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चाय के कप

वर्षों पहले एक ही कॉलेज में एक ही कक्षा में एक साथ पढने वाले पांच युवक अब अपने-अपने कार्यक्षेत्रों में स्थापित हो चुके थे. वे अपनी कक्षा की री-युनियन में मिलने के लिए एकत्र हुए. उन सभी ने यह तय किया कि वे अपने पुराने प्रोफ़ेसर से मिलने जायेंगे जो अपनी कक्षा में हमेशा ही उन्हें ज़िंदगी के ज़रूरी सबक बताते थे.

वे सभी प्रोफ़ेसर के घर गए. प्रोफ़ेसर भी अपने इतने सारे प्रिय शिष्यों से मिलकर बहुत खुश थे. सभी ने अपने जीवन की घटनाओं को बांटना शुरू किया. ज्यादातर युवक अब प्रौढ़ हो चुके थे और उनके जीवन में अनेक व्यक्तिगत, नौकरीपेशा या कारोबारी समस्याएं थी. एक दूसरे की तनावग्रस्त और मुश्किल ज़िंदगी का हाल सुनकर खुशनुमा माहौल खामोश उदासी में बदल गया.

उन सबके वर्तमान जीवन की उलझनों को सुनने के बीच ही प्रोफेसर ने स्वयं उठकर उनके लिए चाय बनाई. प्रोफेसर बड़ी सी प्लेट में एक केतली में चाय और आठ-दस खाली कप लेकर रसोईघर से आये. प्लेट में रखे सारे खाली कप एक जैसे नहीं थे. उनमें मिट्टी के कुल्हड़ से लेकर साधारण चीनी मिट्टी के कप, चांदी की परत चढ़े कप, कांच, धातु, और क्रिस्टल के सुन्दर कप शामिल थे. कुछ कप बहुत सादे और अनगढ़ थे और कुछ बहुत अलंकृत और सुरुचिपूर्ण थे. निश्चित ही उनमें कुछ कप बहुत सस्ते और कुछ राजसी थे.

प्रोफ़ेसर ने अपने ग्लास में चाय ली और सभी शिष्यों से कहा कि वे भी अपने लिए चाय ले लें. जब सभी चाय पीने में मशगूल थे तब प्रोफ़ेसर ने उनसे कहा -

“बच्चों, क्या तुम सभी ने इस बात पर ध्यान दिया कि तुम सभी ने महंगे और दिखावटी कप में चाय परोसी और प्लेट में सस्ते और सादे कप ही बचे रह गए? शायद तुम्हारे इस चुनाव का सम्बन्ध तुम्हारे जीवन में चल रहे तनाव और तकलीफों से भी है. क्या तुम इस बात से इंकार कर सकते हो कि कप के बदल जाने से चाय की गुणवत्ता और स्वाद प्रभावित नहीं होती. तुम्हें चाय का जायका और लज्ज़त चाहिए लेकिन अवचेतन में तुम सबने दिखावटी कप ही चुने.”

“ज़िंदगी इस चाय की तरह है. नौकरी-कारोबार, घर-परिवार, पैसा और सामाजिक स्थिति कप के जैसे हैं. इनसे तुम्हारी ज़िंदगी की असलियत और उसकी उत्कृष्टता का पता नहीं चलता. जीवन के उपहार तो सर्वत्र मुफ्त ही उपलब्ध हैं, यह तुमपर ही निर्भर करता है कि तुम उन्हें कैसे पात्र में ग्रहण करना चाहते हो.”

* * *

इस कहानी में भी चाय के कप का ज़िक्र है – चाय का कप

इसी से मिलती-जुलती एक जापानी कथा भी पढ़ें - सबसे अच्छी चाय

और इन दो ज़ेन कथाओं में भी चाय के प्याले की बात है – चाय के प्याले, चाय का प्याला

और क्या आपको लिप्टन की चाय के बारे में पता है? लिप्टन कौन था? पढ़ें - लिप्टन की चाय

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सबसे अच्छी चाय

जापान में कुलीन व्यक्तियों का एक समूह था जिसके सदस्य साथ बैठकर सबसे अच्छी चाय पीने और वार्तालाप करने के लिए मिलते थे. समूह के सदस्य हमेशा महंगी-से-महंगी और अपने स्वाद से लुभा लेनेवाली जायकेदार चाय की खोज में लगे रहते थे.

एक बार समूह के सबसे बुजुर्ग सदस्य के ऊपर सभी सदस्यों को चाय पिलाने की बारी आई. जापान की परंपरा के अनुसार बड़े सलीके से चाय पिलाने का प्रबंध किया गया. बुजुर्ग सदस्य ने स्वर्ण पात्र से चाय निकालकर सभी को परोसी. वहां उपस्थित सभी जन चाय के अप्रतिम जायके से अभिभूत थे और उन्होंने बुजुर्ग से पूछा कि उन्हें ऐसी अद्भुत चाय कहाँ से मिली.

बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए कहा – “भाइयों, जिस चाय को पीकर आप इतना आनंदित हो रहे हैं उसे तो मेरे फ़ार्म के मजदूर रोज़ ही अपने घर में पीते हैं. जीवन में जो कुछ भी सबसे अच्छा है वह सर्वसुलभ है और उसे पाने के लिए कुछ खर्च नहीं करना पड़ता.

(फादर एंथोनी डी’मेलो की कहानी – A story of Father Anthony de Mello – in Hindi)

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लिप्टन की चाय

Sir_Thomas_Johnstone_Lipton00अंग्रेजों ने बहुत सारी चीज़ों से भारतीयों का परिचय कराया. चाय भी उनमें से एक है. मेरे दादा बताते थे कि जब शुरुआत में चाय भारत में आई तो उसका बड़ा जोरशोर से प्रचार किया गया लेकिन कोई उसे चखना भी नहीं चाहता था. ठेलों में केतली सजाकर ढोल बजाकर उसका विज्ञापन किया जाता था लेकिन लंबे अरसे तक लोगों ने चाय पीने में रुचि नहीं दिखाई.

एक-न-एक दिन तो मार्केटिंग का असर होना ही था. धीरे-धीरे लोग चाय की चुस्कियों में लज्ज़त पाने लगे. अब तो चाय न पीने वाले को बड़ा निर्दोष और संयमित जीवन जीने वाला मान लिया जाता है, जैसे चाय पीना वाकई कोई ऐब हो.

खैर. इस पोस्ट का मकसद आपको चाय पीने के गुण-दोष बताना नहीं है. चाय का कारोबार करनेवालों में लिप्टन कम्पनी का बड़ा नाम है. इस कंपनी की स्थापना सर थॉमस जोंस्टन लिप्टन ने की थी. वे कोई संपन्न उद्योगपति नहीं थे. उन्हें यकीन था कि लोग चाय पीने में रुचि दिखायेंगे और उन्होंने चाय के धंधे में जोखिम होने पर भी हाथ आजमाने का निश्चय किया.

शुरुआत में लिप्टन को धंधे में हानि उठानी पडी लेकिन वे हताश नहीं हुए. एक बार वे बड़े जहाज में समुद्री यात्रा पर निकले थे. रास्ते में जहाज दुर्घटना का शिकार हो गया. जहाज के कैप्टन ने जहाज का भार कम करने के लिए यात्रियों से कहा कि वे अपना भारी सामान समुद्र में फेंक दें. लिप्टन के पास चाय के बड़े भारी बक्से थे जिन्हें समुद्र में फेंकना जरूरी था. जब दूसरे यात्री अपने सामान को पानी में फेंकने की तैयारी कर रहे थे तब लिप्टन अपनी चाय के बक्सों पर पेंट से लिखने लगे “लिप्टन की चाय पियें”. यह सन्देश लिखे सारे बक्से समुद्र में फेंक दिए गए.

जहाज सकुशल विपदा से निकल गया. लिप्टन को विश्वास था कि उनकी चाय के बक्से दूर देशों के समुद्र तटों पर जा लगेंगे और उनकी चाय का विज्ञापन हो जायेगा.

लंदन पहुँचने पर लिप्टन ने दुर्घटना का सारा आँखों देखा हाल विस्तार से लिखा और उसे समाचार पत्र में छपवा दिया. रिपोर्ट में यात्रियों की व्याकुलता और भय का सजीव चित्रण किया गया था. लाखों लोगों ने उसे पढ़ा. रिपोर्ट के लेखक के नाम की जगह पर लिखा था ‘लिप्टन की चाय’.

अपनी धुन के पक्के लिप्टन ने एक दुर्घटना का लाभ भी किस भली प्रकार से उठा लिया. लिप्टन की चाय दुनिया भर में प्रसिद्द हो गई और लिप्टन का व्यापार चमक उठा.

(A motivational / inspirational anecdote of the maker of Lipton Tea – in Hindi)

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चाय का कप

यह कहानी एक दंपत्ति के बारे में है जो अपनी शादी की पच्चीसवीं वर्षगाँठ मनाने के लिए इंग्लैंड गए और उनहोंने पुरानी वस्तुओं की दुकान याने एंटीक शॉप में खरीददारी की। उन दोनों को एंटीक चीज़ें खासतौर पर चीनी मिटटी के बर्तन, कप-प्लेट आदि बहुत अच्छे लगते थे। दूकान में उन्हें एक बेजोड़ कप दिखा और उनहोंने उसे दूकानदार से देखने के लिए माँगा।

जब वे दोनों उस कप को अपने हांथों में लेकर देख रहे थे तभी वह कप उनसे कुछ कहने लगा – “आप जानते हैं, मैं हमेशा से ही चाय का यह कप नहीं था। एक समय था जब मैं भूरी मिटटी का एक छोटा सा लौंदा था। मुझे बनाने वाले ने मुझे अपने हांथों में लिया और मुझे खूब पीटा और पटका। मैं चिल्ला-चिल्ला कर यह कहता रहा की भगवान के लिए ऐसा मत करो । मुझे दर्द हो रहा है, मुझे छोड़ दो, लेकिन वह केवल मुस्कुराता रहा और बोला अभी नहीं और फ़िर धडाम से उसने मुझे चाक पर बिठा दिया और मुझे ज़ोर-ज़ोर से इतना घुमाया की मुझे चक्कर आ गए, मैं चीखता रहा रोको, रोको, मैं गिर जाऊँगा, मैं बेहोश हो जाऊँगा!”

“लेकिन मेरे निर्माता ने केवल अपना सर हिलाकर धीरे से कहा – “अभी नहीं”।

“उसने मुझे कई जगह पर नोचा, मोडा, तोडा। फ़िर अपने मनचाहे रूप में ढालकर उसने मुझे भट्टी में रख दिया। इतनी गर्मी मैंने कभी नहीं झेली थी। मैं रोता रहा और भट्टी की दीवारों से टकराता रहा। मैं चिल्लाता रहा, बचाओ, मुझे बाहर निकालो! और जब मुझे लगा की अब मैं एक मिनट और नहीं रह सकता तभी भट्टी का दरवाज़ा खुला। उसने मुझे सहेजकर निकला और टेबल पर रख दिया। मैं धीरे-धीरे ठंडा होने लगा”।

“वह बेहद खुशनुमा अहसास था, मैंने सोचा। लेकिन मेरे ठंडा होने के बाद उसने मुझे उठाकर ब्रश से जोरों से झाडा। फ़िर उसने मुझे चारों तरफ़ से रंग लगाया। उन रंगों की महक बहुत बुरी थी। मैं फ़िर चिल्लाया, रोको, रोको, भगवन के लिए! लेकिन उसने फ़िर से सर हिलाकर कह दिया, अभी नहीं…”

“फ़िर अचानक उसने मुझे फ़िर से उस भट्टी में रख दिया। इस बार वहां पहले जितनी गर्मी नहीं थी, बल्कि उससे भी दोगुनी गर्मी थी। मेरा दम घुटा जा रहा था। मैं चीखा-चिल्लाया, रोया-गिडगिडाया, मुझे लगा की अब तो मैं नहीं बचूंगा! लेकिन तभी दरवाज़ा फ़िर से खुला और उसने मुझे पहले की तरह फ़िर से निकलकर टेबल पर रख दिया। मैं ठंडा होता रहा और सोचता रहा कि इसके बाद मेरे साथ क्या होगा”।

“एक घंटे बाद उसने मुझे आईने के सामने रख दिया और मुझसे बोला – “ख़ुद को देखो”।

“मैंने ख़ुद को आईने में देखा… देखकर कहा – “यह मैं नहीं हूँ! मैं ये कैसे हो सकता हूँ! ये तो बहुत सुंदर है। मैं सुंदर हूँ!?”

“उसने धीरे से कहा – “मैं चाहता हूँ कि तुम ये हमेशा याद रखो कि… मुझे पता है की तुम्हें तोड़ने-मोड़ने, काटने-जलने में तुम्हें दर्द होता है, लेकिन यदि मैंने तुम्हें अकेले छोड़ दिया होता तो तुम पड़े-पड़े सूख गए होते। तुम्हें मैंने चाक पर इतना घुमाया कि तुम बेसुध हो गए, लेकिन मैं यह नहीं करता तो तुम बिखर जाते!”

“मुझे पता है कि तुम्हें भट्टी के भीतर कैसा लगा होगा! लेकिन यदि मैंने तुम्हें वहां नहीं रखा होता तो तुम चटख जाते। तुम्हें मैंने पैनी सुई जैसे दातों वाले ब्रश से झाडा और तुमपर दम घोंटने वाले बदबूदार रंग लगाये, लेकिन यदि मैं ऐसा नहीं करता तो तुममें कठोरता नहीं आती, तुम्हारे जीवन में कोई भी रंग नहीं होता”।

“और यदि मैंने तुम्हें दूसरी बार भट्टी में नही रखा होता तो तुम्हारी उम्र लम्बी नहीं होती। अब तुम पूरी तरह तैयार हो गए हो। तुम्हें बनाने से पहले मैंने तुम्हारी जो छवि मैंने अपने मन में देखी थी अब तुम वही बन गए हो”।

( A inspirational / motivational story / anecdote about a teacup – in Hindi)

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A Cup of Tea – चाय का प्याला

teacupमेइज़ी युग (१८६८-१९१२) के नान-इन नामक एक ज़ेन गुरु के पास किसी विश्वविद्यालय का एक प्रोफेसर ज़ेन के विषय में ज्ञान प्राप्त करने के लिए आया।

नान-इन ने उसके लिए चाय बनाई। उसने प्रोफेसर के कप में चाय भरना प्रारम्भ किया और भरता गया। चाय कप में लबालब भरकर कप के बहार गिरने लगी।

प्रोफेसर पहले तो यह सब विस्मित होकर देखता गया लेकिन फ़िर उससे रहा न गया और वह बोल उठा। ”कप पूरा भर चुका है। अब इसमें और चाय नहीं आयेगी”।

“इस कप की भांति”, – नान-इन ने कहा – ”तुम भी अपने विचारों और मतों से पूरी तरह भरे हुए हो। मैं तुम्हें ज़ेन के बारे में कैसे बता सकता हूँ जब तक तुम अपने कप को खाली नहीं कर दो”।

(A zen story ‘Empty Your Cup’ of Master Nan-in translated in Hindi)

Nan-in, a Japanese master during the Meiji era (1868-1912), received a university professor who came to inquire about Zen.

Nan-in served tea. He poured his visitor’s cup full, and then kept on pouring.

The professor watched the overflow until he no longer could restrain himself. “It is overfull. No more will go in!”

“Like this cup,” Nan-in said, “you are full of your own opinions and speculations. How can I show you Zen unless you first empty your cup?”

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