Tag Archives: भक्ति

Jonaid and a Barber – प्रत्येक घटना कुछ-न-कुछ सिखाती है

आंखें खुली हों, तो पूरा जीवन ही विद्यालय है. और जिसे सीखने की भूख है, वह प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक घटना से सीख लेता है. और स्मरण रहे कि जो इस भांति नहीं सीखता है, वह जीवन में कुछ भी नहीं सीख पाता. इमर्सन ने कहा है : ”हर शख्स, जिससे मैं मिलता हूं, किसी न किसी बात में मुझ से बढ़कर है. वही, मैं उससे सीखता हूं.”

एक दृश्य मुझे स्मरण आता है. मक्का की बात है. एक नाई किसी के बाल बना रहा था. उसी समय फकीर जुन्नैद वहां आ गये और उन्होंने कहा : ”खुदा की खातिर मेरी भी हजामत कर दें.” उस नाई ने खुदा का नाम सुनते ही अपने गृहस्थ ग्राहक से कहा, ‘मित्र, अब थोड़ी मैं आपकी हजामत नहीं बना सकूंगा. खुदा की खातिर उस फकीर की सेवा मुझे पहले करनी चाहिये. खुदा का काम सबसे पहले है.’ इसके बाद फकीर की हजामत उसने बड़े ही प्रेम और भक्ति से बनाई और उसे नमस्कार कर विदा किया. कुछ दिनों बाद जब जुन्नैद को किसी ने कुछ पैसे भेंट किये, तो वे उन्हें नाई को देने गये. लेकिन उस नाई ने पैसे न लिये और कहा : ”आपको शर्म नहीं आती? आपने तो खुदा की खातिर हजामत बनाने को कहा था, रुपयों की खातिर नहीं!” फिर तो जीवन भर फकीर जुन्नैद अपनी मंडली में कहा करते थे, ”निष्काम ईश्वर-भक्ति मैंने हज्जाम से सीखी है.”

क्षुद्रतम् में भी विराट संदेश छुपे हैं. जो उन्हें उघाड़ना जानता है, वह ज्ञान को उपलब्ध होता है. जीवन में सजग होकर चलने से प्रत्येक अनुभव प्रज्ञा बन जाता है. और, जो मूर्छित बने रहते हें, वे द्वार आये आलोक को भी वापस लौटा देते हैं.

ओशो के पत्रों के संकलन ‘पथ के प्रदीप’ से. प्रस्तुति – ओशो शैलेन्द्र.

“I learned sincere belief from a barber,” Jonaid recalled, and he told the following story.

Once when I was in Mecca, a barber was trimming a gentleman’s hair. I said to him, “For the sake of God,

can you shave my hair?” “I can,” he said. His eyes filling with tears, he left the gentleman still unfinished. “Get up,” he said. “When God’s name is spoken, everything else must wait.”

He seated me and kissed my head, and shaved off my hair. Then he gave me a screw of paper with a few small coins in it. “Spend this on your needs,” he said.

I thereupon resolved that the first present that came my way I would give him in charity. Not long afterwards a bag of gold arrived from Basra. I took it to the barber.

“What is this?” he asked. “I made up my mind,” I explained, “that the first present that came my way I must give to you. This has just arrived.”

“Man,” he exclaimed, “have you no shame before God? You said to me, ‘For the sake of God, shave my hair.’ Then you give me a present. Have you ever known of anyone doing a deed for the sake of God and taking payment for it?” A thief had been hanged in Baghdad. Jonaid went and kissed his feet. “Why did you do that?” he was asked.

“A thousand compassions be upon him!” he replied. “He proved himself a true man at his trade.

He did his work so perfectly, that he gave his life for it.”

About these ads

15 Comments

Filed under Osho

मन के छिद्र बंद करो

रात्रि बीत गई है और खेतों में सुबह का सूरज फैल रहा है. एक छोटा सा नाला अभी-अभी पार हुआ है. गाड़ी की आवाज सुन चांदनी के फूलों से सफेद बगुलों की एक पंक्ति सूरज की ओर उड़ गई है.

फिर कुछ हुआ है और गाड़ी रुक गई है. इस निर्जन में उसका रुकना भला लगा है. मेरे अपरिचित सहयात्री भी उठ आए हैं. रात्रि किसी स्टेशन पर उनका आना हुआ था. शायद मुझे संन्यासी समझ कर प्रणाम किया है. कुछ पूछने की उत्सुकता उनकी आंखों में है. आखिर वे बोल रहे हैं, ”अगर कोई बाधा आपको न हो तो मैं एक बात पूछना चाहता हूं. मैं प्रभु में उत्सुक हूं और उसे पाने का बहुत प्रयास किया है, पर कुछ परिणाम नहीं निकला. क्या प्रभु मुझ पर कृपालु नहीं है?”

मैंने कहा, ”कल मैं एक बगीचे में गया था. कुछ साथी साथ थे. एक को प्यास लगी थी. उसने बाल्टी कुएं में डाली. कुआं कुछ गहरा था. बाल्टी खींचने में श्रम पड़ा पर बाल्टी जब लौटी तो खाली थी. सब हंसने लगे.”

”मुझे लगा, यह बाल्टी तो मनुष्य के मन जैसी है. उसमें छेद ही छेद थे. बाल्टी नाममात्र की थी, बस छेद ही छेद थे. पानी भरा था, पर सब बह गया. ऐसे ही मन भी छेद ही छेद है. इस छेद वाले मन को कितना ही प्रभु की ओर फेंकों, वह खाली ही वापस लौट आता है.

”मित्र पहले बाल्टी ठीक कर लें फिर पानी खींच लेना एकदम आसान है. हां, छेद वाली बाल्टी से तपश्चर्या तो खूब होगी, पर तृप्ति नहीं हो सकती है.”

”और स्मरण रहे कि प्रभु न कृपालु हैं, न अकृपालु. बस आपकी बाल्टी भर ठीक होनी चाहिए. कुआं तो हमेशा पानी देने को राजी होता है. उसकी ओर से कभी कोई इनकार नहीं है.”

ओशो के पत्रों के संकलन ‘क्रांतिबीज’ से. प्रस्तुति – ओशो शैलेंद्र

8 Comments

Filed under Osho