Skip to content
About these ads

Posts tagged ‘क्रोध’

How To Treat Anger – क्रोधोपचार


ब्लौगर बंधु अनुराग शर्मा जी ने हाल ही में बहुत मनोयोग से क्रोध के ऊपर कुछ पोस्ट लिखीं हैं जिन्हें आप उनके ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं. उनकी एक पोस्ट पर मैंने कमेन्ट करके यह इच्छा की थी कि वे क्रोध के उपचार पर भी कुछ लिखें. उन्होंने मुझे इस विषय पर लिखने के लिए प्रेरित किया. हिंदीज़ेन की परंपरा के अनुरूप कुछ विचार क्रोध विषयक सूक्तियों से लिए गए हैं जिनका मैंने केवल विस्तार ही किया है.

हमारे भीतर क्रोध तब उपजता है जब हम स्वयं से तथा क्रोध उपजानेवाले दीर्घकालिक और तात्कालिक कारणों से अनभिज्ञ होते हैं. इस अनभिज्ञता के कारण ही क्रोध जैसे अप्रिय मनोभाव का उदय होता है. लालसा, अभिमान, उत्तेजना, ईर्ष्या और संदेह भी क्रोध का मूल हैं. चूंकि क्रोध हमारे भीतर ही जन्म लेता है इसलिए हम ही इसके प्राथमिक कारक हैं. अन्य व्यक्ति तथा परिवेश आदि सदैव गौण होते हैं. प्रकृति के प्रलयंकारी विप्लव यथा भूकंप अथवा बाढ़ आदि द्वारा घटित विनाश एवं हानि का आकलन करना हमारे लिए कठिन नहीं है और उन्हें हम किंचित सहनशीलता से स्वीकार भी कर लेते हैं, लेकिन जब कोई व्यक्ति हमें क्षति पहुंचाता है तो हमारा धैर्य चुक जाता है. हमें इस पर विचार करना चाहिए कि जिस प्रकार भूकंप अथवा बाढ़ आदि के सुनिश्चित कारण होते हैं, उसी प्रकार हमारे भीतर क्रोध भड़कानेवाले व्यक्ति के भीतर भी हमें क्रुद्ध करने के लिए दीर्घकालिक एवं तात्कालिक कारण मौजूद हैं उपस्थित होते हैं. ठीक वही कारक हमारे भीतर भी अवस्थित हो सकते हैं.

उदाहरण के लिए, यह संभव है कि हमसे दुर्व्यवहार करने वाले व्यक्ति के साथ एक दिन पहले किसी ने बुरा बर्ताव किया हो या उसके पिता ने उसपर बचपन में क्रूरता बरती हो. ये घटनाएं उसके भीतर क्रोध उपजाने वाले तात्कालिक या सुषुप्त कारक हो सकतीं हैं. यदि हम इन कारणों या कारकों को अंतर्दृष्टि के साथ और बोधपूर्वक समझने लगेंगे तो क्रोध से मुक्ति सहज हो जायेगी. इसका अर्थ यह नहीं है कि हमारे ऊपर घातक प्रहार करने वाले व्यक्ति को यूं ही जाने दिया जाए, उसे अनुशासित करना अति आवश्यक है. लेकिन इसके पहले यह ज़रूरी है कि हम अपने भीतर से नकारात्मकता को बाहर निकाल फेंकें. किसी व्यक्ति की सहायता करने अथवा उसे सही मार्ग पर लाने के लिए हमारे भीतर करुणा होनी चाहिए. जब तक हम अन्य व्यक्तियों के दुःख की समानुभूति नहीं करेंगे तब तक हम इस योग्य नहीं बन सकते कि उसे दुःख और भ्रान्ति के दलदल से बाहर निकाल सकें. क्रोध के उपचार के लिए इन बिन्दुओं पर भी मनन करना उपयोगी होगा:

किसी कष्टदायक परिस्थिति का सामना करने पर हमारे भीतर प्रतिरोध की भावना जन्म लेती है और हमारा क्रोध बढ़ने लगता है. हमारे क्रोध की अभिव्यक्ति सामनेवाले व्यक्ति के भीतर खलबली मचाती है और वह अपनी पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए फिर कुछ ऐसा कहता या करता है जिससे हमारा क्रोध उग्र हो जाता है. यह एक चक्र की भांति है. इसलिए यह कहा जाता है कि ऐसी दशा में उस परिस्थिति से बाहर निकाल जाना ही सबसे उचित उपाय है, लेकिन ऐसे भी कुछ अवसर हो सकते हैं जब यह उपाय कारगर न हो. यह और कुछ नहीं बल्कि पलायन ही है.

हमारे अंगों की भांति ही क्रोध भी हमारी काया का ही एक भाग है. अंतस में क्रोध उपजने पर हम हम इससे यह नहीं कह सकते “दूर चले जाओ, क्रोध! मैं तुम्हें नहीं चाहता!” जब हमारे पेट में दर्द होता है तब हम यह नहीं कहते कि “दूर हट जाओ, पेट! मत दुखो!” इसके उलट हम उसका उपचार करते हैं. ऐसा ही हमें क्रोध के साथ भी करना होता है. क्रोध और घृणा की उपस्थिति प्रेम और स्वीकरण के अभाव की द्योतक नहीं होती. प्रेम सदैव भीतर रहता है. उसकी खोज करनी पड़ती है.

क्रोध उपजने की दशा में कुछ संभलें और अपने ग्रहणबोध का अवलोकन करें. यह कुछ कठिन है पर साधने पर सध जाता है. हम सभी बहुधा ही अनुभूतियों के संग्रहण में तत्परता दिखाते हैं और अनुचित भावनाओं को प्रश्रय देते हैं जबकि हमारे भीतर करुणा और शांति का इतना विराट संचय होना चाहिए कि हम अपने विरोधियों से भी प्रेम कर सकें.

जब आपको किसी व्यक्ति पर क्रोध आये तो यह नहीं दर्शायें कि आप क्रुद्ध नहीं हैं. यह भी नहीं दिखाएँ कि आपको बिलकुल पीड़ा नहीं हुई है. यदि सामनेवाला व्यक्ति आपका प्रिय है तो आपको उसे यह जताना चाहिए कि आपको उसके वचनों या कर्मों से दुःख पहुंचा है. उसे यह प्रेमपूर्वक बताएं.

प्रारंभ में आप यह समझ नहीं पायेंगे कि आपके भीतर क्रोध कैसे उपजता है और यह भरसक प्रयत्न करने के बाद भी क्यों नहीं गलता. यदि आप अपने मनोभावों के प्रति जागरूक बनें और क्षण-प्रतिक्षण सजग एवं सचेत रहने का अभ्यास करेंगे तो आप क्रोध की प्रकृति को पहचान जायेंगे और इससे छुटकारा पाना सरल हो जाएगा.

किसी भी व्यक्ति में क्रुद्ध होने के संस्कार अल्पवय में पड़ते हैं. इसका संबंध दिन-प्रतिदिन घटनेवाली घटनाओं से है. यदि आप भेदभाव किये बिना स्वयं की देखभाल करेंगे और मन में नकारात्मकता को हावी नहीं होने देंगे तो आपकी सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होगी. गीता में कहा गया है कि “भुने बीजों में कामना का अंकुर नहीं फूट सकता”, इस बात को मैं क्रोध पर भी लागू करता हूँ.

क्रोध और हताशा का प्रवाह बहुधा बहा ले जाता है फिर भी मानव मन के किन्हीं कोटरों में प्रेम और क्षमा बची रह जातीं हैं. क्रोध प्रत्येक प्राणी को आता है पर मनुष्यों में यह योग्यता है कि वे दूसरे व्यक्ति से सार्थक संवाद स्थापित कर सकते हैं. हम मनुष्य क्षमाशील हैं. हम करूणावश अपना सर्वस्व भी न्यौछावर करने की शक्ति व संकल्प रखते हैं. हम केवल क्रोध एवं दुःख का समुच्चय नहीं हैं. अपने क्रोध का अवसान करने शांति प्राप्त कर सकते हैं. केवल क्रोध को दूर करने के प्रयोजन के लिए ही नहीं बल्कि स्वयं के भीतर उतरकर देखने के अभ्यास के फलस्वरूप हम अन्य मनोविकारों से भी छुटकारा पा सकते हैं. हम क्रोध के बीज को अंकुरण की प्रतीक्षा करते भी देख सकते हैं. वास्तविकता का भान होने पर हम यह जान जाते हैं कि क्रोध का मूल कारण हमारे भीतर ही निहित होता है और वह व्यक्ति केवल निमित्त मात्र ही है जिसपर क्रोध किया जा रहा है. वह हमारे क्रोध का पात्र नहीं है. क्रोध हमारे भीतर है अतः हम ही उसका पात्र हैं.

यदि आपके घर में आग लग जाए तो आप सबसे पहले क्या करेंगे? आप आग बुझाने का जतन करेंगे या आग लगानेवाले व्यक्ति-वस्तु की खोज करेंगे? उस घड़ी में यदि आप आग लगने के कारणों का अनुसंधान करने लगेंगे तो आपका घर जलकर ख़ाक हो जाएगा. ऐसे में सर्वप्रथम आग बुझाना ही श्रेयस्कर है. अतः क्रोध की अवस्था में आपका अन्य व्यक्ति से वाद-विवाद जारी रखना उचित नहीं होता.

क्रोध आने की दशा में पानी पी लेना, सौ तक की गिनती गिनना, मुस्कुराना, या उस स्थान से दूर हट जाना समस्या का समाधान नहीं है. यह एक प्रकार का दमन ही है इसलिए मैं ऐसे उपायों का समर्थन नहीं करता. क्रोध एक आतंरिक समस्या है और इसका कोई बाहरी समाधान नहीं है.

तिक न्यात हंह की एक पुस्तक से एक कथा उद्घृत करना चाहूँगा:

एक धर्मावलम्बी महिला अमिताभ बुद्ध की नियमित आराधना करती थी. दिन में तीन बार घंटी बजाकर “नमो अमिताभ बुद्ध” मन्त्र का एक घंटा जप करना उसकी दिनचर्या में शामिल था. मन्त्र का एक हज़ार जप करने पर वह पुनः घंटी बजाती. यह आराधना करते उसे दस वर्ष हो रहे थे पर उसके व्यक्तित्व में कोई परिवर्तन नहीं आया. उसके भीतर क्रोध और अहंकार भरपूर था और वह लोगों पर चिल्लाती रहती थी.

उस महिला का मित्र उसे सबक सिखाना चाहता था. एक दिन महिला जब अगरबत्तियां जलाकर और तीन बार घंटी बजाकर “नमो अमिताभ बुद्ध” मन्त्र का जप करने के लिए तैयार हुई तब उसके मित्र ने दरवाज़े पर आकर कहा, “श्रीमती नगुयेन, श्रीमती नगुयेन!”. यह सुनकर महिला को बहुत गुस्सा आया क्योंकि वह जप करनेवाली ही थी. वह मित्र दरवाजे पर खड़ा रहा और उसका नाम पुकारता रहा. महिला ने सोचा, “मुझे अपने क्रोध पर विजय पानी है, मैं उसके पुकारने पर ध्यान ही नहीं दूंगी. वह “नमो अमिताभ बुद्ध” का जप करने लगी.

वह व्यक्ति दरवाजे पर खड़ा था और बार-बार उसे पुकार रहा था, दूसरी ओर महिला का क्रोध बढ़ता जा रहा था. वह क्रोध से लड़ रही थी. उसके मन में आया, “क्या मुझे जप रोककर उठ जाना चाहिए?” लेकिन उसने जप करना जारी रखा. भीतर क्रोध की आग धधकती जा रही थी और बाहर जप चल रहा था, “नमो अमिताभ बुद्ध”. उसका मित्र उसकी दशा भांप रहा था इसलिए वह दरवाज़े पर खड़ा पुकारता रहा, “श्रीमती नगुयेन, श्रीमती नगुयेन!”

महिला और अधिक बर्दाश्त नहीं कर सकी. उसने अपने घंटी और आसनी फेंक दी, भड़ाम से दरवाजा खोला और मित्र से चीखती हुई बोली, “तुम ऐसा क्यों कर रहे थे!? बार-बार मेरा नाम लेने की क्या ज़रुरत थी!?

उसका मित्र मुस्कुराता हुआ बोला, “मैंने सिर्फ दस मिनट ही तुम्हारा नाम लिया और तुम इतना क्रोधित हो गयीं! ज़रा सोचो, दस साल से तुम बुद्ध का नाम ले रही हो, वे कितना क्रोधित हो गए होंगे!?”

“Anger is like a howling baby, suffering and crying. Your anger is your baby. The baby needs his mother to embrace him. You are the mother. Embrace your baby.” ~ Thich Nhat Hanh.

A woman called Nuyen used to recite Buddha’s name daily. Although she was reciting Buddha’s name for over 10 years, she was still quite mean, aggressive and used to often shout at people all the time. She usually used to starts her practice by lighting incense and hitting a little bell.

Once her friend wanted to teach her a lesson, so as she began her chanting and prayer, the friend came to her door and called out, “Miss Nuyen, Miss Nuyen!”.

As this was the time for her prayers and chanting the woman got annoyed, but she said to herself, “I have to struggle against my anger, so I will just ignore it.”

She continued reciting Buddha’s name. The man also continued to call her name, as she became more and more oppressive. But the woman kept struggling against her anger and wondered whether she should stop the recitation to give the man a piece of her mind, but she continued reciting.

The man outside also continued shouting her name, “Miss Nuyen, Miss Nuyen, Miss Nuyen….”

The woman could not stand it anymore, so she stopped her chanting of Buddha’s name, jumped to her feet, slammed the door and went to the gate and shouted at the man, “Why do you have to behave like this? I am doing my recitation and you are shouting my name over and over!”

The gentleman smiled at her and said, “I called your name just for five minutes and you are so angry. But you have been calling Buddha’s name for more than ten years now. Can you imagine how angry he must be by now…!”

“जाओ, मैं गालियां नहीं लेता” – बुद्ध


प्रथम पोस्ट – प्रथम भूमिका

“बहुत कुछ लिखने को, अच्छा लिखने को और पढ़ने को मन करता है. मन की यही इच्छा मुझे पहले हिंदीज़ेन तक ले गई और फिर निशांत मिश्र तक. आगे पता चला कि निशांत वही हैं जिन्होंने मेरे साथ करीब 7 – 8 साल पहले दैनिक भास्कर भोपाल में संपादकीय विभाग में काम किया था. तार गहरे जुड़े, जुड़ते गए और अब हम निशांत की ही पहल पर हिंदीज़ेन के लिए साथ आए हैं. निशांत को बहुत धन्यवाद और इतना अच्छा सकारात्मक आधार देने के लिए आभार. सचमुच, बहुत श्रमसाध्य और समर्पण का काम है कुछ अच्छा लिखना या फिर लिखे हुए को सरल, सहज बनाकर बांटना.”

ओशो

ओशो पर बहुत – बहुत लिखा गया है, हर दिन लिखा जा रहा है, फिर भी वे बहुत सामयिक, प्रेरक और सच्चे लगते हैं . हिंदीज़ेन के लिए ओशो की सुनाई एक बोध कथा, ‘अज्ञात की ओर’ पुस्तक से साभार:

बुद्ध एक बार एक गांव के पास से निकलते थे. उस गांव के लोग उनके शत्रु थे. हमेशा ही जो भले लोग होते हैं, उनके हम शत्रु रहें हैं. उस गांव के लोग भी हमारे जैसे लोग होंगे. तो वे भी बुद्ध के शत्रु थे. बुद्ध उस गांव से निकले तो गांव वालों ने रास्ते पर उन्हें घेर लिया. उन्हें बहुत गालियां दी और अपमानित भी किया.

बुद्ध ने सुना और फिर उनसे कहा, “मेरे मित्रों तुम्हारी बात पूरी हो गई हो तो मैं जाऊं, मुझे दूसरे गांव जल्दी पहुंचना है”. वे लोग थोड़े हैरान हुए होंगे. और उन्होंने कहा, “हमने क्या कोई मीठी बातें कहीं हैं, हमने तो गालियां दी हैं सीधी और स्पष्ट. तुम क्रोध क्यों नहीं करते, प्रतिक्रिया क्यों नहीं देते?”

बुद्ध ने कहा, “तुमने थोड़ी देर कर दी. अगर तुम दस वर्ष पहले आए होते तो मजा आ गया होता. मैं भी तुम्हें गालियां देता. मैं भी क्रोधित होता. थोड़ा रस आता, बातचीत होती, मगर तुम लोग थोड़ी देर करके आए हो”. बुद्ध ने कहा, “अब मैं उस जगह हूं कि तुम्हारी गाली लेने में असमर्थ हूं. तुमने गालियां दीं, वह तो ठीक लेकिन तुम्हारे देने से ही क्या होता है, मुझे भी तो उन्हें लेने के लिए बराबरी का भागीदार होना चाहिए. मैं उसे लूं तभी तो उसका परिणाम हो सकता है. लेकिन मैं तुम्हारी गाली लेता नहीं. मैं दूसरे गांव से निकला था वहां के लोग मिठाइयां लाए थे भेंट करने. मैंने उनसे कहा कि मेरा पेट भरा है तो वे मिठाइयां वापस ले गए. जब मैं न लूंगा तो कोई मुझे कैसे दे पाएगा”.

बुद्ध ने उन लोगों से पूछा, “वे लोग मिठाइयां ले गए उन्होंने क्या किया होगा?” एक आदमी ने भीड़ में से कहा, “उन्होंने अपने बच्चों और परिवार में बांट दी होगी”. बुद्ध ने कहा, “मित्रों, तुम गालियां लाए हो मैं लेता नहीं. अब तुम क्या करोगे, घर ले जाओगे, बांटोगे? मुझे तुम पर बड़ी दया आती है, अब तुम इन इन गालियों का क्या करोगे, क्योंकि मैं इन्हें लेता नहीं? क्योंकि, जिसकी आंख खुली है वह गाली लेगा और जब मैं लेता ही नहीं तो क्रोध का सवाल ही नहीं उठता. जब मैं ले लूं तब क्रोध उठ सकता है. आंखे रहते हुए मैं कैसे कांटों पर चलूं और आंखे रहते हुए मैं कैसे गालियां लूं और होश रहते मैं कैसे क्रोधित हो जाऊं, मैं बड़ी मुश्किल में हूं. मुझे क्षमा कर दो. तुम गलत आदमी के पास आ गए. मैं जाऊं मुझे दूसरे गांव जाना है”. उस गांव के लोग कैसे निराश नहीं हो गए होंगे, कैसे उदास नहीं हो गए होंगे? आप ही सोचिये?

बुद्ध ने क्या कहा?  यही कि इस बुद्ध ने क्रोध को दबाया नहीं है. यह बुद्ध भीतर से जाग गया है इसलिए क्रोध अब नहीं है.  अस्तु .

The Apprentice Angel – दर्द के क़तरे


एक दिन एक नन्हा फ़रिश्ता किसी बुज़ुर्ग फ़रिश्ते के पास कुछ वक़्त गुज़ारने के लिए गया. वे दोनों यूं ही धरती पर किसी शहर के व्यस्त बाज़ार में आ गए. वे अदृश्य थे, उन्हें कोई भी नहीं देख सकता था. बुज़ुर्ग फ़रिश्ते ने नन्हे फ़रिश्ते से कहा – “क्या तुम कुछ काम की चीज़ देखना चाहोगे?”

नन्हे फ़रिश्ते ने कहा – “जैसा आप चाहें.” वह जानता था कि जब भी बुज़ुर्ग फ़रिश्ते ने उसे कोई ‘काम की चीज़’ दिखाई तब उसे कुछ नया सीखने को मिला.

वे दोनों बाज़ार की एक कॉफ़ी-शॉप में कॉफ़ी पी रहे एक आदमी के पीछे जाकर बैठ गए. अगले ही पल वहां शैतान आया. वह भी अदृश्य था. वह कॉफ़ी पीनेवाले आदमी के पास बैठ गया.

नन्हा फ़रिश्ता समझ गया कि उसे मिलने वाला सबक अब करीब ही था. बुज़ुर्ग फ़रिश्ते ने उससे कहा – “चलो, हम शैतान के सामने जाकर बैठ जाते हैं.”

यहाँ यह जान लेना ज़रूरी है कि फ़रिश्ते तो शैतान को देख और महसूस कर सकते हैं पर शैतान उन्हें नहीं देख सकता. अगर शैतान ने फरिश्तों को देख लिया होता तो वह अपनी उस हरकत को अंजाम नहीं देता जिसके लिए वह कॉफ़ी-शॉप में आया था.

शैतान आदमी के सर के करीब गया और उसने आदमी के कान में कुछ फुसफुसाकर कहा जिसे सुनते ही नन्हा फ़रिश्ता बोल उठा – “ओह, अब मैं सब समझ गया!”. – बुज़ुर्ग फ़रिश्ते ने उसकी पुष्टि करी – “हाँ, तो तुम अब जान गए न?”

नन्हे फ़रिश्ते ने शैतान को आदमी के कान में यह फुसफुसाते हुए सुना था – “इस दर्द को बाँटते चलो”. – यह कहकर शैतान ने आदमी को दर्द के कुछ कतरे दे दिए.

कॉफ़ी पीने के बाद वह आदमी दुकान से बाहर चला गया. दोनों फ़रिश्ते भी उसके पीछे चल दिए. आदमी जब अपनी कार तक पहुंचा तो उसने पाया कि किसी ने उसकी कार से बिलकुल सटा कर अपनी कार खड़ी कर दी थी और उसकी कार को निकाल पाना बहुत मुश्किल था. आदमी के मुंह से गालियों की बौछार निकल पडी और उसने दूसरी कार के टायर पर अपनी लात दे मारी.

उस आदमी के भीतर जब यह क्रोध उबाल ले रहा था तभी एक औरत उसके करीब से गुज़री. उस औरत ने आदमी की कोई बात नहीं सुनी लेकिन आदमी का दर्द औरत तक पहुँच गया और उसे पता ही नहीं चला कब वह दर्द उसके ज़हन में जज़्ब हो गया.

औरत के भीतर दर्द के पहुँचते ही उसकी निगाह सामने स्टोर में काम कर रही उसकी सहकर्मी पर पड़ी. उसकी सहकर्मी ने पिछले दिन उसे कोई बात कह दी थी जो उसे नागवार गुज़री थी पर वह कुछ कर न सकी. सहकर्मी को देखते ही उसे अपने भीतर उसके लिए नफरत उबलती-सी लगने लगी क्योंकि ‘उसी जाहिल के कारण उसका दिमाग अभी भी ख़राब बना हुआ था’.

दूसरी ओर, स्टोर के भीतर मौजूद सहकर्मी ने बाहर औरत के चेहरे पर अपने लिए बहुत रूखापन और नफरत पहचान ली. बाहर मौजूद औरत के दर्द ने नया ठिकाना तलाश लिया. स्टोर के भीतर मौजूद औरत को सहसा याद आ गया कि उसके बेटे ने परीक्षा में बहुत बुरे अंक प्राप्त किये हैं. उसने तय कर लिया कि घर पहुँचने पर वह अपने बेटे की अच्छी खबर लेगी.

अपनी योजना को साकार होता देख शैतान मंद मुस्कान बिखेरता हुआ चला गया. जो दर्द उसने पहले आदमी को दिया था वह उससे अनभिज्ञ निर्दोष मनुष्यों के भीतर से बदस्तूर गुज़रता रहा.

(गाई फिनले की कहानी – a story of Guy Finley)

One day, a little angel who wanted to be a big angel was spending some time with a more seasoned angel. They were invisibly walking down a busy city street, and the older angel said to the apprentice angel: “Would you like to hear something amazing?”

The little angel said, “I don’t know,” because he knew that whenever the older angel asked him things like this, he was about to receive a certain spiritual shock. The little angel finally said, “Well, all right, what is it?”

They proceeded down the street and into a little coffee shop, and in there was a man drinking his coffee. As the two angels took a seat, in walked a devil (also moving about invisibly). The devil sauntered in and sat right next to the man drinking his coffee.

The little angel knew that he was getting close to the lesson at this point, and the senior angel said, “Come on over here.”

Now, angels can see devils but devils can’t see angels, so this devil couldn’t see the two angels watching him. If he could have seen them, then he never would have done what he was about to do, because everything that angels learn about what devils are doing gives angels the opportunity to teach human beings how to be smarter than devils.

So, this devil leans over to the man sitting there in the coffee shop, and the angels lean forward to hear something that the devil whispers into the man’s ear. The little angel falls back and says, “Ah ha! I see now. This explains so much.” The senior angel confirms, “That’s right.”

What the little angel heard the devil whisper in the man’s ear was this: “Take this pain and pass it along.” With those words, the devil gave that man a little bit of pain.

The angels followed the man as he walked down the street. When he got to his car, he found that somebody had parked his car too close to his, making it very hard for him to get out of his parking space. A string of oaths came out of the man’s mouth as he contemplated banging his car into the offending car.

Then, just as he lets out that stream of violent energy, a woman walking down the street nearby — who actually didn’t hear what the man said — did exactly what the devil had told the man to do, which was to “take this pain and pass it along. ” That woman picked up the man’s pain and never even knew it, never saw it, never felt it go into her.

The moment that pain entered into the woman walking down the street, she looked in a store window and saw a co-worker who had said something to her yesterday. Now she knew why she was in pain because there was “the idiot that made her feel that way.”

The woman in the shop looked out and saw the woman looking in with a scowl on her face (that she didn’t know she had on her face), and felt the pain that woman was passing along to her. The minute the woman in the store felt it, she began to think of her son who had gotten bad grades and who continued to resist the education that was necessary, and she made up her mind that when she got home, she was going to “ground him and really show him something”, and to the devil’s delight, the pain was passed along endlessly to unsuspecting human beings.

क्रोधी बालक : An Angry Boy


nails in fence

एक १२-१३ साल के लड़के को बहुत क्रोध आता था। उसके पिता ने उसे ढेर सारी कीलें दीं और कहा कि जब भी उसे क्रोध आए वो घर के सामने लगे पेड़ में वह कीलें ठोंक दे।

पहले दिन लड़के ने पेड़ में ३० कीलें ठोंकी। अगले कुछ हफ्तों में उसे अपने क्रोध पर धीरे-धीरे नियंत्रण करना आ गया। अब वह पेड़ में प्रतिदिन इक्का-दुक्का कीलें ही ठोंकता था। उसे यह समझ में आ गया था कि पेड़ में कीलें ठोंकने के बजाय क्रोध पर नियंत्रण करना आसान था। एक दिन ऐसा भी आया जब उसने पेड़ में एक भी कील नहीं ठोंकी। जब उसने अपने पिता को यह बताया तो पिता ने उससे कहा कि वह सारी कीलों को पेड़ से निकाल दे।

लड़के ने बड़ी मेहनत करके जैसे-तैसे पेड़ से सारी कीलें खींचकर निकाल दीं। जब उसने अपने पिता को काम पूरा हो जाने के बारे में बताया तो पिता बेटे का हाथ थामकर उसे पेड़ के पास लेकर गया।

पिता ने पेड़ को देखते हुए बेटे से कहा – “तुमने बहुत अच्छा काम किया, मेरे बेटे, लेकिन पेड़ के तने पर बने सैकडों कीलों के इन निशानों को देखो। अब यह पेड़ इतना खूबसूरत नहीं रहा। हर बार जब तुम क्रोध किया करते थे तब इसी तरह के निशान दूसरों के मन पर बन जाते थे।

अगर तुम किसी के पेट में छुरा घोंपकर बाद में हजारों बार माफी मांग भी लो तब भी घाव का निशान वहां हमेशा बना रहेगा।

अपने मन-वचन-कर्म से कभी भी ऐसा कृत्य न करो जिसके लिए तुम्हें सदैव पछताना पड़े।”

(~_~)

There once was a little boy who had a bad temper. His father gave him a bag of nails and told him that every time he lost his temper, he must hammer a nail into the back of the fence.

The first day the boy had driven 37 nails into the fence. Over the next few weeks, as he learned to control his anger, the number of nails hammered daily gradually dwindled down. He discovered it was easier to hold his temper than to drive those nails into the fence.

Finally the day came when the boy didn’t lose his temper at all. He told his father about it and the father suggested that the boy now pull out one nail for each day that he was able to hold his temper. The days passed and the young boy was finally able to tell his father that all the nails were gone.

The father took his son by the hand and led him to the fence. He said, “You have done well, my son, but look at the holes in the fence. The fence will never be the same. When you say things in anger, they leave a scar just like this one. You can put a knife in a man and draw it out. It won’t matter how many times you say I’m sorry, the wound is still there.”

The little boy then understood how powerful his words were. He looked up at his father and said “I hope you can forgive me father for the holes I put in you.”

“Of course I can,” said the father.

Anger Management – क्रोधोपचार



एक ज़ेन शिष्य ने अपने गुरु से पूछा – “मैं बहुत जल्दी क्रोधित हो जाता हूँ। कृपया मुझे इससे छुटकारा दिलाएं।”

गुरु ने कहा – “यह तो बहुत विचित्र बात है! मुझे क्रोधित होकर दिखाओ।”

शिष्य बोला – “अभी तो मैं यह नहीं कर सकता।”

“क्यों?” – गुरु बोले।

शिष्य ने उत्तर दिया – “यह अचानक होता है।”

“ऐसा है तो यह तुम्हारी प्रकृति नहीं है। यदि यह तुम्हारे स्वभाव का अंग होता तो तुम मुझे यह किसी भी समय दिखा सकते थे! तुम किसी ऐसी चीज़ को स्वयं पर हावी क्यों होने देते हो जो तुम्हारी है ही नहीं?” – गुरु ने कहा।

इस वार्तालाप के बाद शिष्य को जब कभी क्रोध आने लगता तो वह गुरु के शब्द याद करता। इस प्रकार उसने शांत और संयमित व्यवहार को अपना लिया।

(A Zen story on anger management – in Hindi)

A Zen disciple approached his teacher. “Master, I have an uncontrollable temper. Can you help me overcome it?”

“Hmmm, that’s strange. Can you show it to me?” asked the master.

“Not right now.”

“Why not?”

“It occurs suddenly.”

“Then it can’t be a part of your true nature,” said the master. “If that were the case, you wouldn’t have any difficulty in showing it! Why do you allow something that isn’t yours to worry you?”

Thereafter, the master’s words would come back to the student whenever his temper rose. Soon, he learned to check his anger and developed a placid temperament.

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 3,506 other followers

%d bloggers like this: