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ईश्वर के दस आदेश : Ten Commandments

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कई शताब्दी पहले, ईश्वर ने पृथ्वी पर आकर जर्मन लोगों से कहा, “मैंने मनुष्यों के लिए कुछ आदेश बनाए हैं जिनके पालन से सबका भला होगा.”

जर्मन लोगों ने पूछा, “कैसे आदेश?”

ईश्वर ने कहा, “जीवन जीने के नियम.”

“आप कोई नियम बताइए?”

ईश्वर ने कहा, “तुम किसी की हत्या नहीं करोगे.”

“कोई हत्या नहीं? माफ कीजिए, हमें ऐसे नियम नहीं चाहिए.”

तब ईश्वर इटली के लोगों के पास गया और बोला, “मैंने कुछ आदेश बनाए हैं…”.

इटलीवालों ने भी उदाहरण के लिए कोई आदेश सुनना चाहा. ईश्वर ने कहा, “तुम चोरी नहीं करोगे.”

“चोरी नहीं करेंगे? नही, हमें ऐसे आदेशों में कोई रूचि नहीं है.”

फिर ईश्वर ने फ्रांसीसियों को भी आदेशों के बारे में बताया.

फ्रांसीसियों ने भी कोई एक आदेश सुनाने के लिए कहा. ईश्वर बोले, “तुम अपने पड़ोसी की पत्नी पर बुरी नज़र नहीं डालोगे.”

फ्रांसीसियों ने भी ऐसा आदेश सुनकर उन्हें ग्रहण करने से इंकार कर दिया.

अंत में ईश्वर ने यहूदियों को आदेशों के बारे में बताया.

“आदेश?”, यहूदियों ने कहा, “ये कितने के हैं?”

“ये तो मुफ्त हैं”, ईश्वर ने कहा.

“तो हमें दस दे दो.”

(~_~)

Centuries ago, God came down, went to the Germans and said, “I have Commandments that will help you live better lives.”

The Germans ask, “What are Commandments?”

And the Lord says, “Rules for living.”

“Can you give us an example?”

God says, “Thou shalt not kill.”

“Not kill? We’re not interested.”

So God went to the Italians and said, “I have Commandments…”

The Italians wanted an example and the Lord said, “Thou shalt not steal.”

“Not steal? We’re not interested.”

Next the Lord went to the French saying, “I have Commandments…”

The French wanted an example and the Lord said, “Thou shalt not covet thy neighbor’s wife.”

And the French were not interested.

God then went to the Jews and said, “I have Commandments…”

“Commandments,” said the Jews, “How much are they?”

“They’re free.”

“We’ll take 10.”

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जंगल में नास्तिक : An Atheist in Jungle

lion

अफ़्रीका के जंगलों से गुज़रते समय एक नास्तिक वैज्ञानिक विकासवाद के कारण अस्तित्व में आए प्राकृतिक सौंदर्य की सराहना करता जा रहा था.

“कितने सुंदर विराट वृक्ष! कितनी वेगवती नदियां! कितने सुंदर प्राणी! और यह सब किसी के हस्तक्षेप के बिना अपने आप ही घटित हो गया! दुनिया में केवल अज्ञानी और कायर ही हैं जो किसी अज्ञात शक्ति के भय से ग्रस्त होकर चमत्कारिक ब्रह्मांड के अस्तित्व का श्रेय नाहक ही ईश्वर को देते हैं.”

तभी उसके पीछे झाड़ियों में कुछ आहट हुई. एक शेर नास्तिक पर झपटा. उसने भागने की कोशिश की लेकिन शेर ने उसे चित कर दिया.

जब कोई राह न सूझी, नास्तिक के मुंह से निकल पड़ा, “भगवान बचाओ!”

और एक चमत्कार हुआ: सब कुछ थम गया. वातावरण में दिव्य प्रकाश व्याप्त हो गया और एक आवाज़ आई:

“तुम क्या चाहते हो? इतने वर्षों तक तुम मेरे अस्तित्व को नकारते रहे और दूसरों को भी यह समझाते रहे कि ईश्वर का कोई वजूद नहीं है. तुमने मेरी रची दुनिया को महज़ “घटनाओं का संयोग” कहा.

नास्तिक को अचरज में कुछ न सूझा, वह बोला:

“सिर्फ इसलिए कि मैं अगले ही पल मरनेवाला हूं, मैं पाखंड का आश्रय नहीं लूंगा. मैं पूरी ज़िंदगी यही सिद्ध करता रहा हूं कि तुम्हारा कोई अस्तित्व नहीं है.”

“अच्छा, तो अब तुम मुझसे क्या चाहते हो?”

नास्तिक ने एक पल को विचार किया. वह जानता था कि अब किसी संवाद की गुंजाइश नहीं थी. अंततः उसने कहा:

“मैं नहीं बदल सकता लेकिन यह शेर तो बदल सकता है. तुम इस खूंखार भयानक शेर को आस्थावान ईसाई बना दो!”

उसी क्षण दिव्य प्रकाश लुप्त हो गया. जंगल में चिड़ियों की चहचहाहट फिर से सुनाई देनी लगी. शेर नास्तिक के ऊपर से उतर गया. उसने श्रृद्धा से अपना सर झुकाया, और नम्रतापूर्वक बोला:

“हे ईश्वर, मेरी भूख मिटाने के लिए तूने अपार उदारता दिखाई और मुझे यह भोजन सौंपा. तुझे लाख-लाख धन्यवाद प्रभु…”

(~_~)

An atheist is going through a forest in Africa, filled with admiration for everything created by that “accident of evolution”.
“But what majestic trees! What powerful rivers! What beautiful animals! And all this happened by chance, without anyone interfering! Only the weak and ignorant, afraid they cannot explain their own lives and the universe, feel the need to attribute all these marvels to a superior entity!”
There is a noise in the bushes behind him; a lion is about to pounce on him. He tries to flee, but the animal knocks him over.
With nothing else to lose, he shouts out: “My God!”
And a miracle happens: time stops, the atmosphere is drenched in a strange light, and a voice is heard:
“What do you want? You have denied my existence for all these years, you have taught others that I do not exist, and you reduced Creation to a “cosmic accident”.
Quite confused, the man exclaims:
“It would be hypocritical of me to change my mind just because I am about to die. All my life I have preached that You do not exist.”
“So, what do you expect me to do?”
The atheist reflected for a moment, knowing that the discussion could not last forever. Finally he says:
“I can’t change, but the lion can. So, I ask the Lord to change this wild, murderous beast into a Christian animal!”
Right there and then, the light disappears, the birds in the forest renew their singing, and the river begins to flow again. T
The lion climbs off the man, pauses, lowers its head, and says very earnestly:
“Lord, I am ever so grateful for Your generosity, for this food that I am about to eat…”

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वैज्ञानिक और ईश्वर : A Scientist Meets God

Cornelia Kopp Photography

एक वैज्ञानिक ने ईश्वर को खोज लिया और उससे कहा, “ईश्वर, हमें अब तुम्हारी कोई ज़रूरत नहीं है. विज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली है कि अब हम जीवन के किसी भी रूप की रचना कर सकते हैं. आदिकाल में तुमने जो किया वह हम अब करके दिखा सकते हैं.”

“अच्छा! बताओ तुम क्या कर सकते हो?”, ईश्वर ने पूछा.

वैज्ञानिक ने कहा, “हम मिट्टी से जीवन के विविध रूपों की रचना कर सकते हैं. हम इसे तुम्हारी आकृति में ढालकर इसमें प्राण फूंक सकते हैं. हम पुरुष, स्त्री और जीवन के हर उस रूप की रचना कर सकते हैं जो कभी अस्तित्व में रहा हो.”

“वाह! यह तो बहुत अच्छी बात है”, ईश्वर ने कहा, “मुझे दिखाओ तुम ऐसा कैसे करते हो”.

वैज्ञानिक नीचे झुकता है और अपनी परखनली में थोड़ी सी मिट्टी भरता है…

“रूको! ज़रा ठहरो!”, ईश्वर ने उसे टोकते हुए कहा, “वह तो मेरी मिट्टी है! तुम अपनी मिट्टी से यह काम करो!”

(~_~)

A scientist one day discovered the God and said to Him, “God, we don’t need you any more. Science has finally figured out a way to create life out of nothing – in other words, we can now do what you did in the beginning.

“Oh, is that so? Tell Me…” replies God.

“Well,” says the scientist, “we can take dirt and create life forms from it. We can make it into the likeness of you and breathe life into it. We are able to create man, woman or any living thing that ever existed.”

“Well, that’s very interesting…show Me how you do it.”

So the scientist bends down to the ground and picks up some dirt in his his test tube…

“No, no, no…” interrupts God, “That’s the dirt I created! Get your own dirt.”

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The Tale of Three Trees – तीन वृक्षों की कहानी

यह कहानी बहुत पुरानी है. किसी नगर के समीप एक पहाड़ी पर तीन वृक्ष थे. वे तीनों अपने सुख-दुःख और सपनों के बारे में एक दूसरे से बातें किया करते थे.

एक दिन पहले वृक्ष ने कहा – “मैं खजाना रखने वाला बड़ा सा बक्सा बनना चाहता हूँ. मेरे भीतर हीरे-जवाहरात और दुनिया की सबसे कीमती निधियां भरी जाएँ. मुझे बड़े हुनर और परिश्रम से सजाया जाय, नक्काशीदार बेल-बूटे बनाए जाएँ, सारी दुनिया मेरी खूबसूरती को निहारे, ऐसा मेरा सपना है.”

दूसरे वृक्ष ने कहा – “मैं तो एक विराट जलयान बनना चाहता हूँ. बड़े-बड़े राजा और रानी मुझपर सवार हों और दूर देश की यात्राएं करें. मैं अथाह समंदर की जलराशि में हिलोरें लूं. मेरे भीतर सभी सुरक्षित महसूस करें और सबका यकीन मेरी शक्ति में हो… मैं यही चाहता हूँ.”

अंत में तीसरे वृक्ष ने कहा – “मैं तो इस जंगल का सबसे बड़ा और ऊंचा वृक्ष ही बनना चाहता हूँ. लोग दूर से ही मुझे देखकर पहचान लें, वे मुझे देखकर ईश्वर का स्मरण करें, और मेरी शाखाएँ स्वर्ग तक पहुंचें… मैं संसार का सर्वश्रेष्ठ वृक्ष ही बनना चाहता हूँ.”

ऐसे ही सपने देखते-देखते कुछ साल गुज़र गए. एक दिन उस जंगल में कुछ लकड़हारे आए. उनमें से जब एक ने पहले वृक्ष को देखा तो अपने साथियों से कहा – “ये जबरदस्त वृक्ष देखो! इसे बढ़ई को बेचने पर बहुत पैसे मिलेंगे.” – और उसने पहले वृक्ष को काट दिया. वृक्ष तो खुश था, उसे यकीन था कि बढ़ई उससे खजाने का बक्सा बनाएगा.

दूसरे वृक्ष के बारे में लकड़हारे ने कहा – “यह वृक्ष भी लंबा और मजबूत है. मैं इसे जहाज बनाने वालों को बेचूंगा”. दूसरा वृक्ष भी खुश था, उसका चाहा भी पूरा होने वाला था.

लकड़हारे जब तीसरे वृक्ष के पास आए तो वह भयभीत हो गया. वह जानता था कि अगर उसे काट दिया गया तो उसका सपना पूरा नहीं हो पाएगा. एक लकड़हारा बोला – “इस वृक्ष से मुझे कोई खास चीज नहीं बनानी है इसलिए इसे मैं ले लेता हूं”. और उसने तीसरे वृक्ष को काट दिया.

पहले वृक्ष को एक बढ़ई ने खरीद लिया और उससे पशुओं को चारा खिलानेवाला कठौता बनाया. कठौते को एक पशुगृह में रखकर उसमें भूसा भर दिया गया. बेचारे वृक्ष ने तो इसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी. दूसरे वृक्ष को काटकर उससे मछली पकड़नेवाली छोटी नौका बना दी गई. भव्य जलयान बनकर राजा-महाराजाओं को लाने-लेजाने का उसका सपना भी चूर-चूर हो गया. तीसरे वृक्ष को लकड़ी के बड़े-बड़े टुकड़ों में काट लिया गया और टुकड़ों को अंधेरी कोठरी में रखकर लोग भूल गए.

एक दिन उस पशुशाला में एक आदमी अपनी पत्नी के साथ आया. स्त्री ने वहां एक बच्चे को जन्म दिया. वे बच्चे को चारा खिलानेवाले कठौते में सुलाने लगे. कठौता अब पालने के काम आने लगा. पहले वृक्ष ने स्वयं को धन्य माना कि अब वह संसार की सबसे मूल्यवान निधि अर्थात एक शिशु को आसरा दे रहा था.

समय बीतता गया. सालों बाद कुछ नवयुवक दूसरे वृक्ष से बनाई गई नौका में बैठकर मछली पकड़ने के लिए गए. उसी समय बड़े जोरों का तूफान उठा और नौका तथा उसमें बैठे युवकों को लगा कि अब कोई भी जीवित नहीं बचेगा. एक युवक नौका में निश्चिंत सा सो रहा था. उसके साथियों ने उसे जगाया और तूफान के बारे में बताया. वह युवक उठा और उसने नौका में खड़े होकर उफनते समुद्र और झंझावाती हवाओं से कहा – “शांत हो जाओ”. और तूफान थम गया. यह देखकर दूसरे वृक्ष को लगा कि उसने दुनिया के परम ऐश्वर्यशाली सम्राट को सागर पार कराया है.

तीसरे वृक्ष के पास भी एक दिन कुछ लोग आए. उन्होंने उसके दो टुकड़ों को जोड़कर एक घायल आदमी के ऊपर लाद दिया. ठोकर खाते, गिरते-पड़ते उस आदमी का सड़क पर तमाशा देखती भीड़ अपमान करती रही. वे जब रुके तब सैनिकों ने लकड़ी के सलीब पर उस आदमी के हाथों-पैरों में कीलें ठोंककर उसे पहाड़ी की चोटी पर खड़ा कर दिया. दो दिनों के बाद रविवार को तीसरे वृक्ष को इसका बोध हुआ कि उस पहाड़ी पर वह स्वर्ग और ईश्वर के सबसे समीप पहुंच गया था क्योंकि ईसा मसीह को उसपर सूली पर चढ़ाया गया था.

सब कुछ अच्छा करने के बाद भी जब हमारे काम बिगड़ते जा रहे हों तब हमें यह समझना चाहिए कि शायद ईश्वर ने हमारे लिए कुछ बेहतर सोचा है. यदि आप उसपर यकीन बरक़रार रखेंगे तो वह आपको नियामतों से नवाजेगा. प्रत्येक वृक्ष को वह मिल गया जिसकी उसने ख्वाहिश की थी, लेकिन उस रूप में नहीं मिला जैसा वे चाहते थे. हम नहीं जानते कि ईश्वर ने हमारे लिए क्या सोचा है या ईश्वर का मार्ग हमारा मार्ग है या नहीं… लेकिन उसका मार्ग ही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है.

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(मथायस ग्रून्वाल्ड द्वारा 1517 में बनाई गई ईसा मसीह की यह पेंटिंग मुझे अच्छी लगती है. सलीब पर चढ़े ईसा मसीह की हर पेंटिंग में मार्मिकता झलकती है पर ग्रून्वाल्ड की इस पेंटिंग में कुछ वीभत्सता और निर्ममता भी है. सलीब पर चढ़े ईसा मसीह के हाथों और पैरों को देखें. चित्र विकिपीडिया से.)

Once upon a mountain top, three little trees stood and dreamed of what they wanted to become when they grew up. The first little tree looked up at the stars and said: “I want to hold treasure. I want to be covered with gold and filled with precious stones. I’ll be the most beautiful treasure chest in the world!” The second little tree looked out at the small stream trickling by on its way to the ocean. “I want to be traveling mighty waters and carrying powerful kings. I’ll be the strongest ship in the world!” The third little tree looked down into the valley below where busy men and women worked in a busy town. “I don’t want to leave the mountain top at all. I want to grow so tall that when people stop to look at me, they’ll raise their eyes to heaven and think of God. I will be the tallest tree in the world.”

Years passed and the little trees grew tall. One day three woodcutters climbed the mountain. The first woodcutter looked at the first tree and said, “This tree is beautiful. It is perfect for me.” With a swoop of his shining ax, the first tree fell. “Now I shall be made into a beautiful chest, I shall hold wonderful treasure!” the first tree said. The second woodcutter looked at the second tree and said, “This tree is strong. It is perfect for me.” With a swoop of his shining ax, the second tree fell. “Now I shall sail mighty waters!” thought the second tree. “I shall be a strong ship for mighty kings!” The third tree felt her heart sink when the last woodcutter looked her way. She stood straight and tall and pointed bravely to heaven. But the woodcutter never even looked up. “Any kind of tree will do for me.” He muttered. With a swoop of his shining ax the third tree fell.

The first tree rejoiced when the woodcutter brought her to a carpenter’s shop. But the carpenter fashioned the tree into a feed box for animals. The once beautiful tree was not covered with gold, nor with treasure. She was coated with sawdust and filled with hay for hungry farm animals. The second tree smiled when the woodcutter took her to a shipyard, but no mighty ship was made that day. Instead, the once strong tree was hammered and sawed into a simple fishing boat. She was too small and too weak to sail to an ocean, or even a river. Instead she was taken to a little lake. The third tree was confused when the woodcutter cut her into strong beams and left her in a lumberyard. “What happened?” The once tall tree wondered. “All I ever wanted was to stay on the mountain top and point to God…”

Many, many days and nights passed. The three trees nearly forgot their dreams. But one night, golden starlight poured over the first tree as a young woman placed her newborn baby in the feed box. “I wish I could make a cradle for him,” her husband whispered. The mother squeezed his hand and smiled as the starlight shone on the smooth and the sturdy wood. “This manger is beautiful,” she said. And suddenly the first tree knew he was holding the greatest treasure in the world.

One evening a tired traveler and his friends crowded into the old fishing boat. The traveler fell asleep as the second tree quietly sailed out into the lake. Soon a thundering and thrashing storm arose. The little tree shuddered. She knew she did not have the strength to carry so many passengers safely through the wind and the rain. The tired man awakened. He stood up, stretched out his hand and said, “Peace.” The storm stopped as quickly as it had begun. And suddenly the second tree knew he was carrying the King of heaven and earth.

One Friday morning, the third tree was startled when her beams were yanked from the forgotten woodpile. She flinched as she was carried through an angry jeering crowd. She shuddered when soldiers nailed a man’s hands to her. She felt ugly and harsh and cruel. But on Sunday morning, when the sun rose and the earth trembled with joy beneath her, the third tree knew that God’s love had changed everything. It had made the third tree strong. And every time people thought of the third tree, they would think of God.

That was better than being the tallest tree in the world.

So the next time you feel down because you didn’t get what you want, just sit tight and be happy because God is thinking of something better to give you.

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सत्य की एक झलक

सत्य की एक किरण ही पर्याप्त है. ग्रंथों का भार जो नहीं कर पाता है, सत्य की एक झलक वह कर दिखाती है. अंधेरे में रौशनी के लिए प्रकाश का वर्णन करने वाले बड़े-बड़े शास्त्र किसी काम के नहीं, मिट्टी का एक दिया जलाना आना ही पर्याप्त है.

Emerson

रॉल्फ वाल्डो इमर्सन के व्याख्यानों में एक बूढ़ी धोबिन निरंतर देखी जाती थी. लोगों को हैरानी हुई : एक अनपढ़ गरीब औरत इमर्सन की गंभीर वार्ताओं को क्या समझती होगी! किसी ने आखिर उससे पूछ ही लिया कि उसकी समझ में क्या आता है? उस बूढ़ी धोबिन ने जो उत्तर दिया, वह अद्भुत था. उसने कहा, ”मैं जो नहीं समझती, उसे तो क्या बताऊं. लेकिन, एक बात मैं खूब समझ गई हूं और पता नहीं कि दूसरे उसे समझे हैं या नहीं. मैं तो अनपढ़ हूं और मेरे लिए एक ही बात काफी है. उस बात ने मेरा सारा जीवन बदल दिया है. और वह बात क्या है? वह यह है कि मैं भी प्रभु से दूर नहीं हूं, एक दरिद्र अज्ञानी स्त्री से भी प्रभु दूर नहीं है. प्रभु निकट है- निकट ही नहीं, स्वयं में है. यह छोटा सा सत्य मेरी दृष्टि में आ गया है और अब मैं नहीं समझती कि इससे भी बड़ा कोई और सत्य हो सकता है!”

जीवन बहुत तथ्य जानने से नहीं, किंतु सत्य की एक छोटी -सी अनुभूति से ही परिवर्तित हो जाता है. और, जो बहुत जानने में लग रहते हैं, वे अक्सर सत्य की उस छोटी-सी चिंगारी से वंचित ही रह जाते हैं जो परिवर्तन लाती है और जिससे जीवन में बोध के नये आयाम उद्घाटित होते हैं.

ओशो के पत्रों के संकलन ‘पथ के प्रदीप’ से. प्रस्तुति – ओशो शैलेन्द्र.

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