खुश रहने के तरीके – Happiness in 11 Steps

अक्सर हम लोग अपनी तरफ से पूरी मेहनत कर रहे होते हैं, लेकिन नतीजे हमेशा अपनी पसंद के हिसाब से मिलते. कभी पैसे कम मिल रहे होते हैं तो कभी पैसों के चक्कर में अपनी पसंद का काम छोड़कर कुछ ऐसा करना पड़ता है जो ज़रा कम पसंद हो. कभी ऐसा भी होता है जब पैसे और पसंद दोनों मिल रहे होते हैं लेकिन घर / परिवार / दोस्तों से दूर रहकर काम करना पड़ता है. ऐसे में सक्सेसफुल होने या कहलाने के बाद भी दिल भीतर से खुश नहीं रहता. ऐसे में शायद हम लोग कुछ छोटी-छोटी चीज़ें भूल रहे होते हैं जिनकी ओर ध्यान देने पर अपने मन को दिलासा दे सकते हैं, खुश रह सकते हैं.

happy-things-vector-1024x1024खुश रहने के तरीके हमें बचपन से ही पता होते हैं, सिर्फ बाद में जीवन की आपाधापी में हम इन्हें भूल जाते हैं. अपने बचपन के दिनों को याद कीजिए, थोड़ा सा बच्चों वाली हरकतें करके देखियेः-

1. मुस्कुराइए ज्यादाऔर शिकायतें कम कीजिये. हर समय तुनकने और शिकायतें करते रहनेवाले व्यक्ति को कौन पसंद करेगा? बच्चों से कुछ सीखिए. बच्चे दिन भर हँसते हैं, 400 बार लगभग, और शायद एक दो बार किसी चीज़ की शिकायत करते हैं! 

2. नए लोगों और पुराने दोस्तों से मिलते रहिये. अपना फोन उठाइए और देखिए कि आपने अपने किन दोस्तों और रिश्तेदारों से बहुत समय से बात नहीं की है. उन्हें फोन लगाकर सरप्राइज़ दीजिए, आप दोनों ही बात करके बहुत अच्छा फ़ील करेंगे. पड़ोस में कोई नया शिफ्ट किया हो तो खुद से आगे बढ़कर उनका परिचय लीजिए, हो सकता है वे संकोच के कारण आप. नए लोग 

3. अपने परिवार को थोड़ा अधिक समय दीजिये. पुराने दिनों में आप स्कूल से घर लोटते ही सबको पूरे दिन के किस्से सुनाने लगते थे न? उसी तरह शाम की चाय के दौरान या डिनर से समय उनसे बातें कीजिए. उनसे पूछिए कि उनका दिन कैसा बीता. 

4. जरुरत पड़ने पर दूसरों की यथासंभव मदद कीजिये. किसी को कोई मामूली चीज़ जैसे ‘पेंसिल’ या ‘रबर’ नहीं मिल रही हो तो अपनी देने में कोई नुकसान नहीं है. बहुत संभव है कि वे आपसी छोटी सी मदद को भी याद रखेंगे. वे पेपरवर्क या कंप्यूटर में कहीं अटक रहे हों तो उन्हें ज़रूरी सुझाव दें. यदि आर्थिक रूप से मदद करने का मामला हो तो उतनी ही रकम दें जितने का घाटा आप सहन कर सकते हों, हालांकि यह ज़रूरी नहीं कि सामनेवाला आपका उधार चुकता न ही करे. 

5. आशावादी बनिए, सब अच्छा ही होगा ये मान के चलिए. मम्मी के डांटने पर बच्चे शाम को घर लौटने पर पापा से शिकायत करते हैं न! यह मत सोचिए कि जिस चीज को बुरा होना है वह बुरा होकर रहेगी. हमेशा याद रखिए कि सब कुछ खत्म हो जाने पर भी उम्मीद बची रहती है. सब लोग बुरे हैं और दुनिया बद से बदतर होती जा रही है, ऐसा सोचते रहने पर आपको अच्छी चीजें दिखना वाकई कम हो जाएंगी.

6. छुट्टी लीजिये और कहीं घूमने निकल जाइये. हर शहर के पास 50-100 किलोमीटर के दायरे में ऐसा बहुत कुछ होता है जिससे हम अनजान होते हैं. कभी-कभी बच्चों की गर्मियों की छुट्टी या पिकनिक जैसा वक्त बिताइए, जब किसी काम को करने की कोई फिक्र न हो. 

7. माफ़ करना सीखिए. किसने आपके साथ किस दिन क्या किया… यह सब याद रखके आप उसका क्या @#$ लेंगे? हर क्लास में वह बच्चा और हर ऑफिस में वह व्यक्ति लोगों का पसंदीदा होता है जो कोई बात अपने दिल में नहीं रखता और दूसरों की बातों को नज़रअंदाज़ करके उनसे हिलमिल कर रहता है. यदि आप ऐसा कर पाते हैं तो आपके करीबी लोगों पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और वे भी इस गुण को अपना सकते हैं.

8. नए लक्ष्य बनाइये, नयी चीज़ें सीखिए. हर रोज़ एक नया लक्ष्य, बच्चों जैसा. यदि लेखक बनना चाहते हों तो एक नोटबुक साख रखकर उसमें अपने विचार नोट करने लगें. यदि फोटोग्राफी करते हों और बढ़िया कैमरा खरीदा हो तो तय कर लें कि रोज़ कम से कम एक फोटो ज़रूर खींचेंगे और नई टेक्नीक सीखेंगे. इसे 365 Project कहते हैं. आपको जो करना पसंद हो, आप जो सीखना चाहते हों, उसके लिए अपना पर्सनल प्रोजेक्ट बनाइए और अपनी प्रगति को शेयर करते रहें, इससे आप एक तरह के पॉज़िटिव प्रेशर में रहेंगे और आलस नहीं करेंगे. 

9. कुछ शारीरिक व्यायाम कीजिये. फिटनेस का भूत सवार होने पर लोग एक ही दिन में कई मील दौड़ने जैसा अव्यावहारिक काम करके जल्द ही डिमॉरेलाइज़ हो जाते हैं. यदि बहुत लंबे अरसे से एक्सरसाइज़ न की हो तो शुरुआत जल्दी उठने और पार्क के कुछ राउंड लगाने से करें. धीरे-धीरे अपनी सैर या दौड़-भाग का दायरा और समय बढ़ाते जाएं. ये गतिविधि आपको स्वस्थ भी रखेगी और नींद भी आएगी. यदि कोई शारीरिक तकलीफ़ या बीमारी आपको व्यायाम न करने दे रही हो तो एक ही स्थान पर किए जा सकने वाला योगाभ्यास या ध्यान करें. 

10. कोई जानवर पाल लीजिये. कुत्ता पालना सबसे बेहतर रहता है क्योंकि लोग उनसे लगाव का अनुभव करते हैं और वे मालिक को चहलकदमी भी खूब कराते हैं. बच्चों का पालतू से लगाव तो आपने देखा होगा! आजकल शहरों में लोग अकेले होते जा रहे हैं. कोई पेट रखने से लोग इमोशनली संभले रहते हैं. 

11. काम से कभी फ़ुर्सत लीजिये. ऑफिस से लौटते ही लैपटॉप या फोन में घुस जाना आपको अखरता नहीं है? बच्चे भी कभी-कभी बस्ता फेंक देते हैं जनाब! कामकाज के भीषण दबाव और टारगेट पूरा करने के तनाव के कारण कितने ही लोग बीमारियों और बुरे हालातों का शिकार हो रहे हैं. 

ऐसी कई रोजाना थोड़ी पॉजिटिव सलाह देने वाली वेब साईट होती हैं, ज्यादातर अंग्रेजी में हैं, मगर दस बारह लाइन तो पढ़ ही सकते हैं! हिंदी में पढ़ना हो तो हिंदीज़ेन है ही! प्रेरक लेखों की आर्काइव में आपको बहुत अच्छे लेख पढ़ने को मिलेंगे.

यह पोस्ट मित्र आनंद कुमार ने फेसबुक में शेयर की थी. आनंद फेसबुक पर बहुत रोचक और उपयोगी बातें शेयर करते हैं. यह अंग्रेजी की इस पोस्ट का अनुवाद है, जिसका हिंदी में विस्तार किया गया है.

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To the Living : जीवन के प्रति

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किसी ने दलाई लामा से पूछा, “मनुष्यों के संबंध में वह कौन सी चीज़ है जो आपको सबसे अधिक आश्चर्यचकित करती है?”
दलाई लामा ने कहा. “स्वयं मनुष्य…
क्योंकि वह पैसे कमाने के लिए अपने स्वास्थ्य को गंवाता है.
फिर वह उसी पैसे से अपने स्वास्थय को संजोने का प्रयास करता है.
वह अपने भविष्य को लेकर इतना चिंतित रहता है कि वर्तमान को ठीक से नहीं जी पाता है.
इसके फलस्वरूप वह न तो वर्तमान में और न भविष्य में ही सुखपूर्वक जीता है,
वह ऐसे जीता है जैसे उसे कभी नहीं मरना है, और पूरी तरह जिए बिना ही मर जाता है”

(~_~)

The Dalai Lama, when asked what surprised him most about humanity, he said:
“Man.
Because he sacrifices his health in order to make money.
Then he sacrifices money to recuperate his health.
And then he is so anxious about the future that he does not enjoy the present;
the result being that he does not live in the present or the future;
he lives as if he is never going to die, and then dies having never really lived.”

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The Happiest Bird – सबसे खुश पक्षी

dawnजंगल में रहनेवाले कौवे को कोई कष्ट नहीं था और वह सुख-चैन से जी रहा था. फिर एक दिन उसने एक हंस को देखा. उजले धवल हंस को देखकर उसने सोचा, “यह हंस कितना सफेद है! और मैं कैसा काला हूं… यह हंस अवश्य ही दुनिया का सबसे खुश पक्षी होगा.”

कौवे ने यह बात हंस से कही. “नहीं भाई, ऐसा नहीं है,” हंस ने जवाब दिया, “बहुत समय तक मुझे भी लगता रहा कि मैं दुनिया का सबसे सुंदर और सुखी पक्षी हूं, लेकिन फिर एक दिन मैंने एक तोते को देखा, जिसके शरीर के दो रंगों की छटा अनूठी थी, जबकि मेरे पास तो केवल एक ही रंग है. अब मुझे लगता है कि तोता ही दुनिया का सबसे सुंदर और सुखी पक्षी है.”

कौवा तोते के पास गया. तोते ने कहा, “जब तक मैंने मोर को नहीं देखा था तब तक मुझे अपने रूप-रंग पर बड़ा गुमान था. मोर जितना सुंदर तो कोई हो ही नहीं सकता. मेरे दोरंगी पंखों का मोर से कैसा मुकाबला!”

फिर कौवा मोर को खोजने चला. उसे मोर एक चिड़ियाघर में मिला जहां उसके पिंजड़े के बाहर सैंकड़ों लोग उसकी सुंदरता की सराहना कर रहे थे. जब लोग वहां से चले गए तो कौवे ने मोर से पूछा, “मोर भइया, तुम कितने सुंदर हो! हजारों लोग रोज तुम्हें देखने यहां आते हैं. मुझे तो वे देखकर ही दुत्कार देते हैं. मुझे लगता है कि तुम दुनिया के सबसे सुखी और खुश रहने वाले पक्षी हो.”

मोर ने कहा, “मुझे भी यही लगता था भाई, कि मैं दुनिया का सबसे सुंदर और खुश पक्षी हूं, लेकिन मेरी सुंदरता ही मेरी शत्रु बन गई है. इसी के कारण अब मैं इस चिड़ियाघर में कैद हूं. यहां मैं सारे पशु-पक्षियों का मुआयना करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि तुम्हें छोड़कर बाकी सभी पक्षी यहां कैद हैं. अब मुझे यह लगने लगा है कि मैं मोर न होकर एक कौवा होता तो आजाद होता और मनमर्जी से कहीं भी घूमता फिरता.”


A crow lived in the forest and was absolutely satisfied in life. But one day he saw a swan. “This swan is so white,” he thought, “and I am so black. This swan must be the happiest bird in the world.”

He expressed his thoughts to the swan. “Actually,” the swan replied, “I was feeling that I was the happiest bird around until I saw a parrot, which has two colors. I now think the parrot is the happiest bird in creation.” The crow then approached the parrot. The parrot explained, “I lived a very happy life until I saw a peacock. I have only two colors, but the peacock has multiple colors.”

The crow then visited a peacock in the zoo and saw that hundreds of people had gathered to see him. After the people had left, the crow approached the peacock. “Dear peacock,” the crow said, “you are so beautiful. Every day thousands of people come to see you. When people see me, they immediately shoo me away. I think you are the happiest bird on the planet.”

The peacock replied, “I always thought that I was the most beautiful and happy bird on the planet. But because of my beauty, I am entrapped in this zoo. I have examined the zoo very carefully, and I have realized that the crow is the only bird not kept in a cage. So for past few days I have been thinking that if I were a crow, I could happily roam everywhere.”

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ख़ुशी, संतोष, और कामयाबी

sanjay sinhaसंजय सिन्हा पेशे से पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं. फेसुबक पर उनके लंबे स्टेटस जिंदगी और उससे जुड़े मसलों पर संजीदगी से सोचने को मजबूर करते हैं. उन्हें पढ़ने पर यह अहसास गहरा होता है कि अपनी तमाम दुश्वारियों और लाचारियों के बावजूद हमारी ज़िंदगी और ये दुनिया यकीनन बहुत सुंदर है. प्यार, पैसा और हर तरह की ऊंच-नीच के दुनियावी मसले सदा से कायम हैं और कायम रहेंगे… ज़िंदगी और वक्त ऐसी शै हैं जिनपर आप ऐतबार नहीं कर सकते… न जाने कब ये मुठ्ठी में बंद रेत की मानिंद बिखर जाएं. इसलिए अपनी अच्छाइयों को बरक़रार रखकर छोटे-छोटे लम्हों से खुशी चुराने की बात कहते हुए संजय अपने अनुभवों को साफ़गोई से बहुत रोचक अंदाज़ में बयां करते हैं. इन्हें पढ़कर आपको यकीनन बहुत अच्छा लगेगा.

संजय सिन्हा जी की अन्य पोस्टें पढ़ने के लिए पोस्ट के नीचे दिए गए टैग पर क्लिक करें.


cornelia kopp photo

जिन दिनों मैं जनसत्ता में नौकरी करता था और मेरी शादी नहीं हुई थी उन दिनों मेरे साथी अक्सर मुझसे पूछा करते थे कि तुम बेवजह इतना खुश क्यों रहते हो? हर बात पर हंसते हो और ऐसा लगता है कि तुम्हें दूसरों की तुलना में अधिक सैलरी मिलती है.

उन दिनों मैं बतौर उप संपादक नया-नया नौकरी पर आया ही था, और यकीनन मेरी सैलरी वहां मुझसे पहले से काम कर रहे लोगों से कम ही रही होगी. खैर, किसकी सैलरी कितनी थी ये मुझे ठीक से तब भी पता ही नहीं चला और आज भी नहीं पता. मुझे हमेशा लगता है कि जितने पैसों की मुझे जरुरत है, उतना पैसा मेरे पास होना चाहिए. इसलिए मेरी हंसी और मेरी खुशी की वजह किसी को सैलरी लगी, किसी को मेरा तनाव रहित जीवन लगा, किसी को मेरा खिलंदड़पन लगा और किसी को लगा कि मैं ज़िंदगी को सीरियसली नहीं लेता.

इतना पक्का है कि मैं दफ्तर जाता तो मस्ती, चुटकुले और ठहाके मेरे साथ ही दफ्तर में घुसते और चाहे-अनचाहे दिन भर की खबरों का तनाव, कइयों के घरेलू कलह कुछ समय के लिए काफूर हो जाते और अक्सर मेरे तत्कालीन बॉस हमसे कहा करते कि यार इतनी जोर जोर से मत हंसा करो, लोग बेवजह दुश्मन बन जाएंगे. वो मुझे समझाया करते कि लोग अपने दुख से कम दूसरों की खुशी से ज्यादा तकलीफ में आते हैं, इसलिए तुम जरा संभल कर रहा करो.

खैर, मैं दस साल जनसत्ता में रहा और एक दिन भी खुद को संभाल नहीं पाया. काम के समय काम और बाकी समय फुल मस्ती. मेरा मानना है कि खुश रहना असल में एक आदत है. ऐसा नहीं है कि खुश रहने वाले की जिंदगी में दुखी रहने वाले की तुलना में कम समस्याएं होती हैं. मैंने ही लिखा है कि बचपन में मां को खो देने वाला मैं, भला जीवन के किस सिद्धांत के तहत खुश रह सकता था, लेकिन फिर यही सोच कर मन को मनाता रहा कि मां जितनी तकलीफ में थी उस तकलीफ से तो उसे मुक्ति मिल गई. और उसकी मुक्ति को अपने अकेलेपन पर मैंने हावी नहीं होने दिया और खुश रहने लगा.

इतना तो मैं दस या बारह साल में समझ गया था कि ज़िंदगी सचमुच उतनी बड़ी होती नहीं है, जितनी बड़ी लगती है. वक्त उतना होता नहीं है, जितना नजर आता है. मैं ये भी समझ गया था कि कोई नहीं जानता कि जिंदगी में कल क्या होगा. कोई ये भी नहीं जानता कि आखिर में इस ज़िंदगी के होने का अर्थ ही क्या है? जब मन में इतनी बातें समा गई तो फिर ज़िंदगी एक सफर ही लगने लगा, एक ऐसा सफर जिसमें सचमुच कल क्या हो, नहीं पता. और उसी समय से मैं खुश रहने लगा. बीच-बीच में मैं भी विचलित हुआ, लेकिन फिर मन को मना लेता. दुख के तमाम पलों में भी खुशी तलाशने को अपनी आदत बनाने लगा.

मेरी खुश रहने की इसी आदत से जुड़ा एक वाकया आपको बताता हूं. जिन दिनों मैं कॉलेज में पढ़ता था, पिताजी के पेट का ऑपरेशन हुआ था, और अस्पताल के जिस कमरे में उन्हें रखा गया था उसी कमरे में रह कर मैं पिताजी की देखभाल करता था. एक दिन पिताजी सो रहे थे, और मेरा एक दोस्त मुझसे मिलने आया था. हम दोनों दोस्त बैठ कर एक दूसरे को चुटकुले सुना रहे थे. हमें ध्यान नहीं रहा कि पिताजी कब जाग गए हैं, और हमारी बातें सुन रहे हैं. किसी चुटकुले पर अचानक वो जोरों से हंसने लगे. इतनी ज़ोर से कि नर्स अंदर चली आई. उसे लगा कि पिताजी को दर्द उठ आया है. डॉक्टर कमरे में आ गए. सबने देखा कि हम तीनों जोर जोर से हंस रहे हैं. डॉक्टर तो आते ही हम पर पिल पड़ा. कहने लगा, “आप लोग मरीज की जान ले लेंगे. इतनी जोर से पागलों की तरह हंसे जा रहे हैं.”

डॉक्टर ने हमें कमरे से निकाल दिया. पिताजी को अभी अस्पताल में रहना था, लेकिन मैंने देखा कि पिताजी अपना डिस्चार्ज सर्टिफिकेट खुद ही बनवाने के लिए उठ गए थे. उन्होंने कहा, “आपकी दवाइयों से ज्यादा मुझे इस हंसी की जरुरत है और आप वही छीन लेंगे तो फिर मैं जल्दी कैसे ठीक होउंगा?”

हमें दुबारा कमरे में बुलाया गया. डॉक्टर थोड़ा ठंडा पड़ चुका था. हम दोनों दोस्त अंदर गए तो डॉक्टर ने पूछा, “आपने ऐसी कौन सी बात कही थी जो सब के सब इतनी जोर से हंस रहे थे?”

मैंने डॉक्टर से कहा कि आप एक मिनट बैठिए. एक चुटकुला सुनिए. फिर मैंने उसे ये चुटकुला सुनायाः

“एक बार एक आदमी पागलखाने के पास से गुजर रहा था कि उसकी गाड़ी पंचर हो गई. उसने वहीं अपनी गाड़ी खड़ी की और उसका पहिया खोल कर बदलने की कोशिश करने लगा. तभी पागलखाने की खिड़की से झांकता हुआ एक पागल उस आदमी से पूछ बैठा, “भैया आप क्या कर रहे हो?”

आदमी ने पागल की ओर देखा और मुंह बना कर चुप रह गया. उसने सोचा कि इस पागल के मुंह क्या लगना? उसने उस पहिये के चारों स्क्रू खोल दिए, और टायर बदलने ही वाला था कि कहीं से वहां भैंसों का झुंड आ गया. वो आदमी वहां से भाग कर किनारे चला गया. जब भैंसे चली गईं तो वह दुबारा गाड़ी के पास आया कि टायर बदल ले. जब वो वहां पहुंचा तो उसने देखा कि जिस पहिए को उसने खोला था उसके चारों स्क्रू गायब हैं. वो बड़ा परेशान हुआ. उसकी समझ नहीं पा रहा था कि अब वो क्या करे. पहिया खुला पड़ा था, चारों स्क्रू भैंसों की भगदड़ में गायब हो गए थे.

वो परेशान होकर इधर-उधर तलाशने लगा. तभी खिड़की से फिर उसी पागल ने पूछा कि भैया क्या हुआ? परेशान आदमी ने झल्ला कर कहा, “अरे पागल मैंने पहिया बदलने के लिए चारों स्क्रू बाहर निकाले थे अब मिल नहीं रहे. क्या करूं समझ में नहीं आ रहा, ऊपर से तुम सिर खा रहे हो.”

उस पागल ने वहीं से कहा, “भैया स्क्रू नहीं मिल रहे तो कोई बात नहीं. आप बाकी तीनों पहियों से एक एक स्क्रू निकाल कर चौथे पहिए को तीन स्क्रू लगाकर टाइट कर लीजिए और फिर गैराज जाकर नए स्क्रू लगवा लीजिएगा. ऐसे परेशान होने से तो कुछ नहीं होने वाला.”

आदमी चौंका. बात तो पते की थी. चार की जगह तीन स्क्रू पर गाड़ी चल जाती. उसने पागल की ओर देखा और कहा, “यार बात तो तुमने ठीक कही है, लेकिन बताओ जब तुम इतने समझदार हो तो यहां पागलखाने में क्या कर रहे हो?”

पागल ने वहीं से जवाब दिया, “भैया, मैं पागल हूं, मूर्ख थोड़े ही हूं?”

डॉक्टर ने चुटकुला सुना और जोर जोर से ठहाके लगाने लगा. फिर उसने कहा, “गॉल ब्लैडर के ऑपरेशन के बाद कोई मरीज अगले दिन दर्द से कराहने की जगह इतना हंस पड़े ये तो कमाल ही है.”

अपने तमाम गमों के बीच भी मैं ऐसे ही हंसी तलाशता रहा. खुशी तलाशता रहा. संतोष तलाशता रहा. आखिर में मैं इसी नतीजे पर पहुंचा कि संतुष्ट होना कामयाब होने से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है. कामयाबी का पैमाना दूसरे तय करते, जबकि संतोष का पैमाना आपके पास होता है. संतोष का पैमाना दिल होता है. कामयाबी खुशी की गारंटी नहीं होती, लेकिन संतुष्ट होना खुशी की गारंटी देता है. इसीलिए उस दिन अस्पताल में डॉक्टर ने हमें भले शुरू में पागल कहा, पर इतना तो वो भी समझ गया था कि ये मूर्ख नही हैं, और जो मूर्ख नहीं होते वो कामयाबी के पीछे नहीं भागते, वो खुशियों को गले लगाते हैं.

कामयाबी के पीछे भागने वाले अक्सर भागते रहते हैं, और जीवन भर अपनी गाड़ी के पहिए को फिट करने के लिए खोए हुए स्क्रू को तलाशते रहते हैं. जो समझदार होते हैं, वो बाकी पहियों से एक-एक स्क्रू लेकर आगे बढ़ चलते हैं.

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खुशी : Happiness

balloons (2)

एक सेमिनार में लगभग 50 व्यक्ति भाग ले रहे थे. सहसा वक्ता ने लोगों से एक ग्रुप-एक्टिविटी में भाग लेने के लिए कहा. उसने हर व्यक्ति को एक गुब्बारा दे दिया और मार्कर पेन से उसपर व्यक्ति का नाम लिखने के लिए कहा. फिर सारे गुब्बारे एकत्र करके दूसरे कमरे में रख दिए गए.

फिर वक्ता ने सभी को कमरे में जाकर दो मिनट के भीतर अपना नाम लिखा गुब्बारा खोजकर लाने के लिए कहा. यह सुनते ही सभी लोग एक दूसरे में गुत्थमगुत्था होकर अपना गुब्बारा खोज लाने के लिए दौड़ पड़े. उस कमरे में घोर अव्यवस्था फैल गई. वे सभी एक-दूसरे से टकरा रहे थे, एक-दिसरे के ऊपर गिर रहे थे.

किसी भी व्यक्ति को दो मिनटों के भीकर अपना नाम लिखा गुब्बारा नहीं मिला.

फिर वक्ता ने उनसे कहा कि वे एक-एक करके कमरे में जाएं और कोई भी एक गुब्बारा उठाकर ले आएं और उसे उस व्यक्ति को दे दें जिसका नाम गुब्बारे पर लिखा हो. ऐसा करने पर दो मिनटों के भीतर हर व्यक्ति को उसका नाम लिखा गुब्बारा मिल गया.

वक्ता ने कहा, “जीवन में भी यही नज़र आता है कि लोग पागलों की तरह अपने इर्द-गिर्द खुशियों की तलाश कर रहे हैं लेकिन वह उन्हें नहीं मिल रही. असल में दूसरों की खुशी में ही हमारी खुशी है. आप उन्हें उनकी खुशियां सौंप दें, फिर आपको अपनी खुशी मिल जाएगी”.

(~_~)

Once a group of 50 people was attending a seminar. Suddenly the speaker stopped and decided to do a group activity. He started giving each one a balloon. Each one was asked to write his/her name on it using a marker pen. Then all the balloons were collected and put in another room.

Now these delegates were let in that room and asked to find the balloon which had their name written, within 2 minutes. Everyone was frantically searching for their name, colliding with each other, pushing around others and there was utter chaos.
At the end of 2 minutes no one could find their own balloon.

Now each one was asked to randomly collect a balloon and give it to the person whose name was written on it. Within minutes everyone had their own balloon.

The speaker began— exactly this is happening in our lives. Everyone is frantically looking for happiness all around, not knowing where it is. Our happiness lies in the happiness of other people. Give them their happiness; you will get your own happiness.

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