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ये खेल होगा नहीं दोबारा

ये ज़िंदगी…

ये ज़िंदगी…

ये ज़िंदगी आज जो तुम्हारे

बदन की छोटी-बड़ी नसों में मचल रही है,

तुम्हारे पैरों से चल रही है.

ये ज़िंदगी…

ये ज़िंदगी…

तुम्हारी आवाज़ में गले से निकल रही है,

तुम्हारे लफ़्ज़ों में ढल रही है.

ये ज़िंदगी…

ये ज़िंदगी…

ये ज़िंदगी जाने कितनी सदियों से यूंही शक्लें बदल रही है.

ये ज़िंदगी…

ये ज़िंदगी…

बदलती शक्लों, बदलते जिस्मों में चलता-फिरता एक शरारा

जो इस घड़ी नाम है तुम्हारा.

इसी से सारी चहल पहल है,

इसी से रौशन है हर नज़ारा.

सितारे तोड़ो, या घर बसाओ,

कलम उठाओ, या सर झुकाओ,

तुम्हारी आँखों की रौशनी तक है खेल सारा,

ये खेल होगा नहीं दोबारा,

ये खेल होगा नहीं दोबारा.

गायक – जगजीत सिंह

शायर – निदा फाज़ली

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स्टीव जॉब्स और चीनी किसान

मैं स्टीव जॉब्स की रचनात्मकता और जीवट का हमेशा से ही कायल रहा हूँ हांलांकि मैंने उसके बिजनेसमैन रूप की सदा ही आलोचना की है. ऐपल के प्रोडक्ट शानदार हैं पर सभी जानते हैं कि वे ऐसे बनाये गए हैं ग्राहक को कुछ भी करने के लिए ऐपल पर ही निर्भर रहना पड़ता है. आज जब लगभग हर उत्पाद में एक्सपेंडेबल मेमोरी कार्ड्स लगाये जा सकते हैं वहीं ऐपल के प्रोडक्ट ऐसी किसी भी सुविधा से वंचित रखे गए हैं. ऐपल के ‘एक्सक्लूसिव’ प्रोडक्ट खरीद पाना सबके लिए संभव नहीं है और यहीं से ऐपल के लोभ आधारित बाज़ार को बढ़त मिलती आई है. अकेले अमेरिका में ही ऐपल के iPod, iPhone, और iPad हथियाने के लिए लोगों ने जान की बाजियां भी लगा दीं हैं और हैरी पौटर की तर्ज़ पर लोग रात भर स्टोर के बाहर इंतज़ार करते हैं कि कब स्टोर खुलेगा और वे सबसे पहले प्रोडक्ट हथिया सकेंगे. कुछ मामलों में यह सब वाकई अहमकाना है, भले ही आप भी मुझसे इत्तेफाक न रखें.

स्टीव जॉब्स के गुज़र जाने के बाद उसके जीवन और उपलब्धियों को लेकर बहुत सी पोस्टें आईं. स्टीव के शब्दों में ही कहें तो उसकी आस्था, आत्मविश्वास, और अंतरात्मा की आवाज़ सुन पाने की योग्यता ही उसकी सफलता का रहस्य थी. जब उसका जीवन तमाम कठिनाइयों से घिरा हुआ था और उसे कोई राह नहीं सूझ रही थी तब भी स्टीव ने डटे रहना ही श्रेयस्कर समझा. महान थाई संत अजान काह ने इस हमारी इस क्षमता को “सर्वज्ञेय” कहा है. यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि हम इस क्षमता को सदा ही नज़रंदाज़ करते आये हैं.

बहुत समय पहले इस ब्लॉग में एक ताओ कहानी आई थी जिसे पाठक अन्यत्र भी पढ़ चुके होंगे. ऐसी कथाएं अनेक संस्कृतियों में कही गयीं हैं. इस कथा में शुभ-अशुभ, और भाग्य-दुर्भाग्य का द्वंद्व है. जब किसान के पडोसी घटनाओं के निष्कर्ष निकालने की जल्दबाजी करते हैं तब कथा का केन्द्रीय पात्र – चीनी किसान – अविचलित रहता है. मुझे यह कथा आज याद हो आई जब मैंने स्टीव जॉब्स का प्रसिद्द स्टेनफोर्ड भाषण पुनः देखा. यह इस बात की मिसाल है कि कैसे कुछ घटनाएँ अपने साथ दुर्भाग्य की छाया लिए डोलती रहतीं हैं पर कालांतर में वही घटनाएं सफलता की नींव बनतीं हैं.

मनुष्य की शक्तियां और क्षमताएँ असीम हैं. फिर भी बहुत कुछ है जो हाथ नहीं आता. हम चीज़ों को खंड-खंड देखने के आदी हैं और उनसे ही अपना विश्व बुनते हैं. स्टीव हमें याद दिलाता है कि हम ‘आतंरिक प्रक्रिया’ (inner process) पर श्रद्धा रखें. तभी हम बिन्दुओं को मिलाकर विश्व को उसकी समग्रता में देख सकेंगे.

Thanx to Dhamma Matters for this post

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दो साल बाद…

यह पोस्ट इस ब्लौग के दो साल पूरे होने के विषय पर लिखी है. यदि इसे पढ़ने में आपकी रूचि न हो तो अन्य पोस्ट पढ़ने के लिए कृपया आर्काइव पर क्लिक करें.

हिंदीज़ेन ब्लॉग पर मैं पिछले दो सालों से काम कर रहा हूँ. यह पहले ब्लॉगर में था और 1 मई, 2009 से wordpress.com के कस्टम डोमेन पर है. अब तक इसमें 460 से भी अधिक पोस्टें छप चुकी हैं. इसके लिए सामग्री जुटाने के लिए मैं अभी भी जूनून की हद तक एक लिंक से दूसरी लिंक तक घूमता रहता हूँ ताकि कहीं से अनुवाद करने लायक कोई बेहतरीन कहानी, प्रसंग, ब्लॉग पोस्ट या जीवन दर्शन के सूत्र मिल जाएँ.

इन दो सालों में मैंने इक्का-दुक्का पोस्ट में ही व्यक्तिगत अनुभवों और परिस्तिथियों के बारे में लिखा है. कुछ एक बार ऐसा भी किया है कि किसी पोस्ट में विदेशी लेखक के अनुभव से मिलता-जुलता कोई अपना अनुभव मैंने शामिल कर दिया क्योंकि उसका अनुभव उसके देशकाल के अनुरूप था और वह भारतीय पाठकों को पढ़ने में अरुचिकर या अजीब लगता.

इस तरह पिछले दो साल से मैंने आप सभी को मेरी विचारप्रक्रिया और जीवनानुभव से वंचित रखा है. इसका जो कारण मुझे समझ में आता है वह यह है कि मैं अब पहले की तरह मुखर नहीं रहा. मेरे बचपन के दोस्त भी इस बात को मानते हैं कि मुझमें अतिशय गांभीर्य आता जा रहा है और मेरा जीवन अब थिर हो चला है. लेकिन उनके यह सोचने में बहुत ज्यादा सत्य नहीं है. मैं अभी भी गप्पें हांकने, ठहाके लगाने, और गीत गुनगुनाने वाला निशांत हूँ पर यह ज़रूर है कि मेरा लड़कपन तो कभी का विदा हो चला है. और ऐसा होना भी चाहिए. जीवन अवस्था के हर चरण की अपनी गरिमा और मर्यादा होती है. कई वर्ष नौकरी में बिताने और अपने परिवार को प्राथमिकता पर रखनेवाले व्यक्ति के लिए अब बेवजह की हीहीफीफी शोभा नहीं देती. :)

तो… अब मन कर रहा है कि ब्लौगिंग में बिताये अपने दो सालों का लेखा-जोखा आपके सामने रखा जाए. मैं यहाँ यह नहीं बता पाऊँगा कि मैं इस बीच किन ब्लौगरों से मिला या मैंने कितनी ब्लॉगर मीट आदि अटेंड किये. अपने प्रिय ब्लौगर प्रवीण पाण्डेय जी से मैं कुछ समय पहले ही मिला था और उन्हें यह बताया था कि अब किस्से-कहानियों को अनूदित करने के साथ ही कुछ अपना, … कुछ अपने बारे में भी लिखना चाहता हूं. अपने इस कामकाज का लेखा-जोखा लेने से बेहतर भला अब क्या होगा? इस प्रकार मेरी यह पोस्ट पिछले दो सालों की चुनौतियों, समस्याओं, और इस दौरान मिले सबक पर केन्द्रित होगी. मुझे लगता है कि यह जानना सभी के लिए रोचक भी होगा और महत्वपूर्ण भी.

मैं यह मानकर चल रहा हूँ कि यह पोस्ट मुख्यतः ब्लौगरों द्वारा पढ़ी जायेगी और हर ब्लौगर के भीतर उसका प्रिय ब्लॉग ठीक उसी प्रकार उपस्थित है जैसे मेरे भीतर हिंदीज़ेन मौजूद है. हम ब्लौगर लोग अपने ब्लॉग से बहुत प्यार करते हैं. यह हमारे लिए दुनिया की ओर खुलनेवाले नई खिड़की है. सालों तक हम खुद को तलाशने और व्यक्त करने के जतन करते रहे, फिर कहीं जाकर तकनीक की तरक्की से यह मौका हमारे सामने आया है कि हम अपने कम्यूटर पर बैठे रहकर दुनिया भर को अपने विचारों से प्रभावित कर सकते हैं. यह कमाल की चीज़ है. तारीफ करने बैठूं तो पोस्ट शायद ख़तम होने का नाम नहीं लेगी इसलिए अब काम की बात की ओर लौटता हूँ.

पीछे मुड़कर देखता हूँ तो अपनी गलतियों की ओर ध्यान जाता है. पुरानी पोस्टों में अभी बहुत सुधार की गुंजाइश है लेकिन नई पोस्टें लगाना और दूसरे ब्लॉग पढना इतना समय मांगता है कि उसे अनिश्चितकाल तक के लिए टाल दिया है. अपनी गलतियाँ हम पहचानने लायक हो जाएँ यह भी मेरे लिए बहुत संतोषजनक बात है. जो ब्लौगर बंधु मेरे कार्यालयी उत्तरदायित्वों के बारे में जानते हैं वे समझ सकते हैं कि मैंने अपने काम को अनुवाद पर केन्द्रित करना ही क्यों बेहतर समझा. पढ़ने-लिखने से कुछ सालों तक कटे रहने के कारण अध्ययन और चिंतन में जो ठहराव आता जा रहा था वह अब छंट रहा है. ब्लौगिंग ने भाषा को समृद्ध किया है और विचारों को गहराई दी है. यहाँ सबसे अच्छी बात यह है कि कोई भी ब्लौगर केवल एक ही विषय के इर्द-गिर्द सदैव नहीं घूम सकता. चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने उसे अपनी रुचियों से इतर बहुत कुछ पढ़ने को मिलता रहता है जो उसकी समझ और ज्ञान में वृद्धि करता है. यह तो सभी मानते हैं कि पढ़ा-लिखा कभी व्यर्थ नहीं जाता. रोजाना इतना कुछ पढ़ने को मिलता रहता है कि भूलने की दर भी खतरनाक तरीके से बढ़ चली है. ऐसे में मैंने एवरनोट का सहारा लिया. इसपर मैंने एक पोस्ट लिखी है जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं.

ब्लौगिंग से दूर रहना नियमित ब्लौगर के लिए कठिन है लेकिन कभी-कभी यह ज़रूरी भी है. कम्प्यूटर के सामने रोजाना दो-तीन घंटे तो वे ब्लौगर भी बैठते ही होंगे जो कभी-कभार अपनी पोस्ट लिखते हैं. मेरे विचार से ब्लौगिंग को इतना समय देना ही पर्याप्त है. परिवार के प्रति दायित्व पूरे करने भी ज़रूरी हैं. मेरे साथ यह अच्छा हुआ कि घर में सभी ने यह समझा कि मुझे जिस काम में आनंद मिलता हो वह मैं ज़रूर करूं क्योंकि सुबह सात बजे से शाम के सात बजे तक का वक़्त दैनिक कर्मों में, आफिस में काम और आने-जाने में खप जाता था और मैं कोई रचनात्मक कर्म नहीं कर पाता था.

ब्लॉग के माध्यम से मैंने लोगों से जुड़कर संवाद करने के बारे में हमेशा गंभीरता से सोचा है पर इसके लिए समय के साथ-साथ एक जुड़ाव की भावना भी चाहिए जिसकी मुझमें कुछ कमी है. अव्वल तो ब्लॉग की सम्पूर्ण सामग्री सारगर्भित होती है और उसपर बहुधा कोई विमर्श की गुंजाईश नहीं होती. कभी-कभी किसी पोस्ट में विचार-विमर्श के सूत्र दिखते हैं पर आमतौर से ऐसा नहीं होता कि पोस्ट पब्लिश होने के दो या तीन दिन बाद भी कोई हलचल होती रहे. इसीलिए मैं अधिकतर पोस्टों को ‘जस की तस’ ही रहने देता हूँ. यदि हम हर वस्तु में जूनून की हद तक सुधार करते जायेंगे तो उसका स्वाभाविक जायका खो बैठेंगे. एक सीमा के बाद हर चित्रकार को अपना ब्रश रखना ही पड़ता है अन्यथा उसकी पेंटिंग overworked लगने लगती है. सीखने का भारतीय सिद्धांत सर्वश्रेष्ठ है – करत-करत अभ्यास के … मैं स्वतः उद्घाटित होनेवाली छोटी-छोटी चीज़ों से सीख लेता रहता हूँ.

एक बार एक मित्र ने मुझसे ब्लॉग लिखने के बाद व्यक्तित्व में आनेवाले परिवर्तनों के बारे में पूछा था. आप जानते हैं कि यह ब्लॉग प्रेरणा और सरलता पर केन्द्रित है पर मुझसे सम्पूर्ण सकारात्मकता की आशा करना जल्दबाजी होगी. मैं अभी भी नकारात्मकता को अपने ऊपर हावी होने से रोक नहीं पाता. मैं जल्दी क्रोधित हो जाता हूँ और कभी-कभी अपने दफ्तर की दिक्कतों को घर में लेकर आ जाता हूँ. बाहर की चिल्लपों का सामना करके जब घर आता हूँ तो शांति चाहता हूँ पर कभी-कभी बच्चों पर गुस्सा कर बैठता हूँ. मैं जानता हूँ कि बच्चे बहुत छोटे हैं और मुझे देखकर उत्साहित हो जाते हैं. ऐसे में उनपर नाराजगी निकालना बुरी बात है. फिर भी मैं यह जोर देकर कहूँगा कि ये बातें अब धीरे-धीरे ही सही पर छूटती जा रही हैं. अब मैं अपने हौसलों को आसानी से पस्त नहीं होने देता. मैं नयी चीज़ें सीखता हूँ. अपनी बहुत सी बुरी आदतों से मैं निजात पा चुका हूँ. अभी बहुत कुछ सीखना और करना बाकी है.

बहरहाल… यहाँ मैं आपसे अपने ब्लॉग अनुभव से जुड़ी एक रोचक बात बांटना चाहता हूँ जिसे मैंने कभी भी किसी से शेयर नहीं किया है. पिछले एक साल से मुझे इस ब्लॉग पर बेहद बुरी भाषा में कमेन्ट मिल रहे हैं. इन कमेंट्स में बहुत सी गाली-गलौच भी होती है और इन्हीं कारणों से मैं इन्हें मॉडरेट कर देता हूँ. कभी-कभार मुझपर किंचित आक्षेप लगानेवाले कमेंट्स को मैंने पब्लिश भी किया है पर यह बात सचमुच बड़ी अजीब है कि कोई इस ब्लॉग विशेष पर ऐसे कमेंट्स क्यों करता है. शायद कमेंट्स करनेवाले सज्जन निजी जीवन में बहुत व्यथित हैं और अपनी ऊर्जा को इस प्रकार व्यर्थ कर रहे हैं. इन कमेंट्स के स्रोतों के बारे में जांच-पड़ताल करना समय की बर्बादी के सिवाय कुछ नहीं है इसलिए मैंने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया. मैं यह भी नहीं बूझ पाता कि मैंने ऐसा क्या किया है जो कोई व्यक्ति मुझसे इतना रुष्ट है. यदि उन कमेंट्स के रचयिता यह पोस्ट पढ़ रहे हों तो मैं उनसे यह कहना चाहता हूँ कि यदि आप मेरा धैर्य जांचने के लिए यह काम कर रहे हैं तो शायद आपको निराशा ही हाथ आयेगी. यदि किन्ही व्यक्तियों को यह लगता है कि मैं कोई गलत काम कर रहा हूँ तो उन्हें या तो मुझसे खुलकर बात करनी चाहिए या इससे बेहतर काम करके दिखाना चाहिए. यकीन मानिए, इससे बेहतर साईट देखकर मुझे ख़ुशी ही मिलेगी.

लेकिन ऐसा हर जगह होता है… बस इसकी मात्रा और पद्धति भिन्न हो सकती है. इन बातों के कारण यदि मैं अपने मन को खट्टा कर लूं और पीछे हट जाऊं तो भी उन लोगों को ख़ुशी नहीं मिलेगी. सच्ची ख़ुशी सृजन और रूपांतरण में है. कुछ नया हो जिसे पढ़कर और देखकर सभी को ख़ुशी मिले, किसी का जीवन संवरे, दुनिया और बेहतर बने – ऐसा काम करना चाहिए. आलोचक और निंदक तो मिलते ही रहेंगे, यदि उनकी ही सुनता रहूँगा तो जल्दी ही ब्लॉग लिखना छोड़कर कुछ और करना पड़ेगा… फिर वहां भी आलोचक और निंदक मिलेंगे.

मैंने इस बीच यह पाया है कि हमें आलोचना ज्यादा व्यथित नहीं करती बल्कि उसे विश्लेषित करते रहना अधिक सताता है. कभी यह भी लगने लगता है कि हम गलत दिशा में जा रहे हैं या हमें रुक जाना चाहिए. कभी इसका मतलब यह होता है कि हमें और सीखने की ज़रुरत है. कभी आलोचना हमसे यह उम्मीद भी करती है कि हमें कुछ सख्त खाल वाले प्राणी जैसा होना चाहिए.

हिंदीज़ेन शुरू करने के पहले मेरे उद्देश्य स्पष्ट नहीं थे. मैं कुछ नया करना चाहता था पर हमेशा ही अपने ‘सुनहरे’ अतीत में भ्रमण करता था. धीरे-धीरे मुझे यह समझ में आ ही गया कि जीवन की एक अवस्था इसकी लंबी यात्रा का एक छोटा पड़ाव ही है. मुझे यह मानने में कोई हिचक नहीं है कि मैंने अपनी ज़िंदगी के कई बेहतरीन साल यहाँ-वहां की चीज़ें करने और चीजों का आधा-अधूरा सीखने में गँवा दिए हैं. मैं कुछ लोगों के बारे में पढ़ता हूँ कि तीस साल का होने तक तो उन्होंने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ इस दुनिया को सौंप दिया था तो मुझे अचरज होता है. फिर मुझे लगता है कि मेरे जैसे आदमी के साथ शायद चालीस या पचास का आंकड़ा सही रहेगा. लेकिन ईमानदारी से यह भी कह दूं कि अभी भी मुझे अपने उद्देश्यों का ज्ञान नहीं है… या मैं यह कहूं कि मैं उनकी परवाह नहीं करता, पर यह बड़बोलापन होगा.

मैं बहुत सपने देखता हूँ पर मुझे यह नहीं लगता कि मेरे जीवन में कुछ कमी है. कुछ चीज़ें करना चाहता हूँ जिसके लिए बहुत समय और कुछ धन की ज़रुरत भी होगी पर फिलहाल मेरे वर्तमान की खुशियों और उपलब्धियों का संबंध उनसे नहीं है. भविष्य का बोझ वर्तमान पर नहीं होना चाहिए… अतीत का तो बिलकुल भी नहीं होना चाहिए. अपने काम में उत्साह से जुटे रहना ही बड़ी बात है. ऐसा मैंने जीवन में पहली बार इस ब्लॉग के साथ किया है. इससे जुड़ने के पहले मैंने बहुत सी चीज़ें की लेकिन ज्यादा समय तक उन्हें कायम नहीं रख सका.

मैं अक्सर ही कुछ ब्लॉग लेखकों की घोषणाएं पढ़ता हूँ कि वे ब्लॉग जगत से विदा ले रहे हैं. मेरे मन में ऐसा विचार कभी नहीं आया हांलांकि एक स्वाभाविक ऊब कभी-कभार होती है जो एक-दो दिन में काफूर हो जाती है. मैं इस ऊब से इसलिए उबर जाता हूँ क्योंकि मैं तरह-तरह की चीज़ें पढ़ता- देखता-सुनता हूँ. इंटरनेट पर यदि आप स्वयं को एकांगी कर लेंगे तो जल्दी ही ऊब जायेंगे. यदि आप मेरा ब्लॉग रोल देखें तो पाएंगे कि मैंने विविध विषयों के ब्लॉग उसमें जोड़ रखे हैं और इनसे भी अधिक ब्लौगों को मैं स्थानाभाव के कारण जोड़ नहीं पाता. मैंने स्वयं को इस ब्लॉग पर पोस्ट डालने तक ही सीमित नहीं किया है. यदि मैं तीन दिन में एक पोस्ट पब्लिश करता हूँ तो इससे दस गुनी पढ़ता भी हूँ. यदि मैं यहाँ नहीं आता तो यह कभी नहीं जान पाता कि दुनिया में लाखों-करोड़ों बेहतरीन लोग हैं जो अपने-अपने क्षेत्र में शानदार काम कर रहे हैं और उनसे प्रेरणा ली जा सकती है. मैं अपनी मधुशाला के लिए एक राह नहीं पकड़ सकता. मेरे सामने अनगिनत विकल्प हैं.

चलते-चलते, कुछ आंकड़ों की बात: पिछले साल इसी दिन तक यह ब्लॉग देखनेवालों/देख चुके लोगों की संख्या एक लाख से कुछ कम थी पर बीते एक साल में यह 2,70,000 को पार कर गयी है. साइड में दिए गए क्लस्टर मैप में इसकी पहुँच दुनिया भर में दिखाई गयी है. इन सब तकनीकी चीज़ों से इतर प्रसंशकों एवं आलोचकों के कमेंट्स और ईमेल इस ब्लॉग की कमाई हैं.

धन्यवाद.

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भारत के बारे में 30 रोचक (?) बातें

मेरे तीस वर्षीय अमेरिकन मित्र राम देव ब्लौगर और शोशल उद्यमी (social entrepreneur) हैं एवं स्वयं को digital nomad (डिजिटल बंजारा) कहते हैं. राम देव अपने ब्लॉग में चिरस्थाई समृद्धि और व्यावहारिक अपरिग्रह के बारे में लिखते हैं. कुछ समय पहले वे भारत में थे और भारत दर्शन के बारे में उन्होंने अपने ब्लॉग raamdev.com पर कई रोचक पोस्ट लिखीं हैं. भारत में अपने प्रथम माह में देखी और अनुभव की 30 अटपटी और रोचक बातें वे इस पोस्ट में बता रहे हैं. इनमें से कुछ तो हम पहले से ही जानते हैं और कुछ अन्य के बारे में जानना दिलचस्प होगा.

भारत में मेरा पहला दिन बहुत रोचक था. अब मुझे यहाँ आये हुए 30 दिन होने जा रहे हैं तो मैं आपको उन 30 रोचक बातों के बारे में बताऊंगा जो मुझे यहाँ आने के बाद पता चलीं हैं.

1. यहाँ लोग रेस्टौरेंट को होटल कहते हैं. यदि आप किसी जगह रात भर के लिए रुकना चाहते हों तो “रहने” की बात करें.

2. यदि आप किसी रेस्टौरेंट (या होटल) में हैं और कोई सामान कहीं भेजना चाहते हैं तो उसे “पार्सल” करने के लिए कहें.

3. ओवरपास (overpaass) को यहाँ फ़्लाइओवर कहा जाता है.

4. वाहन चालक दिल खोलकर हौर्न बजाते हैं. इसी काम के लिए हम USA में ब्लिंकर्स का उपयोग करते हैं.

5. कितना ही खतरनाक मोड़ हो या सामने से कोई गाड़ी आ रही हो तब भी पीछेवाले वाहन को पास दे दिया जाता है.

6. हैडलाईट फ्लैश करके और हौर्न बजाकर यह चेतावनी दे दी जाते है कि सामने से आनेवाले वाहन सावधान हो जाएँ क्योंकि आप गलत सड़क/साइड पर गाड़ी चला रहे हैं.

7. जीप या बस में बैठना रोलर कोस्टर की सवारी के बराबर है.

8. जब मैं लोगों से पूछता हूँ कि मैं कहाँ से आया हूँ तो ज्यादातर लोग अमेरिका कहने के पहले इंग्लैण्ड बताते हैं.

9. बिजली कभी भी जा सकती है और यह आम बात है. एक रात मैं रेस्टौरेंट में खा रहा था तभी बिजली चली गयी. वेटर एक फ्लैशलाईट लेकर आया ताकि मैं उसकी रोशनी में खा सकूं.

10. बिजली के बटनों के साथ बड़े स्विच लगे होते हैं जिन्हें चलाकर पहले सौकेट या बटन में बिजली लाई जाती है.

11. बिजली के स्विच नीचे दबाने पर चालू होते हैं और ऊपर दबाने पर बंद होते हैं.

12. यूनाइटेड स्टेट्स को यहाँ आम तौर पर सभी अमेरिका कहते हैं.

13. मेरे जैसे विदेशी सैलानी यहाँ इतने अलग-थलग से दिखते हैं कि आवारा जानवर भी हमें हैरत से देखते हैं.

14. आठ सीट वाली जीप में बाईस सवारियां ठूंसी (समाई नहीं) जा सकतीं हैं.

15. हर रेस्टौरेंट में हाथ धोने का स्थान है क्योंकि हाथ से खाना खाना आम बात है और लोग खाने से पहले और बाद में हाथ धोते हैं.

16. भारत सरकार विदेशी सैलानियों को बेहद सस्ते दीर्घकालीन (अधिकतम 90 दिन तक) रेलवे पास उपलब्ध कराती है. पास की कीमत है (90 दिनों के लिए $235 या $1,060 (A/C-दर्ज़ा)).

17. तारीख बताने/जानने का फॉरमेट है DD/MM/YYYY. (काश दुनिया भर में इसका कोई एक ही मानक निर्धारित हो जाए).

18. सड़क के किनारे किसी को लघु या दीर्घशंका का निवारण करते देखना अचरज भरा नहीं है.

19. बहुत से लोग फुटपाथ पर सोते हैं.

20. मैक्डॉनाल्ड्स का खाना महंगा है और भीतर की भीड़ बाहर की भीड़ से बिलकुल अलग दिखती है.

21. पसीना आने के बारे में अच्छी बात ये है कि (कम या ज्यादा) हर कोई पसीने में भीगा दिखता है इसलिए तन की दुर्गन्ध के बारे में कोई परवाह नहीं करता.

22. किसानों को रियायती दरों पर बिजली दी जाती है क्योंकि कृषि अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग है.

23. बिजली का वितरण बहुधा सरकार के हाथ में है. प्राइवेट कम्पनियाँ अपनी सौर, जल या वायु ऊर्जा सरकार को बेच सकतीं हैं.

24. बिजली के वितरण पर सरकारी नियंत्रण है क्योंकि बिजली की कमी होने के कारण इसका प्रभावी वितरण आवश्यक है.

25. बैंगलौर जैसे बड़े शहरों में भी घोषित बिजली कटौती सामान्य है और यह एक से लेकर कई घंटों तक हो सकती है.

26. विद्यार्थियों के परीक्षाकाल में बिजली की मांग बढ़ जाती है क्योंकि वे देर रात तक जागकर पढाई करते हैं.

27. बिजली की कमी के कारण सरकार सौर ऊर्जा जैसे विकल्पों के उपयोग को प्रोत्साहन दे रही है.

28. दूर कहीं जाने के लिए बस या रेल यात्रा का सहारा लेना सामान्य बात है. आप सवार होते ही सो जाइए और जागने पर खुद को नई जगह में पायेंगे.

29. हो सकता है कि पांच मिनट के भीतर ही आप दो बार किसी प्राणघातक चीज़ जैसे किंग कोबरा से बच जाएँ!

30. आपको सहायता के लिए हमेशा ही कोई-न-कोई तत्पर मिल जायेगा, भले ही उसे आपकी कोई भी बात समझ नहीं आ रही हो.

मैंने अपने जीवन के 28 साल उत्तरी संयुक्त राज्य अमेरिका में बिताये और बाहरी दुनिया से बिलकुल अछूता रहा. इस लिस्ट में बताई गयी चीज़ों की तरह नयी चीज़ें देखने और जानने के लिए मैं बंजारे की भांति दुनिया घूमने के लिए निकला हूँ.

(Raam Dev is a writer, social entrepreneur, and digital nomad. He writes about sustainable abundance and practical minimalism on raamdev.com. You can join his Community of Passionate Changemakers and follow him on Twitter and Facebook)

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हिंदू विवाह पद्धति का विवेचन

श्री देवदत्त पटनायक का यह आलेख अंग्रेजी पत्रिका ‘फर्स्ट सिटी’ में 11 जनवरी, 2011 को प्रकाशित हो चुका है. उनकी अनुमति से मैं इसका हिंदी अनुवाद करके यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ. यदि आप मूल अंग्रेजी आलेख पढना चाहें तो यहाँ क्लिक करें.

आधुनिक विश्व में विवाह अब अनगिनत विकल्पों और समझौतों का विषय बन गया है. लड़का और लड़की एक-दूसरे को पसंद करते हैं और स्वेच्छापूर्वक संविदा में पड़ते हैं. उनके मध्य हुए समझौते की इति विवाह-विच्छेद या तलाक में होती है. लेकिन पारंपरिक हिन्दू विवाह पद्धति में विकल्पों या संविदा के लिए कोई स्थान नहीं है. यह दो परिवारों के बीच होनेवाला एक संबंध था जिसे लड़के और लड़की को स्वीकार करना होता था. इसके घटते ही उन दोनों का बचपना सहसा समाप्त हो जाता और वे वयस्क मान लिए जाते. इसमें तलाक के बारे में तो कोई विचार ही नहीं किया गया था.

बहुत से नवयुवक और नवयुवतियां पारंपरिक हिन्दू विवाह पद्धति के निहितार्थों और इसके महत्व को समझना चाहते हैं. आमतौर पर वे इसके बहुत से रीति-रिवाजों को पसंद नहीं करते क्योंकि इनका गठन उस काल में हुआ था जब हमारा सामाजिक ढांचा बहुत अलग किस्म का था. उन दिनों परिवार बहुत बड़े और संयुक्त होते थे. वह पुरुषप्रधान समाज था जिसमें स्त्रियाँ सदैव आश्रितवर्ग में ही गिनी जाती थीं. आदमी चाहे तो एक से अधिक विवाह कर सकता था पर स्त्रियों के लिए तो ऐसा सोचना भी पाप था. लेकिन इसके बाद भी पुरुषों पर कुछ बंदिशें थीं और वे पूर्णतः स्वतन्त्र नहीं थे: वे अपने परिवार और जातिवर्ग के नियमों के अधीन रहते थे. विवाह पद्धति के संस्कार अत्यंत प्रतीकात्मक थे और उनमें कृषि आधारित जीवनप्रणाली के अनेक बिंब थे क्योंकि कृषि अधिकांश भारतीयों की आजीविका का मुख्य साधन था. उदाहरण के लिए, पुरुष को कृषक और स्त्री को उसकी भूमि कहा जाता था. उनके संबंध से उत्पन्न होनेवाला शिशु उपज की श्रेणी में आता था. आधुनिक काल की महिलाओं को ऐसे विचार बहुत आपत्तिजनक लग सकते हैं.

हमारे सामने आज एक समस्या यह भी है कि हिन्दू विवाह का अध्ययन करते समय मानकों का अभाव दिखता है. प्रांतीयता और जातीयता के कारण उनमें बहुत सी विविधताएँ घर कर गयी हैं. राजपूत विवाह और तमिल विवाह पद्धति में बहुत अंतर दिखता है. मलयाली हिन्दू विवाह अब इतना सरल-सहज हो गया है कि इसमें वर और वधु के परिजनों की उपस्थिति में वर द्वारा उसकी भावी पत्नी के गले में एक धागा डाल देना ही पर्याप्त है. इस संस्कार में एक मिनट भी नहीं लगता, वहीं दूसरी ओर शाही मारवाड़ी विवाह को संपन्न होने में कई दिन लग जाते हैं. इसी के साथ ही हर भारतीय चीज़ में बॉलीवुड का तड़का लग जाने के कारण ऐसे उत्तर-आधुनिक विवाह भी देखने में आ रहे हैं जिनमें वैदिक मंत्रोच्चार के बीच शैम्पेन की चुस्कियां ली जातीं हैं पर ज्यादातर लोगों को यह नागवार गुज़रता है.

परंपरागत रूप से, विवाह का आयोजन चातुर्मास अथवा वर्षाकाल की समाप्ति के बाद होता है. इसकी शुरुआत तुलसी विवाह से होती है जिसमें विष्णुरूपी गन्ना का विवाह लक्ष्मीरूपी तुलसी के पौधे के साथ किया जाता था. अभी भी यह पर्व दीपावली के लगभग एक पखवाड़े के बाद मनाया जाता है.

विवाह के रीति-रिवाज़ सगाई से शुरू हो जाते हैं. परंपरागत रूप से बहुत से विवाह संबंध वर और वधु के परिवार द्वारा तय किये जाते थे और लड़का-लड़की एक-दूसरे को प्रायः विवाह के दिन तक देख भी नहीं पाते थे. सगाई की यह रीति किसी मंदिर में आयोजित होती थी और इसमें दोनों पक्षों के बीच उपहारों का आदान-प्रदान होता था. आजकल पश्चिमी प्रभाव के कारण लोग दोस्तों की मौजूदगी में अंगूठियों की अदलाबदली करके ही सगाई कर लेते हैं.

सगाई और विवाह के बीच वर और वधु दोनों को उनके परिजन और मित्रादि भोजन आदि के लिए आमंत्रित करने लगते हैं क्योंकि बहुत जल्द ही वे दोनों एकल जीवन से मुक्त हो जायेंगे. यह मुख्यतः उत्तर भारत में संगीत की रस्म में होता था जो बॉलीवुड की कृपा से अब पूरे भारत में होने लगा है. संगीत की रस्म में परिवार की महिलायें नाचती-गाती हैं. यह सामान्यतः वधु के घर में होता है. लड़के को इसमें नहीं बुलाया जाता पर आजकल लड़के की माँ और बहनें वगैरह इसमें शामिल होने लगीं हैं.

विवाह की रस्में हल्दी-उबटन और मेहंदी से शुरू होती हैं. इसमें वर और वधु को विवाह के लिए आकर्षक निखार दिया जाता है. दोनों को हल्दी व चन्दन आदि का लेप लगाकर घर की महिलायें सुगन्धित जल से स्नान कराती हैं. इसका उद्देश्य यह है कि वे दोनों विवाह के दिन सबसे अलग व सुन्दर दिखें. इसके साथ ही इसमें विवाहोपरांत कायिक इच्छाओं की पूर्ति हो जाने की अभिस्वीकृति भी मिल जाती है. भारत में मेहंदी का आगमन अरब संपर्क से हुआ है. इसके पहले बहुसंख्यक हिन्दू आलता लगाकर अपने हाथ और पैरों को सुन्दर लाल रंग से रंगते थे. आजकल तरह-तरह की मेहंदी के प्रयोग से हाथों-पैरों पर अलंकरण किया जाने लगा है. वर और वधु के परिवार की महिलायें भी अपने को सजाने-संवारने में पीछे नहीं रहतीं.

वर और वधु को तैयार करने के बाद उनसे कहा जाता है कि वे अपने-अपने पितरों-पुरखों का आह्वान करें. यह रस्म विशेषकर वधु के लिए अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि विवाह के बाद उसे अपने भावी पति के गोत्र में सम्मिलित होना है और अपने कुल की रीतियों को तिलांजलि देनी है.

सभी हिन्दू रीति-रिवाजों में मेहमाननवाज़ी पर बहुत जोर दिया जाता है. मेहमानों का यथोचित स्वागत किया जाता है, उनके चरण छूकर उन्हें नेग या उपहार दिए जाते हैं, और आदरपूर्वक उन्हें विदाई दी जाती है. पूजा के समय देवी-देवताओं को आमंत्रित किया जाता है, और विसर्जन के पहले भी उनकी पूजा होती है. उनसे निवेदन किया जाता है कि वे अगले वर्ष या अगले सुअवसर पर भी पधारें. विवाह के समय वर अतिथि होता है और हिन्दू परंपरा में अतिथियों को देवता का दर्जा दिया गया है. इसलिए उसका आदरसत्कार देवतातुल्य जानकार किया जाता है और उसे सबसे महत्वपूर्ण उपहार अर्थात वधु सौंप दी जाती है.

भारत के विभिन्न प्रदेशों में विवाह का समय अलग-अलग होता है. दक्षिण में विवाह की रस्में सूर्योदय के निकट पूरी की जाती हैं जबकि पूर्व में यह सब शाम के समय होता है. कागज़ की पोंगरी जैसी निमंत्रण पत्रिका वरपक्ष के घर भेजने के साथ ही विवाह की रस्मों की शुरुआत में तेजी आ जाती है. यह पत्रिका आमतौर पर वधु का भाई लेकर जाता है. ओडिशा में वधु के भाई को वर-धारा कहते हैं – वह, जो वर को घर तक लेकर आता है.

आमंत्रित अतिथिगण और वर का आगमन बारात के साथ होता है. राजपूत दूल्हे अपने साथ तलवार रखते हैं जो कभी-कभी उसकी भावी पत्नी द्वारा उसके लिए चुनी गयी होती है. इससे दो बातों का पता चलता है: यह कि पुरुष तलवार रखने के योग्य है और दूसरी यह कि वह अपनी स्त्री की रक्षा भी कर सकता है. उत्तर भारत में दूल्हे घोड़ी पर सवार होते हैं और उनका चेहरा सेहरे से ढंका होता है ताकि कोई उनपर बुरी नज़र न डाल सके. घोड़े के स्थान पर घोड़ी का प्रयोग यह दर्शाता है कि वह अपनी पत्नी को अपने अधीन रखना चाहता है. यह विचार भी आधुनिक महिलाओं को आपत्तिजनक लग सकता है. भारत के कई स्थानों में दूल्हे के साथियों को जमकर पीने और नाचने का मौका मिल जाता है. कई बाराती बड़े हुडदंगी होते हैं. वे पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती को बिहाने चले शिव की बारात के सदस्यों की तरह होते हैं. पीना और नाचना एकाकी जीवन की समाप्ति के अंतिम दिनों से पहले उड़ानेवाला मौजमजा है जो जल्द ही पत्नी और घर-गृहस्थी के खूंटे से बाँध दिया जाएगा और फिर उससे यह अपेक्षा नहीं की जायेगी कि वह चाहकर भी कभी मर्यादा तोड़ सके.

दूल्हे के ड्योढी पर आनेपर ससुर और सास उसे माला पहनाकर पूजते हैं. उसका मुंह मीठा किया जाता है, चरण पखारे जाते हैं. कई बार ससुर या उसका श्याला उसे अपनी बांहों में भरकर मंडप या स्टेज तक लेकर जाते हैं. इस बीच पंडित यज्ञवेदी पर अग्नि बढ़ाता है. पूरी प्रथा के दौरान अग्नि ही समस्त देवताओं का प्रतिनिधित्व करती है. वह स्त्री और पुरुष के सुमेल की साक्षी है.

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