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मूर्ख : The Idiot

coming home by alicepopkorn

यह रूसी कहानी किसी गांव में रहनेवाले एक युवक के बारे में है जिसे सभी मूर्ख कहते थे. बचपन से ही वह सबसे यही सुनता आ रहा था कि वह मूर्ख है. उसके माता-पिता, रिश्तेदार, पड़ोसी- सभी उसे मूर्ख कहते थे और वह इस बात पर यकीन करने लगा कि जब इतने बड़े-बड़े लोग उसे मूर्ख कहते हैं तो वह यकीनन मूर्ख ही होगा. किशारावस्था को पार कर वह जवान हो गया और उसे लगने लगा कि वह पूरी ज़िंदगी मूर्ख ही बना रहेगा. इस अवस्था से बाहर निकलने के बहुत प्रयास किए लेकिन उसने जो भी काम किया उसे लोगों ने मूर्खतापूर्ण ही कहा.

यह मानव स्वभाव है. कोई कभी पागलपन से उबरकर सामान्य हो जाता है लेकिन कोई उसे सामान्य मानने के लिए तैयार नहीं होता. वह जो कुछ भी करता है उसमें लोग पागलपन के लक्षण खोजने लगते हैं. लोगों की आशंकाएं उस व्यक्ति को संकोची बना देतीं हैं और उसके प्रति लोगों के संदेह गहरे होते जाते हैं. यह एक कुचक्र है. रूसी गांव में रहनेवाले उस युवक ने भी मूर्ख की छवि से निकलने के भरसक प्रयास किए लेकिन उसके प्रति लोगों के रवैये में बदलाव नहीं आया. वे उसे पहले की भांति मूर्ख कहते रहे.

कोई संत वहां से गुज़रा. युवक रात के एकांत में संत के पास गया और उनसे बोला, “मैं इस छवि में बंधकर रह गया हूं. मैं सामान्य व्यक्ति की तरह रहना चाहता हूं लेकिन वे मुझे मुक्त नहीं करना चाहते. उन्होंने मेरी स्वीकार्यता के सारे मार्ग और द्वार बंद कर दिए हैं कि मैं कहीं उनसे बाहर न आ जाऊं. मैं उनकी ही भांति सब कुछ करता हूं फिर भी मूर्ख कहलाता हूं. मैं क्या करूं?”

संत ने कहा, “तुम एक काम करो. जब कभी कोई तुमसे कहे, ‘देखो, कितना सुंदर सूर्यास्त है,’ तुम कहो, ‘तुम मूर्ख हो, सिद्ध करो कि इसमें सुंदर क्या है? मुझे तो इसमें कोई सौंदर्य नहीं दीखता, तुम सिद्ध करो कि यह सुंदर है.’ यदि कोई कहे, ‘यह गुलाब का फूल बहुत सुंदर है,’ तो उसे आड़े हाथों लेकर कहो, ‘इसे साबित करो! किस आधार पर तुम्हें यह साधारण सा फूल सुंदर लग रहा है? यहां गुलाब के लाखों फूल हैं. लाखों-करोड़ों फूल खिल चुके हैं और लाखों-करोड़ों फूल खिलते रहेंगे; फिर गुलाब के इस फूल में क्या खास बात है? तुम किन विशेषताओं और तर्कों के आधार पर यह सिद्ध कर सकते हो कि यह गुलाब का फूल सुंदर है?”

“जब कोई तुमसे कहे, ‘लेव तॉल्स्तॉय की यह कहानी बहुत सुंदर है,’ तो उसे पकड़कर उससे पूछो, ’सिद्ध करो कि यह कहानी सुंदर है; इसमें सुंदर क्या है? यह सिर्फ एक साधारण कहानी है— ऐसी हजारों-लाखों कहानियां किताबों में बंद हैं, इसमें भी वही त्रिकोण है जो हर कहानी में होता है: दो आदमी और एक औरत या एक औरत और दो आदमी… यही त्रिकोण हमेशा होता है. सभी प्रेम कहानियों में यह त्रिकोण होता है. इसमें नई बात क्या है?”

युवक ने कहा, “ठीक है. मैं ऐसा ही करूंगा.”

संत ने कहा, “हां, ऐसा करने का कोई मौका मत छोड़ना, क्योंकि कोई भी इसे सिद्ध नहीं कर पाएगा, क्योंकि इन्हें सिद्ध नहीं किया जा सकता. और जब वे इसे सिद्ध नहीं कर पाएंगे तो वे अपनी मूर्खता और अज्ञान को पहचान लेंगे और तुम्हें मूर्ख कहना बंद कर देंगे. अगली बार जब मैं वापस आऊं, तब तुम मुझे यहां घटी सारी बातें बताना.”

कुछ दिनों बाद संत का उस गांव में दोबारा आना हुआ, और इससे पहले कि वह युवक से मिलते, गांव के लोगों ने उनसे कहा, “यह तो चमत्कार ही हो गया. हमारे गांव का सबसे मूर्ख युवक एकाएक सबसे बुद्धिमान व्यक्ति बन गया है. हम आपको उससे मिलवाना चाहते हैं.”

संत को पता था कि वे किस ‘बुद्धिमान व्यक्ति’ की बात कर रहे हैं. उन्होंने कहा, “हां, मैं भी उससे मिलना चाहूंगा, बल्कि मैं उससे मिलना ही चाहता था.”

वे संत को मूर्ख युवक के पास लेकर गए और मूर्ख ने उनसे कहा, “आप चमत्कारी पुरुष हैं, दिव्य हैं. आपके उपाय ने काम कर दिया! आपके बताए अनुसार मैंने सभी को मूर्ख और अज्ञानी कहना शुरु कर दिया. कोई प्रेम की बात करता था, कोई सौंदर्य की, कला की, साहित्य की, शिल्प की बात करता था और मेरा एक ही व्यक्तव्य होता था: ‘सिद्ध करो!’ वे सिद्ध नहीं कर पाते थे और मूर्खवत अनुभव करने लगते थे.”

“यह कितना अजीब है. मैं सोच ही नहीं सकता था कि इसमें कोई इतनी गहरी बात होगी. मैं केवल इतना ही चाहता था कि वे मुझे मूर्ख समझना बंद कर दें. यह अद्भुत बात है कि अब मुझे कोई मूर्ख नहीं कहता बल्कि सबसे बुद्धिमान वयक्ति कहता है, लेकिन मैं जानता हूं कि वही हूं जो मैं था- और इस तथ्य को आप भी जानते हैं.”

संत ने कहा, “इस रहस्य की चर्चा किसी से न करना. इसे अपने तक ही रखना. तुम्हे लगता है कि मैं कोई संत-महात्मा हूं? हां, यही रहस्य है लेकिन मैं भी उसी प्रकार से संत बना हूं जिस तरह से तुम बुद्धिमान बन गए हो.”

दुनिया में सब कुछ इसी सिद्धांत पर कार्य करता है. तुम कभी किसी से पूछते हो, इस जीवन का अर्थ क्या है? तुम गलत प्रश्न पूछते हो. और कोई-न-कोई इसके उत्तर में कहता है, “जीवन का उद्देश्य यह है” — लेकिन उसे कोई सिद्ध नहीं कर सकता.

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There is one Russian story, a small story. In a village a man, a young man, is called an idiot by everybody. From his very childhood he has heard that, that he is an idiot. And when so many people are saying it — his father, his mother, his uncles, the neighbors, and everybody — of course he starts believing that he must be an idiot. How can so many people be wrong? — and they are all important people. But when he becomes older and this continues, he becomes an absolutely sealed idiot; there is no way to get out of it. He tried hard but whatsoever he did was thought to be idiotic.

That is very human. Once a man goes mad he may become normal again but nobody is going to take him as normal. He may do something normal but you will suspect that there must be something insane about it. And your suspicion will make him hesitant and his hesitancy will make you suspicion stronger; then there is a vicious circle. So that man tried in every possible way to look wise, to do wise things, but whatsoever he did people would always say it was idiotic.

A saint was passing by. He went to the saint in the night when there was nobody about and asked him, “Just help me to get out of this locked state. I am sealed in. They don’t let me out; they have not left any window or door open so that I can jump out. And whatsoever I do, even if it is exactly the same as they do, still I am an idiot. What should I do?”

The saint said, “Do just one thing. Whenever somebody says,’Look how beautiful the sunset is,’ you say, “you idiot, prove it! What is beautiful there? I don’t see any beauty. You prove it.’ If somebody says,’Look at that beautiful rose flower,’ catch hold of him and tell him,’Prove it! What grounds have you to call this ordinary flower beautiful? There have been millions of rose flowers. There are millions, there will be millions in the future; what special thing has this rose flower got? And what are your fundamental reasons which prove logically that this rose flower is beautiful?’

“If somebody says,’This book of Leo Tolstoy is very beautiful,’ just catch hold of him and ask him,’Prove where it is beautiful; what is beautiful in it? It is just an ordinary story — just the same story which has been told millions of times, just the same triangle in every story: either two men and one woman or two women and one man, but the same triangle. All love stories are triangles. So what is new in it?”‘

The man said, “That’s right.”

The saint said, “Don’t miss any chance, because nobody can prove these things; they are unprovable. And when they cannot prove it, they will look idiotic and they will stop calling you an idiot. Next time, when I return, just give me the information how things are going.

And next time when the saint was coming back, even before he could meet the old idiot, people of the village informed him, “A miracle has happened. We had an idiot in our town; he has become the wisest man. We would like you to meet him.”

And the saint knew who that “wisest man” was. He said, “I would certainly love to see him. In fact I was hoping to meet him.”

The saint was taken to the idiot and the idiot said, “You are a miracle-worker, a miracle man. The trick worked! I simply started calling everyone an idiot, stupid. Somebody would be talking of love, somebody would be talking of beauty, somebody would be talking of art, painting, sculpture, and my standpoint was the same:’Prove it!’ And because they could not prove it, they looked idiotic.

And it is a strange thing. I was never hoping to gain this much out of it. All that I wanted was to get out of that confirmed idiocy. It is strange that now I am no longer an idiot, I have become the most wise man, and I know I am the same — and you know it too.”

But the saint said, “Never tell this secret to anybody else. Keep the secret to yourself. Do you think I am a saint? Yes, the secret is
between us. This is how I became a saint. This is how you have become a wise man.”

This is how things go on in the world. Once you ask, What is the meaning of life? you have asked the wrong question. And obviously somebody will say, “this is the meaning of life” — and it cannot be proved.

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कैंची और सुई : Scissors and Needle

love

यह कथा महान सूफी संत फ़रीद के बारे में है. एक बार कोई राजा फ़रीद से मिलने के लिए आया और अपने साथ उपहार में सोने की एक बहुत सुंदर कैंची लाया जिसमें हीरे जड़े हुए थे. यह कैंची बेशकीमती, अनूठी और नायाब थी. राजा ने संत के पैर छुए और उन्हें वह कैंची सौंप दी.

फ़रीद ने कैंची को एक नज़र देखा और उसे राजा के हाथ में देकर बोले, “मेरे लिए उपहार लाने के लिए मैं आपका शुक्रगुज़ार हूं. यह बहुत सुंदर है लेकिन मेरे लिए यह किसी काम की नहीं है. अच्छा होगा यदि आप मुझे इसके बदले एक सुई दे दें.”

राजा ने कहा, “मैं समझा नहीं. यदि आपको सुई की ज़रूरत है तो कैंची भी आपके काम आनी चाहिए.”

फ़रीद ने कहा, “मुझे कैंची नहीं चाहिए क्योंकि कैंची चीजों को काटती है, बांटती है, जबकि सुई चीजों का जोड़ती है. मैं प्रेम सिखाता हूं. मेरी तालीम की बुनियाद में प्रेम है – प्रेम लोगों को जोड़ता है, उन्हें बांधे रखता है. यह ऐसी सुई है जो लोगों को एक-दूसरे से जोड़ती है. कैंची मेरे लिए बेकार हैः यह काटती है… बांटती है. अगली बार आप जब आएं तो एक मामूली सुई ही लेकर आएं. मेरे लिए वही बड़ी चीज होगी.”
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A king came to see the great Sufi mystic Farid. He had brought a present for him: a beautiful pair of scissors, golden, studded with diamonds — very valuable, very rare, something unique. He brought those scissors to present to Farid. He touched Farid’s feet and gave him the scissors.

Farid took them, looked at them, gave them back to the king, and said, “Sir, many many thanks for the present that you have brought. It is a beautiful thing, but utterly useless for me. It will be better if you can give me a needle. Scissors I don’t need: a needle will do.”

The king said, “I don’t understand. If you need a needle, you will need scissors too.”

Farid said, “Scissors I don’t need because scissors cut things apart. A needle I need because a needle puts things together. I teach love. My whole teaching is based on love — putting things together, teaching people communion. I need a needle so that I can put people together. The scissors are useless; they cut, they disconnect. Next time when you come, just an ordinary needle will be enough.”

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पारस पत्थर : Touchstone

Pebbles

कहते हैं कि सिकंदरिया की महान लाइब्रेरी में जब भीषण आग लग गयी तब केवल एक ही किताब आग से बच पाई। वह कोई महत्वपूर्ण या मूल्यवान किताब नहीं थी। मामूली पढ़ना जानने वाले एक गरीब आदमी ने वह किताब चंद पैसों में खरीद ली।

किताब में कुछ खास रोचक नहीं था। लेकिन किताब के भीतर आदमी को एक पर्ची पर कुछ अजीब चीज़ लिखी मिली। उस पर्ची पर पारस पत्थर का रहस्य लिखा हुआ था।

पर्ची पर लिखा था कि पारस पत्थर एक छोटा सा कंकड़ था जो साधारण धातुओं को सोने में बदल सकता था। पर्ची के अनुसार वह कंकड़ उस जैसे दिखनेवाले हजारों दूसरे कंकडों के साथ एक सागरतट पर पड़ा हुआ था। कंकड़ की पहचान यह थी कि दूसरे कंकडों की तुलना में वह थोड़ा गरम प्रतीत होता जबकि साधारण कंकड़ ठंडे प्रतीत होते।

उस आदमी ने अपनी सारी वस्तुएं बेच दीं और पारस पत्थर ढूँढने के लिए ज़रूरी सामान लेकर समुद्र की ओर चल पड़ा।

वह जानता था कि यदि वह साधारण कंकडों को उठा-उठा कर देखता रहा तो वह एक ही कंकड़ को शायद कई बार उठा लेगा। इसमें तो बहुत सारा समय भी नष्ट हो जाता। इसीलिए वह कंकड़ को उठाकर उसकी ठंडक या गर्माहट देखकर उसे समुद्र में फेंक देता था।

दिन हफ्तों में बदले और हफ्ते महीनों में। वह कंकड़ उठा-उठा कर उन्हें समुद्र में फेंकता गया। एक दिन दोपहर में उसने एक कंकड़ उठाया – वह गरम था। लेकिन इससे पहले कि आदमी कुछ सोचता, आदत से मजबूर होकर उसने उसे समुद्र में फेंक दिया। समुद्र में उसे फेंकते ही उसे यह भान हुआ कि उसने कितनी बड़ी गलती कर दी है। इतने लंबे समय तक प्रतिदिन हजारों कंकडों को उठाकर समुद्र में फेंकते रहने की मजबूत आदत होने के कारण उसने उस कंकड़ को भी समुद्र में फेंक दिया जिसकी तलाश में उसने अपना सब कुछ छोड़ दिया था।

ऐसा ही कुछ हम लोग अपने सामने मौजूद अवसरों के साथ करते हैं। सामने खड़े अवसर को पहचानने में एक पल की चूक ही उसे हमसे बहुत दूर कर देती है।

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There is a story that when the great library of Alexandria was burned, one book was saved. But it was not a valuable book, and so a poor man, who could read a little, bought it for a few coppers. It was not very interesting, yet there was a most interesting thing in it. It was a thin strip of vellum on which was written the secret of the “touchstone”.

The touchstone was a small pebble that could turn any common metal into pure gold The writing explained that it was on the shores of the Black Sea lying among thousands and thousands of other pebbles which looked exactly like it. But the secret was this: the real stone would feel warm, while ordinary pebbles are cold. So the man sold his few belongings, bought some simple supplies, camped on the seashore, and began testing the pebbles.

This was his plan: he knew that if he picked up ordinary pebbles and threw them down again because they were cold, he might pick up the same pebbles hundreds of times. So when he felt one that was cold he threw it into the sea. He spent a whole day doing this, and they were none of them the touchstone. Then he spent a week, a month, a year, three years… but he did not find the touchstone. Yet he went on and on this way: pick up a pebble, it’s cold, throw it into the sea… and so on and so on. Just visualize the man doing it for years and years and years — pick up a pebble, it is cold, throw it into the sea… from morning to evening, for years and years.

But one morning he picked up a pebble and it was WARM — and he threw it into the sea. He had formed the habit of throwing them into the sea, you understand, and habit made him do it when at last he found the touchstone, poor fellow.

That’s how mind functions. Trust is a touchstone. Very rarely do you find a man in whom you can trust. Very rarely do you find a heart who is warm, loving, in whom you can trust. Ordinarily you find pebbles which look like the touchstone, almost alike, but all are cold. year in, year out, from the very childhood: you pick up a pebble, you feel it, it is cold, you throw it into the ocean.

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मीठा-नमकीन : Sugar-salt

मैंने एक बहुत पुरानी कहानी सुनी है… यह यकीनन बहुत पुरानी होगी क्योंकि उन दिनों ईश्वर पृथ्वी पर रहता था. धीरे-धीरे वह मनुष्यों से उकता गया क्योंकि वे उसे बहुत सताते थे. कोई आधी रात को द्वार खटखटाता और कहता, “तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? मैंने जो चाहा था वह पूरा क्यों नहीं हुआ?” सभी ईश्वर को बताते थे कि उसे क्या करना चाहिए… हर व्यक्ति प्रार्थना कर रहा था और उनकी प्रार्थनाएं विरोधाभासी थीं. कोई आकर कहता, “आज धूप निकलनी चाहिए क्योंकि मुझे कपड़े धोने हैं.” कोई और कहता, “आज बारिश होनी चाहिए क्योंकि मुझे पौधे रोपने हैं”. अब ईश्वर क्या करे? यह सब उसे बहुत उलझा रहा था. वह पृथ्वी से चला जाना चाहता था. उसके अपने अस्तित्व के लिए यह ज़रूरी हो गया था. वह अदृश्य हो जाना चाहता था.

एक दिन एक बूढ़ा किसान ईश्वर के पास आया और बोला, “देखिए, आप भगवान होंगे और आपने ही यह दुनिया भी बनाई होगी लेकिन मैं आपको यह बताना चाहता हूं कि आप सब कुछ नहीं जानते: आप किसान नहीं हो और आपको खेतीबाड़ी का क-ख-ग भी नहीं पता. और मेरे पूरे जीवन के अनुभव का निचोड़ यह कहता है कि आपकी रची प्रकृति और इसके काम करने का तरीका बहुत खराब है. आपको अभी सीखने की ज़रूरत है.”

ईश्वर ने कहा, “मुझे क्या करना चाहिए?”

किसान ने कहा, “आप मुझे एक साल का समय दो और सब चीजें मेरे मुताबिक होने दो, और देखो कि मैं क्या करता हूं. मैं दुनिया से गरीबी का नामोनिशान मिटा दूंगा!”

ईश्वर ने किसान को एक साल की अवधि दे दी. अब सब कुछ किसान की इच्छा के अनुसार हो रहा था. यह स्वाभाविक है कि किसान ने उन्हीं चीजों की कामना की जो उसके लिए ही उपयुक्त होतीं. उसने तूफान, तेज हवाओं और फसल को नुकसान पहुंचानेवाले हर खतरे को रोक दिया. सब उसकी इच्छा के अनुसार बहुत आरामदायक और शांत वातावरण में घटित हो रहा था और किसान बहुत खुश था. गेहूं की बालियां पहले कभी इतनी ऊंची नहीं हुईं! कहीं किसी अप्रिय के होने का खटका नहीं था. उसने जैसा चाहा, वैसा ही हुआ. उसे जब धूप की ज़रूरत हुई तो सूरज चमका दिया; तब बारिश की ज़रूरत हुई तो बादल उतने ही बरसाए जितने फसल को भाए. पुराने जमाने में तो बारिश कभी-कभी हद से ज्यादा हो जाती थी और नदियां उफनने लगतीं थीं, फसलें बरबाद हो जातीं थीं. कभी पर्याप्त बारिश नहीं होती तो धरती सूखी रह जाती और फसल झुलस जाती… इसी तरह कभी कुछ कभी कुछ लगा रहता. ऐसा बहुत कम ही होता जब सब कुछ ठीक-ठाक बीतता. इस साल सब कुछ सौ-फीसदी सही रहा.

गेहूं की ऊंची बालियां देखकर किसान का मन हिलोरें ले रहा था. वह ईश्वर से जब कभी मिलता तो यही कहता, “आप देखना, इस साल इतनी पैदावार होगी कि लोग दस साल तक आराम से बैठकर खाएंगे.”

लेकिन जब फसल काटी गई तो पता चला कि बालियों के अंदर गेहूं के दाने तो थे ही नहीं! किसान हैरान-परेशान था… उसे समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों हुआ. उसने ईश्वर से पूछा, “ऐसा क्यों हुआ? क्या गलत हो गया?”

ईश्वर ने कहा, “ऐसा इसलिए हुआ कि कहीं भी कोई चुनौती नहीं थी, कोई कठिनाई नहीं थी, कहीं भी कोई उलझन, दुविधा, संकट नहीं था और सब कुछ आदर्श था. तुमने हर अवांछित तत्व को हटा दिया और गेंहू के पौधे नपुंसक हो गए. कहीं कोई संघर्ष का होना ज़रूरी था. कुछ झंझावात की ज़रूरत थी, कुछ बिजलियां का गरजना ज़रूरी था. ये चीजें गेंहू की आत्मा को हिलोर देती हैं.”

यह बहुत गहरी और अनूठी कथा है. यदि तुम हमेशा खुश और अधिक खुश बने रहोगे तो खुशी अपना अर्थ धीरे-धीरे खो देगी. तुम इसकी अधिकता से ऊब जाओगे. तुम्हें खुशी इसलिए अधिक रास आती है क्योंकि जीवन में दुःख और कड़वाहट भी आती-जाती रहती है. तुम हमेशा ही मीठा-मीठा नहीं खाते रह सकते – कभी-कभी जीवन में नमकीन को भी चखना पड़ता है. यह बहुत ज़रूरी है. इसके न होने पर जीवन का पूरा स्वाद खो जाता है.

ओशो द्वारा कही गई एक कहानी.

wheat~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~

I have heard an ancient parable — must be very ancient because God used to live on the earth in those days. Slowly slowly, he became very tired of man, because people would torture him continuously. In the middle of the night, somebody would knock and say, “Why have you done this? Why not do it this way?” Everybody was advising; everybody was praying and their prayers were contradictory. A man would come and would say, “Today let there be sun, because I am going to wash my clothes.”

And somebody else would come and he would say, “Today let there be rain, because I am going to plant trees.” Now what to do? They were driving God mad! He had to disappear from the earth. He had to escape just to survive. He had to become invisible.

One day a man came, a farmer, an old farmer, and he said, “Look, you may be God, and you may have created the world, but one thing I must say to you: you are not a farmer, and you don’t know even the ABC of farming. And your whole nature and the functioning of your nature is so absurd, and this I say out of my whole life’s experience. You have to learn something.”

God said, “What’s your advice?”

The farmer said, “You give me one year’s time, and just let things be according to me, and see what happens. There will be no poverty left!”

God was willing and one year was given to the farmer. Now it was according to his will that everything was happening. Naturally, he asked the best, he thought only of the best — no thunder, no strong winds, no dangers for the crop. Everything comfortable, cozy, and he was very happy. The wheat was growing so high! No dangers were there, no hindrances were there; everything was moving according to HIS desire. When he wanted sun, there was sun; when he wanted rain, there was rain, and AS much as he wanted. In the old days, sometimes it rained too much, and the rivers would be flooded, and the crops would be destroyed; and sometimes it would not rain enough and the land would remain dry, and the crops would die… and sometimes something else, and sometimes something else. It was rare, very rare, that things were right. But this year everything was put right, mathematically right.

The wheat was growing so high that the farmer was very happy. He used to go to God and say, “Look! This time the crops will be such that for ten years if people don’t work there will be enough food.”

But when the crops were cut, there was no wheat inside. He was surprised — what happened?! He asked God, “What happened? what went wrong?”

God said, “Because there was no challenge, because there was no difficulty, because there was no conflict, no friction, because all was good, you avoided all that was bad, the wheat remained impotent. A little struggle is a must. Storms are needed, thunder , lightning is needed. They shake up the soul inside the wheat.”

This parable is of immense value. If you are just happy and happy and happy, happiness will lose all meaning. You will become tired of it. You will be fed up with it. You remain interested in happiness because there are sad moments too. Those sad moments keep you interested in happiness. You cannot go on eating only sugar and sugar and sugar — something salted is a must, otherwise all taste will be lost.

A story told by Osho.

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प्रयास की दिशा – Knowing Where to Make an Effort

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यह विश्व की सबसे अधिक पढ़ी गई प्रेरक लघुकथा है. बचपन में मैंने इसे कहीं पढ़ा और यह मुझे इसी रूप में पढ़ने को मिलती रही है. प्रसिद्ध लघुकथाओं के स्वरूपों में समय के साथ ही परिवर्तन आ जाते हैं और यह स्वाभाविक भी है, लेकिन यह लघुकथा न्यूनतम परिवर्तनों के साथ पीढ़ी-दर-पीढ़ी पढ़ी जाती रही है. बहुत संभव है कि आप इसे पहले ही कहीं पढ़ चुके हों लेकिन इस वेबसाइट में इसका समावेश आवश्यक लग रहा था इसलिए इसे प्रस्तुत किया जा रहा हैः

कभी ऐसा हुआ कि एक बड़े जहाज का इंजन खराब हो गया. जहाज के मालिक ने बहुत सारे विशेषज्ञों को बुलाकर उसकी जांच कराई लेकिन किसी को भी समझ में नहीं आया कि इंजन में क्या गड़बड़ थी.

जब किसी को भी जहाज के इंजन की खराबी का कारण पता न चला तो एक बूढ़े मैकेनिक को बुलाया गया जो बहुत छोटी उम्र से ही जहाज के इंजनों को ठीक करने का काम कर रहा था.

बूढ़ा मैकैनिक अपने औजारों का बक्सा लेकर आया और आते ही काम में जुट गया. उसने इंजन का बारीकी से मुआयना किया.

जहाज का मालिक भी वहीं था और उसे काम करते देख रहा था. बूढ़े मैकेनिक ने इंजन को जांचने के बाद अपने बक्से से एक छोटी सी हथौड़ी निकाली और इंजन के एक खास हिस्से पर हथौड़ी से धीरे से चोट की. चोट पड़ते ही इंजन गड़गड़ाते हुए चल पड़ा. बूढ़े ने हथौड़ी बक्से में वापस रख दी. उसका काम पूरा हो गया था.

एक हफ्ते बाद जहाज के मालिक को बूढ़े मैकैनिक का बिल मिला जिसमें उसने इंजन की मरम्मत के लिए दस हजार रूपए चार्ज किए थे.

बिल देखते ही मालिक चकरा गया. उसे लगा कि बूढ़े मैकेनिक ने ऐसा कुछ नहीं किया था जिसके लिए उसे इतनी बड़ी रकम दी जाए.

उसने बिल के साथ एक नोट लिखकर वापस भेज दिया कि मरम्मत के काम का आइटम-वाइज़ बिल भेज दीजिए.

बूढ़े मैकेनिक ने बिल रिवाइज़ करके भेज दिया. बिल में लिखा थाः

1. हथौड़ी से चोट करने की फीस – रु.5.00/-
2. चोट करने की जगह खोजने की फीस – रु.9,995/-
    कुल- – रु.10,000/-
 

अपने सपनों को पूरा करने के लिए प्रयास करना बहुत ज़रूरी है, लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण इस बात का ज्ञान होना है कि प्रयास किस दिशा में किए जाएं.

मैंने इस कहानी के स्रोत की खोज करने का प्रयास किया तो मुझे पता चला कि यह कहानी जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी में काम करनेवाले एक मैकेनिक चार्ल्स स्टीनमेट्ज़ से संबंधित एक वास्तविक घटना पर आधारित है. उसे एक बड़े इलेक्ट्रिक जेनेरेटर को रिपेयर करने के लिए बुलाया गया था. जेनरेटर का निरीक्षण करने के बाद उसने उसके एक पार्ट पर चॉक से निशान लगा दिया और स्टाफ को समझाया कि उस पार्ट पर क्या काम करने की ज़रूरत है. कंपनी ने उसके बड़े बिल को जब डीटेल के साथ प्रस्तुत करने के लिए लौटा दिया तब उसने चॉक का निशान लगाने के लिए एक डॉलर चार्ज किया और बाकी की रकम उस पार्ट को खोजने के लिए चार्ज की.

* * * * * * * * * * * * * * * * * * * *

A giant ship engine failed. The ship’s owners tried one expert after another, but none of them could figure but how to fix the engine.

Then they brought in an old man who had been fixing ships since he was a young. He carried a large bag of tools with him, and when he arrived, he immediately went to work. He inspected the engine very carefully, top to bottom.

Two of the ship’s owners were there, watching this man, hoping he would know what to do. After looking things over, the old man reached into his bag and pulled out a small hammer. He gently tapped something. Instantly, the engine lurched into life. He carefully put his hammer away. The engine was fixed!

A week later, the owners received a bill from the old man for ten thousand dollars.

“What?!” the owners exclaimed. “He hardly did anything!”

So they wrote the old man a note saying, “Please send us an itemized bill.”

The man sent a bill that read:

Tapping with a hammer…… …….. ……… $ 2.00

Knowing where to tap……… …….. …….. $ 9, 998.00

Effort is important, but knowing where to make an effort makes all the difference!

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