सत्य का मार्ग – The True Path

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गुरु गेहूं के एक खेत के समीप खड़े थे, तब उनका शिष्य एक समस्या लेकर उपस्थित हुआ और बोलाः

“सत्य की प्राप्ति की ओर ले जानेवाला मार्ग कौन सा है? मैं उसकी खोज कैसे करूं?”

गुरू ने उससे पूछा, “तुम अपने दाएं हाथ में कौन सी अंगूठी पहने हो?”

“यह मेरे पिता की निशानी है जो उन्होंने निधन से पहले मुझे सौंपी थी”, शिष्य ने कहा.

“इसे मुझे देना”, गुरू ने कहा.

शिष्य ने अपनी उंगली से अंगूठी निकालकर विनयपूर्वक गुरु के हाथ में दे दी. गुरु ने अंगूठी को खेत के बीच में गेंहू की बालियों की ओर उछाल दिया.

“यह आपने क्या किया?!”, शिष्य अचरज मिश्रित भय से चिल्लाया, “अब मुझे सब कुछ छोड़कर अंगूठी की खोज में जुटना पड़ेगा! वह मेरे लिए बहुमूल्य है!”

“वह तो तुम्हें मिल ही जाएगी, लेकिन उसे पा लेने पर तुम्हें तुम्हारे प्रश्न का उत्तर भी मिल जाएगा. सत्य का पथ भी ऐसा ही होता है… वह अन्य सभी पथों से अधिक मूल्यवान और महत्वपूर्ण है”.

* * * * * * * *

The master was strolling through a field of wheat when a disciple came up to him: “I can’t tell which is the true path. What’s the secret? What does that ring on your right hand mean?” asked the master.

“My father gave it to me before dying.”

“Well, give it to me.”

The disciple obeyed, and the master tossed the ring into the middle of the field of wheat.

“Now what?” shouted the disciple.

“Now I have to stop doing everything I was doing to look for the ring! It’s important to me!”

“When you find it, remember this: you yourself answered the question you asked me. That is how you tell the true path: it is more important than all the rest.”

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बेल्ट – Belt

82 वर्षीय वांग त्सिंग अर्जेंटीना में रहते हैं और इस उम्र में भी युवाओं को चीनी मार्शल आर्ट “ताई ची” सिखाते हैं. ताई ची एक प्राचीन मार्शल आर्ट है, जिसमें अनेक शारीरिक क्रियाएं करते समय सांस पर नियंत्रण रखा जाता है.

वांग त्सिंग के एक शिष्य ने एक बार उनसे यह पूछा, “अन्य मार्शल आर्ट पद्धतियों की भांति ताई ची में योद्धा का स्तर प्रदर्शित करने के लिए रंगीन बेल्टों का प्रयोग क्यों नहीं किया जाता.”

3995134601_41d46cf63cवांग ने उत्तर दिया, “यदि तुम्हारे पास धन हो तो तुम उसे हाथ में लेकर नहीं घूमते हो बल्कि उसे अपनी जेब में रखते हो. यदि तुम्हारे पास बहुत अधिक धन हो तो तुम उसे अपनी जेब में ठूंसकर नहीं रखते बल्कि तिजोरी या बैंक में रख देते हो.”

“सभी को प्रत्यक्ष दिखनेवाली बड़ी सी बेल्ट पहनकर घूमने में क्या तुक है? यह सबको बता देती है कि तुम्हारे कौशल की सीमा क्या है. प्रवीण योद्धा यह भलीभांति जानता है कि रणनीति अधिक महत्वपूर्ण है, प्रदर्शन नहीं.”

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Wang Tsing, who is a professor of Tai Chi Chuan, now lives in Argentina, after having spent almost a decade in São Paulo. At the age of 82, he still teaches his pupils that inner harmony is fundamental for outer happiness.

One of his disciples told me that once he wanted to know from Wang Tsing why Tai Chi does not use the system of colored belts that other martial arts use (to indicate the grade of apprenticeship).

“If you have money, you don’t carry it in your hands, you carry it in your pockets,” answered Wang. “If you have lots of money, you don’t stuff your pockets with it, you keep it in the bank.”

“What is the sense of walking around wearing a big belt that everyone can see, revealing all that you know?” “A good warrior knows that strategy is far more important than vanity.”

पाइलो कोएलो के ब्लॉग से – From the blog of Paulo Coelho

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चंद्रमा की ओर इशारा – Finger Pointing to the Moon

भिक्षुणी वू जिन्कांग ने आचार्य हुइनेंग से पूछा, “मैं कई वर्षों से महापरिनिर्वाण सूत्र का पारायण कर रही हूं लेकिन इनमें कही अनेक बातों को समझ नहीं पा रही हूं. कृपया मुझे उनका ज्ञान दें.”

आचार्य ने कहा, “मुझे पढ़ना नहीं आता. यदि तुम मुझे वे अंश पढ़कर सुना दो तो शायद मैं तुम्हें उनका अर्थ बता पाऊं.”

भिक्षुणी ने कहा, “आपको लिखना-पढ़ना नहीं आता फिर भी आप इन गूढ़ शास्त्रों का ज्ञान कैसे आत्मसात कर लेते हैं?”

“सत्य शब्दों पर आश्रित नहीं होता. यह आकाश में दीप्तिमान चंद्रमा की भांति है, और शब्द हमारी उंगली हैं. उंगली से इशारा करके आकाश में चंद्रमा की स्थिति को दर्शाया जा सकता है, लेकिन उंगली चंद्रमा नहीं है. चंद्रमा को देखने के लिए दृष्टि को उंगली के परे ले जाना पड़ता है. ऐसा ही है न?”, आचार्य ने कहा.

finger-moon-hoteiइस दृष्टांत का सार यह है कि चंद्रमा की ओर इंगित करने वाली उंगली चंद्रमा नहीं है. क्या इसका कोई गहन अर्थ भी है? हमारे दिन-प्रतिदिन के जीवन से इसका क्या संबंध है? इस दृष्टांत के अर्थ का हम किस प्रकार उपयोग कर सकते हैं?

चित्र में लॉफ़िंग बुद्ध होतेई चंद्रमा की ओर इशारा कर रहा है. होतेई चीन के परवर्ती लियांग राजवंश (907–923 ईसवी) में महात्मा था. प्रसन्नता और संतोष होतेई के चित्र व चरित्र का रेखांकन करने वाले प्रमुख तत्व हैं. उसकी थलथलाते हुए पेट और प्रसन्नचित्त मुखमंडल की छवि विषाद हर लेती है.

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The nun Wu Jincang asked the Sixth Patriach Huineng, “I have studied the Mahaparinirvana sutra for many years, yet there are many areas i do not quite understand. Please enlighten me.”

The patriach responded, “I am illiterate. Please read out the characters to me and perhaps I will be able to explain the meaning.”

Said the nun, “You cannot even recognize the characters. How are you able then to understand the meaning?”

“Truth has nothing to do with words. Truth can be likened to the bright moon in the sky. Words, in this case, can be likened to a finger. The finger can point to the moon’s location. However, the finger is not the moon. To look at the moon, it is necessary to gaze beyond the finger, right?”

The finger pointing to the moon is not the moon is the essence here. But what does this mean on a deeper level? How does it relate to todays everyday life? How can we understand the meaning in an useful manner?

The laughing Buddha Hotei is pointing to the moon, who was a monk who lived during the Later Liang Dynasty (907–923 AD) of China. Contentment and happiness being his defining attributes, Hotei has a cheerful face and a big belly.

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अपना घर जमाइये…

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अपने घर और परिवेश को व्यवस्थित रखना एक हुनर है जो नियमित अभ्यास से और अधिक निखरता है. आधुनिक जीवनशैली मे दिनोंदिन बढ़ती आपाधापी के कारण घर-गृहस्थी में जो समस्याएं पहले महानगरों में आम थीं वे अब छोटे शहरों में में भी पैर पसार रहीं हैं. भारतीय परिवार में घर-परिवार की देखरेख करना स्त्रियों का एक अनुवार्य गुण माना जाता रहा है. बदलते माहौल और जागरुकता के कारण अब बहुत से घरों में पुरुष भी कई कामों में स्त्रियों की सहायता करने लगे हैं. जिन घरों में स्त्री भी नौकरी करती हो वहां या तो नौकर के सहारे या आपसी तालमेल से सभी ज़रूरी काम निपटाना ही समय की मांग है.

रोज़मर्रा के कुछ काम ऐसे होते हैं जिनको करना निहायत ही ज़रूरी होता है. आप चाहें तो कपड़े सप्ताह में एक या दो दिन नियत करके धो सकते हैं लेकिन खाना बनाना और घर को व्यवस्थित रखना ऐसे काम हैं जिन्हें एक दिन के लिए भी टाला नहीं जा सकता. घर की सफाई को टाल देने पर दूसरे दिन और अधिक गंदगी से दो-चार होना पड़ता है. ऐसे में किसी अतिथि के अनायास आ जाने पर शर्मिंदगी का सामना भी करना पड़ता है. इसलिए बेहतर यही रहता है कि सामने दिख रही गंदगी या अव्यवस्था को फौरन दुरुस्त कर दिया जाए.

किसी भी काम को और अधिक अच्छे से करने के लिए यह ज़रूरी होता है कि उसके सभी पक्षों के बारे में अपनी जानकारी को परख लिया जाए. घर के बाहर और भीतर बिखरी अव्यवस्था को दूर करने के लिए रोज़-रोज़ की परेशानियों का सामना करने से बेहतर यह है कि घर को यथासंभव हमेशा ही सुरुचिपूर्ण तरीके से जमाकर रखें. ऐसा करने पर हर दिन की मेहनत से भी बचा जा सकता है और इस काम में खटने से बचने वाले समय का सदुपयोग किन्हीं अन्य कामों में किया जा सकता है.

घर को कायदे से रखने सिर्फ हाउसवाइफ का ही कर्तव्य नहीं है. इस काम में घर के सभी सदस्यों और बच्चों की भागीदारी भी होनी चाहिए. घर के सभी सदस्यों का समझदारी भरा व्यवहार उनके घर को साफ, स्वच्छ और सुंदर बनाता है. घर में कीमती सामान और सजावट का होना ज़रूरी नहीं है बल्कि घर में ज़रूरत के मुताबिक सामान का व्यवस्थित रूप से रखा जाना ही घर को तारीफ़ के काबिल बनाता है. सफाई तथा व्यवस्था को नज़रअंदाज करने और उससे जी चुरानेवाले कई तरह के बहाने बनाते हैं और यथास्थिति बनाए रखने के लिए कई तर्क देते हैं, जिनका समाधान नीचे क्रमवार दिया जा रहा हैः

1. समझ में नहीं आता कि शुरुआत कहां से करूं? - किसी भी काम को करने के लिए कहीं से तो शुरुआत करनी ही पड़ेगी, इसलिए यदि आप तय नहीं कर पा रहे हों तो किसी भी एक कोने को चुन लें. उस स्थान को साफ और व्यवस्थित करते हुए आगे बढ़ें. एक ही जगह पर एक घंटा लगा देने में कोई तुक नहीं है. एक कोने को पांच-दस मिनट दें ताकि पूरे घर को घंटे भर के भीतर जमाया जा सके. आज पर्याप्त सफाई कर दें, कल थोड़ी और करें. एक दिन सिर्फ किताबों के ऊपर की धूल झाड़ दें, दूसरे दिन उन्हें क्रमवार जमा दें. यदि आप थोड़ा-थोड़ा करके काम करेंगे तो यह पहाड़ सा प्रतीत नहीं होगा.

2. पुराने अखबारों और पत्रिकाओं में कोई काम की चीज हुई तो? - मेरे एक मित्र के घर दो-तीन साल पुराने अखबारों और पत्रिकाओं का ढेर लगा रहता था. उसे यही लगता था कि उनमें कोई काम की चीज होगी जिसकी ज़रूरत पड़ सकती है. लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी अखबार या पत्रिका को खोजने की ज़रूरत पड़ी हो. बहुत लंबे समय तक पड़े रहने के कारण उस रद्दी का सही मोल भी नहीं मिलता था. कुछ घरों में ऐसा ही होता है. यह एक मनोदशा है जिसके कारण लोग पुराने कागजों का अंबार संजोए रहते हैं. इसका सीधा-सरल उपाय यह है कि पढ़ चुकने के फौरन बाद ही यह तय कर लिया जाए कि उस अखबार या पत्रिका को रखना है या रद्दी में बेचना है. जिन अखबार या पत्रिका को सहेजना ज़रूरी लग रहा हो उनका एक अलग ढेर बना लिया जाए. मेरा अनुभव यह कहता है कि यह ढेर भी अंततः रद्दी में ही मर्ज हो जाता है. प्रारंभ से ही ज़रूरी और गैर-ज़रूरी अखबार या पत्रिका का ढेर बनाने लगें ताकि बाद में रद्दी का अंबार न लगे.

3. मैं तो तैयार हूं लेकिन घर के सदस्य ही नहीं मानते! - दूसरों पर जिम्मेदारी डालने से पहले खुद शुरुआत करें. अपनी निजी चीजों को अपनी जगह पर व्यवस्थित रखें और दूसरों को बताएं कि ऐसा करना क्यों ज़रूरी है. नकारात्मक नज़रिया रखते हुए कोई समझाइश देंगे तो इसका सही प्रभाव नहीं पड़ेगा. उन्हें अपने काम में शामिल करें. छोटे बच्चों को बताएं कि वे अपने बस्ते और कपास को सही तरीके से रखें, पेंसिल की छीलन जमीन पर नहीं गिराएं, अपने गंदे टिफिन को धुलने के लिए रखें. अपने परिवेश को साफ रखना व्यक्तिगत अनुशासन का अंग है और छुटपन से ही बच्चों को इसकी शिक्षा देनी चाहिए. प्रारंभ में लोग आनाकानी और अनमने तरीके से काम करते हैं लेकिन उसका लाभ दिखने और प्रोत्साहन मिलने पर यह आदत में शुमार हो जाता है.

4. क्या पता किस चीज की कब ज़रूरत पड़ जाए! - इस मनोदशा का जिक्र ऊपर किया गया है. यदि आप इससे निजात पाने की कोशिश नहीं करेंगे तो आपका घर कचराघर बन जाएगा. इसका सीधा समाधान यह है कि एक बक्सा लें और ऐसे सामान को उसमें डालते जाएं जिसके बारे में आप आश्वस्त नहीं हों. छः महीने या साल भर के बाद उस बक्से का मुआयना करें. यदि इस बीच किसी सामान की ज़रुरत नहीं पड़ी हो तो उससे छुटकारा पाना ही सही है.

5. मैं उपहारों और स्मृतिचिह्नों का क्या करूं? - घर में मौजूद बहुत सी चीजों का भावनात्मक मूल्य होता है और वे किसी लम्हे, व्यक्ति या घटना की यादगार के रूप में रखी जातीं हैं. इन चीजों के बारे में यही कहा जा सकता है कि इनसे जुड़ी असल भावना हमारे भीतर होती है. ये सामान उस भावना का प्रतिरूप बनकर उपस्थित रहते हैं. आप उनकी फोटो लेकर एक अल्बम में या टेबल पर लगा सकते हैं, चाहें तो किसी ब्लॉग आ डायरी में उनके जिक्र कर सकते हैं. यदि ऐसी वस्तुएं जगह घेर रही हों तो उन्हें बक्साबंद करके रख देने में ही समझदारी है. दूसरों ने आपको उपहार इसलिए नहीं दिए थे कि आप उन्हें बोझ समझकर धूल खाने के लिए छोड़ दें. इन उपहारों ने आपको कभी खुशी दी थी, अब इनको रखे रहना मुनासिब न लग रहा हो तो उन्हें घर से बाहर का रास्ता दिखाने में असमंजस न रखें.

6. ऐसी भी क्या पड़ी है? आज नहीं तो कल कर लेंगे! - आलस्य ऐसी बुरी चीज है कि यदि यही भाग जाए तो बहुत से काम सहज बन जाते हैं. एक बात मन में बिठा लें कि कल कभी नहीं आता. आलस्य को दूर भगाने के लिए प्रेरणा या मोटीवेशन खोजिए. आप जिस काम से जी चुरा रहे हों उसका जिक्र परिवार के सदस्यों और दोस्तों से कर दें. उनके बीच घोषणा कर दें कि आपने साफ-सफाई करने बीड़ा उठा लिया है. यदि आप इस दिशा में कुछ काम करें तो उसके बारे में भी सबको बता दें. इसका फायदा यह होगा कि आपको ज़रूरी काम करने के लिए मोटीवेशन मिलता रहेगा और आप कुछ आलस्य कम करेंगे क्योंकि आपके ऊपर खुद से और दुसरों से किए वादे निभाने का दारोमदार होगा. इन वादों को तोड़कर आप खुद को नाकारा तो साबित नहीं होने देना चाहेंगे न?

7. सारी अनुपयोगी वस्तुओं को यूंही तो फेंक नहीं सकते! - यदि आपके घर में बहुत सारा अनुपयोगी सामान है तो उनके निबटारे के केवल तीन संभव हल हैं – अ) सामान चालू हालत में हो तो इस्तेमाल करें. ब) इस्तेमाल नहीं करना चाहते हों या आपके पास उससे अच्छा सामान हो तो किसी और को दे दें. स) यदि सामान खराब हो और ठीक नहीं हो सकता हो तो उसे रखे रहने में तभी कोई तुक है जब उसकी कोई विटेज वैल्यू हो.

8. और भी बहुत से ज़रूरी काम हैं. इनके लिए समय ही कहां है! - यदि आप चाहें तो बहुत से काम संगीत या समाचार सुनते-सुनते ही निबटा सकते हैं. सही तरीके से करें तो अपने घर और परिवेश को साफ और व्यस्थित रखने के लिए रोज कुछ मिनट ही देने पड़ते हैं. एक आलमारी, एक टेबल, घर का एक कोना – एक दिन में एक बार. घर छोड़ने के पहले और घर लौटने के बाद. जिस सामान को जहां रखना नियत किया हो इसे इस्तेमाल के बाद वहीं रखना. जिस चीज की ज़रुरत न हो उसे या तो बक्साबंद करके रख देना या उसकी कंडीशन के मुताबिक या तो ठीक कराकर इस्तेमाल करना, या बेच देना, या दान में दे देना. ये सभी उपाय सीधे और सरल हैं. इन्हें अमल में लाने पर लोग घर की ही नहीं बल्कि उसमें रहनेवाले सभी सदस्यों की भी तारीफ़ करते हैं. यूं तो नौकरों के भरोसे भी यह सब किया जा सकता है लेकिन इसे खुद ही सुरूचिपूर्वक करने में आनंद आता है.

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सज़ा – The Punishment

यह किस्सा ईरान का है. खुसरो प्रथम के नाम से ईरान का शासक बनने से बहुत पहले खुसरो एक गुरुकुल में रहता था और उसके गुरु उसे समस्त शास्त्र और विद्या में पारंगत करने के लिए प्रतिबद्ध थे.

एक दिन खुसरो के गुरु ने अकारण ही उसे कठोर शारीरिक दंड दे दिया. कई वर्ष बाद जब खुसरो राजगद्दी पर बैठा तो उसने सबसे पहले अपने गुरु को महल में बुलवाया और पूछा कि उन्होंने सालों पहले किस अपराध के लिए उसे कठोर दंड दिया था.

“आपने मुझे अकारण ही कठोर दंड क्यों दिया? आप भलीभांति जानते थे कि मैंने कोई भी गलती या अपराध नहीं किया था”.

“जब मैंने तुम्हारी बुद्धिमता देखी तब में यह जान गया कि एक-न-एक दिन तुम अपने पिता के साम्राज्य के उत्तराधिकारी अवश्य बनोगे,” गुरु ने कहा.

8361471571_848395c3f9_z“तब मैंने यह निश्चय किया कि तुम्हें इस बात का ज्ञान होना चाहिए कि किसी व्यक्ति के साथ किया गया अन्याय उसके हृदय को आजीवन मथता रहता है. मैं आशा करता हूं कि तुम किसी भी व्यक्ति को बिना किसी कारण के कभी प्रताड़ित नहीं करोगे.”

* * * * *

When he was young, Cosroes (later on Cosroes I) had a master who managed to make him an outstanding student in all the subjects he learned.
One afternoon, for no apparent reason, the master punished him very severely.

Years later, Cosroes succeeded to the throne. One of the first measures he took was to send for his childhood master and demand an explanation for the injustice he had committed.

“Why did you punish me? You know I did not deserve it”

“When I saw your intelligence, I realized right away that you would inherit your father’s throne,” answered the master.

“And so I decided to show you how injustice is capable of marking a man for the rest of his life. I hope that you will never chastise anyone without reason.”

पाइलो कोएलो के ब्लॉग से – From the blog of Paulo Coelho

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