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परोपकार

कभी एक आदमी बहुतेरी मुसीबतों से घिरा हुआ था. उसने एक दिन शुद्ध मन से यह प्रतिज्ञा करी कि यदि उसे मुसीबतों से निजात मिल जायेगी तो वह अपना घर बेचकर सारा पैसा गरीबों में बाँट देगा.

देर-सबेर उस आदमी की मुसीबतें टल गईं और उसे अपनी प्रतिज्ञा का स्मरण हो आया. अच्छे दिन लौट आने के बाद अब उसका दिल इस बात की इज़ाज़त नहीं दे रहा था कि वह अपनी सारी दौलत दान में दे दे. कुछ सोचने के बाद उसे एक उपाय सूझ गया.

उसने घर के सामने इश्तिहार लगा दिया. उसमें लिखा था कि घर की कीमत सिर्फ पांच मोहरें थी. लेकिन घर के साथ एक बिल्ली को खरीदना ज़रूरी था जिसकी कीमत उसने दस हज़ार अशर्फियाँ रखी थी.

एक मालदार शख्स ने घर और बिल्ली दोनों को खरीद लिया. आदमी ने पांच मोहरें गरीबों में बाँट दीं और दस हज़ार अशर्फियों से नया घर खरीद लिया.

(इदरीस शाह की कहानी)

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मुझे मेरी किडनी वापस दो!

मुझे एक बेतुके मुकदमे के बारे में पता चला जिसमें न्यूयॉर्क का एक डॉक्टर अपनी तलाकशुदा पत्नी से वह किडनी मांग रहा है जो उसने 2001 में पत्नी को दान में दी थी. अब या तो उसे वह किडनी चाहिए या उसके एवज़ में डेढ़ मिलियन डौलर की रकम चाहिए.

डेली न्यूज़ की वेबसाईट में छपी खबर के मुताबिक डॉक्टर रिचर्ड बटिस्टा ने अपनी पत्नी पर उसके फ़िज़िओथेरेपिस्ट से अवैध सम्बन्ध रखने का आरोप लगाया. बेहद कड़वी मुकदमेबाजी के बाद रिचर्ड को तलाक तो मिल गया पर उसके तीन बच्चों की परवरिश उससे छिन गयी. इस सबसे खिन्न होकर उसने उसने अपनी पत्नी को दान में दी गयी किडनी को वापस उसे सौंपने के लिए आवेदन दिया. बटिस्टा ने कहा – “मैंने उसे किडनी दान में दी थी क्योंकि मैं अपने वैवाहिक जीवन को खंडित होने से बचाना चाहता था. किडनी दान देने का पहला उद्देश्य उसके जीवन की रक्षा करना था. इससे यह उम्मीद भी थी कि हमारे सम्बन्ध मधुर हो जायेंगे.”

जून, 2001 में किडनी प्रत्यारोपण का सफल ऑपरेशन हो गया. बटिस्टा के अनुसार उसे उम्मीद थी कि उसकी पूर्ण स्वस्थ हो चुकी पत्नी उसके दान का महत्व, उसकी कीमत समझेगी पर ‘कुछ भी नहीं बदला’.

सच्ची दानशीलता इसमें है कि शुद्ध मन से बिना किसी गर्व, घमंड, दिखावे, लाभ, या बदले में कुछ पाने की कामना से दान दिया जाए. ऐसा दान हमें ‘मैं, मेरा, मेरे लिए’ की अस्वस्थ भावना से मुक्त करता है और हमारे विचारों को पवित्र बनाता है. इसके द्वारा हम जीवन की विहंगमता को और अधिक पूर्णता में स्वीकार कर पाते हैं और क्षुद्रताओं से ऊपर उठ सकते हैं. इसके अतिरिक्त, यह मानसिक और भौतिक दरिद्रता को दूर कर शुभ कर्मों को करने और उनके संचय को प्रोत्साहित करता है.

इस प्रकार सच्चा दान हमारे अहम् से ऊपर उठने में है और दूसरों के प्रति निःस्वार्थ भाव से कर्म करने में निहित है. किस अपिरिचित व्यक्ति को अपनी किडनी दान में देना वास्तव में बहुत बड़ा दान है. अपने किसी प्रिय परिचित को किडनी दान में देना भी उतना ही विशाल शुभ कर्म है. किसी परिचित को किडनी या कोई अन्य महत्वपूर्ण जीवनरक्षक दान देने के उपरान्त निज-सम्बन्ध से जनित महती उपकार करने की भावना आ जाती है जिसे हम आम बोलचाल में अहसान लादना कह सकते हैं. इसके विपरीत किसी अजनबी को दान देने के बाद आप उसे भूल भी सकते हैं.

बटिस्टा ने अपनी पत्नी को किडनी दान करने का निर्णय प्रेम के वशीभूत होकर ही लिया होगा पर इस निःस्वार्थ प्रतीत होने वाले कर्म के पीछे भी कुछ उद्देश्य छुपे थे जो गलत भी नहीं थे. बटिस्टा के अनुसार वह अपने वैवाहिक जीवन को पुनः स्वस्थ, खुशहाल, और चिरस्थाई बनाना चाहता था. जब ऐसा नहीं हुआ तो उसने अपने निवेश को वापस ले लेने का निर्णय कर लिया. पत्नी से मिले धोखे ने बटिस्टा के भीतर उसके और उसकी पत्नी के बीच न पटने वाली दूरी पैदा कर दी और वह धीरे-धीरे अपने में ही सिमटता रह गया.

मैं अपने पाठकों से यह प्रश्न करता हूँ कि क्या हम किसी और के शरीर में प्रत्यारोपित किडनी को अपना अंग कह सकते हैं? यह देखना ही कितना विस्मयपूर्ण है कि मनुष्यों में ‘मैं और मेरा’ की भावना इतनी गहरी है कि यह शरीर से अलग हो चुके अंग पर भी अपना अधिकार जताती है. मैंने तुम्हें अपने शरीर का टुकड़ा दिया और तुमने ही मुझे चोट पहुंचाई! अब मुझे मेरी किडनी वापस दो!

बटिस्टा सौजन्यपूर्ण, करुणापूर्ण, और दयालुता भरे भाव से अपनी किडनी दान में दे सकता था लेकिन वह ऐसा नहीं कर सका और उसने किडनी तो दे दी पर अपने अहंकार को पोषित करता रहा.

मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि कोई भी मनुष्य अपनी किडनी तभी दान में दे जब वह उसे वापस चाहने की इच्छा न करे.

(इस प्रकरण के अदालती फैसले को ढूँढने में बहुत समय लगा लेकिन मैंने यह पता लगा लिया कि अदालत ने बटिस्टा की अपील कई आधार पर ठुकरा दी. आप विस्तार से यहाँ देख सकते हैं)

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प्यारे कनाडावासी दंपत्ति का बड़ा दान

दो-तीन दिन पहले मुझे याहू न्यूज़ की साईट पर यह खबर पढ़ने को मिली तो मुझे लगा कि इसे यहाँ पोस्ट किया जा सकता है.

सेवानिवृत्त कनाडियन दंपत्ति ने लौटरी में जीते हुए 11,255,272/- कनाडियन डॉलर (लगभग 50 करोड़ रुपये) की रकम दान में दे दी है.

“जो हमारे पास पहले ही नहीं था उसकी कमी क्या महसूस करना?” – 78 वर्षीय वायलेट लार्ज ने एक स्थानीय रिपोर्टर से कहा.

जुलाई में जब दंपत्ति को लौटरी जीतने का समाचार मिला उस समय वायलेट कैंसर के उपचार के लिए कीमोथैरेपी ले रहीं थीं.

“हमारे पास एक-दूसरे का साथ है. यह पैसा हमारे लिए कुछ नहीं है.” – वायलेट के पति ऐलन ने भावुक होकर कहा.

“यह पैसा अपने साथ बहुत बड़ा सरदर्द लेकर आया. हमें हर समय यही लगता रहा कि बुरे लोग कहीं इसके लालच में हमें नुकसान न पहुंचा दें. हमें लौटरी मिलने की खबर सुनते ही अचानक से ही बहुत से ज़रूरतमंद लोग न जाने कहाँ से प्रकट हो गए. इसलिए हमने जल्द-से-जल्द इस रकम को ठिकाने लगाने के लिए सोचना शुरू कर दिया.”

उन्होंने पहले पारिवारिक ज़रूरतों के लिए दो प्रतिशत रकम अलग कर दी, फिर दान के लिए दो पन्नों में संस्थाओं को छांटा जिनमें लोकल अग्निशमन दल, चर्च, कब्रिस्तान, रैड क्रॉस, साल्वेशन आर्मी, और उन अस्पतालों के नाम थे जहाँ वायलेट का उपचार हो रहा था. कैंसर, अल्जीमर्स, और डायबिटीज़ से सम्बद्ध संस्थाओं के नाम भी शामिल किये गए. लिस्ट बड़ी होती गयी.

“हमें यह देखकर अच्छा लगा कि पैसा इतने सारे अच्छे कामों में लग गया” – वायलेट ने कहा.

नोवा स्कॉटिया दंपत्ति पिछले पैंतीस सालों से एक-दूसरे के प्रति समर्पित हैं. ऐलेन ने वेल्डर के काम से और वायलेट ने स्टोर में नौकरी करके बुढ़ापे के लिए शांतिपूर्वक संतोषजनक धन जुटा लिया था.

“हमने अपने ऊपर एक पैसा भी खर्च नहीं किया क्योंकि हम पूरे समय ज़रूरी कामों में लगे रहे और ऐसी अस्वस्थता में कुछ करने के लिए मुझे बहुत ताकत जुटानी पड़ेगी. हम लोग पर्यटन नहीं कर सकते. इस देहात में ही हमें अच्छा लगता है. पैसे से कोई स्वास्थ्य और खुशियाँ तो नहीं खरीद सकता” – वायलेट ने कहा.

अब पूरे गाँव में उनकी बातें होती रहती हैं. – “उन्हें बेहतर जाननेवाले लोग यह जानते हैं कि उनके लिए एक-दूसरे का साथ सबसे बड़ी चीज़ है” – स्थानीय रेस्तरां मालिक ने पत्रकार को बताया.

खबर की लिंक यह है.

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अद्भुत पात्र

प्राचीन काल में एक राजा का यह नियम था कि वह अनगिनत संन्यासियों को दान देने के बाद ही भोजन ग्रहण करता था.

एक दिन नियत समय से पहले ही एक संन्यासी अपना छोटा सा भिक्षापात्र लेकर द्वार पर आ खड़ा हुआ. उसने राजा से कहा – “राजन, यदि संभव हो तो मेरे इस छोटे से पात्र में भी कुछ भी डाल दें.”

याचक के यह शब्द राजा को खटक गए पर वह उसे कुछ भी नहीं कह सकता था. उसने अपने सेवकों से कहा कि उस पात्र को सोने के सिक्कों से भर दिया जाय.

जैसे ही उस पात्र में सोने के सिक्के डाले गए, वे उसमें गिरकर गायब हो गए. ऐसा बार-बार हुआ. शाम तक राजा का पूरा खजाना खाली हो गया पर वह पात्र रिक्त ही रहा.

अंततः राजा ही याचक स्वरूप हाथ जोड़े आया और उसने संन्यासी से पूछा – “मुझे क्षमा कर दें, मैं समझता था कि मेरे द्वार से कभी कोई खाली हाथ नहीं जा सकता. अब कृपया इस पात्र का रहस्य भी मुझे बताएं. यह कभी भरता क्यों नहीं?”

संन्यासी ने कहा – “यह पात्र मनुष्य के ह्रदय से बना है. इस संसार की कोई वस्तु मनुष्य के ह्रदय को नहीं भर सकती. मनुष्य कितना ही नाम, यश, शक्ति, धन, सौंदर्य, और सुख अर्जित कर ले पर यह हमेशा और की ही मांग करता है. केवल ईश्वरीय प्रेम ही इसे भरने में सक्षम है.”

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अंधा भिखारी

मक्का को जानेवाले हजयात्रियों के मार्ग पर एक अंधा भिखारी बैठा भीख मांग रहा था. एक धर्मपरायण यात्री ने उसके पास आकर उससे पूछा – “बाबा, क्या यहां से गुज़रनेवाले यात्री हमारे प्यारे रसूल के फ़रमान पर अमल करते हुए मुनासिब दान दे रहे हैं?”

अंधे भिखारी ने उसे अपना टीन का कटोरा दिखाया. कटोरे में बस दो खोटे पैसे पड़े थे.

यात्री ने भिखारी से कहा – “मैं एक तख्ती पर कुछ लिखकर आपके गले में टांग देता हूं. शायद उससे आपका भला हो सके.”

शाम के वक़्त वह यात्री अंधे भिखारी से मिलने आया. भिखारी बहुत खुश था क्योंकि उसे आज तक भीख में इतने पैसे नहीं मिले थे जितने उस दिन मिल गए.

“आपने इस तख्ती पर क्या लिखा है?” – भिखारी ने यात्री से पूछा.

“मैंने सिर्फ इतना ही लिखा है – ‘आज सर्दी का खुशग़वार दिन है, सूरज अपनी रौशनी बरसा रहा है… और मैं अंधा हूं’.”

(A motivational / inspirational story about a blind beggar – in Hindi)

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