Category Archives: Quotations

जहाँ ज़िंदगी है, वहां उम्मीद है

मार्कस तूलियस सिसेरो (जन्म – 106 ईसा पूर्व और मृत्यु 43 ईसा पूर्व) रोमन राजनीतिज्ञ, विधिवेत्ता, और वक्ता था. उसके कई कथन दो हज़ार साल बाद भी उद्घृत किये जाते हैं:

1. जहाँ ज़िंदगी है, वहां उम्मीद है.

2. क्या ज़माना आ गया है… बच्चे अब मां-बाप का कहना नहीं मानते और हर ऐरा-गैरा लेखक बन जाता है. (दो हज़ार साल पहले भी ऐसा होता था!)

3. अगर तुम्हारे पास एक उद्यान और पुस्तकालय है तो तुम्हें किसी और चीज़ की ज़रुरत नहीं है.

4. मनुष्य हजारों वर्षों से ये छः गलतियाँ करता आ रहा है – पहली: यह मानना कि दूसरों को कुचलकर ही आगे बढ़ा जा सकता है. दूसरी: उन चीज़ों की चिंता करना जिन्हें कोई भी न तो बदल सकता है और न ही सुधार सकता है. तीसरी: यह समझना कि जो काम हमारे बस में नहीं है वह नामुमकिन है. चौथी: तुच्छ प्राथमिकताओं को दरकिनार नहीं करना. पांचवीं: मन के परिमार्जन और परिवर्धन को महत्व न देना. छठवीं: दूसरों पर हमारे विचार और जीवनशैली को थोपना.

5. हमें ज़िंदगी कम ही मिलती है पर बेहतर तरीके से बिताई गयी ज़िंदगी की स्मृति शाश्वत है.

6. दर्शन का अध्ययन और कुछ नहीं बल्कि स्वयं को मृत्यु के लिए तैयार करना है.

7. जो बात नैतिक मानदंडों पर खरी न उतरे उससे किसी का हित नहीं सधता भले ही उससे तुम्हें कुछ लाभ हो जाए. यह सोचना ही दुखदाई है कि किसी अपकृत्य से भी कुछ लाभ उठाया जा सकता है.

8. मुसीबत के वक्त अपने बाल नोचना बेवकूफी है. गंजे हो जाने पर दुःख-तकलीफें कम नहीं हो जातीं.

9. सिर्फ विक्षिप्त जन ही नाचते समय गंभीर रह सकते हैं.

10. जन-कल्याण का ध्येय ही सर्वोत्तम विधि है.

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मनुष्यता से दिव्यता की ओर

तुम्हारी आत्मा, चेतना, और जीवन दिव्यता का अंश है. यह ईश्वर का ही विस्तार है. तुम स्वयं को ईश्वर तो नहीं कह सकते पर ईश्वर से एकात्म्य तुम्हारा जन्मसिद्द अधिकार है. पानी की एक बूँद सागर नहीं हो सकती लेकिन यह सागर से ही निकली है और इसमें सागर के सारे गुण हैं. ~ एकहार्ट टोल

Eckhart Tolle

“कोई भी तुम्हें यह नहीं बता सकता कि तुम कौन हो, क्या हो. वह जो कुछ भी कहेगा वह एक नयी अवधारणा होगी, इसलिए वह तुम्हें बदल न सकेगी. तुम जो भी हो इसका संबंध किसी मान्यता से नहीं है. वास्तव में, हर मान्यता, हर विश्वास एक अवरोध ही है. तुम्हें इसके लिए बोधिसंपन्न होने की आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि तुम उसके साथ ही जन्मे हो. लेकिन जब तक तुम्हें इस तथ्य का ज्ञान नहीं होता तब तक तुम इस जगत में अपनी आभा नहीं बिखेर सकते. तुम्हारा बोध, तुम्हारी जागृति वही कहीं छुपी रहती है जो तुम्हारा वास्तविक आश्रय है. यह ऐसा ही है जैसे कोई दरिद्र व्यक्ति सड़कों पर ठोकर खाने के लिए बाध्य हो और उसे इस बात का पता ही न हो कि उसके नाम कहीं एक खाता भी खुला है जिसमें लाखों करोड़ों रुपये उसकी राह देख रहे हैं.”

“जीवन के प्रति किसी भी प्रतिरोध का न होना ही ईश्वरीय कृपा, आत्मिक शांति और सहजता की दशा है. जब यह दशा उपलब्ध हो तो आसपास बिखरे हुए संसार के शुभ-अशुभ का द्वंद्व मायने नहीं रखता. यह विरोधाभास प्रतीत होता है पर जब नाम-रूप आदि पर हमारी आतंरिक निर्भरता समाप्त हो जाती है तब जीवन की बाहरी-भीतरी स्वाभाविक अवस्था अपने शुद्ध रूप में प्रकट होती है. जिन वस्तुओं, व्यक्तियों, और परिस्थितियों को हम अपनी प्रसन्नता के लिए अनिवार्य मानते हैं वे हमारी ओर निष्प्रयास ही आने लगती हैं और हम उनका आनंद मुक्त रूप से उठा सकते हैं… और जब तक वे टिके रहें तब तक के लिए उनके महत्व को आंक सकते हैं. सृष्टि के नियमों के अंतर्गत वे सभी वस्तुएं और व्यक्ति कभी-न-कभी हमारा साथ छोड़ ही देंगीं, आने-जाने का चक्र चलता रहेगा, लेकिन उनपर निर्भरता की शर्त टूट जाने पर उनके खोने का भय नहीं सताएगा. जीवन की सरिता स्वाभाविक गति से बहती रहेगी.”

एकहार्ट टोल जर्मन मूल के कनाडावासी आध्यात्मिक गुरु और बेस्ट सेलिंग लेखक हैं. इनकी दो पुस्तकों यथा The Power of Now और The New Earth की लाखों प्रतियाँ बिक चुकी हैं.

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सत्य वचन – एपिक्टेटस (1)

एपिक्टेटस (जन्म वर्ष 55 – मृत्यु  वर्ष 135) यूनानी महात्मा और स्टोइक दार्शनिक थे. उनका जन्म वर्तमान तुर्की में एक दास परिवार में हुआ था. उनके शिष्य आरियन ने उनकी शिक्षाओं को संकलित किया जिन्हें ‘उपदेश’ कहा जाता है. एपिक्टेटस ने बताया कि दर्शन केवल सैद्धांतिक ज्ञान नहीं बल्कि जीवन जीने का तरीका है. नियति ही सब कुछ निर्धारित और नियंत्रित करती है अतः मनुष्य उसे भोगने को विवश है पर हम उसे निरपेक्ष और शांत रहकर स्वीकार कर सकते हैं. अपने कर्मों के लिए हम ही उत्तरदायी हैं एवं कठोर आत्मानुशासन द्वारा हम उन्हें सुधार सकते हैं. जो कुछ भी हमारी सीमा में है उसे नज़रंदाज़ करने पर या अपनी सीमा के परे स्थित चीज़ों को नियंत्रित करने का प्रयास करने पर दुःख उत्पन्न होता है. संपूर्ण विश्व एक नगर की भांति है और हम सभी उसके रहवासी हैं, इसलिए यह हमारा कर्तव्य है कि हम एक दूसरे का हितचिंतन करें. एपिक्टेटस की शिक्षाओं को अंगीकार करनेवाला व्यक्ति सुख-शांति पाता है.

एपिक्टेटस की सूक्तियों का अनुवाद करना सरल नहीं है इसलिए यहाँ यथासंभव सरल भाषा का प्रयोग किया गया है. यह उनकी सूक्तियों के संकलन की पहली कड़ी है.

1. प्रसन्नता का एक ही मार्ग है, और वह यह है कि हम उन विषयों की चिंता न करें जो हमारे संकल्प और शक्तियों के परे हैं.

2. संपन्नता अधिकाधिक अर्जन में नहीं बल्कि अल्प आवश्यकताओं में निहित है.

3. यदि तुम स्वयं में सुधार लाना चाहते हो तो दूसरों की दृष्टि में मूढ़ ही बने रहने से परहेज़ न करो.

4. अपने दर्शन की व्याख्या नहीं करो, उसे जियो.

5. उन व्यक्तियों के साथ संयुक्त रहो जो तुम्हें ऊपर उठाते हों एवं जिनकी उपस्थिति में तुम अपना सर्वोत्कृष्ट दे सको.

6. यदि कोई तुम्हें बताये कि अमुक व्यक्ति तुम्हारे बारे में बुरा कह रहा है तो उसका प्रतिवाद मत करो, बल्कि उससे कहो, “हाँ, वह मेरे अन्य दोष नहीं जानता अन्यथा उसने उनका भी उल्लेख किया होता”.

7. दूसरों की धारणाएं एवं समस्याएं संक्रामक हो सकती हैं. उन्हें अनजाने में ही अपनाकर स्वयं की हानि मत करो.

8. जो व्यक्ति स्वयं पर हँस सकता हो उसे हँसने के लिए विषयों की कमी कभी नहीं होती.

9. अपनी दुर्दशा के लिए दूसरों को उत्तरदायी ठहराने से यह पता चलता है कि व्यक्ति में सुधार की आवश्यकता है. स्वयं को दोषी ठहराने से यह पता चलता है कि सुधार आरंभ हो गया है. और किसी को भी दोषी नहीं ठहराने का अर्थ यह है कि सुधार पूर्ण हो चुका है.

10. कुछ भी कहने से पहले तुम उसका अर्थ समझ लो, फिर कहो.

11. परिस्थितियां मनुष्य का निर्माण नहीं करतीं. वे तो उसे स्वयं से परिचित कराती हैं.

12. मनुष्य वास्तविक समस्याओं के कारण नहीं बल्कि उनके बारे में अपने दिमागी फितूर के कारण चिंतित रहता है.

13. संकट जितना गहन होता है, उसे विजित करने पर प्राप्त होनेवाला गौरव उतना ही विशाल होता है. तूफानों और झंझावातों का सामना करने से ही नाविकों का कौशल प्रकट होता है.

14. तुम्हारे भीतर क्रोध उत्पन्न करनेवाला व्यक्ति तुमपर विजय प्राप्त कर लेता है.

15. यदि कोई तुम्हें बुरा कहे, और वह बात सत्य हो, तो स्वयं में सुधार लाओ. यदि वह झूठ हो तो उसे हंसी में उड़ा दो.

16. बाहरी वस्तुओं में श्रेष्ठता मत खोजो, वह तुम्हारे भीतर होनी चाहिए.

17. ईश्वर या तो बुराई को मिटा सकता है या नहीं मिटा सकता… या वह मिटा सकता है, पर मिटाना नहीं चाहता.

18. वह मनुष्य स्वतंत्र नहीं है जो स्वयं का स्वामी नहीं है.

19. एक दिन मैं मर जाऊँगा. तो क्या मैं विलाप करते हुए मरूं? मुझे कभी बेड़ियों में जकड़ दिया जाए तो क्या मैं उसका भी शोक मनाऊँ? यदि मुझे कभी देशनिकाला भी मिल जाए तो क्या मैं अपनी मुस्कुराहटों, प्रसन्नता, और संतुष्टि से भी वंचित कर दिया जाऊं?

20. तुम नन्ही आत्मा हो जो एक शव का बोझा ढो रही है.

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मैं यह जान गयी हूँ कि… : I’ve learned that

मैं यह जान गयी हूँ कि कितना ही बुरा क्यों न हुआ हो और आज मन में कितनी ही कड़वाहट क्यों न हो, यह ज़िंदगी चलती रहती है और आनेवाला कल खुशगवार होगा.

मैं यह जान गयी हूँ कि किसी शख्स को बारिश के दिन और खोये हुए लगेज के बारे में कुछ कहते हुए, और क्रिसमस ट्री में उलझती हुई बिजली की झालर से जूझते देखकर हम उसके बारे में बहुत कुछ समझ सकते हैं.

मैं यह जान गयी हूँ कि हमारे माता-पिता से हमारे संबंध कितने ही कटु क्यों न हो जाएँ पर उनके चले जाने के बाद हमें उनकी कमी बहुत शिद्दत से महसूस होती है.

मैं यह जान गयी हूँ कि पैसा बनाना और ज़िंदगी बनाना एक ही बात नहीं है.

मैं यह जान गयी हूँ कि ज़िंदगी हमें कभी-कभी एक मौका और देती है.

मैं यह जान गयी हूँ कि ज़िंदगी में राह चलते मिल जाने वाली हर चीज़ को उठा लेना मुनासिब नहीं है. कभी-कभी उन्हें छोड़ देना ही बेहतर होता है.

मैं यह जान गयी हूँ कि जब कभी मैं खुले दिल से कोई फैसला लेती हूँ तब मैं अमूमन सही होती हूँ.

मैं यह जान गयी हूँ कि मुझे दर्द सहना गवारा है मगर दर्द बन जाना मुझे मंज़ूर नहीं.

मैं यह जान गयी हूँ कि हर दिन मुझे किसी को प्यार से थाम लेना है. गर्मजोशी से गले मिलना या पीठ पर दोस्ताना धप्पी पाना किसी को बुरा नहीं लगता.

मैं यह जान गयी हूँ कि लोग हमारे शब्द और हमारे कर्म भूल जाते हैं पर कोई यह नहीं भूलता कि हमने उन्हें कैसी अनुभूतियाँ दीं.

मैं यह जान गयी हूँ कि मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है.

माया ऐन्जेलू

* * *

इसी ब्लॉग में इससे मिलती-जुलती एक पोस्ट और भी है. उसे भी पढ़कर देखें.

(~_~)

“I’ve learned that no matter what happens, or how bad it seems today, life does go on, and it will be better tomorrow. I’ve learned that you can tell a lot about a person by the way he/she handles these three things: a rainy day, lost luggage, and tangled Christmas tree lights. I’ve learned that regardless of your relationship with your parents, you’ll miss them when they’re gone from your life. I’ve learned that making a “living” is not the same thing as making a “life.” I’ve learned that life sometimes gives you a second chance. I’ve learned that you shouldn’t go through life with a catcher’s mitt on both hands; you need to be able to throw something back. I’ve learned that whenever I decide something with an open heart, I usually make the right decision. I’ve learned that even when I have pains, I don’t have to be one. I’ve learned that every day you should reach out and touch someone. People love a warm hug, or just a friendly pat on the back. I’ve learned that I still have a lot to learn. I’ve learned that people will forget what you said, people will forget what you did, but people will never forget how you made them feel.”

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आलोचक

(यह पोस्ट पाउलो कोएलो ने अपने ब्लौग में लिखी है)

मुझे अक्सर मेरे प्रिय पाठक ई-मेल करके बताते हैं कि उन्हें मेरी किसी नई किताब का रिव्यू या आलोचना पढ़कर बहुत बुरा लगा क्योंकि वे उस रिव्यू या आलोचना से कतई सहमत नहीं थे. सबसे पहले तो मैं उनका शुक्रिया अदा करता हूँ कि वे मुझमें और मेरे लेखन में इतनी आस्था रखते हैं. इसके आगे मैं उनसे इतना ही कहना चाहता हूँ कि आलोचकों को इतनी गंभीरता से नहीं लें. उनसे पूछें – “यदि आप इतना बेहतर समझते हैं तो आप खुद ही कोई किताब क्यों नहीं लिखते?”

बीस साल के लेखन के दौरान मैं ऐसे निष्कर्षों तक पहुंचा हूँ जो मेरे लेखन में झलकते हैं और जिससे मुझे लिखने में बहुत मदद मिली है. मेरी पुस्तक ‘The Zahir’ का अहम किरदार अपनी किताब के छपने से पहले ही जानता है कि उसके बारे में आलोचक क्या कहेंगे.

आलोचकों की आलोचना करना मेरा काम नहीं है – मैं लेखक हूँ. जब कभी मैं उनसे मिलता हूँ (जैसा कि अक्सर होता ही रहता है), वे मुझसे मिलने पर झेंप जाते हैं. वे मुझसे इतनी भद्रता से पेश आते हैं जैसे कि उन्होंने गलती से मेरा पैर कुचल दिया हो. लेकिन मेरी प्रतिक्रिया उन्हें चकित कर देती है – मैं उनसे हमेशा कहता हूँ कि मैं उनकी राय को व्यक्तिगत तौर पर नहीं लेता.

मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ? क्योंकि मैं यह जानता हूँ कि आप लोगों में से अधिकांश जन अपनी आलोचना से आहत हो जाते हैं. जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ, आलोचकों को गंभीरता से नहीं लें. उन्हें ज़रुरत से ज्यादा महत्व नहीं दें. वे भी अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं, अपना घर चला रहे हैं.

यदि आप मुझसे सहमत नहीं हों तो कुछ महान व्यक्तित्वों के विचार पढ़ें:-

1. जो दिल को अच्छा लगता है वही करो क्योंकि किसी-न-किसी को तो बुरा लगता ही रहेगा. ~ आना एलीयानोर रूजवेल्ट

2. आलोचकों को कुछ अर्थपूर्ण कर्म करना चाहिए. ~ जॉन ग्रिशाम

3. आलोचना से बचने के लिए – कुछ न करें, कुछ न कहें, कुछ न बनें. ~ अलबर्ट हबार्ड

4. उनकी बातें नहीं बल्कि कानाफूसी मायने रखती है. ~ एरोल फ्लिन

5. यदि आलोचना से कुछ फर्क पड़ता तो दुनिया से कमीनापन कब का गायब हो चुका होता. ~ फ्रेड एलेन

6. अपने विरोधियों से भयभीत न हों. याद रखें, पतंग हवा चलने पर ही ऊपर उठती है. ~ हैमिल्टन मैबी

7. गुमनामी के सिवाय आलोचना से बचने का कोई रास्ता नहीं है. ~ जोज़फ़ एडीसन

8. मैं उन्हें (नाटक समीक्षक) बहुत पसंद करता हूँ. यह सोचकर ही मज़ा आता है कि वे हर रात थियेटर जाते हैं जबकि उन्हें नाटक के बारे में कुछ भी नहीं पता. ~ नोल कॉवर्ड

9. एक नन्हीं बरैया किसी भीमकाय घोड़े को काटकर बिदका सकती है पर घोड़े के सामने वह तुच्छ कीड़ा ही तो है! ~ सैमुअल जॉन्सन

10. आलोचकों को रिकॉर्ड्स खरीदने नहीं पड़ते. वे उन्हें मुफ्त ही पाते हैं. ~ नैट किंग कोल

11. आलोचक लम्बे अरसे तक गलत शब्द की खोज करते हैं और दुर्भाग्य से वह उन्हें मिल भी जाता है. ~ पीटर उस्टिनोव

12. मैं ईश्वर की तरह लिखना नहीं चाहता क्योंकि मैं मानता हूं कि ऐसा कोई नहीं कर सकता, जबकि आलोचक यह साबित करते में लगे रहते हैं कि ऐसा कोई नहीं कर सकता. ~ अर्नेस्ट हेमिंग्वे

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