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आख़री सफ़र

(अमरीकन लेखक केंट नेर्बर्न ने आध्यात्मिक विषयों और नेटिव अमरीकन थीम पर कई पुस्तकें लिखीं हैं. नीचे दिया गया प्रसंग उनकी एक पुस्तक से लिया गया है)

बीस साल पहले मैं आजीविका के लिए टैक्सी चलाने का काम करता था. घुमंतू जीवन था, सर पर हुक्म चलानेवाला कोई बॉस भी नहीं था.

इस पेशे से जुडी जो बात मुझे बहुत बाद में समझ आई वह यह है कि जाने-अनजाने मैं चर्च के पादरी की भूमिका में भी आ जाता था. मैं रात में टैक्सी चलाता था इसलिए मेरी टैक्सी कन्फेशन रूम बन जाती थी. अनजान सवारियां टैक्सी में पीछे बैठतीं और मुझे अपनी ज़िंदगी का हाल बयान करने लगतीं. मुझे बहुत से लोग मिले जिन्होंने मुझे आश्चर्यचकित किया, बेहतर होने का अहसास दिलाया, मुझे हंसाया, कभी रुलाया भी.

इन सारे वाकयों में से मुझे जिसने सबसे ज्यादा प्रभावित किया वह मैं आपको बताता हूँ. एक बार मुझे देर रात शहर के एक शांत और संभ्रांत इलाके से एक महिला का फोन आया. हमेशा की तरह मुझे लगा कि मुझे किन्हीं पार्टीबाज, झगड़ालू पति-पत्नी-प्रेमिका, या रात की शिफ्ट में काम करनेवाले कर्मचारी को लिवाने जाना है.

रात के ढाई बजे मैं एक छोटी बिल्डिंग के सामने पहुंचा जिसके सिर्फ ग्राउंड फ्लोर के एक कमरे की बत्ती जल रही थी. ऐसे समय पर ज्यादातर टैक्सी ड्राईवर दो-तीन बार हॉर्न बजाकर कुछ मिनट इंतज़ार करते हैं, फिर लौट जाते हैं. लेकिन मैंने बहुत से ज़रूरतमंद देखे थे जो रात के इस पहर में टैक्सी पर ही निर्भर रहते हैं इसलिए मैं रुका रहा.

यदि कोई खतरे की बात न हो तो मैं यात्री के दरवाजे पर पहुँच जाता हूँ. शायद यात्री को मेरी मदद चाहिए, मैंने सोचा.

मैंने दरवाजे को खटखटाकर आहट की. “बस एक मिनट” – भीतर से किसी कमज़ोर वृद्ध की आवाज़ आई. कमरे से किसी चीज़ को खसकाने की आवाज़ आ रही थी.

लम्बी ख़ामोशी के बाद दरवाज़ा खुला. लगभग अस्सी साल की एक छोटी सी वृद्धा मेरे सामने खड़ी थी. उसने चालीस के दशक से मिलती-जुलती पोशाक पहनी हुई थी. उसके पैरों के पास एक छोटा सूटकेस रखा था.

घर को देखकर यह लग रहा था जैसे वहां सालों से कोई नहीं रहा है. फर्नीचर को चादरों से ढांका हुआ था. दीवार पर कोई घड़ी नहीं थी, कोई सजावटी सामान या बर्तन आदि भी नहीं थे. एक कोने में रखे हुए खोखे में पुराने फोटो और कांच का सामान रखा हुआ था.

“क्या तुम मेरा बैग कार में रख दोगे?” – वृद्धा ने कहा.

सूटकेस कार में रखने के बाद मैं वृद्धा की सहायता के लिए पहुंचा. मेरी बांह थामकर वह धीमे-धीमे कार तक गयी. उसने मुझे मदद के लिए धन्यवाद दिया.

“कोई बात नहीं” – मैंने कहा – “मैंने आपकी सहायता उसी तरह की जैसे मैं अपनी माँ की मदद करता.”

“तुम बहुत अच्छे आदमी हो” – उसने कहा और टैक्सी में मुझे एक पता देकर कहा – “क्या तुम डाउनटाउन की तरफ से चल सकते हो?”

“लेकिन वह तो लम्बा रास्ता है? – मैंने फ़ौरन कहा.

“मुझे कोई जल्दी नहीं है” – वृद्धा ने कहा – “मैं होस्पिस जा रही हूँ”.
(होस्पिस में मरणासन्न बूढ़े और रोगी व्यक्ति अपने अंतिम दिन काटते हैं.)

मैंने रियर-व्यू-मिरर में देखा. उसकी गीली आंखें चमक रहीं थीं.

“मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है” – उसने कहा – “डॉक्टर कहते हैं कि मेरा समय निकट है”.

मैंने मीटर बंद करके कहा – “आप जिस रास्ते से जाना चाहें मुझे बताते जाइए”.

अगले दो घंटे तक हम शहर की भूलभुलैया से गुज़रते रहे. उसने मुझे वह बिल्डिंग दिखाई जहाँ वह बहुत पहले लिफ्ट ऑपरेटर का काम करती थी. हम उस मोहल्ले से गुज़रे जहाँ वह अपने पति के साथ नव-ब्याहता बनकर आई थी. मुझे एक फर्नीचर शोरूम दिखाकर बताया कि दसियों साल पहले वहां एक बालरूम था जहाँ वह डांस करने जाती थी. कभी-कभी वह मुझे किसी ख़ास बिल्डिंग के सामने गाड़ी रोकने को कहती और अपनी नम आँखों से चुपचाप उस बिल्डिंग को निहारते रहती.

सुबह की लाली आसमान में छाने लगी. उसने अचानक कहा – “बस, अब और नहीं. मैं थक गयी हूँ. सीधे पते तक चलो”.

हम दोनों खामोश बैठे हुए उस पते तक चलते रहे जो उसने मुझे दिया था. यह पुराने टाइप की बिल्डिंग थी जिसमें ड्राइव-वे पोर्टिको तक जाता था. कार के वहां पहुँचते ही दो अर्दली आ गए. वे शायद हमारी प्रतीक्षा  कर रहे थे. मैंने ट्रंक खोलकर सूटकेस निकाला और उन्हें दे दिया. महिला तब तक व्हीलचेयर में बैठ चुकी थी.

“कितने रुपये हुए” – वृद्धा ने पर्स खोलते हुए पूछा.

“कुछ नहीं” – मैंने कहा.

“तुम्हारा कुछ तो बनता है” – वह बोली.

“सवारियां मिलती रहती हैं” – मैं बोला.

अनायास ही पता नहीं क्या हुआ और मैंने आगे बढ़कर वृद्धा को गले से लगा लिया. उन्होंने मुझे हौले से थाम लिया.

“तुमने एक अनजान वृद्धा को बिन मांगे ही थोड़ी सी ख़ुशी दे दी” – उसने कहा – “धन्यवाद”.

मैंने उनसे हाथ मिलाया और सुबह की मद्धम रोशनी में बाहर आ गया. मेरे पीछे एक दरवाज़ा बंद हुआ और उसके साथ ही एक ज़िंदगी भी ख़ामोशी में गुम हो गयी.

उस दिन मैंने कोई और सवारी नहीं ली. विचारों में खोया हुआ मैं निरुद्देश्य-सा फिरता रहा. मैं दिन भर चुप रहा और सोचता रहा कि मेरी जगह यदि कोई बेसब्र या झुंझलाने वाला ड्राईवर होता तो क्या होता? क्या होता अगर मैं बाहर से ही लौट जाता और उसके दरवाज़े तक नहीं जाता?

आज मैं उस घटनाक्रम पर निगाह डालता हूँ तो मुझे लगता है कि मैंने अपनी ज़िंदगी में उससे ज्यादा ज़रूरी और महत्वपूर्ण कोई दूसरा काम नहीं किया है.

हम लोगों में से अधिकांश जन यह सोचते हैं कि हमारी ज़िंदगी बहुत बड़ी-बड़ी बातों से चलती है. लेकिन ऐसे बहुत से छोटे दिखनेवाले असाधारण लम्हे भी हैं जो हमें खूबसूरती और ख़ामोशी से अपने आगोश में ले लेते हैं.

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11 Pigs – 11 सुअर

कभी किसी समय चीन के यांगझाओ प्रांत में एक कसाई रहता था जिसका नाम झांग था. वह अपने मोहल्ले के लोगों के भोजन के निमित्त प्रतिदिन सूअरों को मारकर उनका मांस बेचता था. रोज़-रोज़ असहाय सूअरों को मारना बहुत ही कठोर और पापकर्म था झांग अक्सर सोचता था कि वह आजीविका के लिए कोई दूसरा काम करने लगे.

झांग सोचता, “क्या मैं कोई दूसरा काम करने लगूं? जब दुनिया में करने के लिए इतने सारे काम हैं तो मैं रोज़ सूअरों के खून से अपने हाथ गंदे क्यों करता हूँ? यदि मैं रोज़ एक सूअर को मारता हूँ तो साल भर में तीन सौ साठ सूअर मेरे हाथों मारे जाते हैं. यह सब सोचकर ही कितना बुरा लगता है!:

चाहे जो हो, झांग को अपना और अपने परिवार का पेट तो पालना ही था. फिलहाल तो सूअरों को मारना और बेचना ही उसके लिए सबसे आसान काम था. उसके मन में जब-तब अपना पेशा बदलने का विचार आता रहता पर वह किसी तरह खुद को समझा-बुझा लेता.

झांग खुद से कहता, “अपना जमा-जमाया धंधा बदलना इतना आसान थोड़े ही है! और केवल मैं ही तो सूअरों को नहीं मार रहा हूँ! मेरे जैसे तो बहुतेरे हैं! पूरे नगर में लोग सूअर के मांस से पेट भरते हैं. यदि वे इसे खाना बंद नहीं करेंगे तो सूअर ऐसे ही मारे जाते रहेंगे. यह सच है कि मुझपर इन प्राणियों की हत्या करने का दोष लगता है पर इनका मांस खरीदकर खानेवाले भी उतने ही उत्तरदायी हैं. लोग खाते हैं, इसलिए मैं इन्हें मारता हूँ! मुझे इन्हें काटने का कोई शौक नहीं है!”

सूअरों को मारने के लिए झांग तड़के ही उठ जाता था क्योंकि काटे जाते समय वे बड़ी वेदनामय चीख निकालते. झांग का एक नियम था जिसका वह सालों से पालन कर रहा था. उसके कसाईखाने से कुछ दूर ही एक बौद्ध मंदिर था. हर सुबह वहां जब घंटा बजने की आवाज़ आती तब झांग सूअर को मारने के लिए उठ जाता. यह उसके प्रतिदिन की चर्या बन गया था.

एक दिन ऐसा हुआ कि झांग को उठने में कुछ देर हो गयी. बाद में उसे पता चला कि उस दिन मंदिर में घंटा नहीं बजा. जब झांग अपने कसाईखाने में पहुंचा तो उसने देखा कि सूअरों के बाड़े में मौजूद जिस मादा सूअर को वह उस दिन मारनेवाला था उसने ग्यारह बच्चे जन्मे थे. वे सभी बच्चे चिचियाते हुए अपनी माँ के स्तनों से दूध पी रहे थे. यह दृश्य देखकर झांग का दिल भर आया. उसे यह घटना असाधारण लगी.

झांग मंदिर गया. वहां के पुजारी ने उससे कहा, “कल रात मैंने एक सपना देखा कि ग्यारह बच्चों ने मुझे प्रणाम करके उनका और उनकी माता का जीवन बचाने की याचना की. मैंने उनसे पूछा कि मैं ऐसा कैसे कर सकता हूँ तो उन्होंने मुझसे कहा कि मैं बस सुबह मंदिर का घंटा नहीं बजाऊँ.”

ग्यारह बच्चे! सूअर के ग्यारह बच्चे! झांग को इन दो बातों में साम्य दिख गया. उसने अपने हथियारों को नदी में फेंक दिया और आजीविका के लिए दूसरे काम करने लगा.

* * * * * * * * * *

Once upon a time there lived a butcher in a small village in China. Everyday he would kill a pig to supply the demand for the people who lived around him. However, slaughtering pigs was an act of killing sentient beings Therefore he often thought of making a living out of other profession,

I should change my profession! There are many jobs I can do out. Why should I be a butcher? My knife has to kill a pig and “dye red” each day. If I kill 20 pigs each month then I would have killed 260 pigs every year. It’‘s terrible whenever time I think about it.”

However, the butcher had a family to feed. Slaughtering pigs was a profession that he could made money with ease. Therefore his thought of changing profession became replaced by another thought. He would reassured himself,

“Oh well, well! Changing profession is not that easy, is it? Furthermore it isn’‘t me who like killing pigs. It’s the people who like to eat pork. Otherwise who will I sell to when I kill them? Even though I incur bad retribution, those who eat pork should also share the responsibilities with me as well. Also we keep pigs because we want to eat them, don’‘t we?!!”

Since he had to arrive at the morning market early, and also pigs made tremendous noise when he killed them, therefore he chose to slaughter them at dawn. The butcher also had a habit which he had been keeping up for years. That was: Every morning as soon as he heard the bell rang from the nearby Buddhist temple, he would get up and slaughtered a pig. This habitual action had never changed.

However, one day he got up late. Later he found out that the temple did not ring the bell at all in that morning. When the butcher went to the pig-shed he discovered the mother pig he was going to kill gave birth to 11 sucking-pigs in the morning. Everyone of them was so fat and already they were leaning so close to the mother and suckling for milk. How lovely they were! He felt the event was extraordinary.

Therefore he went to the temple. The abbot of the temple told him, “I had a dream last night. I dreamed of 11 children who knelt down to beg me to save the life of their mother.

I asked them how I could save her. They replied it was very simple. All I needed to do was not to ring the bell.”

Eleven children? Eleven pigs? Suddenly the butcher understood the relationship between them. He threw the knife he killed the pigs into the river. Eventually he determined to change his profession.

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Different languages – दूसरी भाषा

एक परमधार्मिक बौद्ध महिला हर संभव प्रयास करती थी कि वह अपने मन, वचन, और कर्मों से किसी का भी अहित न कर दे. लेकिन जब कभी वह बाज़ार में समान खरीदने जाती, एक दुकानदार उससे कुछ अश्लील बातें करने लगता.

एक बारिशवाले दिन जब दुकानदार ने पुनः उससे अभद्रतापूर्वक बात की तो महिला आत्मनियंत्रण खो बैठी और उसने दुकानदार के सर पर छाते से प्रहार कर दिया.

इस घटना से ग्लानिवश, वह उसी दिन एक मठ में गयी और वहां प्रधान भिक्षु को सारा वृत्तान्त सुनाया.

“मैं बहुत दुखी हूँ” – महिला ने कहा – “आज पता नहीं कैसे मैं अपने मन पर नियंत्रण खो बैठी”.

“देखो” – भिक्षु ने कहा – “अपने मन में इस प्रकार ग्लानि का भाव रखना उचित नहीं है. जीवन में हमें एक-दूसरे को अपनी मन की भावनाएं बताने के लिए उनसे संवाद करना ही पड़ता है. और तुम इसमें कुछ कर भी नहीं सकतीं क्योंकि हर व्यक्ति का स्वभाव भिन्न होता है”.

“अब भविष्य में तुम यह करना कि अगली बार यदि वह कोई अभद्रता करे, तो तुम अपने ह्रदय में असीम करुणा एकत्र करना”.

“और पहले से भी अधिक जोर से उसे छाते से मारना, क्योंकि वह इसकी भाषा ही समझता है”.

(कहानी पाउलो कोएलो के ब्लॉग से)

A fervent Buddhist lady made every effort to love others. But every time she went to the market, a merchant made indecent proposals to her.

One rainy morning, when the man bothered her once again, she lost control and hit him on the face with her umbrella.

That same afternoon, she sought out a monk and told him what had happened.

“I am ashamed,” she said. “I couldn’t control my hate.”

“You did wrong to hate him,” answered the monk. ” But life is about communicating our feelings to each other – and you need to understand that people are different”.

“The next time he says something, fill your heart with goodness.

“And hit him again with your umbrella, because that’s the only language he knows.”

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शतरंज की बाज़ी : A Game of Chess

एक युवक ने किसी ईसाई मठ के महंत से कहा – “मैं साधू बनना चाहता हूँ लेकिन मुझे कुछ नहीं आता. मेरे पिता ने मुझे शतरंज खेलना सिखाया था लेकिन शतरंज से मुक्ति तो नहीं मिलती. और जो दूसरी बात मैं जानता हूँ वह यह है कि सभी प्रकार के आमोद-प्रमोद के साधन पाप हैं.”

“हाँ, वे पाप हैं लेकिन उनसे मन भी बहलता है. और क्या पता, इस मठ को उनसे भी कुछ लाभ पहुंचे.” – महंत ने कहा.

महंत ने शतरंज का बोर्ड मंगाया और युवक को एक बाज़ी खेलने के लिए कहा.

इससे पहले कि खेल शुरू होता, महंत ने युवक से कहा – “हांलाकि हम सभी को मनोरंजन चाहिए पर हम यहाँ हर समय शतरंज तो नहीं खेलने दे सकते. हम दोनों शतरंज की एक बाज़ी खेलेंगे. यदि मैं हार गया तो मैं इस मठ को हमेशा के लिए छोड़ दूंगा और तुम मेरा स्थान ले लोगे.”

महंत वास्तव में गंभीर था. युवक को यह प्रतीत हुआ कि यह बाज़ी उसके लिए ज़िंदगी और मौत का खेल बन गयी थी. उसके माथे पर पसीना छलकने लगा. वहां उपस्थित सभी व्यक्तियों के लिए शतरंज का बोर्ड पृथ्वी की धुरी बन गया था.

महंत ने बहुत खराब शुरुआत की. युवक ने कठोर चालें चलीं लेकिन उसने एक क्षण महंत के चेहरे की ओर देखा. फिर वह जानबूझकर ख़राब खेलने लगा. उसे लगने लगा था कि दुनिया को शतरंज की उस बाज़ी से ज्यादा उस महंत की ज़रुरत थी.

अचानक ही महंत ने बोर्ड को ठोकर मारकर जमीन पर गिरा दिया.

“तुम्हें जितना सिखाया गया था तुम उससे कहीं ज्यादा जानते हो” – महंत ने युवक से कहा – “तुमने अपना पूरा ध्यान जीतने पर लगाया और तुम अपने सपनों के लिए लड़ सकते हो. फिर तुम्हारे भीतर करुणा जाग उठी और तुमने एक भले कार्य के लिए त्याग करने का निश्चय कर लिया. इस मठ में तुम्हारा स्वागत है क्योंकि तुम यह जानते हो कि तुम अनुशासन और करुणा में सामंजस्य स्थापित कर सकते हो”.

(~_~)

A young man said to the abbot from the monastery, “I’d actually like to be a monk, but I haven’t learned anything in life. All my father taught me was to play chess, which does not lead to enlightenment. Apart from that, I learned that all games are a sin.

“They may be a sin but they can also be a diversion, and who knows, this monastery needs a little of both,” was the reply.

The abbot asked for a chessboard, sent for a monk, and told him to play with the young man.

But before the game began, he added, “Although we need diversion, we cannot allow everyone to play chess the whole time. So, we have the best players here; if our monk loses, he will leave the monastery and his place will be yours.”

The abbot was serious. The young man knew he was playing for his life, and broke into a cold sweat; the chessboard became the center of the world.

The monk began badly. The young man attacked, but then saw the saintly look on the other man’s face; at that moment, he began playing badly on purpose. After all, a monk is far more useful to the world.

Suddenly, the abbot threw the chessboard to the floor.

“You have learned far more than was taught you,” he said. “You concentrated yourself enough to win, were capable of fighting for your desire. Then, you had compassion, and were willing to make a sacrifice in the name of a noble cause. Welcome to the monastery, because you know how to balance discipline with compassion.”

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भले आदमी की परछांई : The Shadow of a Noble Man

बहुत पुरानी बात है. कहीं एक भला आदमी रहता था जो सभी से असीम प्रेम करता था और सारे जीवों के प्रति उसके ह्रदय में अपार करुणा थी. उसके गुणों से प्रसन्न होकर ईश्वर ने उसके पास अपना देवदूत भेजा.

“ईश्वर ने मुझे आपके पास यह कहने के लिए भेजा है कि वे आपसे बहुत प्रसन्न हैं और आपको कोई दिव्य शक्ति देना चाहते हैं” – देवदूत ने कहा – “क्या आप लोगों को रोगमुक्त करने की शक्ति प्राप्त करना चाहेंगे?”

“बिलकुल नहीं” – भले आदमी ने कहा – “मैं यह चाहूँगा कि ईश्वर स्वयं इस बात का निर्णय करे कि किसे रोगमुक्त किया जाय”.

“तो फिर आप पापियों को सद्मार्ग पर वापस ले आने की शक्ति ग्रहण कर लें”

“यह तो आप जैसे देवदूतों का काम है. मैं नहीं चाहता कि लोग मसीहा जानकर मेरा सम्मान करें या मुझे ऐसे प्रतिमान के रूप में स्थापित कर दिया जाय.”

“आपने तो मुझे संकट में डाल दिया” – देवदूत ने कहा – “आपको कोई शक्ति दिए बिना मैं स्वर्ग नहीं लौट सकता. यदि आप स्वयं कोई शक्ति नहीं लेना चाहेंगे तो मुझे विवश होकर आपके लिए चयन करना पड़ेगा”.

भले आदमी ने कुछ क्षणों के लिए सोचा, फिर कहा :-

“ठीक है, यदि ऐसा है तो मैं चाहता हूँ कि ईश्वर मुझसे जो भी शुभ कर्म करवाना चाहता है वे स्वतः घटित होते जाएँ परन्तु उनमें मेरा हाथ होने का पता किसी को भी नहीं चले, मुझे भी नहीं, ताकि स्वयं को ऐसी क्षमता से युक्त जानकार मुझमें कभी अहंकार न उपजे”.

“ऐसा ही हो” – देवदूत ने कहा. उसने भले आदमी की परछाईं को रोगमुक्त करने की दिव्य शक्ति से संपन्न कर दिया परन्तु केवल उसी समयकाल के लिए जब उसके चेहरे पर सूर्य की किरणें पड़ रहीं हों. इस प्रकार, वह भला आदमी जहाँ कहीं भी गया वहां लोग रोगमुक्त हो गए, बंजर धरती में फूल खिल उठे, और दुखियों के जीवन में वसंत आ गया.

अपनी दिव्य शक्तियों से अनभिज्ञ वह भला आदमी सालों तक दूरदेशों की यात्रायें करता रहा. उसके पीछे सदैव चल रही उसकी परछाईं ईश्वरीय इच्छा को पूर्ण करती रही. उसे जीवनपर्यंत इसका बोध नहीं हुआ कि वह परमेश्वर के कितना करीब था.

(पाउलो कोएलो के ब्लॉग से)

(A story on goodness of a man – Paolo Coelho – in Hindi)

(~_~)

Many years ago, there lived a man who was capable of loving and forgiving everyone he came across. Because of this, God sent an angel to talk to him.

‘God asked me to come and visit you and tell you that he wishes to reward you for your goodness,’ said the angel. ‘You may have any gift you wish for. Would you like the gift of healing?’

‘Certainly not,’ said the man. ‘I would prefer God to choose those who should be healed.’

‘And what about leading sinners back to the path of Truth?’

‘That’s a job for angels like you. I don’t want to be venerated by anyone or to serve as a permanent example.’

‘Look, I can’t go back to Heaven without having given you a miracle. If you don’t choose, I’ll have to choose one for you.’

The man thought for a moment and then said:

‘All right, I would like good to be done through me, but without anyone noticing, not even me, in case I should commit the sin of vanity.’

So the angel arranged for the man’s shadow to have the power of healing, but only when the sun was shining on the man’s face. In this way, wherever he went, the sick were healed, the earth grew fertile again, and sad people rediscovered happiness.

The man traveled the Earth for many years, oblivious of the miracles he was working because when he was facing the sun, his shadow was always behind him. In this way, he was able to live and die unaware of his own holiness.

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