एक सुबह एक प्रख्यात लेखक और ज़ेन मास्टर के बीच ज़ेन के विषय पर बातचीत हो रही थी:
“ज़ेन को आप किस प्रकार परिभाषित करेंगे?”, लेखक ने पूछा.
“ज़ेन प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा प्राप्त ज्ञान है”, ज़ेन मास्टर ने कहा.
“दूसरों के अनुभव से ज्ञान प्राप्त करने में क्या बुराई है?”, लेखक ने कहा, “पुस्तकालयों में ज्ञान भरा पड़ा है!”
ज़ेन मास्टर ने कुछ नहीं कहा.
कुछ देर बाद ज़ेन मास्टर ने लेखक से पूछा, “आपको भोजन कैसा लगा?”
“मैंने अभी कुछ खाया ही नहीं है! अभी तो सुबह के दस ही बजे हैं”, लेखक ने कहा.
“मैं जानता हूँ. मैंने आपके लिए कुछ बनवाया था पर वह मैंने ही खा लिया”, ज़ेन मास्टर ने कहा, “भोजन बहुत बढ़िया था. आप मेरे अनुभव से यह जान सकते हैं.”
Thanx to John Weeren for this story

