनंद जब झरने पर पहुंचा, तो देखकर चकित हो गया. झरना अब बिलकुल निर्मल और शांत हो गया था, कीचड़ बैठ गयी थी और जल बिलकुल निर्मल हो गया था.

यह कहानी मुझे बड़ी प्रीतिकर है. यही स्थिति मन की भी है. जीवन की गाड़ियां उसे विक्षुब्ध कर जाती हैं, मथ देती हैं. पर कोई यदि शांति और धीरज से उसे बैठा देखता है रहे, तो कीचड़ अपने से नीचे बैठ जाती है और सहज निर्मलता का आगमन हो जाता है. बात केवल धीरज और शांति प्रतीक्षा की है और ‘बिना कुछ किये’ मन की कीचड़ बैठ सकती है.

केवल साक्षी होना है और मन निर्मल हो जाता है. मन को निर्मल करना नहीं होता है. करने से ही कठिनाई बन जाती है. उसे तो केवल किनारे पर बैठ कर देखें और फिर देखें कि क्या होता है!

ओशो के पत्रों के संकलन ‘क्रांतिबीज’ से. प्रस्तुति – ओशो शैलेन्द्र

A beautiful Buddhist story illustrates the state of pure consciousness.

Buddha was once on His way to deliver a sermon in a village with His disciple Ananda. On their way, they crossed over a small canal and proceeded further. It was a hot day and the sun was blazing. Buddha felt thirsty and rested under a tree.

He asked Ananda to get Him some water to quench His thirst from the canal that they had just crossed. In the meantime, a bullock cart had crossed the canal making the water muddy.

Ananda on finding the water muddy returned back to Buddha saying that the water was not clean.

Buddha insisted Ananda to wait for sometime until the water becomes clean and then fetch some to quench His thirst.

So when Ananda went back he still found the water not good enough to drink. He waited for a while and went into meditation.

After his meditation, Ananda was surprised to find the mud settled and the crystal clear water fit to be drunk.

Osho says that same is the case with our minds too. Thoughts are like the mud which pollutes the consciousness. Our consciousness gets cleared the moment we cease paying attention to thoughts, cooperating with them, analysing them and bothering them. It is only then that silence descends in pure consciousness.

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