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Japan’s Soap-box Study – खाली डिब्बा

यह जापान में प्रबंधन के विद्यार्थियों को पढ़ाया जाने वाला बहुत पुराना किस्सा है जिसे ‘साबुन के खाली डिब्बे का किस्सा’ कहते हैं. कई दशक पहले जापान में साबुन बनानेवाली सबसे बड़ी कंपनी को अपने एक ग्राहक से यह शिकायत मिली कि उसने साबुन का व्होल-सैल पैक खरीदा था पर उनमें से एक डिब्बा खाली निकला. कंपनी के अधिकारियों को जांच करने पर यह पता चल गया कि असेम्बली लाइन में हो किसी गड़बड़ के कारण साबुन के कई डिब्बे भरे जाने से चूक गए थे.

कंपनी ने एक कुशल इंजीनियर को रोज़ पैक हो रहे हज़ारों डिब्बों में से खाली रह गए डिब्बों का पता लगाने के लिए तरीका ढूँढने के लिए निर्देश दिया. कुछ सोचविचार करने के बाद इंजीनियर ने असेम्बली लाइन पर एक हाई-रिजोल्यूशन एक्स-रे मशीन लगाने के लिए कहा जिसे दो-तीन कारीगर मिलकर चलाते और एक आदमी मॉनीटर की स्क्रीन पर निकलते जा रहे डिब्बों पर नज़र गड़ाए देखता रहता ताकि कोई खाली डिब्बा बड़े-बड़े बक्सों में नहीं चला जाए. उन्होंने ऐसी मशीन लगा भी ली पर सब कुछ इतनी तेजी से होता था कि वे भरसक प्रयास करने के बाद भी खाली डिब्बों का पता नहीं लगा पा रहे थे.

ऐसे में एक अदना कारीगर ने कंपनी अधिकारीयों को असेम्बली लाइन पर एक बड़ा सा इंडस्ट्रियल पंखा लगाने के लिए कहा. जब फरफराते हुए पंखे के सामने से हर मिनट साबुन के सैंकड़ों डिब्बे गुज़रे तो उनमें मौजूद खाली डिब्बा सर्र से उड़कर दूर चला गया.

सिंपल!

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One of the most memorable case studies in Japanese management was the case of the empty soap box, which happened in one of Japan’s biggest cosmetics companies.

The company received a complaint that a consumer had bought a soap box that was empty.

Immediately the authorities isolated the problem to the assembly line, which transported all the packaged boxes of soap to the delivery department. For some reason, one soap box went through the assembly line empty. Management asked its engineers to solve the problem. Post-haste, the engineers worked hard to devise an X-ray machine with high-resolution monitors manned by two people to watch all the soap boxes that passed through the line to make sure they were not empty. No doubt, they worked hard and they worked fast but they spent whoopee amount to do so.

But when a rank-and-file employee in a small company was posed with the same problem, did not get into complications of X-rays, etc but instead came out with another solution.

He bought a strong industrial electric fan and pointed it at the assembly line. Heswitched the fan on, and as each soap box passed the fan, it simply blew the empty boxes out of the line.

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अपने-अपने वनवास

रामायण में अन्य राजपुत्रों के साथ सुकुमार श्रीराम को भी सीता-स्वयंवर में आमंत्रित करके शिव के धनुष पर प्रत्यंचा चढाने के लिए कहा जाता है. यदि राम इसमें सफल रहेंगे तो उनका विवाह सीता से हो जाएगा. राम धनुष को उठाकर उसे प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए खींचते हैं परंतु धनुष टूट जाता है. अन्य आमंत्रितों में से कोई भी राजा धनुष को हिला भी न पाया था अतः जनकराज राम से अत्यंत प्रभावित होकर अपनी पुत्री सीता का हाथ उनके हाथ में दे देते हैं.

यह सोचना सच में अचरज भरा है कि कोमल और दयालु स्वभाव के स्वामी राम उस धनुष को मोड़कर कैसे तोड़ देते हैं जिसपर उन्हें केवल प्रत्यंचा ही चढ़ानी थी! यह धनुष मिथिला की प्राचीन राजसत्ता का प्रतीक है. धनुष तभी तक उपयोगी है जब इसकी प्रत्यंचा न तो अधिक ढीली हो और न ही अधिक कसी हुई हो. सुकुमार राम द्वारा इसे यूं ही तोड़ देने के पीछे कुछ-न-कुछ प्रयोजन अवश्य है क्योंकि यह कोई साधारण धनुष नहीं था. यह सृष्टि के संहारक महायोगी शिव का धनुष था.

अयोध्या में राम के आगमन पर उनके पिता राजा दशरथ यह विचार व्यक्त करते हैं कि वे अब बूढ़े हो चले हैं और उन्हें राजपाट अपने ज्येष्ठ पुत्र के हवाले कर देना चाहिए. दुर्भाग्यवश राजतिलक की सारी तैयारियों पर पानी फिर जाता है. राजमहल में घटनेवाली बातों के कारण राम को वनवास के लिए अयोध्या छोड़नी पड़ती है. क्या शिव के धनुष के टूटने और राम को राज्य न मिलने की घटना में कोई संबंध है? रामायण में इसपर कोई चर्चा नहीं की गयी है लेकिन यह प्रश्न बहुत रोचक है. चाहे जो हो, हिन्दू कथानकों में कई प्रतीकात्मक बिंदु हैं और इस संबंध के विवेचन की भी आवश्यकता है.

राम के द्वारा शिव के धनुष को खंडित कर देना संभवतः इस बात का प्रतीक है कि राम ने कामनाओं और आसक्तियों का खंडन कर दिया है क्योंकि महायोगी शिव स्वयं अनासक्ति के देवता हैं. क्या इसीलिए राम को राजा नहीं बनाया जाता है? क्या इसीलिए उन्हें चौदह वर्ष के वनवास पर भेजा जाता है ताकि वे अपने भीतर कुछ मोह-माया लेकर वापस लौटें? ध्यान दें कि चौदह वर्ष के बाद रावण के वध के उपरान्त राम के व्यवहार में हमें कैसा विचित्र आवेश दिखता है. वे सीता से कहते हैं कि उन्होंने रावण का वध सीता को पाने के लिए नहीं बल्कि धर्म की रक्षा और अपने कुल की मर्यादा को अक्षुण रखने के लिए किया. इससे यह प्रतीत होता है कि शीघ्र ही राजा बनने जा रहे व्यक्ति के लिए यह अशोभनीय था कि वह अपनी पत्नी के प्रति अपने भावनाओं को सबके समक्ष व्यक्त करे. उसे प्राप्त करने के लिए धनुष को खंडित करते समय तो उसने अपने मनोभावों का प्रकटन किया पर ऐसा वह दुबारा नहीं करेगा.

प्राचीन दृष्टाओं ने राजाओं से ऐसी ही अनासक्ति की अपेक्षा की थी. यहाँ राजत्व का महत्व परिवार से भी बढ़कर था. यही कारण है कि राम को सर्वोच्च पदवी पर आसीन कर दिया गया. आज शायद हम इन विचारों से सहमत न हो सकें लेकिन यह स्पष्ट है कि महाकाव्य में वर्षों तक निर्जन वन में विचरण करने को त्रासदी की भांति नहीं बल्कि ऐसी कालावधि के रूप में देखा गया है जिसमें राम राजमुकुट का भार वहन करने योग्य बन रहे हैं.

निर्जन वन में पकने/विकसित होने की यही थीम महाभारत में दोहराई गयी है. कृष्ण इन्द्रप्रस्थ का राज्य स्थापित करने में पांडवों की सहायता करते हैं पर वे पाँचों भाई मूर्खतापूर्वक जुए में अपना सब कुछ हार जाते हैं. इसके परिणामस्वरूप उन्हें तेरह वर्ष का वनवास मिलता है. वन में जब युधिष्ठिर अपने भाग्य का रोना रोते हैं तो महात्मा उन्हें स्मरण कराते हैं कि श्री राम ने भी दोषहीन होते हुए भी उनसे एक वर्ष अधिक का वनवास झेला. महात्मा पांडवों से कहते हैं कि अपना सर धुनने की बजाय इस अवधि को नए कौशल सीखने में लगाएं. पांडव नयी चीज़ें सीखते हैं. शिव के वेश में साधारण आखेटक से द्वंद्व में परास्त होकर अर्जुन नम्रता सीखते हैं, बूढ़े वानर (हनुमान) की पूँछ उठा पाने में असमर्थ होने पर भीम का गर्व चूर हो जाता है और उसमें दीनता आती है. अज्ञातवास के एक वर्ष की अवधि में सभी पांडव बंधु अपने मान-अपमान को ताक पर रखकर साधारण नौकर-चाकरों की भांति दूसरों की सेवा करते हैं. इतना सब होने के बाद ही वे महाभारत के महायुद्ध में कृष्ण की अगुवाई में अपने शत्रुओं का दमन कर पाते हैं.

कॉर्पोरेट जगत में अपना मुकाम बना चुके अधिकतर लीडर्स भी कभी-न-कभी अपना वनवास काट चुके होते हैं. किसी CEO, या सफल उद्यमी से बात करिए और आप देखेंगे कि उनकी आँखें सालों तक कॉर्पोरेट के बीहड़ में बिताये वक़्त की दास्ताँ बयान करतीं हैं. यह वो वक़्त था जब कोई उन्हें पूछता नहीं था, उन्हें पीछे धकेल दिया जाता और उनके काम की कीमत तक नहीं दी जाती थी. उनसे भय खानेवाले दोयम दर्जे के लोग उन्हें ताकत और दौलत से दूर कर देते थे. वे आपको उन दिनों के बारे में बताएँगे जब लोग उन्हें नवागंतुक या उससे भी बुरा… गयाबीता जानकर व्यवहार करते थे. यह अफसोसनाक है पर बहुत से लीडर्स अपने जीवन के इस दौर को सकारात्मकता से नहीं लेते. इससे उनमें असुरक्षा की भावना आ जाती है और वे कड़वाहट से भर जाते हैं. अपनी ही राख से फिर जीवित हो जानेवाले पौराणिक फीनिक्स पक्षी बनने की बजाय वे विशाल वटवृक्ष बन जाते हैं जो सबको शीतलता तो देता है पर अपने नीचे घास का एक तिनका भी नहीं पनपने देता.

यह देखने में आया है कि किसी मंझोली कंपनी का लीडर अपने टीम के सदस्यों में यह भावना भरने में रूचि लेता है कि वे शक्तिशाली हैं. पर सच्चाई यह है कि निर्णय लेते समय वह निपट अकेला होता है. उसने अपने नीचे किसी प्रतिभा समूह या दूसरी कमान का विकास नहीं किया है. यदि आप उससे इस बारे में पूछेंगे तो वह इस प्रत्यक्ष सत्य को स्वीकार करने से ही इनकार कर देगा. उसे शायद इसका पता ही नहीं है. एक समय ऐसा भी था जब वह किसी तेजी से विकसित हो रही कंपनी में मार्केटिंग विभाग का मुखिया था. लेकिन जब उस कंपनी में नए CEO ने काम संभाला तो वह उसका विश्वासपात्र नहीं बन सका और छंटनी के योग्य बन गया. उसे किसी दूर देश में बड़े पदनाम के साथ मामूली काम निपटाने के लिए तीन साल के लिए भेज दिया गया. उस तीन वर्षों में वह कॉर्पोरेट निर्जनता में बिखर गया. उसके भीतर कड़वाहट, खीझ, एवं गुस्सा भर गया और उसने तय कर लिया कि वह लडेगा और विजेता बनकर दिखाएगा. इसी जूनून में उसने अपना पद छोड़ दिया और नई कंपनी में प्रवेश किया. वर्षों तक संघर्ष करने के बाद अब वह बहुत बड़ी कंपनी में बड़ी जिम्मेदारी का पद संभाल रहा है और उन लोगों से भी बेहतर स्थिति में है जिन्होंने उसे कभी छंटनी के लायक समझा था. अपनी गौरवपूर्ण वापसी के हर क्षण को वह आनंदपूर्वक भोगता है. उसने सबको अपना महत्व जता दिया है.

लेकिन इन घटनाओं ने उसे बहुत बदल दिया है. वह अब पहले की भांति उदार नहीं रहा. उसे हर कोई खतरा जान पड़ता है. उसे आपने सहयोगियों से विश्वासघात का भय है. कंपनी में उसके कामकाज के तौरतरीके यह ज़ाहिर करते हैं कि उसमें निराशा घर करती जा रही है. अपने संघर्ष के दिनों में उसमें जो आशावादिता थी वह अब कहीं नज़र नहीं आती. कभी वह शिकार था और अब वह शिकारी बनकर अवांछित निर्वासन और प्रतिशोधात्मक वापसी के चक्र को गति दे रहा है.

हमारे ग्रंथों में ऐसे संकीर्णमना नायकों की निंदा की गयी है. ऐसे लक्षण उनके चरित्र के उथलेपन और आस्थाहीनता को प्रदर्शित करते हैं. दोनों महाकाव्यों में वनागमन को शक्ति-संसाधन और पौरुषपूर्ण वापसी के अवसर के रूप में देखा गया है. यदि राम वन को नहीं जाते तो रावण का दमन नहीं होता और यदि पांडव वनवास नहीं करते तो उनके भीतर आपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने का नैतिक बल उत्पन्न नहीं होता. अंततः दीर्घकाल तक गौरवपूर्ण शासन करने के उपरांत राम और पांडवों ने राजसत्ता अपनी अगली पीढ़ी के सुयोग्य व्यक्तियों को सौंप दी और यह दर्शाया कि हर नायक को एक-न-एक दिन राजपाट को तिलांजलि देनी होती है.

श्री देवदत्त पटनायक का यह आलेख अंग्रेजी अखबार कॉरपोरेट डॉज़ियर ईटी में 21 मार्च, 2008 को प्रकाशित हो चुका है. उनकी अनुमति से मैं इसका हिंदी अनुवाद करके यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ. यदि आप मूल अंग्रेजी आलेख पढना चाहें तो यहाँ क्लिक करें.

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मैं कोई सांख्यिकीय नहीं हूं!

श्री देवदत्त पटनायक का यह आलेख अंग्रेजी अखबार कॉरपोरेट डॉज़ियर ईटी में 4 फरवरी,  2011 को प्रकाशित हो चुका है. उनकी अनुमति से मैं इसका हिंदी अनुवाद करके यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ. यदि आप मूल अंग्रेजी आलेख पढना चाहें तो यहाँ क्लिक करें.

समुद्र के आर-पार एक विराट पुल बनाने के कार्य का प्रारंभ हुआ. इस पुल के द्वारा श्रीराम की सेना ने लंकानगरी जाकर युद्धोपरांत माता सीता को सकुशल लेकर आने की ठानी थी. श्रीराम की सेना अद्भुत थी – यह मुख्यतः वानरों और अन्य पशुओं की सेना थी. गिद्धराज ने लंकानगरी की दिशा बताई थी. भालुओं ने वास्तुकार की भूमिका का निर्वहन किया. वानरों ने श्रमिकों के रूप में निर्माणकार्य में योगदान दिया. उन्होंने बड़े-बड़े पत्थर उठाकर समुद्र में फेंके – यह बड़ा विकट काम था. कार्य को योजनाबद्ध रूप से कुशलतापूर्वक संपादित करने के लिए वानर समूह अपने स्वाभाविक करतबों और शोरगुल के साथ भिड़े हुए थे तभी एक नन्ही गिलहरी भी एक कंकड़ उठाये चली आई. इस छोटे प्राणी के मन में भी विराट प्रयोजन की सफलता के लिए योगदान करने का संकल्प था. उसका बेतुका प्रयास देखकर वानरों की हंसी छूट गयी. एक ने तो उसे अपने रास्ते का अवरोध जानकर परे भी धकेल दिया. लेकिन श्रीराम ने उसे देखा और वे उसके समर्पण से अभिभूत हो गए. उन्होंने उस नन्हे प्राणी को उसके अथक योगदान के लिए धन्यवाद दिया. नन्ही गिलहरी को सुखकर प्रतीति देने के लिए उन्होंने उसकी पीठ पर उंगलियाँ फेरीं. कहा जाता है कि इसी कारण से गिलहरियों की पीठ पर धारियों के चिह्न दिखते हैं जो उस छोटे से प्राणी के अंशदान के प्रति श्रीराम की कृतज्ञता अर्पित करने के द्योतक हैं.

सांख्यिकीय दृष्टि से देखें तो पुल के निर्माण में गिलहरी का योगदान नगण्य है. लेकिन हमारे लिए जो नगण्य है वह गिलहरी के लिए 100% है. क्या गिलहरी के योगदान का कोई औचित्य नहीं है? यह तो निश्चित है कि पुल के निर्माण के संबंध में इसका कोई महत्व नहीं है, लेकिन श्रीराम के लिए यह निस्संदेह महत्वपूर्ण था. उन्होंने यह देख लिया कि गिलहरी की निष्ठा का कोई सानी नहीं है. मात्रा या सामग्री के रूप में तो उसका योगदान दूसरों के योगदान के सामने कुछ भी नहीं है पर इसका भावनात्मक मूल्य औरों से बढ़कर है. यही बात मायने रखती है.

जायसवाल एक क्रेडिट कार्ड कंपनी में ग्राहक सेवा विभाग का मुखिया है. अपने लक्ष्यों की पूर्ति के लिए वह हर संभव प्रयास करता है कि उसके ग्राहक संतुष्ट और प्रसन्न रहें. जब भी उसका प्रबंध निदेशक (MD) उससे ग्राहकों की संतुष्टि के बारे में पूछता है तो जायसवाल उसे एक ग्राफ दिखता है जिसमें नियमित भुगतान करनेवाले ग्राहकों की संतुष्टि का स्तर दिखता है. फिर वह MD को एक दूसरा ग्राफ दिखाता है जिसमें ग्राहकों की इस साल की संतुष्टि की तुलना पिछले साल की संतुष्टि के स्तर से दिखाई जाती है. वह एक टेबल भी दिखाता है जिसमें आधार में बढ़ोत्तरी होने और काल सेंटर के लिए अतिरिक्त खर्च किये बिना भी संतुष्टि के स्तर में सुधार दिखता है. उसके प्रेजेंटेशन के ख़त्म होते-होते कमरे में मौजूद सभी व्यक्तियों और MD को भी यह विश्वास हो जाता है कि ग्राहक वास्तव में खुश हैं.

लेकिन इस सबसे बहुत दूर बेलगाम में जयराज बहुत परेशान है. वह कुछ महीने पहले श्री लंका की यात्रा पर गया था और कंपनी ने उसे बिना बताये उसका कार्ड डी-एक्टीवेट कर दिया. जब उसने इसका कारण पूछा तो उसे बताया गया कि ऐसा सुरक्षा कारणों से किया गया था क्योंकि श्री लंका जैसे पर्यटक स्थलों पर कार्ड से सम्बंधित बहुत धांधलेबाजी हो रहीं थीं. कंपनी ने जयराज को बताया कि उसे एक सप्ताह में नया कार्ड मिल जाएगा पर इस बात को दो महीने बीत गए थे और कोई कार्ड नहीं आया.

जयराज बार-बार कंपनी से बात करता है पर हर बार उसे रटारटाया उत्तर मिलता है. उसने ग्राहक सेवा के मुखिया को भी लिखा लेकिन उसे कोई जवाब नहीं मिला. जयराज क्रोधित है. उसे लगता है कि उसके साथ धोखा किया गया है. वह स्वयं को असहाय मानने लगा है. उसे लगता है कि किसी को भी उसकी फ़िक्र नहीं है और कंपनी के लिए वह महत्वहीन है.

कंपनी के संतुष्टि ‘पुल’ के प्रयोजन में जयराज की भूमिका नन्ही ‘गिलहरी’ की भांति हो गयी है जिसका उत्तरदायी जायसवाल है. एक अकेले जयराज के योगदान से कंपनी को बहुत फर्क नहीं पड़ता. वह सैंकड़ों-हज़ारों में से एक है. कंपनी की दृष्टि अपार सांख्यिकीय वानर समूह पर रहती है जो बड़े-बड़े पत्थर फेंककर पुल का निर्माण करते हैं और कंपनी को लक्ष्य तक पहुंचाते हैं. कंपनी की दृष्टि में जयराज के छोटे अंश का कोई मोल नहीं है. उलटे, कंपनीवाले तो उसकी बार-बार की शिकायतों से त्रस्त हो चुके हैं. यह आधुनिक प्रबंधन की त्रासदी है कि इसने यह धारणा बना ली है कि सभी लोगों को खुश नहीं किया जा सकता. इसमें यह शिक्षा दी जाती है कि ‘राम कैसे नहीं बनें’: यह 100 % की चिंता नहीं करती. इसके लिए 80% का महत्व है और बचे हुए 20% के बारे में यह कुछ नहीं सोचती.

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नेत्रहीनों की संतानें

श्री देवदत्त पटनायक का यह आलेख अंग्रेजी अखबार कॉरपोरेट डॉज़ियर ईटी में 5 नवम्बर,  2010 को प्रकाशित हो चुका है. उनकी अनुमति से मैं इसका हिंदी अनुवाद करके यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ. यदि आप मूल अंग्रेजी आलेख पढना चाहें तो यहाँ क्लिक करें.

महाभारत में ज्येष्ठ कौरव दुर्योधन खलनायक है. उसकी ईर्ष्या के परिणामस्वरूप वह महायुद्ध हुआ जिसमें लाखों लोग मारे गए. दुर्योधन को अपने चचेरे भाई पांडवों से डाह है. वह उनकी सफलता नहीं सह पाता. पांडवों का विनाश ही उसके जीवन का लक्ष्य है. उन्हें मारने के लिए उसने एकाधिक षडयंत्र किये. शांति बनाए रखने के लिए उसने पांडवों को सुई की नोक के बराबर धरती देने से भी मना कर दिया. पांडवों का विनाश करने के लिए उसने न केवल अपना सुख-चैन खोया बल्कि अपने राज्य और नागरिकों के जीवन को भी छिन्न-भिन्न कर दिया. उसके भीतर घनघोर घृणा है. इतनी घृणा उसके ह्रदय में कहाँ से आई?

कोई व्यक्ति दुर्योधन कैसे बन जाता है. उसके भीतर इतनी कड़वाहट और इतना क्रोध है कि उसे अपने समीप बिखरी खुशियाँ (अच्छे माता-पिता, पत्नियाँ, मित्र, सत्ता) नहीं दिखती और उसकी आँख पांडवों के हितों पर गड़ी रहती है. उनसे तुलना करते-करते वह स्वयं को हीन अनुभव करने लगता है. उसका पूरा जीवन पांडवों से अपनी तुलना करने में बीतता है और इसके फलस्वरूप वह स्वयं को दुखी, और दुखी करता जाता है.

महाभारत के लेखक महर्षि वेद व्यास ने स्पष्ट रूप से तो नहीं पर ग्रन्थ में कई स्थानों पर दुर्योधन के रुग्णचित्त होने के कारण गिनाये हैं. दुर्योधन के पिता राजा धृतराष्ट्र नेत्रहीन हैं. उसकी माता गांधारी ने भी अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली है. पिता पुत्र को देख नहीं सकता, और माता पुत्र को देखना नहीं चाहती, कारण चाहे जो हो. इन परिस्तिथियों में दुर्योधन अपने माता-पिता की देखरेख के बिना बड़ा होता है. उसके माता-पिता यह देख ही नहीं पाते कि उसके भीतर कैसी विषमताएं घर कर रहीं हैं. वे यह देख ही नहीं पाते कि क्रोध उसे भीतर-ही-भीतर लील रहा है. इसलिए कोई उसे सुधारने का जतन भी नहीं करता. वह चापलूसों और ईर्ष्यालुओं की संगति में बिगड़ता जाता है. उसका समग्र व्यक्तित्व खंडित हो जाता है जिसके परिणाम भयावह होते हैं.

संस्थाओं में भी बहुतेरे दुर्योधन होते हैं. वे ऐसे कर्मचारी होते हैं जिनके भीतर हीन भावनाएं और क्रोध पनपता रहता है, जिसका निर्णय लेने की काबिलियत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. अपने संस्थागत उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रयास करने के बजाय पर वे उस समय अपने व्यक्तित्व को थोपने लगते हैं जब कोई महत्वपूर्ण निर्णय लिया जाना होता है. उदाहरण के लिए, वे बड़े केबिन, बड़े पैकेज, या बड़ी टीम के लिए आपस में लड़ते हैं, बिजनेस को बड़ा करने के लिए नहीं. उनकी आँखें ग्राहक को नहीं बल्कि खुद को ही देखती रहतीं हैं. वे हर समय दूसरों का ध्यान खींचना चाहते हैं. उन्हें सब कुछ प्रबंधन से मिलता है पर प्रबंधन या तो उन्हें देख नहीं सकता या उन्हें देखना नहीं चाहता. कर्मचारी भी या तो प्रबंधन को देख नहीं पाते या उसे देखना नहीं चाहते.

ऐसी ही एक कंपनी में रमेश दुर्योधन की भांति है. वह मानता है कि वह उसकी कंपनी का सबसे अच्छा सेल्स मैनेजर है. उसने गुण और मात्रा की दृष्टि से कंपनी के किसी भी दूसरे सेल्स मैनेजर से बेहतर काम किया है. लेकिन रमेश को यह लगता है कि उसका प्रबंध निदेशक (Managing Director or MD) उसे देखता भी नहीं. MD सारे सेल्स मैनेजरों से एक समान बर्ताव करता है और सभी को समान बोनस और सुविधाएँ देता है. MD का कोई चहेता सेल्स मैनेजर नहीं है. रमेश चाहता है कि उसकी ओर ध्यान दिया जाए. वह चाहता है कि उसकी सराहना हो और उसे ख़ास माना जाए. लेकिन MD को तो रमेश की इन भावनाओं का पता भी नहीं है. वह तो सिर्फ यह चाहता है कि उसकी टीम के सभी सदस्य प्रोफेशनल रवैये से अपना-अपना काम करें. रमेश की भावनात्मक ज़रूरतों को या तो वह देख नहीं पाता या उन्हें नज़रंदाज़ कर देता है. अपने इस अति-प्रोफेशनल रवैये के कारण वह गांधारी बन जाता है. कुछ लोग यह भी कह सकते हैं कि वह धृतराष्ट्र है और अपनी टीम सदस्यों के प्रति संवेदनशून्य है. इस सबका परिणाम यह होता है कि रमेश और उसकी टीम के अन्य सेल्स मैनेजर स्वयं को नेत्रहीन माता-पिता की संतानें समझने लगते हैं. अपनी ओर सबका ध्यान खींचने की उनकी इच्छाएं कई रूपों में लक्षित होने लगतीं हैं – वे बोर्डरूम में लड़ते हैं, टीमवर्क से काम नहीं करते, MD से और अधिक समय मांगते हैं (जो वह देता नहीं है), बिजनेस नीतियों को दरकिनार कर अपने लिए अधिक वेतन, कमीशन, और सुविधाएँ मांगते हैं (जिनके मिलने की कोई उम्मीद नहीं होती).

कंपनी को रमेश के भीतर पनपती विषमताओं और क्रोध का खामियाजा भरना पड़ता है. सभी यह आश्चर्य करते हैं कि रमेश भी औरों की तरह प्रोफेशनली अपना काम पूरा करके शांति से घर क्यों नहीं जाता. वे यह भूल जाते हैं कि रमेश कोई मशीन नहीं है. उसकी भी कुछ भावनात्मक ज़रूरतें हैं. वह चाहता है कि उसके काम को सराहकर उसे महत्वपूर्ण समझा जाए. रमेश की इस सोच को अतार्किक और फ़िज़ूल की कह सकते हैं पर यह सोच उसके भीतर गहरी पैठ बना चुकी है. हम हमेशा ही यह उम्मीद करते हैं कि दफ्तर में घुसते समय कर्मचारियों को अपनी भावनाएं बाहर छोड़ देनी चाहिए पर वास्तविकता में ऐसा नहीं होता. संस्थाएं और कम्पनियाँ अपने कर्मचारियों को पहिये के दांत सदृश मान सकती हैं पर यह मैकियावेली मानसिकता तर्कसंगत और व्यावहारिक नहीं है. हर मनुष्य को दुलार और सराहना की ज़रुरत होती है भले ही यह कितनी ही बचकानी बात क्यों न लगे.

हर कंपनी में MD को ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की ज़रुरत है. महाभारत के विनाशकारी युद्ध के लिए केवल दुर्योधन ही नहीं बल्कि धृतराष्ट्र और गांधारी भी समान रूप से उत्तरदायी हैं.

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