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Posts tagged ‘न्याय’

खोटा सिक्का


यह एक सूफी कथा है. किसी गाँव में एक बहुत सरल स्वभाव का आदमी रहता था. वह लोगों को छोटी-मोटी चीज़ें बेचता था. उस गाँव के सभी निवासी यह समझते थे कि उसमें निर्णय करने, परखने और आंकने की क्षमता नहीं थी. इसीलिए बहुत से लोग उससे चीज़ें खरीदकर उसे खोटे सिक्के दे दिया करते थे. वह उन सिक्कों को ख़ुशी-ख़ुशी ले लेता था. किसी ने उसे कभी भी यह कहते नहीं सुना कि ‘यह सही है और यह गलत है’. कभी-कभी तो उससे सामान लेनेवाले लोग उसे कह देते थे कि उन्होंने दाम चुका दिया है, और वह उनसे पलटकर कभी नहीं कहता था कि ‘नहीं, तुमने पैसे नहीं दिए हैं’. वह सिर्फ इतना ही कहता ‘ठीक है’, और उन्हें धन्यवाद देता.

दूसरे गाँवों से भी लोग आते और बिना कुछ दाम चुकाए उससे सामान ले जाते या उसे खोटे पैसे दे देते. वह किसी से कोई शिकायत नहीं करता.

समय गुज़रते वह आदमी बूढ़ा हो गया और एक दिन उसकी मौत की घड़ी भी आ गयी. कहते हैं कि मरते हुए ये उसके अंतिम शब्द थे: – “मेरे खुदा, मैंने हमेशा ही सब तरह के सिक्के लिए, खोटे सिक्के भी लिए. मैं भी एक खोटा सिक्का ही हूँ, मुझे मत परखना. मैंने तुम्हारे लोगों का फैसला नहीं किया, तुम भी मेरा फैसला मत करना.”

ऐसे आदमी को खुदा कैसे परखता?

श्रीराम के दरबार में कुत्ता


एक दिन एक कुत्ता श्रीराम के दरबार में आया और उसने प्रभु से शिकायत की – “राजन, कितने दुख की बात है कि जिस राज्य की कीर्ति चहुंओर रामराज्य के रूप में फैली हुई है वहीं लोग हिंसा और अन्याय का सहारा लेते हैं. मैं आपके महल के पास ही एक गली में लेटा हुआ था जब एक साधू आया और उसने मुझे पत्थर मारकर घायल कर दिया. देखिए मेरे सिर पर लगे घाव से अभी भी रक्त बह रहा है. वह साधू अभी भी गली में ही होगा. कृपया मेरे साथ न्याय कीजिए और अन्यायी को उसके दुष्कर्म का दंड दीजिए.”

श्रीराम के आदेश पर साधु को दरबार में लिवा लाया गया. साधू ने कहा – “यह कुत्ता गली में पूरा मार्ग रोककर लेटा हुआ था. मैंने इसे उठाने के लिए आवाज़ें दीं और ताली बजाई लेकिन यह नहीं उठा. मुझे गली के पार जाना था इसलिए मैंने इसे एक पत्थर मारकर भगा दिया.”

श्रीराम ने साधु से कहा – “एक साधू होने के नाते तो तुम्हें किंचित भी हिंसा नहीं करनी चाहिए थी. तुमने गंभीर अपराध किया है और इसके लिए दंड के भागी हो.” श्रीराम ने साधू को दंड देने के विषय पर दरबारियों से चर्चा की. दरबारियों ने एकमत होकर निर्णय लिया – “चूंकि इस बुद्धिमान कुत्ते ने यह वाद प्रस्तुत किया है अतएव दंड के विषय पर भी इसका मत ले लिया जाए.”

कुत्ते ने कहा – “राजन, इस नगरी से पचास योजन दूर एक अत्यंत समृद्ध और संपन्न मठ है जिसके महंत की दो वर्ष पूर्व मृत्यु हो चुकी है. कृपया इस साधू को उस मठ का महंत नियुक्त कर दें.”

श्रीराम और सभी दरबारियों को ऐसा विचित्र दंड सुनकर बड़ी हैरानी हुई. उन्होंने कुत्ते से ऐसा दंड सुनाने का कारण पूछा.

कुत्ते ने कहा – “मैं ही दो वर्ष पूर्व उस मठ का महंत था. ऐसा कोई सुख, प्रमाद, या दुर्गुण नहीं है जो मैंने वहां रहते हुए नहीं भोगा हो. इसी कारण इस जन्म में मैं कुत्ता बनकर पैदा हुआ हूं. अब शायद आप मेरे दंड का भेद जान गए होंगे.”

(A motivational / inspirational story about a dog in the court of Lord Rama – in Hindi)

नकली ख़लीफा का न्याय


Harun Al-Rashidबग़दाद के ख़लीफा हारून-अल-रशीद अपनी न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्द थे. दूर-दूर के देशों तक उनकी ख्याति थी. वे रात को वेश बदलकर नगर में घूमते थे ताकि जनता के दुःख-दर्द का पता लगा सकें.

उसी नगर में अली ख्वाज़ा नाम का एक व्यापारी रहता था. उसने हज यात्रा पर जाने का निश्चय किया तो अपना सारा सामान बेच दिया. यात्रा का खर्चा निकालने के बाद उसके पास एक हज़ार अशर्फियाँ बच गईं. उसने उन्हें एक घड़े में रखकर ऊपर से जैतून के फल रख दिए और उसे बंद करके नगर के एक परिचित व्यापारी के घर बतौर अमानत रख दिया.

सात साल बाद अली जब हज यात्रा से लौटा तो उसने व्यापारी के घर से अपना घड़ा वापस ले लिया. घर जाकर घड़ा खोला तो उसमें एक भी अशर्फी नहीं मिली. व्यापारी तो साफ मुकर गया और उसने बदले में अली को खूब खरी-खोटी भी सुनाई.

अली ने ख़लीफा के दरबार में न्याय की फ़रियाद की. ख़लीफा के पूछने पर व्यापारी ने तो साफ़ मना कर दिया कि उसने  मर्तबान से अशर्फियाँ निकाली हैं. कोई सबूत नहीं होने पर मामले का हल नहीं निकला और सारे बग़दाद में इस मुक़दमे की चर्चा होने लगी.

ऐसे में एक दिन ख़लीफा वेश बदलकर रात में घूम रहे थे. उन्होंने कुछ बच्चों को इसी मुक़दमे का नाटक करते देखा. उनमें से एक ख़लीफा बना था, एक अली और एक व्यापारी बना था. बालक नकली ख़लीफा के हुक्म पर व्यापारी को बुलाया गया. बालक व्यापारी से पूछा गया कि मर्तबान के जैतून कितने पुराने हैं. बालक व्यापारी ने सूंघकर बताया कि “ज्यादा-से-ज्यादा एक साल पुराने हैं”. बालक ख़लीफा ने कहा – “अली तो सात साल पहले हज पर गया था. इसका मतलब ये है कि तुमने मर्तबान की अशर्फियाँ निकलकर उसमें ताजे जैतून भर दिए!”

यह सुनकर ख़लीफा हारून-अल-रशीद की आँखें खुल गईं. उन्होंने मर्तबान के जैतूनों की जांच कराई तो वे वाकई ताजे निकले.  इस प्रकार अली ख्वाज़ा को न्याय मिल गया. नकली ख़लीफा बालक आगे जाकर बड़ा न्यायाधिकारी बना.

‘सर्वोत्तम’ (हिंदी रीडर्स डाइजेस्ट) के बहुत पुराने अंक से साभार. ये किस्सा ‘अरेबियन नाइट्स’ किताब में भी है.

(A story/anecdote of Caliph Harun-Al-Rashid – Hindi)

लाओ-त्ज़ु का न्याय


lao-tzu and confuciusअपनी बुद्धिमत्ता के कारण लाओ-त्ज़ु बहुत प्रसिद्द हो गया था और निस्संदेह वह सबसे बुद्धिमान व्यक्ति था. चीन के राजा ने लाओ-त्ज़ु से अपने न्यायालय का प्रधान न्यायाधीश बनने का अनुरोध किया और कहा – “सम्पूर्ण विश्व में आप जितना बुद्धिमान और न्यायप्रिय कोई नहीं है. आप न्यायाधीश बन जायेंगे तो मेरा राज्य आदर्श राज्य बन जायेगा”.

लाओ-त्ज़ु ने राजा को समझाने का बहुत प्रयास किया कि वे उस पद के लिए उपयुक्त नहीं हैं लेकिन राजा नहीं माना. लाओ-त्ज़ु ने कहा – “आप मेरी बात नहीं मान रहे हैं लेकिन मुझे न्यायालय में एक दिन कार्य करते देखकर आपको अपना विचार बदलना पड़ेगा. आप मान जायेंगे कि मैं इस पद के लिए उपयुक्त नहीं हूँ. वास्तव में सम्पूर्ण व्यवस्था में ही दोष है. आपके प्रति आदरभाव रखे हुए ही मैंने आपसे सत्य नहीं कहा है. अब या तो मैं न्यायाधीश बना रहूंगा या आपके राज्य की कानून-व्यवस्था बनी रहेगी. देखें, अब क्या होता है”.

पहले ही दिन न्यायालय में एक चोर को लाया गया जिसने राज्य के सबसे धनी व्यक्ति का लगभग आधा धन चुरा लिया था. लाओ-त्ज़ु ने मामले को अच्छे से सुना और अपना निर्णय सुनाया – “चोर और धनी व्यक्ति, दोनों को छः महीने का कारावास दिया जाए”.

धनी ने कहा – “आप यह क्या कर रहे हैं? चोरी मेरे घर में हुई है! मेरा धन चुरा लिया गया है! फिर भी आप मुझे जेल भेजने का निर्णय कर रहे हैं!? यह कैसा न्याय है?”

लाओ-त्ज़ु ने कहा – “मुझे तो लगता है कि मैंने चोर के प्रति न्याय नहीं किया है. तुम्हें वास्तव में अधिक लम्बा कारावास देने की आवश्यकता है क्योंकि तुमने आवश्यकता से अधिक धन जमा करके बहुत से लोगों को धन से वंचित कर दिया है! सैकड़ों-हजारों लोग भूखे मर रहे हैं लेकिन तुम्हारी धनसंग्रह करने की लालसा कम नहीं होती! तुम्हारे लालच के कारण ही ऐसे चोर पैदा हो रहे हैं. अपने घर में होनेवाली चोरी के लिए तुम ही जिम्मेदार हो. तुम अधिक बड़े अपराधी हो”.

कहना न होगा कि राजा ने लाओ-त्ज़ु को अपने पद से उसी दिन मुक्त कर दिया.

चित्र साभार – फ्लिकर

(Lao-tzu is made a judge – a motivational / inspirational anecdote in Hindi)

Imprisoning The Buddha – बुद्ध-प्रतिमा को बंदी बनाना


buddha in jailएक व्यापारी कपड़े के 50 थान लेकर दूसरे नगर में बेचने जा रहा था। मार्ग में एक स्थान पर वह सुस्ताने के लिए एक पेड़ के नीचे बैठ गया। वहीं पेड़ की छांव में भगवान बुद्ध की एक प्रतिमा भी लगी हुई थी। व्यापारी को बैठे-बैठे नींद लग गयी। कुछ समय बाद जागने पर उसने पाया कि उसके थान चोरी हो गए थे। उसने फ़ौरन पुलिस में जाकर रिपोर्ट लिखवाई।

मामला ओ-ओका नामक न्यायाधीश की अदालत में गया। ओ-ओका ने निष्कर्ष निकाला – ”पेड़ की छाँव में लगी बुद्ध की प्रतिमा ने ही चोरी की है। उसका कार्य वहाँ पर लोगों का ध्यान रखना है, लेकिन उसने अपने कर्तव्य-पालन में लापरवाही की है। प्रतिमा को बंदी बना लिया जाए।”

पुलिस ने बुद्ध की प्रतिमा को बंदी बना लिया और उसे अदालत में ले आए। पीछे-पीछे उत्सुक लोगों की भीड़ भी अदालत में आ पंहुची। सभी जानना चाहते थे कि न्यायाधीश कैसा निर्णय सुनायेंगे।

जब ओ-ओका अपनी कुर्सी पर आकर बैठे तब अदालत परिसर में कोलाहल हो रहा था। ओ-ओका नाराज़ हो गए और बोले – “इस प्रकार अदालत में हँसना और शोरगुल करना अदालत का अनादर है। सभी को इसके लिए दंड दिया जाएगा।”

लोग माफी मांगने लगे। ओ-ओका ने कहा – “मैं आप सभी पर जुर्माना लगाता हूँ, लेकिन यह जुर्माना वापस कर दिया जाएगा यदि यहाँ उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति कल अपने घर से कपड़े का एक थान ले कर आए। जो व्यक्ति कपड़े का थान लेकर नहीं आएगा उसे जेल भेज दिया जाएगा।”

अगले दिन सभी लोग कपड़े का एक-एक थान ले आए। उनमें से एक थान व्यापारी ने पहचान लिया और इस प्रकार चोर पकड़ा गया। लोगों को उनके थान लौटा दिए गए और बुद्ध की प्रतिमा को रिहा कर दिया गया।

चित्र साभार – फ्लिकर

(Imprisoning a statue of Lord Buddha – A story in Hindi)

A short Buddhist story portrays the spontaneous intelligence of a judge.

Once a merchant bearing about fifty rolls of cotton goods on his shoulder, out of fatigue, rested under the shade of a large stone Buddha. Since it was a hot day, the merchant instantly fell asleep. On waking up, he found that his goods were robbed.

He immediately took it to the notice of the police. Soon a judge named O-oka arrived to hear the case. The stone Buddha must have robbed the goods,” said the judge

“He is supposed to be responsible for the welfare of the people, but has failed to do His duty. So arrest Him!” ordered the judge.

So the Buddha was carried to the court, followed by a curious crowd to watch the arrest of the stone Buddha.

The judge flew into a rage on seeing the gathering laughing and joking about the strange judgement.

“Why are you laughing and joking? By doing so you have earned the contempt of the court. I strongly condemn it. All of you are under arrest and are liable to pay a fine!”

The gathered people took no time to apologise. The judge said, “I will remit the amount provided you each bring a roll of cotton within three days. If you fail you will be arrested!”

The merchant easily recognized his cotton roll among the gathered rolls and the thief was identified. The merchant got back his stolen goods and the cotton rolls were given back to the people.

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