तूफ़ान और झंझावात
पेड़ों और पर्वतों को ध्वस्त करते हैं,
पर आकर वापस लौट जाते हैं.
फिर हमारे कर्मों की क्या बिसात!
प्रचंड तूफ़ान जब धरती से टकराता है तब वायु और वर्षा प्रलय मचाती हैं. वृक्ष जड़ों से उखड़ जाते हैं, नदियां मार्ग बदल लेती हैं, यहाँ तक कि बड़े-बड़े पर्वत भी बिखरने लगते हैं. फिर भी ऐसे प्रकोप एक-दो दिन से अधिक नहीं ठहरते. सर्वनाश की शक्ति लेकर धावा बोलनेवाले तूफानों को भी अपना डेरा-डांडा समेटना पड़ता है.
यदि प्रकृति के कर्म और प्रयत्न दो-चार दिन भी नहीं ठहरते तो मनुष्यों की रचनाओं और उपायों का क्या कहें! सरकारें बमुश्किल चंद साल घिसटती हैं, समाज अपने नियम-कायदे बदलते देखता है, परिवार बिखरते हैं, आत्मीय संबंध कलुषित होते हैं, लोग काम-धंधे से जाते रहते हैं. सहस्राब्दियों से टिके हुए स्मारक प्रदूषण और उपेक्षा सहते हैं. सब नश्वर है. मनुष्य ऐसा कुछ नहीं कर पाते जो चिरंतन रहे.
समस्त मानवीय प्रयत्न अस्थाई हैं. वे अतीत से उधार लिए जाते हैं, वर्तमान की धारा पर सवारी करते हैं, और परिस्थितियों की आज्ञा का पालन करते हुए लुप्त हो जाते हैं. वस्तुओं की क्षणभंगुर प्रकृति का ज्ञान रखते हुए उनसे लय मिलाकर चलना सर्वोत्तम नीति है.
बूँदें…
