Tag Archives: अहंकार

गुबरीले और हाथी : Story of Bugs and An Elephant

एक दिन एक गुबरीले को गोबर का एक बड़ा सा ढेर मिला। उसने इसका मुआयना किया और अपने दोस्तों को इसके बारे में बताया। उन सभी ने जब यह ढेर देखा तो इसमें एक नगर बसाने का निश्चय किया। कई दिनों तक उस गोबर के ढेर में दिन-रात परिश्रम करने के बाद उनहोंने एक भव्य ‘नगरी’ बनाई। अपनी उपलब्धि से अभिभूत होकर उनहोंने गोबर के ढेर के खोजकर्ता गुबरीले को इस नगरी का प्रथम राजा बना दिया। अपने ‘राजा’ के सम्मान में उनहोंने एक शानदार परेड का आयोजन किया।

उनकी परेड जब पूरी तरंग में चल रही थी तभी उस ढेर के पास से एक हाथी गुज़रा। उसने ढेर को देखते ही अपना पैर उठा दिया ताकि उसका पैर कहीं ढेर पर रखने से गन्दा न हो जाए। जब राजा गुबरीले ने यह देखा तो वह आपे से बाहर हो गया और चिल्लाते हुए हाथी से बोला – “अरे ओ, क्या तुममें राजसत्ता के प्रति कोई सम्मान नहीं है? क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारा इस प्रकार मुझपर पैर उठाना मेरी कितनी बड़ी अवमानना है? पैर नीचे रखकर फ़ौरन माफ़ी मांगो अन्यथा तुम्हें दण्डित किया जाएगा!”

हाथी ने नीचे देखा और कहा – “क्षमा करें महामहिम, मैं अपने अपराध के लिए दया की भीख मांगता हूँ”। इतना कहते हुए हाथी ने अपार आदर प्रदर्शित करते हुए गोबर के ढेर पर धीरे से अपना पैर रख दिया।

(A story about bugs and an elephant – in Hindi)

(~_~)

“There once was a beetle which came upon a lump of cow dung. He worked himself into it and liking what he saw, he invited his friends to join him in building a city in it.

After working feverishly for a few days they built a magnificent `city´ in the dung and feeling very proud of their achievement they decided to elect the first beetle as their king. Now to honour their new `king´ they organised a grand parade through their `city´.

While these impressive proceedings were taking place, An elephant happened to pass by and seeing the lump of cow dung he lifted his foot to avoid stepping on it.

The king beetle saw the elephant and angrily shouted at the huge beast. `Hey you! Don´t you have any respect for royalty? Don´t you know it is rude to lift your leg over my majestic head? Apologies at once or I´ll have you punished.´

The elephant looked down and said, `Your most gracious majesty, I humbly crave your pardon.´ Thus saying he knelt down on the lump of cow dung and crushed king, city, citizens and pride in one act of obeisance.”

About these ads

4 Comments

Filed under Stories