Category Archives: Sufi Stories

ईश्वर का प्रेमी : The Lover of God

shepherd

गड़रिया मार्ग में प्रार्थना कर रहा था:

“हे ईश्वर, तू कहां है? मैं तेरी मदद करना चाहता हूं. मैं तेरे जूते झाड़ना और तेरे बालों में कंघी करना चाहता हूं. मैं तेरे कपड़े धोना और लीखें निकालना चाहता हूं.”

“जब तू सोने को जाए तो मैं तेरे पीने के लिए दूध लाना, तेरे हाथों और कदमों को चूमना चाहता हूं.”

“मैं तेरा कमरा बुहारकर साफ़ करना चाहता हूं. ईश्वर, मेरी भेड़ और बकरियां सब तेरी ही हैं.”

मूसा ने गड़रिये की बातें सुनकर अचरज से पूछा, “तुम किससे बातें कर रहे हो? ईश्वर को तुम्हारे दूध की कोई ज़रूरत नहीं है. जिसके पैर ही न हों वह तुम्हारे जूते लेकर क्या करेगा? कुछ तो समझो!”

गड़रिया बहुत दुखी हो गया. उसने छटपटाहट में अपने कपड़े तार-तार कर दिए और रेगिस्तान में भटकता रहा.

और तब ईश्वर ने मूसा से कहा:

“तुमने मेरे प्रियवर को मुझ से दूर क्यों कर दिया?”

“मेरे पैगंबर, तुम उन्हें मुझसे जोड़ने के लिए आए हो या जुदा करने के लिए?”

“मैंने दुनिया में हर किसी को जानने-पहचानने के लिए अनूठी दृष्टि दी है और कुछ कहने का तरीका सबका अलग है.”

“जिसे तुम गलत समझते हो वह किसी और के लिए सही है.”

“जो किसी के लिए विष है वह दूसरे के लिए मधु के समान है.”

“भक्तिभाव में पावन या अपावन, समर्पण या आलस्य का मेरे लिए कोई मोल नहीं है.”

“मैं इन सबसे पृथक हूं. किसी की भी आराधना या साधना का महत्व किसी अन्य व्यक्ति की आराधना या साधना से न तो कम है न अधिक है. मेरे लिए सब एक समान है.”

“जब कोई मेरी पूजा करता है तो वह मुझे नहीं बल्कि स्वयं का ही पूजन करता है.”

“मैं उनके मंत्रोच्चार या भजन के शब्दों को नहीं वरन उनकी साधुता को देखता हूं.”

“शास्त्रों को भुला दो. दहन करो, भंजन करो. तपो और स्वयं को तप में रत करो.”

“अपने विचारों और अभिव्यक्तियों को राख कर दो.”

“प्रेम की अग्नि में रूपांतरित हो.”

“प्रेमियों को झिड़को नहीं. जिसे तुम “अनुचित” प्रार्थना कहते हो वह सैंकड़ों “उत्तम” प्रार्थनाओं से श्रेष्ठ है.”

“तुम किसी दर्पण में स्वयं को ही देखते हो. तब तुम दर्पण को नहीं देखते.”

“बांसुरी बजानेवाला जब बांसुरी में फूंकता है तो संगीत रचता है?”

“बांसुरी संगीत नहीं रचती. उसे बजानेवाला उसका रचयिता है!”

“जब कोई मुझे धन्यवाद दे और मेरी बड़ाई करे तो उतनी ही सादगी और सहजता से करे जैसे उस प्यारे गड़रिये न की.”

रूमी के काव्य “मूसा और गड़रिय़ा” से…

(~_~)

shepherd on the road praying:
“Lord, where are you? I want to help you, to fix your shoes and comb your hair. I want to wash your clothes and pick the lice off.
“I want to bring you milk to kiss your little hands and feet when it’s time for you to go to bed.
“I want to sweep your room and keep it neat. God, my sheep and goats are yours.”
“Who are you talking to?” Moses could stand it no longer.
“Only something that grows needs milk. Only some one with feet needs shoes. Not G’d!”
The shepherd repented and tore his clothes and sighed and wandered out into the desert.
A sudden revelation came then to Moses.
“You have separated me from one of my own.
“Did you come as a Prophet to unite, or to sever?
“I have given each being a separate and unique way of seeing and knowing and saying that knowledge.
“What seems wrong to you is right for him.
“What is poison to one is honey to someone else.
“Purity and impurity, sloth and diligence in worship, these mean nothing to me.
“I am apart from all that. Ways of worshipping are not to be ranked as better or worse than one another.
“It’s not me that’s glorified in acts of worship. It’s the worshippers!
“I don’t hear the words they say. I look inside at the humility.
“Forget phraseology. I want burning, burning. Be friends with your burning.
“Burn up your thinking and your forms of expression!
“Lovers who burn are another.
“Don’t scold the Lover. The “wrong” way he talks is better than a hundred “right” ways of others.
“When you look in a mirror, you see yourself, not the state of the mirror.
“The flute player puts breath into a flute, and who makes the music?
“Not the flute. The flute player!
“Whenever you speak praise or thanksgiving to Me, it’s always like this dear shepherd’s simplicity.”
from Rumi’s “Moses and the Shepherd, translated by Coleman Barks

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सत्य का धरातल : The Land of Truth

एक बार किसी आदमी को यह लगने लगा कि सामान्य जीवन में परिपूर्णता नहीं है और उसे सत्य की प्राप्ति करनी चाहिए. उसने ज्ञानी गुरु की खोज करना शुरू कर दिया. उसने बहुत से ग्रन्थ पढ़े, कई मठों में प्रवेश लिया, एक गुरु से दूसरे गुरु तक वह ज्ञान के शब्द सुनने के लिए भटकता रहा. उसने साधना और उपासना की वे पद्धतियाँ ही चुनीं जो उसे आकर्षक और सरल जान पडीं.

उसे कुछ आध्यांत्मिक अनुभव हुआ जिसने उसे भ्रमित कर दिया. अब वह जानना चाहता था कि वह आत्मज्ञान के मार्ग पर कितनी दूर आ गया है और उसकी साधना कब पूरी होगी.

अपने मन में ये विचार उमड़ते-घुमड़ते लिए हुए वह एक दिन परमज्ञानी माने जाने वाले गुरु के आश्रम तक चला आया. आश्रम के उद्यान में उसका सामना हज़रत खिद्र से हो गया. (हज़रत खिद्र लोगों को सत्य के मार्ग पर अग्रसर करनेवाले रहस्यमय गुरु हैं).

खिद्र उस आदमी को एक जगह ले गए जहाँ बहुत से लोग दुःख और पीड़ा में थे. खिद्र ने उन व्यक्तियों से पूछा कि वे कौन हैं. उन्होंने जवाब दिया – “हम वे साधक हैं जिन्होंने वास्तविक शिक्षाओं को ग्रहण नहीं किया. हम वे हैं जिन्होंने मिथ्या गुरु-ज्ञानियों पर आस्था लुटाई.”

फिर खिद्र आदमी को उस जगह पर ले गए जहाँ सभी प्रसन्नचित्त और सुखी प्रतीत हो रहे थे. उनसे भी खिद्र ने वही सवाल किया. वे बोले – “हम वे साधक हैं जिन्होंने सत्य के मार्ग को दर्शानेवाले चिह्नों का अनुसरण नहीं किया.”

“यदि तुम लोगों ने सत्य की ओर ले जाने वाले मार्गदर्शक चिह्नों का अनुसरण नहीं किया तो तुम आनंदमय क्यों कर हो?” – खिद्र ने उनसे पूछा.

“क्योंकि हमने सत्य के स्थान पर प्रसन्नता का चुनाव किया” – वे व्यक्ति बोले – “जिस प्रकार मिथ्या गुरु-ज्ञानियों में आस्था रखनेवालों ने दुःख का चुनाव किया था.”

“तो क्या सुख का आदर्श मनुष्य के लिए त्याज्य है?” – आदमी ने पूछा.

उन्होंने कहा – “मनुष्य का उद्देश्य सत्य की प्राप्ति है. सत्य के सामने सुख का मूल्य कुछ भी नहीं है. जिस व्यक्ति को सत्य मिल गया हो उसके लिए किसी मनोदशा का कोई महत्व नहीं है. हम सबने सत्य को ही सुख और सुख को ही सत्य मान लिया था और सभी ने हमपर विश्वास किया जिस प्रकार तुम भी अब तक यही मानते आये हो कि सत्य की अनुभूति परमसुख और आनंद की प्राप्ति से होती होगी. लेकिन सुख हो या दुःख, आनंद हो या पीड़ा, ये सभी अनुभूतियाँ ही हैं और तुम्हें बाँधकर ही रखतीं हैं.”

सहसा उस आदमी ने स्वयं को उद्यान में खिद्र के साथ खड़ा पाया.

खिद्र ने उससे कहा – “मैं तुम्हारी एक इच्छा पूरी कर सकता हूँ. मांगो, क्या मांगते हो.”

“मैं यह जानना चाहता हूँ कि मैं पथभ्रष्ट क्यों हो गया और मुझे सफलता कब मिलगी” – आदमी ने कहा.

खिद्र बोले – “तुमने अपना पूरा जीवन व्यर्थ कर दिया क्योंकि तुम झूठा जीवन जीते आये हो. सत्य को खोजने के स्थान पर तुम केवल अपनी इच्छाओं को ही इस झूठ के जरिये पूरा करते आये हो.”

“फिर भी मैं उस अवस्था तक पहुँच गया कि आप मुझे मिल गए” – आदमी ने कहा – “ऐसा तो शायद ही किसी और के साथ हुआ होगा!?”

“हाँ, तुम मुझे मिल गए क्योंकि तुम्हारे भीतर केवल सत्य के लिए ही सत्य को पाने की चाह थी, भले ही वह कभी एक क्षण के लिए ही रही हो. उस लेश मात्र ईमानदारी के कारण ही मैं तुम्हें दर्शन देने को बाध्य हो गया.” – खिद्र ने कहा.

इतना कुछ देख लेने के बाद अब आदमी के भीतर खुद को खो देने की कीमत पर भी सत्य को पाने की उत्कंठा तीव्र हो गयी.

खिद्र अपनी राह चल पड़े थे लेकिन आदमी भी उनके पीछे चल दिया.

“मेरे पीछे मत आओ” – खिद्र ने कहा – “क्योंकि मैं सामान्य जगत में प्रवेश करने जा रहा हूँ जो असत्य का राज्य है. मुझे वहीं होना चाहिए क्योंकि मुझे अभी बहुत काम करना बाकी है”

उस क्षण जब आदमी ने अपने चारों ओर देखा तो यह पाया कि वह खिद्र के साथ उद्यान में नहीं वरन सत्य के धरातल पर खड़ा था.

(इदरीस शाह की कहानी)

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A certain man believed that the ordinary waking life, as people know it, could not possibly be complete. He sought the real Teacher of the Age. He read many books and joined many circles, and he heard the words and witnessed the deeds of one master after another. He carried out the commands and spiritual exercises which seemed to him to be most attractive. He became elated with some of his experiences. At other times he was confused; and he had no idea at all of what his stage was, or where and when his search might end.

This man was reviewing his behaviour one day when he suddenly found himself near the house of a certain sage of high repute. In the garden of that house, he encountered Khidr, the secret guide who shows the way to truth.

Khidr took him to a place where he saw people in great distress and woe, and he asked who they were.

“We are those who did not follow real teachings, who were not true to our undertakings, who revered self-appointed teachers,” they said.

Then the man was taken by Khidr to a place where everyone was attractive and full of joy.

He asked who they were. “We are those who did not follow the real Signs of the Way,” they said.

“But if you have ignored the Signs, how can you be happy?” asked the traveler.

“Because we chose happiness instead of Truth,” said the people, “just as those who chose the self-appointed chose also misery.”

“But is happiness not the ideal of man?” asked the man. “The goal of man is Truth. Truth is more than happiness. The man who has Truth can have whatever mood he wishes, or none,” they told him. “We have pretended that Truth is happiness, and happiness Truth, and people have believed us, therefore you, too, have until now imagined that happiness must be the same as Truth. But happiness makes you its prisoner, as does woe.”

Then the man found himself back in the garden with Khidr beside him. “I will grant you one desire,” said Khidr. “I wish to know why I have failed in my search and how I can succeed in it,” said the man.

“You have all but wasted your life,” said Khidr, “because you have been a liar. Your lie has been in seeking personal gratification when you could have been seeking Truth.” “And yet I came to the point where I found you,” said the man, ” and that is something which happens to hardly anyone at all.”

“And you met me,” said Khidr, “because you had sufficient sincerity to desire Truth for its own sake, just for an instant. It was that sincerity, in that single instant, which made me answer your call.” Now the man felt an overwhelming desire to find Truth, even if he lost himself.

Khidr, however, was starting to walk away, and the man began to run after him. “You may not follow me,” said Khidr, “because I am returning to the ordinary world, the world of lies, for that is where I have to be, if I am to do my work.” And when the man looked around him again, he realized that he was no longer n the garden of the sage, but standing in the Land of Truth.

(A story by Idris Shah)

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How to Purify the World? – संसार की शुद्धि

सूफी गुरु इब्न-अल-हुसैन से एक शिष्य ने पूछा – “दुनिया में शांति और पवित्रता कैसे आएगी?”

हुसैन ने कहा – “दमिश्क में अबू मूसा अल-कुमासी नामक एक शेख रहता था. उसके इल्म और अच्छाई की सब मिसाल देते थे लेकिन हक़ीक़त में किसी को यह पता नहीं था कि वह वाकई भला आदमी है भी या नहीं.”

“एक रोज़ किसी वज़ह से शेख का घर ढह गया और शेख और उसकी बीवी मलबे में दब गए. घबराए हुए पड़ोसियों ने मलबे में उनकी तलाश शुरू कर दी. उन्होंने शेख की बीवी को खोज लिया. बीवी ने पड़ोसियों को देखते ही कहा – “मेरी फ़िक्र मत करो और पहले मेरे शौहर को बचाओ! वे उस कोने में बैठे हुए थे!”

“पड़ोसियों ने बीवी की बताई जगह पर से मलबा हटाया और उन्हें लकड़ी की एक शहतीर के नीचे दबा शेख दिख गया. उन्हें देखते ही शेख ने चिल्लाकर कहा – “मैं ठीक हूँ! पहले मेरी बीवी को बचाओ! बेचारी उस कोने में कहीं दबी होगी!”

“जब भी कोई व्यक्ति ऐसा आचरण करेगा जैसा इन पति-पत्नी ने किया तो वह दुनिया में शांति और पवित्रता में इजाफ़ा ही करेगा”

(A Sufi story about the modal conduct of men)

How do we purify the world?- asked a disciple.

Ibn al-Husayn replied: – There was once a sheik in Damascus called Abu Musa al-Qumasi. Everyone honored him for his great wisdom, but no one knew whether he was a good man.

“One afternoon, a construction fault caused the house where the sheik lived with his wife, to collapse. The desperate neighbors began to dig the ruins; eventually, they managed to locate the sheik’s wife.

“She said: “Don’t worry about me. First save my husband, who was sitting somewhere over there.”

“The neighbors removed the rubble from the area she indicated, and found the sheik. He said: “Don’t worry about me. First save my wife, who was lying somewhere over there.”

“When someone acts as this couple did, he is purifying the whole world.”

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Zun-nun’s Story – लिबास

बहुत पुरानी बात है. मिस्र देश में एक सूफी संत रहते थे जिनका नाम ज़ुन्नुन था. एक नौजवान ने उनके पास आकर पूछा, “मुझे समझ में नहीं आता कि आप जैसे लोग सिर्फ एक चोगा ही क्यों पहने रहते हैं!? बदलते वक़्त के साथ यह ज़रूरी है कि लोग ऐसे लिबास पहनें जिनसे उनकी शख्सियत सबसे अलहदा दिखे और देखनेवाले वाहवाही करें”.

ज़ुन्नुन मुस्कुराये और अपनी उंगली से एक अंगूठी निकालकर बोले, “बेटे, मैं तुम्हारे सवाल का जवाब ज़रूर दूंगा लेकिन पहले तुम मेरा एक काम करो. इस अंगूठी को सामने बाज़ार में एक अशर्फी में बेचकर दिखाओ”.

नौजवान ने ज़ुन्नुन की सीधी-सादी सी दिखनेवाली अंगूठी को देखकर मन ही मन कहा, “इस अंगूठी के लिए सोने की एक अशर्फी!? इसे तो कोई चांदी के एक दीनार में भी नहीं खरीदेगा!”

“कोशिश करके देखो, शायद तुम्हें वाकई कोई खरीददार मिल जाए”, ज़ुन्नुन ने कहा.

नौजवान तुरत ही बाज़ार को रवाना हो गया. उसने वह अंगूठी बहुत से सौदागरों, परचूनियों, साहूकारों, यहाँ तक कि हज्जाम और कसाई को भी दिखाई पर उनमें से कोई भी उस अंगूठी के लिए एक अशर्फी देने को तैयार नहीं हुआ. हारकर उसने ज़ुन्नुन को जा कहा, “कोई भी इसके लिए चांदी के एक दीनार से ज्यादा रकम देने के लिए तैयार नहीं है”.

ज़ुन्नुन ने मुस्कुराते हुए कहा, “अब तुम इस सड़क के पीछे सुनार की दुकान पर जाकर उसे यह अंगूठी दिखाओ. लेकिन तुम उसे अपना मोल मत बताया, बस यही देखना कि वह इसकी क्या कीमत लगाता है”.

नौजवान बताई गयी दुकान तक गया और वहां से लौटते वक़्त उसके चेहरे पर कुछ और ही बयाँ हो रहा था. उसने ज़ुन्नुन से कहा, “आप सही थे. बाज़ार में किसी को भी इस अंगूठी की सही कीमत का अंदाजा नहीं है. सुनार ने इस अंगूठी के लिए सोने की एक हज़ार अशर्फियों की पेशकश की है. यह तो आपकी माँगी कीमत से भी हज़ार गुना है!”

ज़ुन्नुन ने मुस्कुराते हुए कहा, “और वही तुम्हारे सवाल का जवाब है. किसी भी इन्सान की कीमत उसके लिबास से नहीं आंको, नहीं तो तुम बाज़ार के उन सौदागरों की मानिंद बेशकीमती नगीनों से हाथ धो बैठोगे. अगर तुम उस सुनार की आँखों से चीज़ों को परखने लगोगे तो तुम्हें मिट्टी और पत्थरों में सोना और जवाहरात दिखाई देंगे. इसके लिए तुम्हें दुनियावी नज़र पर पर्दा डालना होगा और दिल की निगाह से देखने की कोशिश करनी होगी. बाहरी दिखावे और बयानबाजी के परे देखो, तुम्हें हर तरफ हीरे-मोती ही दिखेंगे”.

Thanx to Zendictive for this post

A young man came Zun-Nun (A Sufi) and then asked, “Teacher, I do not understand why people like you have a simple dress, even very, very simple. Is not in the current best dressed very necessary, not only for appearance, but also for many other purposes. “

The saint just smiled. He then removed the ring from one finger, and said, “a young friend, will answer your question, but first do one thing for me. Take this ring and bring it to market on the other end. Can you sell it for a piece of gold? “

Seeing the ring Zun-Nun dirty and ugly, the young man hesitated, “One piece of gold? I’m not sure this ring could be sold for that. “

“Try it, young friend. Who knew you had. “

The young man was rushed to the market. He offered the ring to the cloth merchants, traders vegetables, meat and fish sellers, as well as to others. Apparently, no one dared to buy gold coins worth one. They offered only one piece of silver. Of course, the young man did not dare to sell it for a piece of silver. He returned to the hermitage Zun-Nun and report, “Teacher, no one dared to offer more than one pieces of silver.”

Zun-Nun, while still smiling wisely, said, “Go ye into a gold shop in the back of this road. Try to show the owner or the goldsmith’s shop there. Do not open the price, just listen to how he gave the assessment. “

The young man then went to a gold shop in question. He returned to Zun-Nun with another face. He later reported, “Teachers, was the traders in the market does not know the true value of this ring. Gold traders bid the price of a thousand pieces of gold. Apparently the value of this ring a thousand times higher than that offered by the traders in the market. “

Zun-Nun smile as he said softly, “That’s the answer to your question young pal. A person can not be judged by his clothes. Only “vegetable vendors, fish and meat in the market” such a rate. But not for the “gold traders”.

“Gold and diamonds have in a person, can only be seen and assessed if we are able to see into the depths of the soul. It takes wisdom to see him. And it takes a process, O my young friend.

We can not judge just by recalled words and attitudes that we hear and see at a glance. Often the alleged gold that was baking, and we see it as a gold pan. “

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प्रार्थना : प्रेम और समर्पण

प्रार्थना क्या है? – प्रेम और समर्पण. जहां प्रेम नहीं है, वहां प्रार्थना नहीं है.

प्रेम के स्मरण में एक अद्भुत घटना का उल्लेख है. नूरी, रक्काम एवं कुछ अन्य सूफी फकीरों पर काफिर होने का आरोप लगाया गया था और उन्हें मृत्यु दण्ड दिया जा रहा था.

जल्लाद जब नंगी तलवार लेकर रक्काम के निकट आये, तो नूरी ने उठकर स्वयं को अपने मित्र के स्थान पर अत्यंत प्रसन्नता और नम्रता के साथ पेश कर दिया. दर्शक स्तब्ध रह गये. हजारों लोगों की भीड़ थी. उनमें एक सन्नाटा दौड़ गया. जल्लाद ने कहा, “हे युवक, तलवार ऐसी वस्तु नहीं है, जिससे मिलने के लिए लोग इतने उत्सुक और व्याकुल हों. और फिर तुम्हारी अभी बारी भी नहीं आयी है.”

और, पता है कि फकीर नूरी ने उत्तर में क्या कहा? उसने कहा, “प्रेम ही मेरा धर्म है. मैं जानता हूं कि जीवन संसार में सबसे मूल्यवान वस्तु है, लेकिन प्रेम के मुकाबले वह कुछ भी नहीं है. जिसे प्रेम उपलब्ध हो जाता है, उसके लिए जीवन खेल से ज्यादा नहीं है. संसार में जीवन श्रेष्ठ है लेकिन प्रेम जीवन से भी श्रेष्ठ है, क्योंकि वह संसार का नहीं, सत्य का अंग है. और प्रेम कहता है कि जब मृत्यु आये, तो अपने मित्रों के आगे हो जाओ और जब जीवन मिलता हो तो पीछे. इसे हम प्रार्थना कहते हैं.”

प्रार्थना का कोई ढांचा नहीं होता है. वह तो हृदय का सहज अंकुरण है. जैसे पर्वत से झरने बहते हैं, ऐसे ही प्रेम-पूर्ण हृदय से प्रार्थना का आविर्भाव होता है.

ओशो के पत्रों के संकलन ‘पथ के प्रदीप’ से. प्रस्तुति – ओशो शैलेंद्र

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