मैंने कहा – “प्रेम जो कुछ भी हो, उसे शब्दों में कहने का कोई उपाय नहीं है क्योंकि वह कोई विचार नहीं है. प्रेम तो अनुभूति है. उसमें डूबा जा सकता है पर उसे जाना नहीं जा सकता. प्रेम पर विचार मत करो. विचार को छोड़ो और फिर जगत को देखो. उस शांति में जो अनुभव में आएगा वही प्रेम है.
और फिर मैंने एक कहानी भी कही. किसी बाउल फकीर से एक पंडित ने पूछा – “क्या आपको शास्त्रों में वर्गीकृत किये गए प्रेम के विभिन्न रूपों का ज्ञान है?”
वह फकीर बोला – “मुझ जैसा अज्ञानी भले शास्त्रों की बातें क्या जाने!”
यह सुनकर पंडित ने शास्त्रों में वर्गीकृत किये गए प्रेम के विभिन्न रूपों की विस्तार से चर्चा की और फिर इस संबंध में बाउल फकीर का मंतव्य जानना चाहा.
बाउल फकीर खूब हंसा और बोला – “आपकी बातें सुनते समय मुझे यह लग रहा था जैसे कोई सुनार फूलों की बगिया में घुस आया हो और फूलों के सौंदर्य को स्वर्ण की परख करने वाले पत्थर पर घिस-घिस कर जांच रहा हो”.
क्या आप इसका अनुभव कर पाते हैं? क्या यह आपको छू भी पाता है?
हममें से बहुतेरे तो दिन-रात की आपाधापी में इसका अंशमात्र भी देख नहीं पाते. उगते हुए सूरज की अद्भुत लालिमा, बच्चे की मनभावन खिलखिलाहट, चाय के पतीले से उठती हुई महक, दफ्तर में या सड़क में किसी परिचित की कुछ कहती हुई-सी झलक, ये सभी सुंदर लम्हे हैं.
जब हम सौंदर्य पर विचार करते हैं तो ज्यादातर लोगों में मानस में खूबसूरत वादियाँ और सागरतट, फ़िल्मी तारिका, महान पेंटिंग या अन्य किसी भौतिक वस्तु की छवि उभर आती है. मैं जब इस बारे में गहराई से सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि जीवन में मुझे वे वस्तुएं या विचार सर्वाधिक सुंदर प्रतीत होते हैं जो इन्द्रियातीत हैं अर्थात जिन्हें मैं छूकर, या चखकर, यहाँ तक कि देखकर भी अनुभव नहीं कर सकता.
वे अनुभव अदृश्य हैं फिर भी मेरे मन-मष्तिष्क पर वे सबसे गहरी छाप छोड़ जाते हैं. मुझे यह भी लगता है कि वे प्रयोजनहीन नहीं हैं. उनके मूल में भी ईश्वरीय विचार या योजना है. ईश्वर ने उनकी रचना की पर उन्हें हमारी इन्द्रियों की परिधि से बाहर रख दिया ताकि हम उन्हें औसत और उथली बातों के साथ मिलाने की गलती नहीं करें.
हमें वास्तविक प्रसन्नता और सौंदर्य का बोध करानेवाले वे अदृश्य या अमूर्त प्रत्यय कौन से हैं? वे सहज सुलभ होते हुए भी हाथ क्यों नहीं आते? इसमें कैसा रहस्य है?
ऐसे पांच प्रत्ययों का मैंने चुनाव किया है जो किसी विशेष क्रम में नहीं हैं.
1. ध्वनि/संगीत – मुझे आपके बारे में नहीं पता पर मेरे लिए संगीत कला की सबसे गतिशील विधा है. ऐसे कई गीत हैं जो मुझे किसी दूसरी दुनिया में ले जाते हैं और मेरे भीतर वैसा भाव जगा देते हैं जो शायद साधकों को समाधिस्थ होने पर ही मिलता होगा.
संगीत में अद्भुत शक्ति है और यह हमारे विचारों को ही नहीं बल्कि विश्व को भी प्रभावित करती है. एक अपुष्ट जानकारी के अनुसार हम लय और ताल पर इसलिए थिरकते हैं क्योंकि हमारे मन के किसी कोने में माता के गर्भ में महीनों तक सुनाई देती उसकी दिल की धड़कन गूंजती रहती है. ये बड़ी अजीब बात है पर यह सही न भी हो तो मैं इसपर विश्वास कर लूँगा.
“यदि मैं भौतिकविद नहीं होता तो संभवतः संगीतकार बनता. मैं अक्सर स्वरलहरियों में सोचता हूँ. मेरे दिवास्वप्न संगीत से अनुप्राणित रहते हैं. मुझे लगता है कि मानव जीवन एक सरगम की भांति है. संगीत मेरे लिए मनोरंजन का सबसे बड़ा माध्यम है” – अलबर्ट आइंस्टीन
संगीत की अनुपस्थिति में साधारण ध्वनियाँ भी मुझे उससे कमतर नहीं लगतीं. बादलों का गर्जन हो या बच्चे की किलकारी, टपरे पर बारिश की बूँदें हों या पत्तों की सरसराहट – साधारण ध्वनियाँ भी मन को प्रफुल्लित करती हैं. सारी ध्वनियाँ और संगीत अदृश्य है पर मन को एक ओर हर्षित करता है तो दूसरी ओर विषाद को बढ़ा भी सकता है.
आपको कौन सी ध्वनियाँ और संगीत सबसे अधिक प्रभावित करतीं हैं? आपका सबसे प्रिय गीत कौन सा है? क्या कहा, मेरे प्रिय गीत के बारे में पूछ रहे हैं? पचास के दशक की फिल्म ‘पतिता’ का तलत महमूद द्वारा गया गया गीत ‘है सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं’ मेरा सर्वप्रिय गीत है. पिछले तीस सालों से कोई ऐसा महीना नहीं गुज़रा होगा जब मैंने यह गीत नहीं सुना या गुनगुनाया. यह तो रही मेरी बात. हो सकता है आप मेरी पसंद से इत्तेफाक न रखें. आदमी-आदमी की बात है.
2. निस्तब्धता/मौन – देखिये, पहले तो मैंने संगीत की बात छेड़ी थी और अब एकदम से चुप्पी पर आ गया. पर यह तो आप जानते ही हैं कि एक सुरीली ध्वनि के पीछे दस या सौ कोलाहलपूर्ण या बेसुरी आवाजें होतीं हैं. मुझे फर्श की टाइलें काटनेवाली आरी की आवाज़ या गाड़ियों के रिवर्स हौर्न बहुत बुरे लगते हैं. आपको भी कुछ आवाजें बहुत खिझाती होंगी.
ऐसी कर्कश ध्वनियों से तो अच्छा है कि कुछ समय के लिए पूर्ण शांति हो, सन्नाटा हो. यही मौन में होता है. जब कहीं से कोई आवाज़ नहीं आती तो निस्तब्धता छा जाती है. पिन-ड्रॉप सायलेंस! आजकल का संगीत भी एक तरह के शोरगुल से कुछ कम नहीं है! सबसे अच्छा अपना सुन्न बटा सन्नाटा:)
पर मौन अपने आप में एक बड़ी साधना भी है, अनुशासन पर्व है. जैसे हर गैजेट या मशीन में आजकल रीसेट का बटन होता है वैसा ही मौन का बटन मैंने आजमा कर देखा हुआ है. इस बटन को दबाते ही भीतर शांति छा जाती है. थोड़ी कोशिश करके देखें तो कोलाहल में भी मौन को साध सकते हैं. किसी हल्ला-हू पार्टी में कॉफ़ी या कोल्ड-ड्रिंक का ग्लास थामकर एक कोने में दुबक जाएँ और यह बटन दबा दें. फिर देखें लोग आपको शांत और संयमित देखकर कैसे खुन्नस खायेंगे. उपद्रवियों की जले जान तो आपका बढ़े मान.
किसी ने कहा है “Silense is Golden” – बड़ी गहरी बात है भाई! इसके कई मतलब हैं. कुछ कहकर किसी अप्रिय स्थिति में पड़ने से बेहतर लोग इसी पर अमल करना पसंद करते हैं.
एक और बात भी है – अब व्यस्तता दिनभर की नहीं रह गयी है. शोरगुल और कोलाहल का सामना तड़के ही होने लगा है और सोने के लिए लेटने तक मेंटल स्टैटिक जारी रहती है. इससे बचने का एक ही उपाय है कि टीवी और किवाड़ को बंद करें और लोगों को लगने दें कि आप वाकई भूतिया महल में ही रहते हैं.
3. गंध/सुगंध – भगवान ने नाक सिर्फ सांस लेने या ऊंची रखने के लिए ही नहीं दी है! सांस लेने के लिए तो मुंह भी काफी है. पर नाक न हो तो तपती धरती पर बारिश की पहली फुहारों से उठती सोंधी महक और लिफ्ट में किसी अकड़ू आत्म-मुग्धा के बदन से आती परफ्यूम की महक का जायका कैसे कर पाते? वैसे इनके अलावा भी बहुत सी सुगंध हैं जो दिल को लुभा लेती हैं! मुझे हवन के समय घर में भर जानेवाली सुगंध बहुत भाती है. एक ओर ये सुगंध मन में शांति और दिव्यता भरती है वहीं दूसरी ओर दूसरी सुगंध भी हैं जिन्हें पकड़ते ही दिल से आह निकलती है और मैं बुदबुदा उठता हूँ ‘हाय, मार डाला!’
खुशबुओं से जुड़ा हुआ एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कभी-कभी उनका अहसास होते ही अतीत की कोई धुंधली सी स्मृति जाग उठती है. ऐसी खुशबू बहुत ही यादगार-से लम्हों को बिसरने से पहले ही जिंदा कर देती है. वैसे, ऐसा ही कुछ बदबू के में भी कहा जा सकता है.
मैं निजी ज़िंदगी में किसी सुगंधित प्रोडक्ट का उपयोग नहीं करता. कोई डियो या परफ्यूम नहीं लगाता. सुगंधित साबुन से स्नान भी नहीं करता. पाउडर भी नहीं लगाता. बहुत से लोग हद से ज्यादा सुगंध का उपयोग करते हैं जो अरुचिकर लगता है. लेकिन जीवन सुगंध से रिक्त नहीं होना चाहिए, इसीलिए मुझे बदल-बदलकर सुगंधित अगरबत्तियां लगाने का चस्का है. इससे सुगंध भी बनी रहती है और पत्नी इस भ्रम में भी रहती है कि मैं बहुत भक्ति-भावना से ओतप्रोत हूँ.
4. संतुष्टि/शांति – जीवन में संतुष्टि और शांति का कोई विकल्प नहीं है. इन्हें ध्वनि या सुगंध की तरह महसूस भी नहीं किया जा सकता. केवल अंतरात्मा ही इनकी उपस्थिति की गवाही दे सकती है. इन्हें न तो खरीदा जा सकता है और न ही किसी से उधार ले सकते हैं. इन्हें अर्जित करने के मार्ग सबके लिए भिन्न-भिन्न हैं. ज्यादातर लोग ज़िंदगी में सब कुछ पा लेना चाहते हैं, सबसे ज्यादा, और सबसे पहले. उन्हें इसकी बहुत ज़रुरत है. मुझे लगता है कि बड़ी-बड़ी बातों में इन्हें तलाश करना अपना समय और ऊर्जा नष्ट करना ही है.
जीवन में संतुष्टि और शांति पाने के लिए बुद्ध या गाँधी या कोई मसीहा बनने की ज़रुरत नहीं है. छोटे-छोटे पलों में भी परिपूर्णता से अपने सभी ज़रूरी कामों को पूरा करते रहना मेरे लिए इन्हें पाने का उपाय है. अपने दैनिक कार्यों को पूरा करना ही नहीं बल्कि और भी कई चीज़ें करना, जैसे बच्चों को सैर पर ले जाना, किसी पड़ोसी की मदद कर देना, सैल्समैन को पानी के लिए पूछना भी कुछ ऐसे काम हैं जिन्हें नहीं करने पर कोई नुकसान नहीं होता पर इन्हें करनेपर मिलनेवाला आत्मिक संतोष असली पूंजी है.
आपके अनुसार वास्तविक संतुष्टि और शांति किसमें निहित है?
संभव है इन्हें अर्जित करने के सूत्र आपके सामने ही बिखरे हों पर आप उन्हें देख नहीं पा रहे हों.
5. प्रेम – प्रेम दुनिया में सबसे सुंदर और सबसे कीमती है. यही हमें इस दुनिया में लाता है और हम इसी के सहारे यहाँ बने रहते हैं. जीवन को सतत गतिमान रखने के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रेम से ही मिलती है. गौर करें तो हमारा दिन-रात का खटना और ज्यादा कमाने के फेर में पड़े रहने के पीछे भी प्रेम की भावना ही है हांलांकि जिनके लिए हम यह सब करते हैं उन्हें प्यार के दो मीठे बोल ज्यादा ख़ुशी देंगे. प्यार के बारे में और क्या लिखूं…
आप किससे प्रेम करते हैं? आप प्रेम बांटते हैं या इसकी खोज में हैं?
प्यार की राह में केवल एक ही चीज़ आती है, और वह है हमारा अहंकार. ज़माना बदल गया है और अब लोग निस्वार्थ भाव से आचरण नहीं करते. हमारा विश्वास इस बात से उठ गया है कि बहुत सी अच्छी चीज़ें बाँटने से ही बढ़ती हैं. इस बारे में आपका क्या ख़याल है?
इस लिस्ट में आप और क्या इजाफा कर सकते हैं? आप जीवन का वास्तविक सौंदर्य किन वस्तुओं या विचारों में देखते हैं?
मेरा प्रिय गीत सुनें.
हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें, हम दर्द के सुर में गाते हैं
जब हद से गुज़र जाती है खुशी, आँसू भी छलकते आते हैं
हैं सबसे मधुर वो गीत
(पहलू में पराये दर्द बसाके, हँसना हँसाना सीख ज़रा
तू हँसना हँसाना सीख ज़रा ) – २
तूफ़ान से कह दे घिर के उठे, हम प्यार के दीप जलाते हैं
हम प्यार के दीप जलाते हैं
हैं सबसे मधुर वो गीत …
(काँटों में खिले हैं फूल हमारे, रंग भरे अरमानों के
रंग भरे अरमानों के ) – २
नादान हैं जो इन काँटों से, दामन को बचाये जाते हैं
दामन को बचाये जाते हैं
हैं सबसे मधुर वो गीत …
(जब ग़म का अन्धेरा घिर आये, समझो के सवेरा दूर नहीं
समझो के सवेरा दूर नहीं ) – २
हर रात की है सौगात यही, तारे भी यही दोहराते हैं
तारे भी यही दोहराते हैं
हैं सबसे मधुर वो गीत …
एक नौजवान ने शहर के चौराहे पर खड़े होकर ऐलान किया कि उसका दिल पूरे मुल्क में सबसे खूबसूरत है. उसके इर्द-गिर्द भीड़ जमा हो गयी और सभीने उसके दिल को देखने के बाद हामी भरी कि उसका दिल वाकई सबसे खूबसूरत था और उसमें कहीं कोई नुस्ख नहीं था.
लेकिन भीड़ के पीछे से एक बूढ़े की आवाज़ आई – “नहीं बच्चे, तुम्हारा दिल मेरे दिल जितना खूबसूरत नहीं है!”
भीड़ ने बूढ़े के दिल को गौर से देखा. वह भरपूर जोश से धड़क रहा था पर इसपर बहुत से जख्मों के निशान थे. इसके कुछ टुकड़े निकले हुए थे जिनकी जगह पर दूसरे टुकड़े निहायत ही कामचलाऊ तरीके से अटकाए हुए थे और वह देखने में भद्दा लग रहा था. नौजवान ने भी बूढ़े के दिल का मुआयना किया और ज़ोरों से हंस दिया.
“तुम बढ़िया मजाक कर लेते हो!” – नौजवान बोला – “मेरे दिल के सामने तुम्हारा दिल कहीं नहीं ठहरता. मेरा दिल बेजोड़ है और तुम्हारा दिल बहुत चोट खाया लगता है.”
“हाँ, वो तो है” – बूढ़ा बोला – “तुम्हारा दिल वाकई निर्दोष है… लेकिन मैं ऐसा दिल कभी नहीं चाहूँगा. मेरे दिल में लगा हर जख्म उस शख्स की ओर इशारा करता है जिसे मैंने अपने दिल का टुकड़ा दिया… मैंने अपने दिल को खोलकर उसके सामने रख दिया और उसे दे दिया. उसके बदले में उसने भी मुझे अपने दिल का एक हिस्सा दिया जिसे मैंने अपने दिल से जोड़ दिया. अक्सर ही ये टुकड़े बिलकुल सटीक नहीं बैठे और दिल की सतह ऊबड़-खाबड़ हो गयी…”
“और कभी ऐसा भी हुआ कि मैंने किसी को अपने दिल का एक टुकड़ा दिया लेकिन उसने मुझे अपने दिल का टुकड़ा नहीं दिया. मेरे दिल के खाली कोने यही किस्सा बयान करते हैं कि किसी से मोहब्बत करना दांव लगाने जैसा ही है. ये खाली कोटर सूने रहते हैं और दर्द पहुंचाते हैं पर मुझे यह भी याद दिलाते हैं कि मैंने कभी किसी से प्यार किया और शायद वे कभी मेरे पास आयें और मेरे दिल के ये खाली कोने फिर से भर जाएँ. क्या तुम्हें अभी भी यह लगता है कि मेरा दिल बदसूरत है?”
नौजवान मायूस खड़ा रहा और उसकी आँखों से आंसू बहने लगे. उसने अपने दिल की ओर हाथ बढाया और उसका एक टुकड़ा निकालकर बूढ़े के हाथ में रख दिया.
बूढ़े से नौजवान की पेशकश को अपने दिल से लगा लिया और अपने भग्न ह्रदय से एक टुकड़ा निकालकर नौजवान के दिल में नई बनी हुई जगह में रख दिया.
यह टुकड़ा बिलकुल तराशा हुआ नहीं था इसलिए नौज़वान का दिल अब पहले की तरह इंतहाई खूबसूरत नहीं रहा. नौजवान ने अपने दिल की तरफ देखा. उसका दिल अब पहले जैसा बेजोड़ नहीं था पर उसे अब वह ज्यादा खूबसूरत नज़र आने लगा क्योंकि बूढ़े के दिल का प्यार अब उसके दिल में घर बना चुका था.
(पाउलो कोएलो के ब्लॉग से – from the blog of Paulo Coelho)
यह पोस्ट पाउलो कोएलो के ब्लॉग से लेकर पोस्ट की गयी है.
कुछ सप्ताह पहले मैंने Why women love men पोस्ट की थी. कुछ पाठकों ने मुझसे इसपर लिखने के लिए कहा कि हम स्त्रियों से प्रेम क्यों करते हैं. मैं इसपर लिखने से बच रहा था पर एक पाठिका जूलिया ने मेरी मुश्किल आसान कर दी. इसमें लिखी सारी बातों से मैं इत्तेफाक नहीं रखता लेकिन यह एक बेहतर कोशिश है. देखिये वह हमें क्या बता रही है:
हम पुरुष स्त्रियों से इसलिए प्यार करते हैं कि भरपूर उम्र हो जाने पर भी उनके भीतर एक लड़की छुपी होती है.
क्योंकि किसी बच्चे के करीब से गुज़रते समय वे मुस्कुराना नहीं भूलतीं.
क्योंकि जब हम उन्हें सड़क पर चलता देखकर कमेन्ट करते हैं तो वे पलटकर कोई जवाब नहीं देतीं और मुस्कुराती भी नहीं हैं.
क्योंकि वे रात में खुल जाती हैं… इसलिए नहीं कि यह उनके चरित्र की विकृति है… वे तो हमें खुश देखना चाहती हैं.
क्योंकि वे स्वयं को सुन्दर और सुगठित बनाने के लिए पार्लर और जिम की यातनाएं झेलतीं हैं और उफ़ तक नहीं करतीं.
क्योंकि वे सलाद खाना पसंद करती हैं.
क्योंकि वे अपने चेहरे को उतनी ही शिद्दत और यकीन से रंगती हैं जैसे माइकलएंजेलो सिस्टीन चैपल पर काम करता था.
क्योंकि वे बार-बार हमसे यह पूछती हैं – “बताओ, मैं कैसी लग रही हूँ?”
क्योंकि वे समस्याओं को अपने तरीके से सुलझाती हैं और हम इसपर बहुत खीझते हैं.
क्योंकि वे करुणावान है और जब हम उन्हें प्यार करना कम कर देते हैं तो वे हमसे कहती हैं ‘मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ’ और इस तरह वे हमें इशारा करती हैं और अपना प्यार जताती हैं.
क्योंकि कभी-कभी वे हमें बताती हैं कि उन्हें सर्दी हो गयी है या उनके जोड़ों में दर्द है, और तभी हमें यह पता चलता है कि वे भी हमारी तरह इंसान हैं.
क्योंकि जब हमारी सेनाएं एक दुसरे के मुल्कों में घुसी चली आती हैं उस समय भी वे अपने चौके-चूल्हे में बेख़ौफ़ बनी रहतीं हैं.
क्योंकि वे हमारे जैसे कपड़े पहनकर काम पर जा सकती हैं जबकि कोई मर्द उनकी कुर्तियाँ पहनकर बाहर निकलने की हिम्मत नहीं कर सकता.
क्योंकि फिल्मों की तरह – सिर्फ फिल्मों की तरह ही – वे रात में हमारे करीब आने से पहले सुगंधित स्नान नहीं करतीं.
क्योंकि जब हम उन्हें कहते हैं कि फलां औरत बहुत सुन्दर लग रही है तब वे उसमें कोई-न-कोई पक्का खोट निकालकर बता देती हैं ताकि हमें अपने ख़याल पर शक होने लगे.
क्योंकि वे फ़िल्मी तारिकाओं की तरह चरमोत्कर्ष पर पहुँचने का सटीक दिखावा कर सकतीं हैं.
क्योंकि जब हम पुरुष अपनी सूखी चाय और पुरानी शराब से ही चिपके रहते हैं तब वे बेहतरीन रंगीन घालमेल बनाकर दिखाती हैं और अपने नाजुक महीन बुंदनों पर इठला सकती हैं.
क्योंकि उन्हें कहीं कोई पुरुष भा जाता है तो वे उसे ज़ाहिर करने में वक़्त नहीं गंवातीं.
क्योंकि वे हमें जन्म देती हैं और हमें खुद में समा लेती हैं, और यह जब तक नहीं होता तब तक हम उनकी काया और आत्मा की परिक्रमा करते रहते हैं.
(और मैं इसमें जोड़ता हूँ: हम उन्हें स्त्री होने के नाते ही प्रेम करते हैं. बात ख़तम!)
प्राचीन काल में एक राजा का यह नियम था कि वह अनगिनत संन्यासियों को दान देने के बाद ही भोजन ग्रहण करता था.
एक दिन नियत समय से पहले ही एक संन्यासी अपना छोटा सा भिक्षापात्र लेकर द्वार पर आ खड़ा हुआ. उसने राजा से कहा – “राजन, यदि संभव हो तो मेरे इस छोटे से पात्र में भी कुछ भी डाल दें.”
याचक के यह शब्द राजा को खटक गए पर वह उसे कुछ भी नहीं कह सकता था. उसने अपने सेवकों से कहा कि उस पात्र को सोने के सिक्कों से भर दिया जाय.
जैसे ही उस पात्र में सोने के सिक्के डाले गए, वे उसमें गिरकर गायब हो गए. ऐसा बार-बार हुआ. शाम तक राजा का पूरा खजाना खाली हो गया पर वह पात्र रिक्त ही रहा.
अंततः राजा ही याचक स्वरूप हाथ जोड़े आया और उसने संन्यासी से पूछा – “मुझे क्षमा कर दें, मैं समझता था कि मेरे द्वार से कभी कोई खाली हाथ नहीं जा सकता. अब कृपया इस पात्र का रहस्य भी मुझे बताएं. यह कभी भरता क्यों नहीं?”
संन्यासी ने कहा – “यह पात्र मनुष्य के ह्रदय से बना है. इस संसार की कोई वस्तु मनुष्य के ह्रदय को नहीं भर सकती. मनुष्य कितना ही नाम, यश, शक्ति, धन, सौंदर्य, और सुख अर्जित कर ले पर यह हमेशा और की ही मांग करता है. केवल ईश्वरीय प्रेम ही इसे भरने में सक्षम है.”
हिंदी के सबसे प्रेरक और मोहक ब्लॉग में आपका स्वागत है।
"It is proper for you, Kalamas, to doubt, to be uncertain; uncertainty has arisen in you about what is doubtful. Come, Kalamas. Do not go upon what has been acquired by repeated hearing; nor upon tradition; nor upon rumor; nor upon what is in a scripture; nor upon surmise; nor upon an axiom; nor upon specious reasoning; nor upon a bias toward a notion that has been pondered over; nor upon another's seeming ability; nor upon the consideration, 'The monk is our teacher.' Kalamas, when you yourselves know: 'These things are bad; these things are blamable; these things are censured by the wise; undertaken and observed, these things lead to harm and ill,' abandon them." ~ Buddha
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