Category Archives: Zen Stories

चुनाव


शिष्य ने गुरु से पूछा, “यदि मैं आपसे यह कहूं कि आपको आज सोने का एक सिक्का पाने या एक सप्ताह बाद एक हज़ार सिक्के पाने के विकल्प में से एक का चुनाव करना है तो आप क्या लेना पसंद करेंगे?”

“मैं तो एक सप्ताह बाद सोने के हज़ार सिक्के लेना चाहूँगा”, गुरु ने कहा.

शिष्य ने आश्चर्य से कहा, “मैं तो यह समझ रहा था कि आप आज सोने का एक सिक्का लेने की बात करेंगे. आपने ही तो हमें हमेशा वर्तमान क्षण में अवस्थित रहने की शिक्षा दी है!”

“तुमने मुझे सोने की दो काल्पनिक मात्राओं में से एक का चयन करने के लिए कहा”, गुरु बोले, “तो इससे क्या फर्क पड़ता है कि मैं किसका चुनाव करता हूँ!?

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मन


“मेरे मन के साथ कुछ गड़बड़ है” शिष्य ने कहा, “मेरे विचार तर्कसंगत नहीं हैं”.

गुरु ने कहा, “शांत सरोवर और उफनती नदी, दोनों जल ही हैं”

शिष्य गुरु की बात नहीं समझ पाया और मुंह बाए देखता रहा.

गुरु ने अपने कथन की व्याख्या की, “तुम्हारे सबसे शुद्ध, सचेत, उन्नत विचार और सबसे विकृत, दूषित, भद्दे विचार – तुम्हारा मन ही इनका सृजन करता है.”

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अनुभव


एक सुबह एक प्रख्यात लेखक और ज़ेन मास्टर के बीच ज़ेन के विषय पर बातचीत हो रही थी:

“ज़ेन को आप किस प्रकार परिभाषित करेंगे?”, लेखक ने पूछा.

“ज़ेन प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा प्राप्त ज्ञान है”, ज़ेन मास्टर ने कहा.

“दूसरों के अनुभव से ज्ञान प्राप्त करने में क्या बुराई है?”, लेखक ने कहा, “पुस्तकालयों में ज्ञान भरा पड़ा है!”

ज़ेन मास्टर ने कुछ नहीं कहा.

कुछ देर बाद ज़ेन मास्टर ने लेखक से पूछा, “आपको भोजन कैसा लगा?”

“मैंने अभी कुछ खाया ही नहीं है! अभी तो सुबह के दस ही बजे हैं”, लेखक ने कहा.

“मैं जानता हूँ. मैंने आपके लिए कुछ बनवाया था पर वह मैंने ही खा लिया”, ज़ेन मास्टर ने कहा, “भोजन बहुत बढ़िया था. आप मेरे अनुभव से यह जान सकते हैं.”

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सबक


धनुर्विद्या के एक प्रसिद्द गुरु अपने शिष्य के साथ वन में भ्रमण कर रहे थे. गुरु ने एक वृक्ष की सबसे ऊंची शिखाओं में छुपे हुए फल पर निशाना लगाया और तीर चला दिया. फल सीधे डाल से टूटकर नीचे आ गिरा. भूमि पर गिरे हुए फल पर एक दृष्टि डाल कर गुरु भावशून्य-से आगे बढ़ गए, लेकिन उनकी दक्षता से चकित होकर शिष्य ने उनसे पूछा, “क्या आपको यह देखकर प्रसन्नता नहीं हुई?”

गुरु ने कुछ नहीं कहा. वे चलते रहे. कुछ दूर जाने पर गुरु ने पहले की भांति एक छुपे हुए फल पर निशाना साधा लेकिन इस बार निशाना चूक गया. इससे निराश होकर शिष्य ने पूछा, “इस बार निशाना नहीं लगने पर आपको बुरा लग रहा होगा.”

गुरु ने इस बार भी कुछ नहीं कहा. वे पहले की भांति चलते रहे. सूर्या के अस्ताचलगामी होने के साथ-साथ शिष्य दिन में सीखे गए सबक को जान गया. उसने अपना धनुष उठाया और वृक्ष की सबसे ऊंची डाल से लटक रहे फल पर निशाना लगाया.

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जुआरी


एक जुआरी ने ज़ेन मास्टर के पास आकर कहा, “मैं कल रात सराय में पत्तों की बेईमानी करते पकड़ा गया और मेरे साथियों ने मुझे पहली मंजिल के कमरे की खिड़की से नीचे सड़क पर धकेल दिया. किस्मत से मुझे कुछ ख़ास चोट नहीं लगी. अब मुझे क्या करना चाहिए?”

मास्टर ने जुआरी की आँखों में आँखें डालकर कहा, “आज से ऊपरी मंजिलों पर जुआ खेलना बंद कर दो”.

जुआरी ख़ुशी-ख़ुशी वापस लौट गया.

यह सब देख-सुन रहे एक शिष्य ने अचरज से मास्टर से पूछा, “आपने उसे सीधे-सीधे जुआ खेलना बंद करने के लिए क्यों नहीं कहा?”

“क्योंकि मैं जानता हूँ कि वह जुआ खेलना कभी भी बंद नहीं करेगा”, मास्टर ने मुस्कुराते हुए कहा.

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