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Posts tagged ‘गुरू-शिष्य’

The Disciple and the Horse – शिष्य और घोड़ा


white horse by alice popkorn

गुरु की कठोर एवं संयमित दिनचर्या से प्रभावित होकर शिष्य ने उनका अनुसरण करने का निश्चय कर लिया और सबसे पहले उसने पुआल पर सोना शुरु कर दिया.

गुरु को शिष्य के व्यवहार में कुछ परिवर्तन दिखाई दे रहा था. उन्होंने शिष्य से पूछा कि वह इन दिनों क्या साध रहा है.

“मैं शीघ्र दीक्षित होने के लिए कठोर दिनचर्या का अभ्यास कर रहा हूं,” शिष्य ने कहा.

“मेरे श्वेत वस्त्र मेरी शुद्ध ज्ञान की खोज को दर्शाते हैं, शाकाहारी भोजन से मेरे शरीर में सात्विकता की वृद्धि होती है, और सुख-सुविधा से दूर रहने पर मैं आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर होता हूं.”

गुरु मुस्कुराए और उसे खेतों की ओर ले गए जहां एक घोड़ा घास चर रहा था.

“तुम खेत में घास चर रहे इस घोड़े को देखते हो? इसकी खाल सफेद है, यह केवल घास-फूस खाता है, और अस्तबल में भूसे पर सोता है. क्या तुम्हें इस घोड़े में ज़रा सी भी साधुता दिखती है? क्या तुम्हें लगता है कि आगे जाकर एक दिन ये घोड़ा सक्षम गुरु बन जाएगा?”

(~_~)

The master was an austere man, so the disciple decided to lead a life of sacrifice by sleeping on a bed made of straw.

After some time the master noticed a change in his disciple’s behaviour and decided to find out what was happening.

“I am climbing the steps of initiation,” was the answer.

“The white of my garments shows the simplicity of the search, the vegetarian food purifies my body, and the lack of comfort makes me think only of spiritual things.”

Smiling, the master took him to a field where a horse was grazing.

“Do you see that animal over there? His skin is white, he eats only herbs, and he sleeps in a barn with a floor covered in straw. Do you think that he looks like a saint, or that one day he will manage to become a true master?”

वर्तमान


“सदैव वर्तमान में उपस्थित रहने से आपका क्या तात्पर्य है?”, शिष्य ने गुरु से पूछा.

गुरु ने शिष्य को एक छोटी जलधारा के पार तक चलने के लिए कहा. जलधारा के बीच कुछ दूरी पर पड़े पत्थरों पर चलकर वे दूसरी ओर आ गए.

गुरु ने पूछा, “एक पत्थर पर पैर रखकर अगले पत्थर पर पैर रखना आसान था न?”

“हाँ”, शिष्य ने कहा, “क्या यही सीख है कि एक बार में एक पत्थर पर पैर धरना है?”

“नहीं, सीख यह है कि…”, गुरु ने कहा, “यदि तुम पत्थरों पर क्रमशः एक-एक करके पैर रखोगे तो पार जाना सरल हो जाएगा. लेकिन यदि तुम हर पत्थर को उठाकर आगे बढ़ना चाहोगे तो तुम डूब जाओगे”.

शिष्य जलधारा में जमे हुए विशाल पत्थरों को देखकर यह कल्पना करता रहा कि कोई उन्हें किस भांति ढोकर पार ले जा सकेगा. फिर उसने श्रद्धापूर्वक गुरु को नमन किया.

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