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Posts from the ‘Mulla Nasruddin’ Category

Wild Flowers – जंगली फूल


सर्दियों का पूरा मौसम नसरुद्दीन ने अपने बगीचे की देखरेख में बिताया. वसंत आते ही हर तरफ मनमोहक फूलों ने अपनी छटा बिखेरी. बेहतरीन गुलाबों और दूसरे शानदार फूलों के बीच नसरुद्दीन को कुछ जंगली फूल भी झांकते दिख गए.

नसरुद्दीन ने उन फूलों को उखाड़कर फेंक दिया. कुछ दिनों के भीतर वे जंगली फूल और खरपतवार फिर से उग आये.

नसरुद्दीन ने सोचा क्यों न उन्हें खरपतवार दूर करनेवाली दवा का छिडकाव करके नष्ट कर दिया जाए. लेकिन किसी जानकार ने नसरुद्दीन को बताया कि ऐसी दवाएं अच्छे फूलों को भी कुछ हद तक नुकसान पहुंचाएंगी. निराश होकर नसरुद्दीन ने किसी अनुभवी माली की सलाह लेने का तय किया.

“ये जंगली फूल, ये खरपतवार…”, माली ने कहा, “यह तो शादीशुदा होने की तरह है, जहाँ बहुत सी बातें अच्छीं होतीं हैं तो कुछ अनचाही दिक्कतें और तकलीफें भी पैदा हो जातीं हैं”.

“अब मैं क्या करूं?”, नसरुद्दीन ने पूछा.

“तुम अगर उन्हें प्यार नहीं कर सकते हो तो बस नज़रंदाज़ करना सीखो. इन चीज़ों की तुमने कोई ख्वाहिश तो नहीं की थी लेकिन अब वे तुम्हारे बगीचे का हिस्सा बन गयीं हैं.”

* * * * * * * * * *

Nasrudin spent the entire autumn working his garden. The flowers had blossomed in the spring – and Nasrudin noticed a few dandelions appearing, which he hadn’t planted.

Nasrudin tore them up. But the pollen had already spread and others began to grow. He tried to find a weed killer which only killed dandelions. A specialist told him any type of poison would end up killing all the other flowers. In despair, he went to ask a gardener for help.

- It is like a marriage – said the gardener. – Along with the good things, a few little inconveniences always appear.

- What can I do? – insisted Nasrudin.

- Learn how to love them . Although they are flowers you did not count on, they are still part of the garden.

मुसीबत


नसरुद्दीन एक शाम अपने घर से निकला. उसे किन्हीं मित्रों के घर उसे मिलने जाना था. वह चला ही था कि दूर गाँव से उसका एक दोस्त जलाल आ गया. नसरुद्दीन ने कहा, “तुम घर में ठहरो, मैं जरूरी काम से दो-तीन मित्रों को मिलने जा रहा हूँ और लौटकर तुमसे मिलूंगा. अगर तुम थके न हो तो मेरे साथ तुम भी चल सकते हो”.

जलाल ने कहा, “मेरे कपड़े सब धूल-मिट्टी से सन गए हैं. अगर तुम मुझे अपने कपड़े दे दो तो मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ. तुम्हारे बगैर यहां बैठकर मैं क्या करूंगा? इसी बहाने मैं भी तुम्हारे मित्रों से मिल लूँगा”.

नसरुद्दीन ने अपने सबसे अच्छे कपड़े जलाल को दे दिए और वे दोनों निकल पड़े.

जिस पहले घर वे दोनों पहुंचे वहां नसरुद्दीन ने कहा, “मैं इनसे आपका परिचय करा दूं, ये हैं मेरे दोस्त जलाल. और जो कपड़े इन्होंने पहने हैं वे मेरे हैं”.

जलाल यह सुनकर बहुत हैरान हुआ. इस सच को कहने की कोई भी जरुरत न थी. बाहर निकलते ही जलाल ने कहा, “कैसी बात करते हो, नसरुद्दीन! कपड़ों की बात उठाने की क्या जरूरत थी? अब देखो, दूसरे घर में कपड़ों की कोई बात मत उठाना”.

वे दूसरे घर पहुंचे. नसरुद्दीन ने कहा, “इनसे परिचय करा दूं. ये हैं मेरे पुराने मित्र जलाल; रही कपड़ों की बात, सो इनके ही हैं, मेरे नहीं हैं”.

जलाल फिर हैरान हुआ. बाहर निकलकर उसने कहा, “तुम्हें हो क्या गया है? इस बात को उठाने की कोई क्या जरूरत थी कि कपड़े किसके हैं? और यह कहना भी कि इनके ही हैं, शक पैदा करता है, तुम ऐसा क्यों कर रहे हो?”

नसरुद्दीन ने कहा, “मैं मुश्किल में पड़ गया. वह पहली बात मेरे मन में गूंजती रह गई, उसकी प्रतिक्रिया हो गई. सोचा कि गलती हो गई. मैंने कहा, कपड़े मेरे हैं तो मैंने कहा, सुधार कर लूं, कह दूं कि कपड़े इन्हीं के हैं”. जलाल ने कहा, “अब ध्यान रखना कि इसकी बात ही न उठे. यह बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए”.

वे तीसरे मित्र के घर पहुंचे. नसरुद्दीन ने कहा, “ये हैं मेरे दोस्त जलाल. रही कपड़ों की बात, सो उठाना उचित नहीं है”. नसरुद्दीन ने जलाल से पूछा, “ठीक है न, कपड़ों की बात उठाने की कोई ज़रुरत ही नहीं है. कपड़े किसी के भी हों, हमें क्या लेना देना, मेरे हों या इनके हों. कपड़ों की बात उठाने का कोई मतलब नहीं है”.

बाहर निकलकर जलाल ने कहा, “अब मैं तुम्हारे साथ और नहीं जा सकूंगा. मैं हैरान हूं, तुम्हें हो क्या रहा है?”

नसरुद्दीन बोला, “मैं अपने ही जाल में फंस गया हूं. मेरे भीतर, जो मैं कर बैठा, उसकी प्रतिक्रियाएं हुई चली जा रही हैं. मैंने सोचा कि ये दोनों बातें भूल से हो गयीं, कि मैंने अपना कहा और फिर तुम्हारा कहा. तो मैंने तय किया कि अब मुझे कुछ भी नहीं कहना चाहिए, यही सोचकर भीतर गया था. लेकिन बार-बार यह होने लगा कि यह कपड़ों की बात करना बिलकुल ठीक नहीं है. और उन दोनों की प्रतिक्रिया यह हुई कि मेरे मुंह से यह निकल गया और जब निकल गया तो समझाना जरूरी हो गया कि कपड़े किसी के भी हों, क्या लेना-देना”.

यह जो नसरुद्दीन जिस मुसीबत में फंस गया होगा बेचारा, पूरी मनुष्य जाति ऐसी मुसीबत में फंसी है. एक सिलसिला, एक गलत सिलसिला शुरू हो गया है. और उस गलत सिलसिले के हर कदम पर और गलती बढ़ती चली जाती है. जितना हम उसे सुधारने की कोशिश करते हैं, वह बात उतनी ही उलझती चली जाती है.

प्रस्तुति ः ओशो शैलेंद्र

मुल्ला का कुरता


मुल्ला नसरुद्दीन ने नया कुरता बनवाने के लिए पैसे जमा किये. बड़े जोश-ओ-खरोश से वह दर्जी की दुकान पर गया. नाप लेने के बाद दर्जी ने कहा, “एक हफ्ते के बाद आइये. अल्लाह ने चाहा तो आपका कुरता तैयार मिलेगा”.

हफ्ते भर के इंतज़ार के बाद मुल्ला दुकान पर गया. दर्जी ने कहा, “काम में कुछ देर हो गयी. अल्लाह ने चाह तो आपका कुरता कल तक तैयार हो जायेगा.”

अगले दिन मुल्ला फिर दुकान पर पहुंचा. उसे देखते ही दर्जी ने कहा, “माफ़ करिए, अभी कुछ काम बाकी रह गया है. बस एक दिन की मोहलत और दे दें. अगर अल्लाह ने चाहा तो कल आपका कुरता तैयार हो जाएगा.”

“तुम तो मुझे यह बताओ कि इसमें और कितनी देर लगेगी…”, मुल्ला ने मन मसोसकर कहा…

“अगर तुम अल्लाह को इससे अलग रखो”.

शरीफ़ चोर


एक रात मुल्ला नसरुद्दीन का गधा चोरी हो गया. अगले दिन मुल्ला ने गधे के बारे में पड़ोसियों से पूछताछ की.

चोरी की खबर सुनकर पड़ोसियों ने मुल्ला को लताड़ना शुरू कर दिया. एक ने कहा, “तुमने रात को अस्तबल का दरवाज़ा खुला क्यों छोड़ दिया?”

दूसरे ने कहा, “तुमने रात को चौकसी क्यों नहीं बरती. तुम होशियार रहते तो चोर गधा नहीं चुरा पाता!”

तीसरे ने कहा, “तुम घोड़े बेचकर सोते हो, तभी तुम्हें कुछ सुनाई नहीं दिया जब चोर अस्तबल की कुंडी सरकाकर गधा ले गया”.

यह सब सुनकर मुल्ला ने फनफनाते हुए कहा, “ठीक है भाइयों! जैसा कि आप सभी सही फरमाते हैं, सारा कसूर मेरा है और चोर बेचारा तो पूरा पाक-साफ़ है”.

अकलमंदी : Intelligence


नसरुद्दीन अपने घर के बाहर रोटियों के टुकड़े बिखेर रहा था.

उसे यह करता देख एक पड़ोसी ने पूछा – “ये क्या कर रहे हो मुल्ला!?”

“शेरों को दूर रखने का यह बेहतरीन तरीका है” – मुल्ला ने कहा.

“लेकिन इस इलाके में तो एक भी शेर नहीं है!” – पड़ोसी ने हैरत से कहा.

मुल्ला बोला – “तरीका वाकई कारगर है, नहीं क्या?”

(इदरीस शाह की कहानी)

(~_~)

Nasrudin was throwing handfuls of crumbs around his house.

“What are you doing?” someone asked him.

“Keeping the tigers away.”

“But there are no tigers in these parts.”

“That’s right. Effective, isn’t it?”

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