बच्चों को जिम्मेदार व स्वावलंबी बनाने के लिए ज़रूरी 10 बातें

Father and son @ wassenaarse slag.

हम अपने बच्चों को सारी खुशियां देना चाहते हैं क्योंकि हममें से बहुतों ने बहुत सादा बचपन बिताया. हमारे पैरेंट्स के पास विकल्प सीमित थे इसलिए हम अपने बच्चों को उन चीजों से वंचित नहीं रखना चाहते जो हमें उपलब्ध नहीं थीं. लेकिन हममें से कई पैरेंट्स अपने बच्चों के प्रति इतना अधिक स्नेह रखते हैं कि वे बच्चों में घर कर रही बुरी आदतों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं और उन्हें स्वावलंबी नहीं बनाते. यदि आप ऐसे माता-पिता हैं तो बहुत जल्द ही चीजें आपके नियंत्रण से बाहर हो जाएंगी. निस्संदेह आप अपने बच्चों से बहुत प्रेम करते हैं लेकिन उनके बेहतर भविष्य के लिए यह ज़रूरी है कि नीचे दिए गए बिंदुओं पर विचार करेः

1. बच्चों की परवरिश राजाओं की भांति न करें – यह ज़रूरी है कि आप बच्चों को समय-समय पर यह अहसास होने दें कि वे महत्वपूर्ण हैं लेकिन उन्हें अपने नियंत्रण से मुक्त कर देने के परिणाम प्रतिकूल हो सकते हैं. बच्चों पर आपके नियंत्रण का अर्थ यह है कि आप उनके लिए सीमाओं का निर्धारण करें. उन्हें यह समझाएं कि उन्हें किन हदों को कभी पार नहीं करना है. इसके लिए यह ज़रूरी है कि आप उन्हें कुछ जिम्मेदारियां सौंपें और पैरेंट्स होने के नाते उनका मार्गदर्शन करें.

2. बच्चों को रूपए-पैसे का महत्व बताएं – आजकल अधिकांश घरों में माता-पिता कामकाजी होते हैं इसलिए वे बच्चों को पर्याप्त समय न दे पाने के कारण उन्हें सुख-सुविधा और पॉकेट मनी देकर अपने अपराध बोध को कम करते रहते हैं. ऐसा करते समय वे यह भूल जाते हैं कि पैसा एक साधन मात्र है और इसे साध्य नहीं बनना चाहिए. यदि आप स्वयं पर इस नीति का पालन करेंगे तो आपके बच्चे भी इसका महत्व समझेंगे. हम उस कालखंड में जी रहे हैं जब सब कुछ एक क्लिक पर सर्वसुलभ है. ऐसे में अपने बच्चों को छोटी उम्र से ही रूपए-पैसे देना, उनके लिए महंगी ज्वेलरी, मोबाइल, गेमिंग पैड आदि खरीदना उन्हें सुविधाभोगी बना देगा और ऐसे बच्चों में किसी भी चीज के प्रति कृतज्ञ होने का भाव नहीं पनपेगा.

3. बच्चों को खुद से काम करने के लिए प्रोत्साहित करें – जीवन में आगे बढ़ते रहने के लिए स्वयं कार्य करना बहुत ज़रूरी है. हर जिम्मेदार व्यक्ति को वयस्क होने पर स्वावलंबी बनना पड़ता है, अपने लिए उपयुक्त काम खोजना पड़ता है. अपने बच्चों को यह बात बताकर आप उन्हें उनके भावी जीवन की सफलता में सहायक हो सकते हैं. हो सकता है कि आप उन्हें किसी भी ऐसे काम से बचाना चाहते हों जो कठिन हो या जिसमें बहुत परिश्रम लगता हो लेकिन उन्हें कोई भी काम न सौंपकर आप उन्हें निठल्ला व आलसी ही बना देंगे. यदि आपके बच्चे खुद से उठकर पानी भी नहीं लेते हों तो आपको सावधान हो जाना चाहिए. ऐसा होने पर उन्हें किशोरावस्था में बाहरी दुनिया में एडजस्ट होने में बड़ी कठिनाई जाएगी. उन्हें इस बात का अहसास होने दीजिए कि अपने जूते पहनने से लेकर बगीचे में पानी डालने के काम में किसी भी तरह से संकोच करने से कोई लाभ नहीं होगा. अपना काम खुद करने की आदत विकसित करने से वे भावी जीवन में बड़ी जिम्मेदारियों को कुशलतापूर्वक अकेले ही निभाने की हिम्मत जुटा पाएंगे.

4. बच्चों को “थैंक यू” कहना व आभारी होना सिखाएं – हो सकता है आप अपने बच्चों को इस प्रकार पाल रहे हों कि वे सब कुछ डिज़र्व करते हैं और किसी के प्रति ऋणी न बनें लेकिन यह भावना आपके बच्चों में ओछापन भर देगी. किसी को “थैंक यू” कहना या किसी के काम के प्रति आभारी होने की बात कहने से बच्चे यह जान पाते हैं कि उनके लिए किए जा रहे काम कितने महत्वपूर्ण हैं.

5. अपने बच्चों के सामने बचपना न दिखाएं – पैरेंट्स होने के नाते हमें बच्चों के सामने आदर्श स्थापित करना चाहिए. हमारे बच्चों को यह दिखना चाहिए कि हम जिम्मेदार, दृढ़-प्रतिज्ञ व खरे हैं. यदि हम ही अपने बच्चों के सामने गैरजिम्मेदार बर्ताव करेंगे तो वे हमसे क्या सीखेंगे?  कुछ पैरेंट्स अपने बच्चों से हमेशा खीझभरा व्यवहार करते हैं या हमेशा उनकी शिकायतें करते रहते हैं. हमारे बच्चों के सबसे बड़े शिक्षक हम ही हैं और हमारी पर्सनालिटी के निगेटिव लक्षणों को वे सहजता से अपने जीवन में उतार लेंगे.

6. बच्चों को उनकी सीमाओं का बोध कराएं – बच्चे स्वभाव से शरारती और सिरचढ़े हो सकते हैं लेकिन पैरेंट्स होने के नाते यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम उन्हें संयत व्यवहार करना सिखाएं. हमें उनमें ऐसे गुणों को विकसित करने का प्रयास करना चाहिए जिनसे वे सबके प्रिय बनें. इसके लिए यह ज़रूरी है कि उन्हें बताया जाए कि उनकी किन बातों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. बच्चों के नखरों व ज़िद के आगे हार मान लेने पर वे उच्छृंखल और बदतमीज़ बन जाएंगे.

7. बच्चों को हमेशा उनकी मनमानी न करने दें – जागरूक पैरेंट्स के लिए यह जानना ज़रूरी है कि वे अपने बच्चों को क्या करने या नहीं करने की इज़ाज़त दें. बच्चे को उसकी फरमाइश पर एक चॉकलेट या पर्सनल टैब्लेट दिला देना एक ही बात नहीं है. आप बच्चे की ज़रूरत का आकलन करके स्वयं यह तय करें कि उसके लिए क्या अनिवार्य है और क्या गैरज़रूरी है.

8. बच्चों को गलत बातों के लिए गिफ्ट नहीं दें – यदि आपका बच्चा पुराने खिलौने से ऊबकर तुनकमिजाजी या चिड़चिड़ा व्यवहार कर रहा हो तो उसे शांत करने के लिए नया खिलौना दिला देना गलत नीति है. बच्चों को कोई भी गिफ्ट या नया खिलौना दिलाते समय उन्हें यह अहसास होने दें कि वे उसे डिज़र्व करते हैं और उनकी अच्छाइयों के लिए उन्हें रिवार्ड दिया जाता है. ऐसा होने पर वे उत्तरदायी बनेंगे और अपने सामान व खिलौनों को एहतियात से रखेंगे और उनकी कीमत समझेंगे.

9. बच्चों को सुसंगति के अवसर प्रदान करना – कोई पैरेंट्स नहीं चाहता कि उनके बच्चे बिगड़ैल बच्चों के साथ दोस्ती करें लेकिन बहुत कम पैरेंट्स अपने बच्चों को बुजुर्गों के साथ समय बिताने की सलाह देते हैं. अपने दादा-दादी, नाना-नानी या परिवार के अन्य बुजुर्ग व्यक्तियों के पास जीवनानुभवों का खजाना होता है जिससे आनेवाली पीढ़ियां वंचित होती जाएंगी. आप अपने बच्चों को कभी-कभार ही सही लेकिन बुजुर्गों के साथ हिलने-मिलने का मौका दें, अपने घर में उन लोगों को बुलाएं जो सामुदायिक सेवा आदि से जुड़े हों और वॉलंटियर का काम करते हों. बच्चों के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि लोगों के साथ उनके संबंध स्वस्थ हों और बुराई की ओर खींचनेवाली संगति से वे दूर रहें.

10. अपने बच्चों की गलतियों पर उनका पक्ष नहीं लें – आपका बच्चा उसके द्वारा किए जानेवाले हर सही-गलत काम के लिए जवाबदेह होना चाहिए. यदि उसने कोई गलती की है तो आप उसका पक्ष नहीं लें. बच्चों को उनकी गलतियों से सबक लेने दें और उन्हें मामूली सज़ा देने से पीछे नहीं हटें. यदि आप हर समय अपने बच्चे का ही पक्ष लेंगे तो वे अपनी गलतियों से कोई सीख नहीं लेंगे और सुधरने की बजाए बिगड़ते जाएंगे.

यह लेख इस लेख का संपादित अनुवाद है.

प्यारे कनाडावासी दंपत्ति का बड़ा दान

canadian lottrey winner coupleदो-तीन दिन पहले मुझे याहू न्यूज़ की साईट पर यह खबर पढ़ने को मिली तो मुझे लगा कि इसे यहाँ पोस्ट किया जा सकता है.

सेवानिवृत्त कनाडियन दंपत्ति ने लौटरी में जीते हुए 11,255,272/- कनाडियन डॉलर (लगभग 50 करोड़ रुपये) की रकम दान में दे दी है.

“जो हमारे पास पहले ही नहीं था उसकी कमी क्या महसूस करना?” – 78 वर्षीय वायलेट लार्ज ने एक स्थानीय रिपोर्टर से कहा.

जुलाई में जब दंपत्ति को लौटरी जीतने का समाचार मिला उस समय वायलेट कैंसर के उपचार के लिए कीमोथैरेपी ले रहीं थीं.

“हमारे पास एक-दूसरे का साथ है. यह पैसा हमारे लिए कुछ नहीं है.” – वायलेट के पति ऐलन ने भावुक होकर कहा.

“यह पैसा अपने साथ बहुत बड़ा सरदर्द लेकर आया. हमें हर समय यही लगता रहा कि बुरे लोग कहीं इसके लालच में हमें नुकसान न पहुंचा दें. हमें लौटरी मिलने की खबर सुनते ही अचानक से ही बहुत से ज़रूरतमंद लोग न जाने कहाँ से प्रकट हो गए. इसलिए हमने जल्द-से-जल्द इस रकम को ठिकाने लगाने के लिए सोचना शुरू कर दिया.”

उन्होंने पहले पारिवारिक ज़रूरतों के लिए दो प्रतिशत रकम अलग कर दी, फिर दान के लिए दो पन्नों में संस्थाओं को छांटा जिनमें लोकल अग्निशमन दल, चर्च, कब्रिस्तान, रैड क्रॉस, साल्वेशन आर्मी, और उन अस्पतालों के नाम थे जहाँ वायलेट का उपचार हो रहा था. कैंसर, अल्जीमर्स, और डायबिटीज़ से सम्बद्ध संस्थाओं के नाम भी शामिल किये गए. लिस्ट बड़ी होती गयी.

“हमें यह देखकर अच्छा लगा कि पैसा इतने सारे अच्छे कामों में लग गया” – वायलेट ने कहा.

नोवा स्कॉटिया दंपत्ति पिछले पैंतीस सालों से एक-दूसरे के प्रति समर्पित हैं. ऐलेन ने वेल्डर के काम से और वायलेट ने स्टोर में नौकरी करके बुढ़ापे के लिए शांतिपूर्वक संतोषजनक धन जुटा लिया था.

“हमने अपने ऊपर एक पैसा भी खर्च नहीं किया क्योंकि हम पूरे समय ज़रूरी कामों में लगे रहे और ऐसी अस्वस्थता में कुछ करने के लिए मुझे बहुत ताकत जुटानी पड़ेगी. हम लोग पर्यटन नहीं कर सकते. इस देहात में ही हमें अच्छा लगता है. पैसे से कोई स्वास्थ्य और खुशियाँ तो नहीं खरीद सकता” – वायलेट ने कहा.

अब पूरे गाँव में उनकी बातें होती रहती हैं. – “उन्हें बेहतर जाननेवाले लोग यह जानते हैं कि उनके लिए एक-दूसरे का साथ सबसे बड़ी चीज़ है” – स्थानीय रेस्तरां मालिक ने पत्रकार को बताया.

खबर की लिंक यह है.

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लाओ-त्ज़ु का न्याय

laotzu and confuciusअपनी बुद्धिमत्ता के कारण लाओ-त्ज़ु बहुत प्रसिद्द हो गया था और निस्संदेह वह सबसे बुद्धिमान व्यक्ति था. चीन के राजा ने लाओ-त्ज़ु से अपने न्यायालय का प्रधान न्यायाधीश बनने का अनुरोध किया और कहा – “सम्पूर्ण विश्व में आप जितना बुद्धिमान और न्यायप्रिय कोई नहीं है. आप न्यायाधीश बन जायेंगे तो मेरा राज्य आदर्श राज्य बन जायेगा”.

लाओ-त्ज़ु ने राजा को समझाने का बहुत प्रयास किया कि वे उस पद के लिए उपयुक्त नहीं हैं लेकिन राजा नहीं माना. लाओ-त्ज़ु ने कहा – “आप मेरी बात नहीं मान रहे हैं लेकिन मुझे न्यायालय में एक दिन कार्य करते देखकर आपको अपना विचार बदलना पड़ेगा. आप मान जायेंगे कि मैं इस पद के लिए उपयुक्त नहीं हूँ. वास्तव में सम्पूर्ण व्यवस्था में ही दोष है. आपके प्रति आदरभाव रखे हुए ही मैंने आपसे सत्य नहीं कहा है. अब या तो मैं न्यायाधीश बना रहूंगा या आपके राज्य की कानून-व्यवस्था बनी रहेगी. देखें, अब क्या होता है”.

पहले ही दिन न्यायालय में एक चोर को लाया गया जिसने राज्य के सबसे धनी व्यक्ति का लगभग आधा धन चुरा लिया था. लाओ-त्ज़ु ने मामले को अच्छे से सुना और अपना निर्णय सुनाया – “चोर और धनी व्यक्ति, दोनों को छः महीने का कारावास दिया जाए”.

धनी ने कहा – “आप यह क्या कर रहे हैं? चोरी मेरे घर में हुई है! मेरा धन चुरा लिया गया है! फिर भी आप मुझे जेल भेजने का निर्णय कर रहे हैं!? यह कैसा न्याय है?”

लाओ-त्ज़ु ने कहा – “मुझे तो लगता है कि मैंने चोर के प्रति न्याय नहीं किया है. तुम्हें वास्तव में अधिक लम्बा कारावास देने की आवश्यकता है क्योंकि तुमने आवश्यकता से अधिक धन जमा करके बहुत से लोगों को धन से वंचित कर दिया है! सैकड़ों-हजारों लोग भूखे मर रहे हैं लेकिन तुम्हारी धनसंग्रह करने की लालसा कम नहीं होती! तुम्हारे लालच के कारण ही ऐसे चोर पैदा हो रहे हैं. अपने घर में होनेवाली चोरी के लिए तुम ही जिम्मेदार हो. तुम अधिक बड़े अपराधी हो”.

कहना न होगा कि राजा ने लाओ-त्ज़ु को अपने पद से उसी दिन मुक्त कर दिया.

चित्र साभार – फ्लिकर

(Lao-tzu is made a judge – a motivational / inspirational anecdote in Hindi)

कौन अमीर और कौन गरीब?

rustic lifeएक बहुत धनी व्यक्ति अपने छोटे से लड़के को एक बार गाँव दिखाने ले गया ताकि उसका बेटा जान सके कि गरीब लोग कैसे रहते हैं. उन्होंने शहर से कुछ दूर अपने फार्म हाउस में दो दिन बिताये. फार्म हाउस के सामने ही एक गरीब परिवार रहता था. यात्रा से वापस लौटते समय पिता ने अपने पुत्र से पूछा – “बेटा, यात्रा कैसी रही?”

“बहुत अच्छी, पापा” – बेटे ने कहा.

“तो तुमने देखा कि गरीब लोग कैसे रहते हैं?”

“हाँ”.

“तो तुमने यात्रा से क्या सीखा?”

बेटे ने जवाब दिया – “मैंने देखा कि हमारे पास तो एक ही कुत्ता है जबकि उनके पास चार हैं. हमारा स्वीमिंग पूल तो बहुत छोटा है लेकिन वे बहुत बड़ी नहर में नहाते हैं. हमारे बगीचे में मंहगे लालटेन लगे हैं जबकि वे तारों भरे आकाश को देख सकते हैं. हमारे घर से तो दूर तक नहीं दिखता जबकि वे दूर-दूर की पहाडियां और घाटियाँ देख सकते हैं. हमारे नौकर हमारी देखभाल करते हैं लेकिन वे सभी का ख़याल रखते हैं. हम अपना खाना खरीदते हैं लेकिन वे अपना खाना खुद उगाते हैं. हमारे घर की रक्षा के लिए चारदीवारी है लेकिन उनके दोस्त उनकी रक्षा करते हैं”.

लड़के का पिता निरुत्तर हो गया.

(An anecdote – Rich and Poor – in Hindi)

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राजा मिडास की कहानी

हम सबने उस अहमक और लालची राजा की कहानी सुनी है जिसका नाम मिडास था. उसने पास बहुत सारा सोना था और जितना सोना वह जमा करता जाता था उतना ही ज्यादा सोना पाने की उसकी प्यास बढती जाती थी. अपने महल के स्वर्णकोष  में बैठकर वह अपना पूरा समय सोना गिनने में लगाता था.

एक दिन जब वह सोना गिनने में व्यस्त था तब उसके पास एक फ़कीर आया और उसने कहा कि वह मिदास की कोई एक मनोकामना पूरी कर सकता है. मिडास यह सुनकर बहुत खुश हो गया और बोला – “मैं जिस चीज़ को छू लूँ वह सोने की हो जाये!”

फ़कीर ने कहा – “क्या तुम वाकई ऐसा ही चाहते हो?” – मिडास ने कहा – “हाँ”.

फ़कीर ने कहा – “ऐसा ही हो. कल सुबह सूरज की पहली किरण के साथ तुम जो कुछ भी छुओगे वह सोने में बदल जायेगा”.

मिडास को लगा कि कहीं यह सपना तो नहीं! ऐसा कैसे हो सकता है? लेकिन अगले दिन जब वह सो कर उठा, उसने अपने पलंग को छुआ, और पलंग सोने का हो गया. उसके कपडे, उसके बर्तन, उसकी तलवार, अब कुछ सोने का हो गया.

मिडास ने महल की खिड़की से बाहर झाँककर देखा. उसकी प्यारी बिटिया बाहर बगीचे में खेल रही थी. मिडास ने सोचा की वह बाहर जाकर उसे अपनी करामाती शक्ति दिखाकर उसे खुश कर देगा. वह हर किसी चीज़ को छूकर बाहर जाने लगा. उसने एक किताब को छुआ, वह पलक झपकते ही सोने की किताब बन गई, लेकिन अब उसे पढ़ पाना संभव नहीं था. वह नाश्ता करने बैठा लेकिन जैसे ही उसने फलों को हाथ लगाया, वे भी सोने के फल बन गए. पीने का पानी भी सोने में बदल गया. मिडास को बहुत तेज भूख लग रही थी और सोना खाकर तो कोई पेट नहीं भर सकता था!

मिडास को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे! इतने में ही उसकी बिटिया भागती हुई उसके पास आई और इससे पहले की मिडास ज़रा संभल पाता, उसने मिडास को गले से लगा लिया. मिडास को छूते ही वह भी सोने के बुत में तब्दील हो गई.

मिडास दहाडें मारकर रोने लगा. उसे अपनी बेवकूफी पर पछतावा हुआ. उसे यह लगने लगा था कि सोना संसार की सबसे अच्छी चीज नहीं है.

अचानक ही कहीं से वह फ़कीर आ गया. फ़कीर ने पूछा – “मिडास, क्या तुम इतना सारा सोना पाकर खुश हो?”

मिडास ने कहा – “नहीं! मैं संसार का सबसे दुखी मनुष्य हूँ!”

फ़कीर ने पूछा – “क्यों? तुम्हारे पास तो अब सब कुछ सोने का हो गया है!”

मिडास बोला – “मुझे माफ़ कर दो! मेरा सब कुछ ले लो लेकिन मेरी बिटिया को पहले जैसा बना दो. मैं उसे ही सबसे ज्यादा प्यार करता हूँ, सोने को नहीं!”

फ़कीर ने कहा – “ठीक है मिडास. तुम समझ गए हो कि सोना संसार की सबसे कीमती वस्तु नहीं है.” – यह कहकर फ़कीर ने अपने मंतर को उल्टा कर दिया. मिडास की बाँहों में उसकी प्यारी बिटिया पहले की तरह अठखेलियाँ करने लगी और उसने कभी न भूलनेवाला सबक सीख लिया.

goldइस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है?

* विकृत जीवन-मूल्य त्रासदी की ओर ले जाते हैं.

* कभी-कभी आपकी ख्वाहिशें ही आगे जाकर आपके दुःख का कारण बन जाती हैं और आप उस क्षण को कोसते हैं जब आपने उस चीज़ की तमन्ना की थी.

* सिर्फ फुटबाल के खेल में ही खिलाडियों को बाहर निकाला या बदला जा सकता है. ज़िन्दगी ऐसा करने की इजाज़त नहीं देती. मिडास की तरह हमें अपने दुःख से निजात पाने का मौका मिले-न-मिले!

विडियो साभार : youtube.com

(A motivational / inspiring story of King Midas – greed – in Hindi)