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आलू, अंडे, और कॉफ़ी – Potatoes, Eggs, and Coffee


alice popkorn photo

बुरे दिनों के दौरान एक बेटी ने अपने पिता से कहा, “ये समय कितना कठिन है! मैं अब बहुत थक गई हूं, भीतर-ही-भीतर टूट गई हूं. जब तक हम एक मुसीबत से दो-चार होते हैं तब तक नई मुसीबतें मुंह बाए खड़ी हो जाती हैं. ऐसा कब तक चलेगा?”

पिता किसी जगह खाना बनाने का काम करता था. वह बिना कुछ बोले उठा और उसने सामने रखे चूल्हे पर तीन बर्तनों में पानी भरकर तेज आंच पर चढ़ा दिया.

जब पानी उबलने लगा, उसने एक बर्तन में आलू, दूसरे में अंडे, और तीसरे बर्तन में कॉफ़ी के बीज डाल दिए. फिर वह चुपचाप अपनी कुर्सी तक आकर बेटी की बातें सुनने लगा. वह वाकई बहुत दुखी थी और यह समझ नहीं पा रही थी कि पिता क्या कर रहे हैं.

कुछ देर बाद पिता ने बर्नर बंद कर दिए और आलू और अंडे को निकालकर एक प्लेट में रख दिया और एक कप में कॉफ़ी ढाल दी. फिर उसने अपनी बेटी से कहाः

“अब तुम बताओ कि ये सब क्या है?”

बेटी ने कहा, “आलू, अंडे और कॉफ़ी ही तो है. और क्या है?”

“नहीं, इन्हें करीब से देखो, छूकर देखो”, पिता ने कहा.

बेटी ने आलू को उठाकर देखा, वे नरम हो गए थे. अंडा पानी में उबलने पर सख्त हो गया था और कॉफ़ी से तरोताज़ा कर देने वाली महक उठ रही थी.

“लेकिन मैं समझी नहीं कि आप क्या बताना चाह रहे हैं”, उसने कहा.

पिता ने उसे समझाया, “मैंने आलू, अंडे और कॉफ़ी को एक जैसी यंत्रणा याने खौलते पानी से गुज़ारा, लेकिन इनमें से हर एक ने उसका सामना अपनी तरह से किया. आलू पहले तो कठोर और मजबूत थे, लेकिन खौलते पानी का सामना करने पर वे नर्म-मुलायम हो गए. वहीं दूसरी ओर, अंडे नाज़ुक और कमज़ोर थे और इनका पतला छिलका भीतर की चीज़ को बचाए रखता था. खौलते पानी ने उसको ही कठोर बना दिया. अब कॉफ़ी, इसका मामला सबसे जुदा है. उबलते पानी का साथ पाकर इन्होंने उसे ही बदल डाला. इन्होंने पानी को एक ऐसी चीज़ में रूपांतरित दिया जो तुम्हें खुशनुमा अहसास से सराबोर कर देती है.”

“अब तुम मुझे बताओ”, पिता ने पूछा, “जब मुसीबतें तुम्हारा द्वार खटखटाती हैं तो तुम क्या जवाब देती हो? तुम इन तीनों में से क्या हो?”

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Once upon a time a daughter complained to her father that her life was miserable and that she didn’t know how she was going to make it. She was tired of fighting and struggling all the time. It seemed just as one problem was solved, another one soon followed. Her father, a chef, took her to the kitchen. He filled three pots with water and placed each on a high fire.

Once the three pots began to boil, he placed potatoes in one pot, eggs in the second pot and ground coffee beans in the third pot. He then let them sit and boil, without saying a word to his daughter. The daughter, moaned and impatiently waited, wondering what he was doing. After twenty minutes he turned off the burners. He took the potatoes out of the pot and placed them in a bowl. He pulled the eggs out and placed them in a bowl. He then ladled the coffee out and placed it in a cup.

Turning to her, he asked. “Daughter, what do you see?”

“Potatoes, eggs and coffee,” she hastily replied.

“Look closer”, he said, “and touch the potatoes.” She did and noted that they were soft.
He then asked her to take an egg and break it. After pulling off the shell, she observed the hard-boiled egg. Finally, he asked her to sip the coffee. Its rich aroma brought a smile to her face.

“Father, what does this mean?” she asked.

He then explained that the potatoes, the eggs and coffee beans had each faced the same adversity-the boiling water. However, each one reacted differently. The potato went in strong, hard and unrelenting, but in boiling water, it became soft and weak. The egg was fragile, with the thin outer shell protecting its liquid interior until it was put in the boiling water. Then the inside of the egg became hard. However, the ground coffee beans were unique. After they were exposed to the boiling water, they changed the water and created something new.

“Which one are you?” he asked his daughter. “When adversity knocks on your door, how do you respond? Are you a potato, an egg, or a coffee bean?”

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अच्छी ख़बर – The Good News


Hartwig HKD Flickr

एक महत्वपूर्ण गोल्फ टूर्नामेंट में जीत जाने के बाद अर्जेंटीना के गोल्फ खिलाड़ी रॉबर्ट डि विन्सेंजों अपनी गाड़ी लेने के लिए पार्किंग लॉट में गए.

एक युवती उनके पास आई और उन्हें बधाई देने के बाद उसने बताया कि उसके बच्चे को कैंसर है तथा वह मृत्यु के करीब है, और उसके पास अस्पताल का बिल चुकाने के लिए पैसे नहीं हैं.

यह सुनकर रॉबर्ट ने उस दिन जीती हुई रकम का एक हिस्सा युवती को दे दिया.

एक सप्ताह बाद प्रोफ़ेशनल गोल्फ असोसिएशन के लंच पर उन्होंने अपने मित्रों को ये बात बताई. उनमें से एक ने रॉबर्ट से पूछा, “क्या उस युवती के बाल सुनहरे थे और उसकी एक आंख के नीचे दाग था”?

रॉबर्ट के ‘हां’ कहने पर मित्र ने कहा, “उसने तुम्हें ठग लिया. वो औरत यही कहानी सुनाकर यहां आनेवाले बहुत से विदेशी गोल्फ़र्स को ठग चुकी है”.

“तो, तुम्हारे कहने का मतलब है कि किसी भी बच्चे को कैंसर नहीं है”?, रॉबर्ट ने पूछा.

“नहीं. ये सारी मनगढंत बात है”.

“फिर तो ये इस सप्ताह की सबसे अच्छी बात है”, रॉबर्ट ने कहा.

(~_~)

The Argentinian golfer Robert de Vincenzo went to the parking lot to get his car after having won an important tournament.

At that moment, a woman approached him. After congratulating him for his victory, she told him her son was at the edge of death and that she had no money to pay the hospital bills.

De Vincenzo immediately gave her part of the money he had won that afternoon.

A week later, at a lunch at the Professional Golf Association, he told this story to a couple of friends. One of them asked him if the woman was blond with a small scar under her left eye.

De Vincenzo agreed. “You were cheated,” his friend said.

“This woman is a swindler and is always telling the same story to all foreign golfers that show up here.”

“So there is no child having cancer?”

 “No.”

“Well, this was the best news I got this week!” said the golf player.

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विनय और करूणा का पाठ – A Lesson into Humility and Kindness


sweet dreams by alice popkorn

एक युवक ने किसी बड़ी कंपनी में मैनेजर के पद के लिए आवेदन किया. उसने पहला इंटरव्यू पास कर लिया और उसे फाइनल इंटरव्यू के लिए कंपनी के डाइरेक्टर के पास भेजा गया. डाइरेक्टर ने युवक के CV में देखा कि उसकी शैक्षणिक योग्यताएं शानदार थीं.

डाइरेक्टर ने युवक से पूछा, “क्या तुम्हें स्कूल-कॉलेज में स्कॉलरशिप मिलती थी”?

“नहीं”, युवक ने कहा.

“तुम्हारी फीस कौन भरता था?”

“मेरे माता-पिता काम करते थे और मेरी फीस चुकाते थे.”

“वो क्या काम करते थे?”

“वो कपड़ों की धुलाई करते थे… अभी भी यही काम करते हैं.”

डाइरेक्टर ने युवक से अपने हाथ दिखाने के लिए कहा. युवक ने डाइरेक्टर को अपने हाथ दिखाए. उसके हाथ बहुत सुंदर और मुलायम थे.

“क्या तुमने कभी कपड़े धोने में अपने मता-पिता की मदद नहीं की?”

“कभी नहीं. वे यही चाहते थे कि मैं बहुत अच्छे से पढाई करूं. मुझे यह काम करते नहीं बनता था और वे इसे बड़ी तेजी से कर सकते थे.”

डाइरेक्टर ने युवक से कहा, “तुम एक काम करो… आज जब तुम घर जाओ तो अपने माता-पिता के हाथ साफ करो और कल मुझसे फिर मिलो.”

युवक उदास हो गया. जब वह अपने घर पहुंचा, उसने अपने माता-पिता से कहा कि वह उनके हाथ धोना चाहता है. माता-पिता को सुनकर अजीब-सा लगा. वे झेंप गए लेकिन उन्हें मिलीजुली सुखकर अनुभूतियां भी हुईं. युवक ने इनके हाथों को अपने हाथ में लेकर साफ करना शुरु किया. उसकी आंखों से आंसू बहने लगे.

जीवन में पहली बार उसे यह अहसास हुआ कि उसके माता-पिता के हाथ झुर्रियों से भर गए थे और ज़िंदगी पर कठोर काम करने के कारण वे रूखे और चोटिल हो गए थे. उन हाथों के जख्म इतने नाज़ुक थे कि सहलाने पर उनमें टीस उठने लगी.

पहली मर्तबा युवक को यह बात गहराई से महसूस हुई कि उसे पढ़ा-लिखाकर काबिल बनाने के लिए उसके माता-पिता इस उम्र तक कपड़े धोते रहे ताकि उसकी फीस चुका सकें. माता-पिता ने अपने हाथों के जख्मों से अपने बेटे की स्कूल-कॉलेज की पढाई की फीस चुकाई और उसकी हर सुख-सुविधा का ध्यान रखा.

उनके हाथ धोने के बाद युवक ने खामोशी से धुलने से छूट गए कपड़ों को साफ किया. उस रात वे तीनों साथ बैठे और देर तक बातें करते रहे.

अगले दिन युवक डाइरेक्टर से मिलने गया. डाइरेक्टर ने युवक की आंखों में नमी देखी और उससे पूछा, “अब तुम मुझे बताओ कि तुमने घर में कल क्या किया और उससे क्या सीख ली?”

युवक ने कहा, “मैंने उनके हाथ धोए और धुलाई का बचा हुआ काम भी निबटाया. अब मैं जान गया हूं कि उनकी करुणा का मूल्य क्या है. यदि वे यह सब न करते तो मैं आज यहां आपके सामने साथ नहीं बैठा होता. उनके काम में उनकी मदद करके ही मैं यह जान पाया हूं कि अपनी हर सुख-सुविधा को ताक पर रखकर परिवार के हर सदस्य का ध्यान रखना और उसे काबिल बनाना बहुत महत्वपूर्ण बात है और इसके लिए बड़ा त्याग करना पड़ता है.”

डाइरेक्टर ने कहा, “यही वह चीज है जो मैं किसी मैनेजर में खोजता हूं. मैं उस व्यक्ति को अपनी कंपनी में रखना चाहता हूं जो यह जानता हो कि किसी भी काम को पूरा करने के लिए बहुत तकलीफों से गुज़रना पड़ता है. इस बात को समझने वाला व्यक्ति अधिक-से-अधिक रुपए-पैसे कमाने की होड़ में अपने जीवन को व्यर्थ नहीं करेगा. मैं तुम्हें नौकरी पर रखता हूं.”

(~_~)

जिन बच्चों को बहुत जतन और एहतियात सा पाला पोसा जाता है और जिनकी सुख-सुविधा में कभी कोई कोर-कसर नहीं रखी जाती, उन्हें यह लगने लगता है कि उनका हक हर चीज पर है और उन्हें उनकी पसंद की चीज किसी भी कीमत पर सबसे पहले मिलनी चाहिए. ऐसे बच्चे अपने माता-पिता की मेहनत और उनके समर्पण का मूल्य नहीं जानते.

यदि हम भी अपने बच्चों की हर ख़्वाहिश को पूरा करके उन्हें खुद से पनपने का मौका नही दे रहे हैं तो हम उनकी आनेवाली ज़िंदगी को बिगाड़ रहे हैं. उन्हें बड़ा घर, महंगे खिलौने, और शानदार लाइफस्टाइल देना ही पर्याप्त नहीं है, उन्हें रोजमर्रा के काम खुद से करने के लिए प्रेरित करना चाहिए. उन्हें सुविधापूर्ण जीवन का गुलाम नहीं बनाना चाहिए. उनमें यह आदत डालनी चाहिए कि वे अपना भोजन कभी नहीं छोड़ें, अन्न का तिरस्कार नहीं करें और अपनी थाली खुद धोने के लिए रखने जाएं.

हो सकता है कि आपके पास अपने बच्चों की सभी ज़रूरतें पूरा करने के लिए बहुत अधिक पैसा हो और घर में नौकर-चाकर लगें हों लेकिन उनमें दूसरों के प्रति संवेदना पनपाने के लिए आपको ऐसे कदम ज़रूर उठाने चाहिए. उन्हें यह समझना चाहिए कि उनके माता-पिता कितने भी संपन्न हों लेकिन एक दिन वे भी सबकी तरह बूढ़े हो जाएंगे और शायद उन्हें दूसरों की सहायता की ज़रूरत पड़ेगी.

सभी बच्चों में यह बात विकसित करनी चाहिए कि वे दुनिया के हर व्यक्ति की जरूरतों, प्रयासों, और कठिनाइयों को समझें और उनके साथ मिलकर चलना सीखें ताकि हर व्यक्ति का हित हो.

(हिंदीज़ेन पर ही यह भी पढ़ें “प्रार्थना के हाथ“)


One young man went to apply for a managerial position in a big company. He passed the initial interview, and now would meet the director for the final interview. The director discovered from his CV that the youth’s academic achievements were excellent.

He asked, “Did you obtain any scholarships in school?”

The youth answered, “NO”.

“Who paid for your school fees?”

“My parents”, he replied.

“Where did they work?”

“They worked as clothes cleaner… they still do”

The director requested the youth to show his hands. The youth showed his hands that were smooth and perfect.

“Have you ever helped your parents wash the clothes?”

“Never, my parents always wanted me to study and read more books. Besides, they could wash clothes faster than me.”

The director said, “I have a request. When you go home today, go and clean hand of your parents. See me tomorrow morning.”

The youth felt dejected. When he went back home, he asked his parents to let him clean their hands. His parents felt strange, happy but with mixed feelings. They showed their hands to their son. The youth cleaned their hands slowly. His tear fell as he did that.

It was the first time he noticed that his parents hands were so wrinkled, and there were so many bruises in their hands. Some bruises were so painful that they winced when he touched it. This was the first time the youth realized that it was this pair of hands that washed the clothes everyday to enable him to pay the school fees. The bruises in the hands were the price that the parents had to pay for his education, his school activities and his future.

After cleaning his parents hands, the youth quietly washed all the remaining clothes for them. That night, parents and son talked for a very long time.

Next morning, the youth went to the director’s office. The Director noticed the tears in the youth’s eyes, and asked, “tell me what have you done and learned yesterday in your house?”

The youth answered, “I cleaned my parents hand, and also finished cleaning all the remaining clothes. I now know what appreciation is. Without my parents, I would not be who I am today. By helping my parents, only now do I realize how difficult and tough it is to get something done on your own And I have come to appreciate the importance and value of helping one’s family.”

The director said, “this is what I am looking for in a manager. I want to recruit a person who can appreciate the help of others, a person who knows the sufferings of others to get things done, and a person who would not put money as his only goal in life. You are hired.”

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The Disciple and the Horse – शिष्य और घोड़ा


white horse by alice popkorn

गुरु की कठोर एवं संयमित दिनचर्या से प्रभावित होकर शिष्य ने उनका अनुसरण करने का निश्चय कर लिया और सबसे पहले उसने पुआल पर सोना शुरु कर दिया.

गुरु को शिष्य के व्यवहार में कुछ परिवर्तन दिखाई दे रहा था. उन्होंने शिष्य से पूछा कि वह इन दिनों क्या साध रहा है.

“मैं शीघ्र दीक्षित होने के लिए कठोर दिनचर्या का अभ्यास कर रहा हूं,” शिष्य ने कहा.

“मेरे श्वेत वस्त्र मेरी शुद्ध ज्ञान की खोज को दर्शाते हैं, शाकाहारी भोजन से मेरे शरीर में सात्विकता की वृद्धि होती है, और सुख-सुविधा से दूर रहने पर मैं आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर होता हूं.”

गुरु मुस्कुराए और उसे खेतों की ओर ले गए जहां एक घोड़ा घास चर रहा था.

“तुम खेत में घास चर रहे इस घोड़े को देखते हो? इसकी खाल सफेद है, यह केवल घास-फूस खाता है, और अस्तबल में भूसे पर सोता है. क्या तुम्हें इस घोड़े में ज़रा सी भी साधुता दिखती है? क्या तुम्हें लगता है कि आगे जाकर एक दिन ये घोड़ा सक्षम गुरु बन जाएगा?”

(~_~)

The master was an austere man, so the disciple decided to lead a life of sacrifice by sleeping on a bed made of straw.

After some time the master noticed a change in his disciple’s behaviour and decided to find out what was happening.

“I am climbing the steps of initiation,” was the answer.

“The white of my garments shows the simplicity of the search, the vegetarian food purifies my body, and the lack of comfort makes me think only of spiritual things.”

Smiling, the master took him to a field where a horse was grazing.

“Do you see that animal over there? His skin is white, he eats only herbs, and he sleeps in a barn with a floor covered in straw. Do you think that he looks like a saint, or that one day he will manage to become a true master?”

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Daughter of the Servant – नौकर की पुत्री


summer impression ~ 11 ~ by alice popkorn

भारत के किसी राज्य में बहुत पहले एक राजकुमार था जो जल्द ही राजा बनने वाला था. राज्य की परंपरा के अनुसार राजा बनने से पहले उसे विवाह करना आवश्यक था.

दरबार के एक बुद्धिमान व्यक्ति ने उसे सलाह दी कि वह राज्य की सभी विवाह योग्य युवतियों को बुलाकर उनमें से अपने लिए सुयोग्य वधु का चुनाव करे.

राजकुमार के महल में एक स्त्री काम करती थी जिसकी पुत्री भी विवाह योग्य थी. जब उसने राजकुमार के विवाह के लिए की जा रही तैयारियां होते देखा तो उसका दिल डूबने लगा क्योंकि उसकी पुत्री राजकुमार से बहुत प्रेम करती थी.

उसने घर पहुंचकर राजकुमार के विवाह की खबर अपनी पुत्री को दी. वह यह जानकर अचंभित हो गई कि उसकी पुत्री भी स्वयंवर में जाना चाहती थी.

उसने अपनी पुत्री से कहा, “बिटिया, तुम वहां जाकर क्या करोगी? वहां तो पूरे देश से सुंदर और धनी लड़कियां राजकुमार का वरण करने के लिए आएंगी. राजकुमार से विवाह की इच्छा अपने मन से निकाल दो. मैं जानती हूं कि तुम्हें इससे दुख होगा लेकिन अपने दुख को खुद पर हावी करके अपने जीवन को व्यर्थ न होने दो!”

पुत्री ने कहा, “मां, तुम चिंतित न हो. मैं दुखी नहीं हूं और मेरा निर्णय सही है. मुझे पता है कि राजकुमार मुझे नहीं चुनेगा लेकिन इसी बहाने मुझे कुछ समय के लिए उसके निकट होने का मौका मिलेगा. मेरे लिए यही बहुत है. मैं जानती हूं कि मेरी किस्मत में महलों का प्रेम नहीं लिखा है.”

स्वयंवर की रात को सभी नवयुवतियां महल पहुंचीं. वहां सुंदर-से-सुंदर और धनी युवतियों का जमघट था जो सुंदर वस्त्रों और बहुमूल्य आभूषणों से स्वयं को सुसज्जित करके राजकुमार की नजरों में आने के किसी भी मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहती थीं.

राजकुमार ने तब भरे दरबार में सभी युवतियों से कहा, “मैं तुममें से प्रत्येक को एक बीज दूंगा. इस बीज से पौधा निकलने के छः महीने बाद जो युवती मुझे सबसे सुंदर फूल लाकर देगी मैं उसी से विवाह करुंगा और वही इस राज्य की रानी बनेगी.”

सभी युवतियों को गमले में एक-एक बीज रोपकर दे दिया गया. महल की नौकरानी की पुत्री को बागवानी या पौधे की देखभाल के बारे में कुछ पता नहीं था फिर भी उसने बहुत धैर्य और लगन से गमले की देखभाल की. राजकुमार के प्रति उसके दिल में गहरा प्रेम था और वह आश्वस्त थी कि पौधे से निकलनेवाला फूल बहुत सुंदर होगा.

तीन महीने बीत गए लेकिन गमले में कोई पौधा नहीं उगा. नौकरानी की पुत्री ने सब कुछ करके देख लिया. उसने मालियों और किसानों से बात की, जिन्होंने उसे बागवानी की कुछ तरकीबें सुझाईं, लेकिन किसी ने काम नहीं किया. उसके गमले में कुछ नहीं उगा. इसी सब में छः महीने बीत गए.

अपने खाली गमले को लेकर वह राजमहल पहुंची. उसने देखा कि बाकी युवतियों के गमलों में बहुत अच्छे पौधे उगे थे और हर पौधे में एक अद्वितीय फूल खिला था. हर फूल एक-से-बढ़कर-एक था.

अंत में वह घड़ी आ गई जिसकी सभी बाट जोह रहे थे. राजकुमार दरबार में आया और उसने सभी युवतियों के गमलों और फूल को बहुत गौर से देखा.

फिर राजकुमार ने परिणाम की घोषणा की. उसने नौकरानी की पुत्री की ओर इशारा करके कहा कि वह उससे विवाह करेगा.

वहां उपस्थित सभी जन रोष व्यक्त करने लगे. उन्होंने कहा कि राजकुमार ने सुंदर फूल लेकर आई युवतियों की उपेक्षा करके उस युवती को चुना जो खाली गमला लेकर चली आई थी.

राजकुमार ने शांतिपूर्वक सभी को संबोधित कर कहा, “केवल यही युवती रानी बनने की योग्यता रखती है क्योंकि उसने सच्चाई और ईमानदारी का फूल खिलाया है. जो बीज मैंने छः महीने पहले सभी युवतियों को दिए थे वे निर्जीव थे. उनसे पौधा उगकर फूल खिलना असंभव था.”

(~_~)

In ancient India a certain prince was about to be crowned Emperor; before that, in accordance with the law, he had to get married.
Advised by a wise man, he decided to call all the young women in the region to choose the most suitable among them.

An old lady who had been a servant in the palace for many years heard the comments on the preparations for the audience and felt a deep sadness, for her daughter nurtured a secret love for the prince.

On reaching home and conveying the news, she was astonished to hear that her daughter also intended to present herself before the prince.

“My child, what are you going to do there? All the prettiest and richest young women in the court will be there. Get that silly idea out of your head! I know that you must be suffering, but don’t change your suffering into madness!”

“Dearest mother, I am not suffering and far less have I gone crazy; I know that I shall never be the chosen one, but it’s my chance to be at least for a few minutes close to the prince. That makes me happy, even knowing that my fate lies elsewhere.”

At night, when the young woman reached the palace, indeed all the prettiest young ladies were there, dressed in the prettiest clothes, displaying the most beautiful jewels, and willing to fight in every possible way for the opportunity that lay open to them.

Surrounded by his court, the prince announced the challenge: “I shall give each of you a seed. The one who brings me the prettiest flower in six months’ time will be the future Empress of India.

The young girl took her seed, planted it in a vase, and even though she did not know much about the art of gardening, took care of the earth with great patience and tenderness, for she thought that if the beauty of flowers was as deep as her love, then she did not need to worry about the result.

Three months passed by and nothing bloomed. The young woman tried a bit of everything, spoke to farmers and peasants – who taught her all sorts of gardening techniques – but nothing worked, all her efforts came to nothing.

Finally, the six months came to an end and nothing had flourished in her vase.

Even knowing that she had nothing to show, she decided to return to the palace, realizing that this would be the last meeting with her beloved. The day arrived for the new audience.

The girl appeared with her vase without a plant, and saw that all the other pretenders had managed to produce fine results, each of them with a prettier flower than the next, all with a variety of shapes and colors.

At last came the moment everyone was waiting for: the prince entered and observed each of the pretenders with great care and attention.

After reviewing them all, he announced the result, pointing to his servant’s daughter as his chosen wife.

Everyone present began to complain, saying that he chose precisely the one candidate who had failed in the assigned task.

Then the prince very calmly clarified the reason for his choice: “She was the only one among you all to cultivate the flower that made her worthy to become an Empress: the flower of honesty. All the seeds that I distributed were sterile, and there was absolutely no way that they could flourish.”

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