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मूर्ख : The Idiot


coming home by alicepopkorn

यह रूसी कहानी किसी गांव में रहनेवाले एक युवक के बारे में है जिसे सभी मूर्ख कहते थे. बचपन से ही वह सबसे यही सुनता आ रहा था कि वह मूर्ख है. उसके माता-पिता, रिश्तेदार, पड़ोसी- सभी उसे मूर्ख कहते थे और वह इस बात पर यकीन करने लगा कि जब इतने बड़े-बड़े लोग उसे मूर्ख कहते हैं तो वह यकीनन मूर्ख ही होगा. किशारावस्था को पार कर वह जवान हो गया और उसे लगने लगा कि वह पूरी ज़िंदगी मूर्ख ही बना रहेगा. इस अवस्था से बाहर निकलने के बहुत प्रयास किए लेकिन उसने जो भी काम किया उसे लोगों ने मूर्खतापूर्ण ही कहा.

यह मानव स्वभाव है. कोई कभी पागलपन से उबरकर सामान्य हो जाता है लेकिन कोई उसे सामान्य मानने के लिए तैयार नहीं होता. वह जो कुछ भी करता है उसमें लोग पागलपन के लक्षण खोजने लगते हैं. लोगों की आशंकाएं उस व्यक्ति को संकोची बना देतीं हैं और उसके प्रति लोगों के संदेह गहरे होते जाते हैं. यह एक कुचक्र है. रूसी गांव में रहनेवाले उस युवक ने भी मूर्ख की छवि से निकलने के भरसक प्रयास किए लेकिन उसके प्रति लोगों के रवैये में बदलाव नहीं आया. वे उसे पहले की भांति मूर्ख कहते रहे.

कोई संत वहां से गुज़रा. युवक रात के एकांत में संत के पास गया और उनसे बोला, “मैं इस छवि में बंधकर रह गया हूं. मैं सामान्य व्यक्ति की तरह रहना चाहता हूं लेकिन वे मुझे मुक्त नहीं करना चाहते. उन्होंने मेरी स्वीकार्यता के सारे मार्ग और द्वार बंद कर दिए हैं कि मैं कहीं उनसे बाहर न आ जाऊं. मैं उनकी ही भांति सब कुछ करता हूं फिर भी मूर्ख कहलाता हूं. मैं क्या करूं?”

संत ने कहा, “तुम एक काम करो. जब कभी कोई तुमसे कहे, ‘देखो, कितना सुंदर सूर्यास्त है,’ तुम कहो, ‘तुम मूर्ख हो, सिद्ध करो कि इसमें सुंदर क्या है? मुझे तो इसमें कोई सौंदर्य नहीं दीखता, तुम सिद्ध करो कि यह सुंदर है.’ यदि कोई कहे, ‘यह गुलाब का फूल बहुत सुंदर है,’ तो उसे आड़े हाथों लेकर कहो, ‘इसे साबित करो! किस आधार पर तुम्हें यह साधारण सा फूल सुंदर लग रहा है? यहां गुलाब के लाखों फूल हैं. लाखों-करोड़ों फूल खिल चुके हैं और लाखों-करोड़ों फूल खिलते रहेंगे; फिर गुलाब के इस फूल में क्या खास बात है? तुम किन विशेषताओं और तर्कों के आधार पर यह सिद्ध कर सकते हो कि यह गुलाब का फूल सुंदर है?”

“जब कोई तुमसे कहे, ‘लेव तॉल्स्तॉय की यह कहानी बहुत सुंदर है,’ तो उसे पकड़कर उससे पूछो, ’सिद्ध करो कि यह कहानी सुंदर है; इसमें सुंदर क्या है? यह सिर्फ एक साधारण कहानी है— ऐसी हजारों-लाखों कहानियां किताबों में बंद हैं, इसमें भी वही त्रिकोण है जो हर कहानी में होता है: दो आदमी और एक औरत या एक औरत और दो आदमी… यही त्रिकोण हमेशा होता है. सभी प्रेम कहानियों में यह त्रिकोण होता है. इसमें नई बात क्या है?”

युवक ने कहा, “ठीक है. मैं ऐसा ही करूंगा.”

संत ने कहा, “हां, ऐसा करने का कोई मौका मत छोड़ना, क्योंकि कोई भी इसे सिद्ध नहीं कर पाएगा, क्योंकि इन्हें सिद्ध नहीं किया जा सकता. और जब वे इसे सिद्ध नहीं कर पाएंगे तो वे अपनी मूर्खता और अज्ञान को पहचान लेंगे और तुम्हें मूर्ख कहना बंद कर देंगे. अगली बार जब मैं वापस आऊं, तब तुम मुझे यहां घटी सारी बातें बताना.”

कुछ दिनों बाद संत का उस गांव में दोबारा आना हुआ, और इससे पहले कि वह युवक से मिलते, गांव के लोगों ने उनसे कहा, “यह तो चमत्कार ही हो गया. हमारे गांव का सबसे मूर्ख युवक एकाएक सबसे बुद्धिमान व्यक्ति बन गया है. हम आपको उससे मिलवाना चाहते हैं.”

संत को पता था कि वे किस ‘बुद्धिमान व्यक्ति’ की बात कर रहे हैं. उन्होंने कहा, “हां, मैं भी उससे मिलना चाहूंगा, बल्कि मैं उससे मिलना ही चाहता था.”

वे संत को मूर्ख युवक के पास लेकर गए और मूर्ख ने उनसे कहा, “आप चमत्कारी पुरुष हैं, दिव्य हैं. आपके उपाय ने काम कर दिया! आपके बताए अनुसार मैंने सभी को मूर्ख और अज्ञानी कहना शुरु कर दिया. कोई प्रेम की बात करता था, कोई सौंदर्य की, कला की, साहित्य की, शिल्प की बात करता था और मेरा एक ही व्यक्तव्य होता था: ‘सिद्ध करो!’ वे सिद्ध नहीं कर पाते थे और मूर्खवत अनुभव करने लगते थे.”

“यह कितना अजीब है. मैं सोच ही नहीं सकता था कि इसमें कोई इतनी गहरी बात होगी. मैं केवल इतना ही चाहता था कि वे मुझे मूर्ख समझना बंद कर दें. यह अद्भुत बात है कि अब मुझे कोई मूर्ख नहीं कहता बल्कि सबसे बुद्धिमान वयक्ति कहता है, लेकिन मैं जानता हूं कि वही हूं जो मैं था- और इस तथ्य को आप भी जानते हैं.”

संत ने कहा, “इस रहस्य की चर्चा किसी से न करना. इसे अपने तक ही रखना. तुम्हे लगता है कि मैं कोई संत-महात्मा हूं? हां, यही रहस्य है लेकिन मैं भी उसी प्रकार से संत बना हूं जिस तरह से तुम बुद्धिमान बन गए हो.”

दुनिया में सब कुछ इसी सिद्धांत पर कार्य करता है. तुम कभी किसी से पूछते हो, इस जीवन का अर्थ क्या है? तुम गलत प्रश्न पूछते हो. और कोई-न-कोई इसके उत्तर में कहता है, “जीवन का उद्देश्य यह है” — लेकिन उसे कोई सिद्ध नहीं कर सकता.

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There is one Russian story, a small story. In a village a man, a young man, is called an idiot by everybody. From his very childhood he has heard that, that he is an idiot. And when so many people are saying it — his father, his mother, his uncles, the neighbors, and everybody — of course he starts believing that he must be an idiot. How can so many people be wrong? — and they are all important people. But when he becomes older and this continues, he becomes an absolutely sealed idiot; there is no way to get out of it. He tried hard but whatsoever he did was thought to be idiotic.

That is very human. Once a man goes mad he may become normal again but nobody is going to take him as normal. He may do something normal but you will suspect that there must be something insane about it. And your suspicion will make him hesitant and his hesitancy will make you suspicion stronger; then there is a vicious circle. So that man tried in every possible way to look wise, to do wise things, but whatsoever he did people would always say it was idiotic.

A saint was passing by. He went to the saint in the night when there was nobody about and asked him, “Just help me to get out of this locked state. I am sealed in. They don’t let me out; they have not left any window or door open so that I can jump out. And whatsoever I do, even if it is exactly the same as they do, still I am an idiot. What should I do?”

The saint said, “Do just one thing. Whenever somebody says,’Look how beautiful the sunset is,’ you say, “you idiot, prove it! What is beautiful there? I don’t see any beauty. You prove it.’ If somebody says,’Look at that beautiful rose flower,’ catch hold of him and tell him,’Prove it! What grounds have you to call this ordinary flower beautiful? There have been millions of rose flowers. There are millions, there will be millions in the future; what special thing has this rose flower got? And what are your fundamental reasons which prove logically that this rose flower is beautiful?’

“If somebody says,’This book of Leo Tolstoy is very beautiful,’ just catch hold of him and ask him,’Prove where it is beautiful; what is beautiful in it? It is just an ordinary story — just the same story which has been told millions of times, just the same triangle in every story: either two men and one woman or two women and one man, but the same triangle. All love stories are triangles. So what is new in it?”‘

The man said, “That’s right.”

The saint said, “Don’t miss any chance, because nobody can prove these things; they are unprovable. And when they cannot prove it, they will look idiotic and they will stop calling you an idiot. Next time, when I return, just give me the information how things are going.

And next time when the saint was coming back, even before he could meet the old idiot, people of the village informed him, “A miracle has happened. We had an idiot in our town; he has become the wisest man. We would like you to meet him.”

And the saint knew who that “wisest man” was. He said, “I would certainly love to see him. In fact I was hoping to meet him.”

The saint was taken to the idiot and the idiot said, “You are a miracle-worker, a miracle man. The trick worked! I simply started calling everyone an idiot, stupid. Somebody would be talking of love, somebody would be talking of beauty, somebody would be talking of art, painting, sculpture, and my standpoint was the same:’Prove it!’ And because they could not prove it, they looked idiotic.

And it is a strange thing. I was never hoping to gain this much out of it. All that I wanted was to get out of that confirmed idiocy. It is strange that now I am no longer an idiot, I have become the most wise man, and I know I am the same — and you know it too.”

But the saint said, “Never tell this secret to anybody else. Keep the secret to yourself. Do you think I am a saint? Yes, the secret is
between us. This is how I became a saint. This is how you have become a wise man.”

This is how things go on in the world. Once you ask, What is the meaning of life? you have asked the wrong question. And obviously somebody will say, “this is the meaning of life” — and it cannot be proved.

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सत्य का धरातल : The Land of Truth


एक बार किसी आदमी को यह लगने लगा कि सामान्य जीवन में परिपूर्णता नहीं है और उसे सत्य की प्राप्ति करनी चाहिए. उसने ज्ञानी गुरु की खोज करना शुरू कर दिया. उसने बहुत से ग्रन्थ पढ़े, कई मठों में प्रवेश लिया, एक गुरु से दूसरे गुरु तक वह ज्ञान के शब्द सुनने के लिए भटकता रहा. उसने साधना और उपासना की वे पद्धतियाँ ही चुनीं जो उसे आकर्षक और सरल जान पडीं.

उसे कुछ आध्यांत्मिक अनुभव हुआ जिसने उसे भ्रमित कर दिया. अब वह जानना चाहता था कि वह आत्मज्ञान के मार्ग पर कितनी दूर आ गया है और उसकी साधना कब पूरी होगी.

अपने मन में ये विचार उमड़ते-घुमड़ते लिए हुए वह एक दिन परमज्ञानी माने जाने वाले गुरु के आश्रम तक चला आया. आश्रम के उद्यान में उसका सामना हज़रत खिद्र से हो गया. (हज़रत खिद्र लोगों को सत्य के मार्ग पर अग्रसर करनेवाले रहस्यमय गुरु हैं).

खिद्र उस आदमी को एक जगह ले गए जहाँ बहुत से लोग दुःख और पीड़ा में थे. खिद्र ने उन व्यक्तियों से पूछा कि वे कौन हैं. उन्होंने जवाब दिया – “हम वे साधक हैं जिन्होंने वास्तविक शिक्षाओं को ग्रहण नहीं किया. हम वे हैं जिन्होंने मिथ्या गुरु-ज्ञानियों पर आस्था लुटाई.”

फिर खिद्र आदमी को उस जगह पर ले गए जहाँ सभी प्रसन्नचित्त और सुखी प्रतीत हो रहे थे. उनसे भी खिद्र ने वही सवाल किया. वे बोले – “हम वे साधक हैं जिन्होंने सत्य के मार्ग को दर्शानेवाले चिह्नों का अनुसरण नहीं किया.”

“यदि तुम लोगों ने सत्य की ओर ले जाने वाले मार्गदर्शक चिह्नों का अनुसरण नहीं किया तो तुम आनंदमय क्यों कर हो?” – खिद्र ने उनसे पूछा.

“क्योंकि हमने सत्य के स्थान पर प्रसन्नता का चुनाव किया” – वे व्यक्ति बोले – “जिस प्रकार मिथ्या गुरु-ज्ञानियों में आस्था रखनेवालों ने दुःख का चुनाव किया था.”

“तो क्या सुख का आदर्श मनुष्य के लिए त्याज्य है?” – आदमी ने पूछा.

उन्होंने कहा – “मनुष्य का उद्देश्य सत्य की प्राप्ति है. सत्य के सामने सुख का मूल्य कुछ भी नहीं है. जिस व्यक्ति को सत्य मिल गया हो उसके लिए किसी मनोदशा का कोई महत्व नहीं है. हम सबने सत्य को ही सुख और सुख को ही सत्य मान लिया था और सभी ने हमपर विश्वास किया जिस प्रकार तुम भी अब तक यही मानते आये हो कि सत्य की अनुभूति परमसुख और आनंद की प्राप्ति से होती होगी. लेकिन सुख हो या दुःख, आनंद हो या पीड़ा, ये सभी अनुभूतियाँ ही हैं और तुम्हें बाँधकर ही रखतीं हैं.”

सहसा उस आदमी ने स्वयं को उद्यान में खिद्र के साथ खड़ा पाया.

खिद्र ने उससे कहा – “मैं तुम्हारी एक इच्छा पूरी कर सकता हूँ. मांगो, क्या मांगते हो.”

“मैं यह जानना चाहता हूँ कि मैं पथभ्रष्ट क्यों हो गया और मुझे सफलता कब मिलगी” – आदमी ने कहा.

खिद्र बोले – “तुमने अपना पूरा जीवन व्यर्थ कर दिया क्योंकि तुम झूठा जीवन जीते आये हो. सत्य को खोजने के स्थान पर तुम केवल अपनी इच्छाओं को ही इस झूठ के जरिये पूरा करते आये हो.”

“फिर भी मैं उस अवस्था तक पहुँच गया कि आप मुझे मिल गए” – आदमी ने कहा – “ऐसा तो शायद ही किसी और के साथ हुआ होगा!?”

“हाँ, तुम मुझे मिल गए क्योंकि तुम्हारे भीतर केवल सत्य के लिए ही सत्य को पाने की चाह थी, भले ही वह कभी एक क्षण के लिए ही रही हो. उस लेश मात्र ईमानदारी के कारण ही मैं तुम्हें दर्शन देने को बाध्य हो गया.” – खिद्र ने कहा.

इतना कुछ देख लेने के बाद अब आदमी के भीतर खुद को खो देने की कीमत पर भी सत्य को पाने की उत्कंठा तीव्र हो गयी.

खिद्र अपनी राह चल पड़े थे लेकिन आदमी भी उनके पीछे चल दिया.

“मेरे पीछे मत आओ” – खिद्र ने कहा – “क्योंकि मैं सामान्य जगत में प्रवेश करने जा रहा हूँ जो असत्य का राज्य है. मुझे वहीं होना चाहिए क्योंकि मुझे अभी बहुत काम करना बाकी है”

उस क्षण जब आदमी ने अपने चारों ओर देखा तो यह पाया कि वह खिद्र के साथ उद्यान में नहीं वरन सत्य के धरातल पर खड़ा था.

(इदरीस शाह की कहानी)

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A certain man believed that the ordinary waking life, as people know it, could not possibly be complete. He sought the real Teacher of the Age. He read many books and joined many circles, and he heard the words and witnessed the deeds of one master after another. He carried out the commands and spiritual exercises which seemed to him to be most attractive. He became elated with some of his experiences. At other times he was confused; and he had no idea at all of what his stage was, or where and when his search might end.

This man was reviewing his behaviour one day when he suddenly found himself near the house of a certain sage of high repute. In the garden of that house, he encountered Khidr, the secret guide who shows the way to truth.

Khidr took him to a place where he saw people in great distress and woe, and he asked who they were.

“We are those who did not follow real teachings, who were not true to our undertakings, who revered self-appointed teachers,” they said.

Then the man was taken by Khidr to a place where everyone was attractive and full of joy.

He asked who they were. “We are those who did not follow the real Signs of the Way,” they said.

“But if you have ignored the Signs, how can you be happy?” asked the traveler.

“Because we chose happiness instead of Truth,” said the people, “just as those who chose the self-appointed chose also misery.”

“But is happiness not the ideal of man?” asked the man. “The goal of man is Truth. Truth is more than happiness. The man who has Truth can have whatever mood he wishes, or none,” they told him. “We have pretended that Truth is happiness, and happiness Truth, and people have believed us, therefore you, too, have until now imagined that happiness must be the same as Truth. But happiness makes you its prisoner, as does woe.”

Then the man found himself back in the garden with Khidr beside him. “I will grant you one desire,” said Khidr. “I wish to know why I have failed in my search and how I can succeed in it,” said the man.

“You have all but wasted your life,” said Khidr, “because you have been a liar. Your lie has been in seeking personal gratification when you could have been seeking Truth.” “And yet I came to the point where I found you,” said the man, ” and that is something which happens to hardly anyone at all.”

“And you met me,” said Khidr, “because you had sufficient sincerity to desire Truth for its own sake, just for an instant. It was that sincerity, in that single instant, which made me answer your call.” Now the man felt an overwhelming desire to find Truth, even if he lost himself.

Khidr, however, was starting to walk away, and the man began to run after him. “You may not follow me,” said Khidr, “because I am returning to the ordinary world, the world of lies, for that is where I have to be, if I am to do my work.” And when the man looked around him again, he realized that he was no longer n the garden of the sage, but standing in the Land of Truth.

(A story by Idris Shah)

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अनुभव


एक सुबह एक प्रख्यात लेखक और ज़ेन मास्टर के बीच ज़ेन के विषय पर बातचीत हो रही थी:

“ज़ेन को आप किस प्रकार परिभाषित करेंगे?”, लेखक ने पूछा.

“ज़ेन प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा प्राप्त ज्ञान है”, ज़ेन मास्टर ने कहा.

“दूसरों के अनुभव से ज्ञान प्राप्त करने में क्या बुराई है?”, लेखक ने कहा, “पुस्तकालयों में ज्ञान भरा पड़ा है!”

ज़ेन मास्टर ने कुछ नहीं कहा.

कुछ देर बाद ज़ेन मास्टर ने लेखक से पूछा, “आपको भोजन कैसा लगा?”

“मैंने अभी कुछ खाया ही नहीं है! अभी तो सुबह के दस ही बजे हैं”, लेखक ने कहा.

“मैं जानता हूँ. मैंने आपके लिए कुछ बनवाया था पर वह मैंने ही खा लिया”, ज़ेन मास्टर ने कहा, “भोजन बहुत बढ़िया था. आप मेरे अनुभव से यह जान सकते हैं.”

Thanx to John Weeren for this story

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शून्य के लिए ही मेरा आमंत्रण


एक साधु ने अपने आश्रम के अंत:वासियों को जगत के विराट विद्यालय में अध्ययन के लिए यात्रा को भेजा था. समय पूरा होने पर उनमें से एक को छोड़कर अन्य वापस लौट आये थे. उनके ज्ञानार्जन और उपलब्धियों को देखकर गुरु बहुत प्रसन्न हुआ. वे बहुत कुछ सीख कर वापस लौटे थे. फिर अंत में पीछे छूट गया युवक भी लौट आया. गुरु ने उससे कहा, “निश्चय ही तुम सबसे बाद में लौटे हो, इसलिए सर्वाधिक सीख कर लौटे होगे.” उस युवक ने कहा, “मैं कुछ सीख कर नहीं लौटा हूं, उलटा जो आपने सिखाया था, वह भी भूल आया हूं.” इससे अधिक निराशाजनक उत्तर और क्या हो सकता था!?

फिर एक दिन वह युवक गुरु की मालिश कर रहा था. गुरु की पीठ को मलते हुए उसने स्वगत ही कहा, “मंदिर तो बहुत सुंदर है, पर भीतर भगवान की मूर्ति नहीं है.” गुरु ने सुना तो उनके क्रोध का ठिकाना न रहा. निश्चय ही वे शब्द उनसे ही कहे गये थे. उनके ही सुंदर शरीर को उसने मंदिर कहा था. गुरु के क्रोध को देखकर वह युवक हंसने लगा. यह ऐसा था जैसे कोई जलती अग्नि पर और घी डाल दे. गुरु ने उसे आश्रम से अलग कर दिया.

फिर एक सुबह जब गुरु अपने धर्मग्रंथ का अध्ययन कर रहा थे, वह युवक अनायास कहीं से आकर पास बैठ गया. वह बैठा रहा, गुरु पढ़ते रहे. तभी एक जंगली मधुमक्खी कक्ष में आकर बाहर जाने का मार्ग खोजने लगी. द्वार तो खुला ही था – वही द्वार, जिससे वह भीतर आयी थी, पर वह बिलकुल अंधी होकर बंद खिड़की से निकलने की व्यर्थ चेष्टा कर रही थी. उसकी भिनभिनाहट मंदिर के सन्नाटे में गूंज रही थी. उस युवक ने खड़े होकर जोर से उस मधुमक्खी से कहा, “ओ, नासमझ! वह द्वार नहीं, दीवार है. रुक और पीछे देख, जहां से तेरा आना हुआ है, द्वार वही है.”

मधुमक्खी ने तो नहीं, पर गुरु ने ये शब्द अवश्य सुने और उसे द्वार मिल गया. उन्होंने युवक की आंखों में पहली बार देखा. वह वह नहीं था, जो यात्रा पर गया था. ये आंखें दूसरी ही थीं. गुरु ने उस दिन जाना कि वह जो सीखकर आया है, वह कोई साधारण सीखना नहीं है.

वह सीखकर नहीं कुछ जानकर आया था.

गुरु ने उससे कहा, “मैं आज जान रहा हूं कि मेरा मंदिर भगवान से खाली है और मैं आज जान रहा हूं कि मैं आज तक दीवार से ही सिर मारता रहा पर मुझे द्वार नहीं मिला. लेकिन अब मैं द्वार को पाने के लिए क्या करूं? क्या करूं कि मेरा मंदिर भगवान से खाली न रहे?”

उस युवक ने कहा, “भगवान को चाहते हो, तो स्वयं से खाली हो जाओ. जो स्वयं भरा है, वही भगवान से खाली है. जो स्वयं से खाली हो जाता है, वह पाता है कि वह सदा से ही भगवान से भरा हुआ था. और इस सत्य तक द्वार पाना चाहते हो, तो वही करो, जो वह अब मधुमक्खी कर रही है.”

गुरु ने देखा मधुमक्खी अब कुछ नहीं कर रही है. वह दीवार पर बैठी है और बस बैठी है. उसने समझा, वह जागा. जैसे अंधेरे में बिजली कौंध गई हो, ऐसा उसने जाना और उसने देखा कि मधुमक्खी द्वार से बाहर जा रही है.

यह कथा मेरा पूरा संदेश है. यही मैं कह रहा हूं. भगवान को पाने को कुछ करना नहीं है, वरन सब करना छोड़कर देखना है. चित्त जब शांत होता है और देखता है, तो द्वार मिल जाता है. शांत और शून्य चित्त ही द्वार है. उस शून्य के लिए ही मेरा आमंत्रण है. वह आमंत्रण धर्म का ही है. उस आमंत्रण को स्वीकार कर लेना ही धार्मिक होना है.

ओशो के पत्रों के संकलन ‘क्रांतिबीज’ से. प्रस्तुति – ओशो शैलेंद्र.

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सत्य का स्वाद


एक राजा ने एक महात्मा से कहा – “कृपया मुझे सत्य के बारे में बताइये. इसकी प्रतीति कैसी है? इसे प्राप्त करने के बाद की अनुभूति क्या होती है?”

राजा के प्रश्न के उत्तर में महात्मा ने राजा से कहा – “ठीक है. पहले आप मुझे एक बात बताइए, आप किसी ऐसे व्यक्ति को आम का स्वाद कैसे समझायेंगे जिसने पहले कभी आम नहीं खाया हो?”

राजा सोच-विचार में डूब गया. उसने हर तरह की तरकीब सोची पर वह यह नहीं बता सका कि उस व्यक्ति को आम का स्वाद कैसे समझाया जाय जिसने कभी आम नहीं खाया हो.

हताश होकर उसने महात्मा से ही कहा – “मुझे नहीं मालूम, आप ही बता दीजिये”.

महात्मा ने पास ही रखी थाली से एक आम उठाया और उसे राजा को देते हुए कहा – “यह बहुत मीठा है. इसे खाकर देखो”.

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