Tag Archives: जागरण

स्वयं से पूछो, “मैं कौन हूं?”

”मैं कौन हूं?” जो स्वयं से इस प्रश्न को नहीं पूछता है, उसके लिए ज्ञान के द्वार बंद ही रह जाते हैं. उस द्वार को खोलने की कुंजी यही है. स्वयं से पूछो कि ”मैं कौन हूं?” और जो प्रबलता से और समग्रता से पूछता है, वह स्वयं से ही उत्तर भी पा जाता है.

Thomas Carlyle

कारलाइल बूढ़ा हो गया था. उसका शरीर अस्सी वसंत देख चुका था. और जो देह कभी अति सुंदर और स्वस्थ थी, वह अब जर्जर और ढीली हो गई थी. जीवन संध्या के लक्षण प्रकट होने लगे थे. ऐसे बुढ़ापे की एक सुबह की घटना है. कारलाइल स्नानगृह में था. स्नान के बाद वह जैसे ही शरीर को पोंछने लगा, उसने अचानक देखा कि वह देह तो कब की जा चुकी है, जिसे कि वह अपनी मान बैठा था! शरीर तो बिलकुल ही बदल गया है. वह काया अब कहां है जिसे उसने प्रेम किया था? जिस पर उसने गौरव किया था, उसकी जगह यह खंडहर ही तो शेष रह गया है. पर साथ ही एक अत्यंत अभिनव-बोध भी उसके भीतर अकुंडलित होने लगा : ”शरीर तो वही नहीं है, लेकिन वह तो वही है. वह तो नहीं बदला है.” और तब उसने स्वयं से ही पूछा था, ”आह! तब फिर मैं कौन हूं?”

यही प्रश्न प्रत्येक को अपने से पूछना होता है. यही असली प्रश्न है. प्रश्नों का प्रश्न यही है. जो इसे नहीं पूछते, वे कुछ भी नहीं पूछते हैं. और, जो पूछते ही नहीं, वे उत्तर कैसे पा सकगें?

पूछो. अपने अंतरतम की गहराइयों में इस प्रश्न को गूंजने दो, ”मैं कौन हूं?”

जब प्राणों की पूरी शक्ति से कोई पूछता है, तो अवश्य ही उत्तर उपलब्ध होता है. और, वह उत्तर जीवन की सारी दिशा और अर्थ को परिवर्तित कर देता है. उसके पूर्व मनुष्य अंधा है. उसके बाद ही वह आंखों को पाता है.

ओशो के पत्रों के संकलन ‘पथ के प्रदीप’ से. प्रस्तुति – ओशो शैलेन्द्र.

About these ads

26 Comments

Filed under Osho

हम सोये ही हुए हैं!

स्‍‌मरण रहे कि मैं मूर्छा को ही पाप कहता हूं. अमूर्च्छित चित्त-दशा में पाप वैसे ही असंभव है, जैसे कि जानते और जागते हुए अग्नि में हाथ डालना. जो अमूच्‍‌र्छा को साध लेता है, वह सहज ही धर्म को उपलब्‍‌ध हो जाता है.

संत भीखण के जीवन की घटना है. वे एक रात्रि प्रवचन दे रहे थे. आसोजी नाम का एक श्रावक सामने बैठा नींद ले रहा था. भीखण ने उससे पूछा- “आसोजी! नींद लेते हो?” आसोजी ने आंखें खोलीं और कहा- “नहीं महाराज!”

थोड़ी देर और नींद फिर वापस लौट आई. भीखणजी ने फिर पूछा- “आासोजी, सोते हो?” फिर मिला वही उत्तर- “नहीं महाराज”. नींद में डूबा आदमी सच कब बोलता है!? और बोलना भी चाहे तो बोल कैसे सकता है!? नींद फिर से आ गई.

इस बार भीखण ने जो पूछा वह अद्भुत था. उसमें बहुत गहरा अर्थ है. प्रत्‍‌येक को स्‍‌वयं से पूछने योग्‍‌य वह प्रश्‍‌न है. वह अकेला प्रश्‍‌न ही बस सारे तत्‍‌व-चिंतन का केंद्र और मूल है. भीखण जी ने जोर से पूछा- “आसोजी! जीते हो?”

आसोजी तो सो रहे थे. निद्रा में सुनाई दिया होगा कि वही पुराना प्रश्‍‌न है. नींद में ‘जीते हो’, ‘सोते हो’ जैसा ही सुनाई दिया होगा! आंखें मिचमिचाईं और बोले- “नहीं महाराज!”

भूल से सही उत्तर निकल गया. निद्रा में जो है, वह मृत के ही तुल्‍‌य है. प्रमादपूर्ण जीवन और मृत्‍‌यु में अंतर ही क्‍‌या हो सकता है? जाग्रत ही जीवित है. जब तक हम विवेक और प्रज्ञा में जागते नहीं हैं, तब तक हम जीवित भी नहीं हैं.

जो जीवन को पाना चाहता है उसे अपनी निद्रा और मूच्‍‌र्छा छोड़नी होगी. साधारणत: हम सोये ही हुए हैं. हमारे भाव, विचार और कर्म सभी मूर्छित हैं. हम उन्‍‌हें इस प्रकार किये जा रहे हैं जैसे कि कोई और हमसे करा रहा हो. जैसे कि हम किसी गहरे सम्‍‌मोहन में उन्‍‌हें कर रहे हों. जागने का अर्थ है कि मन और काया से कुछ भी मूर्छित न हो – जो भी हो वह पूरी जागरूकता और सजगता में हो. ऐसा होने पर अशुभ असंभव हो जाता है और शुभ सहज ही फलित होता है.

ओशो के पत्रों के संकलन ‘पथ के प्रदीप’ से. प्रस्तुति – ओशो शैलेन्द्र.

10 Comments

Filed under Osho

परमात्मा की पुकार

ईरान के सूफ़ी महाकवि हाफ़िज़ {ख्वाज़ा शमसुद्दीन मुहम्मद हाफ़िज़-ए-शीराज़ी (1315 – 1390)} का दीवान अधिकाँश ईरानियों के घर में पाया जाता है. उनकी कविताएँ और सूक्तियां हर मौके पर पढ़ी और प्रयुक्त की जाती हैं.

यह घटना उस समय की है जब हाफ़िज़ अपने गुरु के सानिध्य में ज्ञान और ध्यान की शिक्षा ग्रहण कर रहे थे. आश्रम में और भी बहुत से शिष्य थे. एक रात को गुरु ने सभी शिष्यों को आसन जमाकर ध्यान करने के लिए कहा. आधी रात बीत जाने पर गुरु ने धीरे से कहा – “हाफिज़!”

यह सुनते ही हाफ़िज़ फ़ौरन उठकर गुरु के पास पहुँच गए. गुरु ने उनसे कुछ कहा और ध्यान करने के लिए वापस भेज दिया. इसके कुछ देर बाद गुरु ने फिर किसी और शिष्य को बुलाया लेकिन केवल हाफ़िज़ ने ही उनके स्वर को सुना. सुबह होने तक गुरु ने कई बार अलग-अलग शिष्यों को उनका नाम लेकर बुलाया लेकिन हर बार हाफ़िज़ ही गुरु के समीप आये क्योंकि बाकी शिष्य तो सो रहे थे.

परमात्मा भी प्रतिक्षण प्रत्येक को बुला रहा है – सब दिशाओं से, सब मार्गों से उसकी ही आवाज़ आ रही है लेकिन हम तो सोये हुए हैं. जो जागता है, वह उसे सुनता है… और जो जागता है केवल वही उसे पाता है. – ओशो

(An anecdote of great Sufi mystic poet ‘Hafiz’)

4 Comments

Filed under साहित्यकार, Osho, Sufi Stories

जागरण

कहते हैं कि ज्ञान प्राप्ति के बाद भगवान् बुद्ध जब एक गाँव से गुज़र रहे थे तब एक किसान उनके रूप और व्यक्तित्व की सुगंध से प्रभावित होकर उनके समीप आ गया.

“मित्र, आप कौन हैं?” – किसान ने बुद्ध से पूछा – “आपके समीप मुझे ऐसी अनुभूति हो रही है कि मैं किसी देवता या ईश्वर के सम्मुख उपस्थित हूँ”.

“मैं इनमें से कोई नहीं हूँ” – बुद्ध ने उत्तर दिया.

“फिर आप अवश्य ही मायावी शक्तियों से संपन्न होंगे”.

“नहीं, मैं मायावी भी नहीं हूँ.”

“तो फिर आपमें ऐसा क्या है जो मुझ जैसे साधारण किसान को भी सहज ही दृष्टिगोचर हो रहा है”.

“मैं केवल इस जीवन की सुप्तावस्था से जाग गया हूँ. यही सत्य है जिसे मैं सबको बताता हूँ पर कोई मेरा विश्वास नहीं करता”.

(An anecdote of Lord Buddha – in Hindi)

4 Comments

Filed under Buddhist Stories

छाता : Umbrella

ज़ेन गुरु के कक्ष में प्रवेश करने से पहले शिष्य ने अपना छाता और जूते बाहर छोड़ दिए.

“मैंने खिड़की से तुम्हें आते हुए देख लिया था” – गुरु ने पूछा – “तुमने अपने जूते छाते के दाईं ओर उतारे या बाईं ओर?”

“यह तो मुझे याद नहीं आ रहा. इससे क्या फर्क पड़ता है? मैं तो हर समय ज़ेन के रहस्य का ही मनन करता रहता हूँ”.

“यदि तुम जीवन की इन छोटी-छोटी बातों की ओर ध्यान नहीं दे सकते तो तुम कभी भी कुछ नहीं सीख पाओगे. हर समय सतत जागरण में रहो, हर क्षण तुमसे ध्यान देने की अपेक्षा करता है – यही ज़ेन का एकमात्र रहस्य है”.

(A short Zen story on being alert and attentive – in Hindi)

At the end of ten years of apprenticeship, Zenno thought he should be elevated to the category of Zen master. One rainy day, he went to visit the famous professor Nan-in.

Upon entering Nan-in’s house, the host asked him:

- Did you leave your shoes and umbrella outside?

- Of course – replied Zenno. – As good manners demand. I would do the same anywhere.

- Then tell me: did you place your umbrella to the right or the left of your shoes?

- I’ve no idea, master.

- Zen Buddhism is the art of total consciousness of what we do – said Nan-in. – The lack of attention to the smallest details can completely destroy a man’s life. A father who rushes out of the house, must never forget the dagger within his small son’s reach. A Samurai who doesn’t take care of his sword every day, will at some point find it is rusty, just when he most needs it. A young man who forgets to give his lover flowers, will end up losing her.

And Zenno understood that, although he knew the Zen techniques of the spiritual world, he had forgotten to apply them to the world of men.

7 Comments

Filed under Zen Stories