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Posts tagged ‘बुराई’

जिंदगी की U ट्यूब


sanjay sinhaसंजय सिन्हा पेशे से पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं. फेसुबक पर उनके लंबे स्टेटस जिंदगी और उससे जुड़े मसलों पर संजीदगी से सोचने को मजबूर करते हैं. उन्हें पढ़ने पर यह अहसास गहरा होता है कि अपनी तमाम दुश्वारियों और लाचारियों के बावजूद हमारी ज़िंदगी और ये दुनिया यकीनन बहुत सुंदर है. प्यार, पैसा और हर तरह की ऊंच-नीच के दुनियावी मसले सदा से कायम हैं और कायम रहेंगे… ज़िंदगी और वक्त ऐसी शै हैं जिनपर आप ऐतबार नहीं कर सकते… न जाने कब ये मुठ्ठी में बंद रेत की मानिंद बिखर जाएं. इसलिए अपनी अच्छाइयों को बरक़रार रखकर छोटे-छोटे लम्हों से खुशी चुराने की बात कहते हुए संजय अपने अनुभवों को साफ़गोई से बहुत रोचक अंदाज़ में बयां करते हैं. इन्हें पढ़कर आपको यकीनन बहुत अच्छा लगेगा.


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इस संसार में बहुत से लोग ईश्वर को मानते हैं. बहुत से लोग नहीं मानते. बहुत से लोग कहते हैं उन्हें नहीं पता. बहुत से लोग आधा मानते हैं, आधा नहीं मानते. बहुत से लोग सिर्फ इतना मानते हैं कि ईश्वर नहीं है लेकिन कोई शक्ति है.

मैं ईश्वर के बारे में कुछ भी कह पाने वाला कोई नहीं हूं. मैंने ईश्वर को नहीं देखा है, फिर भी बहुत से लोगों की इस दुविधा पर मैं अपनी एक राय रखना चाहता हूं. ये राय मैं उन लोगों के लिए रखना चाहता हूं, जो ईश्वर पर सिर्फ इसलिए यकीन नहीं करना चाहते क्योंकि वो उसकी पूजा करते हैं, उसकी उपासना करते हैं, मगर वो उन्हें अपनी मौजूदगी का अहसास नहीं कराता. ये राय मैं उन लोगों के लिए लिखना चाहता हूं जिन्हें अच्छे कर्मों के बदले अच्छा मिलने और बुरे कर्मों के बदले बुरा मिलने वाली बात पर संदेह है. यकीनन जो लोग ऐसा सोचते हैं, उनके पास अपने अनुभव भी होंगे. आप में से तमाम लोगों ने कभी अच्छे काम किए होंगे, कोई पुण्य किया होगा फिर भी आपको उसके बदले में बुराई मिली. आपके पास तमाम वे उदाहरण भी होंगे ही जिनमें आपके जानने वाले ने कोई गलत काम किया, पाप किया पर उसकी ज़िंदगी में अच्छा ही अच्छा होता चला गया. ऐसे उदाहरण अक्सर हमें गुमराह करते हैं.

ऐसे उदाहरण हमें ये मानने को मजबूर करते हैं कि इस बात की गारंटी नहीं है कि पाप करने का अंजाम बुरा होगा और पुण्य करने के बदले में भला होगा.

मैं कहता हूं कि इस बात की गारंटी है. आप जो कर्म करेंगे उसका प्रतिफल वैसा ही मिलेगा. और सिर्फ समझाने के लिए मैं आपके सामने एक उदाहरण पेश करने जा रहा हूं, जिसे मैंने इक्का-दु्क्का अब तक अपने मित्रों से ही साझा किया था.

आप मान लीजिए जब बच्चा पैदा होता है, उसकी जिंदगी एक यू ट्यूब (U) की तरह होती है. अब U आकार के इस हिस्से में आधा ‘अच्छा’ भरा है और आधा ‘बुरा’. इसे आप चाहें तो आधा पुण्य कह लीजिए और आधा पाप. आप इसे आधा पॉजीटिव कह लीजिए या आधा निगेटिव.

ये अच्छा और बुरा जन्म के साथ जुड़ कर आपके साथ आया है. अब आप जब कोई अच्छा काम करते हैं, तो U आकार के इस ट्यूब के आधे हिस्से में अच्छाई भरे होने वाले छोर से इसके भीतर अच्छाई जाती है. जब उसमें थोड़ी अच्छाई अंदर जाती है तो दूसरी तरफ से उतनी ही बुराई बाहर निकलती है. क्योंकि U ट्यूब पूरी तरह से भरी हुई और उसमें कुछ और भरने की जगह ही नहीं है. इसलिए इसके एक छोर से उसमें अच्छाई भीतर जाने पर  दूसरी तरफ से बुराई बाहर निकल गई.

फिर कभी आपको लगा, हे भगवान! हमने तो भला किया लेकिन हमारे साथ ये बुरा क्यों हो गया?

अब मान लीजिए कि आपने किसी का बुरा कर दिया. आपके U ट्यूब के दूसरे छोर से उसमें बुराई घुसी और दूसरी ओर से लबालब भरी अच्छाई में से थोड़ी सी अच्छाई बाहर निकल गई. आपको लगा, ये हुई न बात! ईश्वर नहीं है. कर्म कुछ नहीं है. देखो मैंने तो पाप किया लेकिन मेरा भला हुआ.

फिर आप लगातार बुरा करते जाते हैं. और अधिक बुराई उस ट्यूब में अंदर जाती रहती है, और अच्छाई बाहर आती रहती है. आप रिश्वत लेते रहते हैं, आप चोरी करते रहते हैं, आप व्यभिचार करते रहते हैं और आपका जीवन लगातार जगमग रोशनी से चमकता रहता है. एक दिन सारी अच्छाई उस ट्यूब से निकल जाती है. इसके बाद उस ट्यूब से जो कुछ भी बाहर निकलता है, वो सिर्फ और सिर्फ बुरा निकलता है. जिस दिन उस यू ट्यूब से सारी अच्छाई निकल जाती है, उस दिन आप चाहे चमचमाती मर्सिडीज़ कार में चलते रहे होंगे, चाहे आप खुद सरकार ही क्यों न हों, एक दिन आपका ही भाई आता है और अपनी बंदूक की सारी गोलियां आपके सीने में उतार देता है.

क्यों? सब कुछ तो इतना अच्छा चल रहा था! आज भाई का दिमाग फिर क्यों गया?

नहीं समझे? अरे भाई, अपने बड़े बुजुर्ग इसी को तो कहते थे कि पाप का घड़ा भर गया.

एक वाकया सुनाता हूं आपको. भोपाल में मेरे घर के टॉयलेट को साफ करने वाली एक महिला, दो वक्त की रोटी को तरसने वाली एक महिला अपने अच्छे कर्म को नहीं छोड़ती. उसे गरीबी मंजूर है, लेकिन गलत काम नहीं. जिस ईश्वर ने उसे कुछ नहीं दिया उस पर उसका इतना भरोसा है कि बिना उसकी तस्वीर को प्रणाम किए वो कोई काम ही नहीं करती. एक दिन बाथरूम में उसे हीरे की एक अंगूठी मिलती है, तो उसे धो कर वापस कर देती है. मैंने उससे पूछा भी कि ‘क्या तुम्हें पता है, ये अंगूठी कितने की होगी?’ उसने कहा ‘दाम तो नहीं पता साहब लेकिन बहुत महंगी होगी. सोना और हीरा तो महंगे ही होते हैं’. मैंने पूछा, ‘तुम्हारे मन में क्या ऐसा नहीं आया कि बाथरूम में गिरी चीज न भी मिले तो कोई तुम पर शक नहीं ही करता. तुम इसे अपने पास ही रख सकती थीं.’ उसने दोनों कानों को हाथ लगाया और कहा, ‘साहब पिछले जन्म की गलतियों के बाद तो आज इस जन्म में ये गरीबी देख रही हूं, अभी भी नहीं चेती तो अगले कई जन्मों का चक्र बिगड़ जाएगा. इस पर कहीं तो रोक लगानी ही होगी.’

मेरे घर के टॉयलेट साफ करने वाली उस महिला को मैंने मन-ही-मन प्रणाम किया. एक दिन वो मेरे ही पास यह कहने के लिए आई कि उसकी बेटी दसवीं में पढ़ती है और मैं उसे कुछ पढ़ा दूं ताकि वो हाई स्कूल ठीक से पास हो जाए. मैं उस लड़की से मिला. मुझे वो मेधावी लगी. मैंने उसे अपने एक शिक्षक के पास भेज दिया.

लड़की प्रथम श्रेणी से पास हुई. फिर उसका परिचय भोपाल में ही एक रूसी अध्ययन संस्थान की अपनी एक टीचर से मैंने करा दिया. ये बात तब की है जब रूस का विघटन नहीं हुआ था. 1987 में उस लड़की ने रूसी भाषा में पढ़ाई शुरू कर दी. फिर उसे सोवियत संघ में कोई स्कॉलरशिप मिली. जिस लड़की ने कभी ट्रेन को नहीं देखा था, वो एक शाम मालवा एक्सप्रेस से भोपाल से दिल्ली आई और दिल्ली से एयरोफ्लोत एयर लाइंस से मॉस्को पहुंची. वहां वह कुछ पढ़ने लगी. मैं जिन दिनों मॉस्को गया था वो मुझसे मिली थी.

फिर सोवियत संघ का विघटन हो गया. वहां पढ़ने के लिए गए बहुत से लोग शराबी-कबाबी बन कर रह गए और अय्याशी करके वापस आ गए. लेकिन वो लड़की वहीं रही. उसने बदलते हुए रूस के साथ खुद को ढाल किया. आज वह मॉस्को में बहुत बड़ा व्यापार समूह संभाल रही है. दुनिया भर की यात्रा करती है. कोई साल भर पहले उसके बारे में पता किया था तो पता चला कि उसकी मां, जो हमारे घर काम करती थी वो बेटी के पास चली गई. कोई बता रहा था कि भोपाल के अरेरा कॉलोनी में उसका बहुत बड़ा बंगला है. दिल्ली-मुंबई में तो है ही. सिंगापुर और पता नहीं कहां-कहां है.

कुछ समझे आप? उस औरत ने अच्छाई का दामन नहीं छोड़ा. उसने पुण्य का दामन नहीं छो़ड़ा. उसने ईश्वर की उंगली नहीं छो़ड़ी. उसके U ट्यूब में एक-एक कर ढेरों पुण्य समाते गए और दूसरी छोर से एक-एक कर सारे पाप निकल गए. जिस दिन सारे पाप निकल गए, U ट्यूब के पास निकालने को सिर्फ ‘गुड’ ‘गुड’ ‘गुड’ ही रह गया.

इसे ही गंवई भाषा में पाप और पुण्य का कुंड कहते हैं. ईश्वर ने भी खुद को किसी आकार में परिभाषित नहीं किया है. अगर गीता को ईश्वर का कथन मान लें तो उसने यही तो कहा है कि मैं तुम-में ही हूं. उसने भी तो कर्म करने की बात ही कही है. यह ईप पर निर्भर करता है कि आप कितने दिनों तक अपने दुख को सहते हुए पुण्य के खाते को बढ़ाना चाहते हैं. आप पर ही यह भी निर्भर करता है कि कितने दिनों तक पाप करते हुए आप अपने पुण्य के बैलेंस को खत्म करके दुख को बार-बार झेलना चाहते हैं.

ये मत भूलिए कि सबकी मंजिल एक है. अज्ञानी अंधविश्वास के सहारे वहां पहुंचते हैं और ज्ञानी तर्क के सहारे. जो बच्चे सुबह सुबह अपने मम्मी-पापा को, दादा-दादी को, नाना-नानी को गुड मॉर्निंग कहते हैं वो उनके ज्यादा प्यारे तो होते ही हैं, जो बच्चे सुबह उठ कर अपने मां-बाप को, सास-ससुर को कोसते हैं उन्हें तो वो भी कोसेंगे ही. फिर आप ईश्वर की पूजा कर ही लेंगे तो क्या नुकसान है? ईश्वर हो या न हो, लेकिन आपके जुड़े हुए हाथ, मुंह से निकले ‘थैंक यू’ के दो शब्द किसी को बुरे नहीं लगते, फिर मूर्ति को वे क्यों बुरे लगेंगे?

मैं फिर दुहरा रहा हूं… ईश्वर है या नहीं ये मैं नहीं जानता. लेकिन आपके कर्मों का फल आपके ही सामने होगा इसमें आप संदेह मत कीजिएगा. आपके कम्यूटर में वायरस होगा, आपके कम्यूटर का प्रोसेसर सुस्त होगा, लेकिन उसका कम्यूटर बहुत शानदार है. मर्जी आपकी. अगर कण कण में भगवान है तो मैं किसी भी कण को नहीं छोड़ना चाहता, ना मूरत वाले कण को, ना सूरत वाले कण को. मैं भी अपने घर के टॉयलेट को साफ करने वाली उस महिला की तरह अभी ही चेत कर अपने पिछले जन्मों और इस जन्म में किए सारे पापों के चक्र को पूरा कर मुक्त होना चाहता हूं. क्या पता मेरे लिए भी एक मॉस्को, ऊपर ही सही, मेरा इंतजार कर रहा हो.

बुराई : The Evil


निक्सिवान ने अपने मित्रों को रात्रिभोज पर बुलाया था और वह स्वयं रसोई में उनके लिए बेहतरीन शोरबा बना रहा था. थोड़ा चखने पर उसे लगा कि उसमें नमक कम था.

रसोई में नमक ख़त्म हो गया था इसलिए उसने अपने बेटे को पुकारा और उससे कहा, “गाँव तक जाओ और जल्दी से थोड़ा नमक खरीद लाओ, लेकिन उसकी सही-सही कीमत चुकाना, न तो बहुत ज्यादा देना और न ही बहुत कम देना.”

निक्सिवान का लड़का हैरान होकर बोला, “मैं जानता हूँ कि मुझे किसी चीज़ का ज्यादा दाम नहीं चुकाना चाहिए, लेकिन अगर मैं मोलभाव करके कुछ पैसा बचा सकता हूँ तो उसमें क्या हर्ज़ है?”

निक्सिवान ने कहा, “किसी बड़े शहर में तो यह करना ठीक होगा लेकिन यहाँ ऐसा करने से हमारा यह छोटा सा गाँव बर्बाद हो सकता है”.

निक्सिवान के मित्र पिता-पुत्र के बीच हो रही यह बात सुन रहे थे. उन्होंने निक्सिवान से पूछा, “यदि मोलभाव करने पर नमक कम कीमत पर मिल रहा हो तो उसे लेने में क्या बुराई है?”

निक्सिवान ने कहा, “कोई भी दुकानदार सामान्य से काफी कम कीमत पर नमक तभी बेचेगा जब उसे पैसे की बड़ी सख्त ज़रुरत हो. ऐसी स्थिति में उससे नमक वही आदमी खरीदेगा जिसके ह्रदय में उस नमक को तैयार करने और उपलब्ध कराने वाले व्यक्ति के श्रम तथा संघर्ष के प्रति कोई संवेदना न हो”.

“लेकिन इतनी छोटी सी बात से कोई गाँव कैसे बर्बाद हो सकता है?”, एक मित्र ने पूछा.

निक्सिवान ने कहा, “तुम्हें शायद इसका पता न हो लेकिन आदिकाल में संसार में बुराई की मात्रा अत्यल्प थी. कालांतर में आनेवाली पीढ़ियों के लोग उसमें अपनी थोड़ी-थोड़ी बुराई मिलाते गए. उन्हें हमेशा यही लगता रहा कि आटे में नमक के बराबर बुराई से जग का कुछ न बिगड़ेगा, लेकिन देखो इस प्रकार हम आज कहाँ तक आ गए हैं.”

(पाउलो कोएलो की पुस्तक ‘द डेविल एंड मिस प्रिम’ से लिया गया अंश.)

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Nixivan had invited his friends to supper and was cooking a succulent piece of meat for them. Suddenly, he realised that he had run out of salt. So Nixivan called to his son.

‘Go to the village and buy some salt, but pay a fair price for it: neither too much nor too little.’

His son was surprised.

‘I can understand why I shouldn’t pay too much for it, Father, but if I can bargain them down, why not save a bit of money?’

‘That would be the sensible thing to do in a big city, but it could destroy a small village like ours.’

When Nixivan’s guests, who had overheard their conversation, wanted to know why they should not buy salt more cheaply if they could, Nixivan replied:

‘The only reason a man would sell salt more cheaply than usual would be because he was desperate for money. And anyone who took advantage of that situation would be showing a lack of respect for the sweat and struggle of the man who laboured to produce it.’

‘But such a small thing couldn’t possibly destroy a village.’

‘In the beginning, there was only a small amount of injustice abroad in the world, but everyone who came afterwards added their portion, always thinking that it was only very small and unimportant, and look where we have ended up today.’

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