Category Archives: Folk Tales

Origin of Death – मृत्यु की उत्पत्ति


दुनिया नई-नई बनी थी और एक बूढ़ा आदमी अपनी बुढ़िया पत्नी के साथ टहल रहा था. बूढ़े ने बुढ़िया से कहा – “चलो, हम यह तय करते हैं कि यह दुनिया कैसे चले.”

“ठीक है” – बुढ़िया ने कहा – “यह कैसे होगा?”

“हम्म…” – बूढ़े ने कहा – “चूंकि यह बात मेरे मन में पहले आई है इसलिए किसी भी मामले में मेरी बात पहले मानी जाएगी”.

“ठीक है” – बुढ़िया बोली – “फिर तुम्हारे बाद मैं जो भी कहूं उसे मान लिया जायेगा.”

बूढ़ा इससे सहमत हो गया.

वे अपने आसपास देखते हुए घूमते-फिरते रहे. बूढ़े ने कहा – “मैं शिकार के तरीके के बारे में सोच रहा हूँ. आदमी शिकार किया करेंगे. जब भी वे किसी जानवर को पकड़ना चाहेंगे तो उसे इशारा करके अपने पास बुला लिया करेंगे. जानवर के पास आ जाने पर उसका शिकार कर लेंगे.”

“मैं यह बात तो मानती हूँ कि आदमी शिकार करेंगे” – बुढ़िया ने कहा – “लेकिन यदि जानवर इस तरह इशारा करने पर ही पास आने लगेंगे तो लोगों का जीवन बहुत आसान हो जायेगा. मैं चाहती हूँ कि मनुष्यों को देखकर जानवर डर के भाग जाएँ. इस तरह उनका शिकार करना मुश्किल हो जायेगा और आदमी हमेशा मजबूत और होशियार बने रहेंगे.”

“जैसा हम तय कर चुके हैं, तुम्हारी बात तो माननी ही पड़ेगी” – बूढ़े ने कहा.

वे घूमते-फिरते रहे.

कुछ समय बाद बूढ़े ने कहा – “मैं लोगों के नाक-नक्श के बारे में सोच रहा हूँ. उनके सर के एक ओर आँखें होंगी और दूसरी ओर मुंह. उनके हर हाथ में दस उँगलियाँ होनी चाहिए.”

“मैं भी यह मानती हूँ कि लोगों के सर में आँखें और मुंह होना चाहिए” – बुढ़िया ने कहा – “लेकिन उनकी आँखें एक ओर ऊपर की तरफ होंगी और उनका मुंह उसी ओर कुछ नीचे होना चाहिए. उनके हांथों में उँगलियाँ होनी चाहिए पर हर हाथ में दस उँगलियाँ होने से कामकाज में अड़चन होगी इसलिए हर हाथ में पांच उँगलियाँ होना ठीक रहेगा.”

“तुम्हारी बात तो माननी ही पड़ेगी” – बूढ़ा बोला.

चलते-चलते वे नदी के पास आ गए. “चलो अब ज़िंदगी और मौत के बारे में भी तय कर लेते हैं” – बूढ़े ने कहा – “इसके लिए मैं इस नदी में भैंस की खाल फेंकूंगा. यदि यह तैरती रहेगी तो लोग मरने के चार दिनों के बाद फिर से जिन्दा हो उठेंगे और फिर हमेशा जीते रहेंगे.”

बूढ़े ने नदी में खाल फेंक दी. एक डुबकी लगाने के बाद खाल नदी की सतह पर आ गयी. बुढ़िया ने कहा – “मैं इस तरीके से सहमत हूँ पर मुझे लगता है कि इस काम के लिए भैंस की खाल का उपयोग ठीक नहीं है. उसके बजाय मैं यह पत्थर नदी में फेंकूँगी. यदि यह तैरता रहेगा तो लोग मरने के चार दिनों के बाद फिर से जिन्दा हो उठेंगे और फिर हमेशा जीते रहेंगे, लेकिन यदि यह डूब जायेगा तो लोग मरने के बाद कभी वापस नहीं आयेंगे.”

बुढ़िया ने पत्थर नदी में फेंक दिया और वह एकदम से डूब गया.

“तो ऐसा ही होगा” – बुढ़िया ने कहा – “यदि लोग हमेशा जीवित रहेंगे तो दुनिया में बहुत भीड़ हो जाएगी और खाने की कमी भी पड़ जाएगी. जब लोग मरने के बाद कभी भी वापस नहीं आयेंगे तो लोगों को उनकी कमी खलेगी और दुनिया में सहानुभूति का अभाव नहीं होगा.”

बूढ़े ने कुछ नहीं कहा.

कुछ समय बीत गया. बुढ़िया ने एक बच्चे को जन्म दिया. बूढ़ा और बुढ़िया अपने बच्चे पर जान छिड़कते थे. वे बहुत खुश थे. फिर एक दिन बच्चा बहुत बीमार पड़ गया और उसकी मौत हो गयी.

बुढ़िया अपने पति के पास गयी और उससे बोली – “चलो हम ज़िंदगी और मौत के बारे में फिर से तय कर लेते हैं.”

बूढ़े ने बहुत नाउम्मीदी से कहा – “अब कुछ नहीं हो सकता. हम सबसे पहले यह तय कर चुके हैं कि बाद में तुम्हारी बात ही मानी जाएगी.”

* * * * * * * * * *

When the world was new, Old Man and Old Woman were walking around. “Let us decide how things will be,” Old Man said.

“That is good,” said Old Woman. “How shall we do it?”

“Well,” Old Man said, “since it was my idea I think I should have the first say in everything.”

“That is good,” said Old Woman, “just as long as I have the last say.”

So they walked around and looked at things. Then Old Man spoke. “I have been thinking about hunting,” he said. “The men will be the hunters. Anytime they want to shoot an animal, they will call it and it will come to them.”

“I agree men should be the hunters,” Old Woman said. “But if the animals come when they are called, life will be too easy for the people. The animals should run away when they see thepeople. Then it will be hard for the men to kill them. That way people will be smarter and stronger.”

“You have the last say,” Old Man agreed. Then they walked around some more.

After a while, Old Man spoke again. “I have been thinking about what people will look like,” he said. “They will have eyes on one side of their face and their mouth on the other. Their mouths will go straight up and down. They will have ten fingers on each hand.”

“I agree that people should have their eyes and their mouth on their face,” Old Woman said. “But their eyes will be at the top of their face and their mouth at the bottom and they will be set across. I agree they should have fingers on their hands, but ten on each hand will make them clumsy. They will have five fingers on each hand.”

“You have the last say,” Old Man agreed.

Now they were walking by the river. “Let us decide about life and death,” Old Man said. “I will do it this way. I will throw this buffalo chip into the river. If it floats, when people die they will come back to life after four days and then live forever.”

Old Man threw the buffalo chip into the water. It bobbed up and floated. “I agree we should decide it this way,” Old Woman said. “But I do not think it should be done with a buffalo chip. I will throw this stone into the water instead. If it floats, the people will die for four days and then come back to life and live forever. If it sinks, the people will not come back to life after they die.”

Old Woman threw the stone into the water. It sank immediately.

“That is the way it should be,” Old Woman said. “If people lived forever, the Earth would be too crowded. There would not be enough food. This way people will feel sorry for each other. There will be sympathy in the world.”

Old Man said nothing.

Some time passed. Old Woman had a child. She and Old Man loved the child very much and they were happy. One day, though, the child became sick and died. Then Old Woman went to Old Man.

“Let us have our say again about death,” she said.

But Old Man shook his head. “No,” he said, “you had the last say.”

(Ancient Spiritual Story retold by Joseph Bruchac)

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चोर बादशाह


गज़नी के बादशाह का नियम था कि वह रात को भेष बदलकर गज़नी की गलियों में घूमा करता था. एक रात उसे कुछ आदमी छुपते-छुपाते चलते दिखाई दिये. वह भी उनकी तरफ बढ़ा. चोरों ने उसे देखा तो वे ठहर गये और उससे पूछने लगे – “भाई, तुम कौन हो और रात के समय किसलिए घूम रहे हो?” बादशाह ने कहा – “मैं भी तुम्हारा भाई हूं और रोज़ी की तलाश में निकला हूं.” यह सुनकर चोर बड़े खुश हुए और कहने लगे – “यह बहुत अच्छा हुआ जो तुम हमसे आ मिले. जितने ज्यादा हों, उतनी ही ज्यादा कामयाबी मिलती है. चलो, किसी बड़े आसामी के घर चोरी करें”. जब वे लोग चलने लगे तो उनमें से एक ने कहा, “पहले यह तय कर लेना चाहिए कि कौन आदमी किस काम को अच्छी तरह कर सकता है, जिससे हम एक-दूसरे के हुनर को जान जाएं और जो ज्यादा हुनरमंद हो उसे नेता बनायें”.

यह सुनकर हर एक ने अपनी-अपनी खूबियां बतलायीं. एक बोला – “मैं कुत्तों की बोली पहचानता हूं. वे जो कुछ कहें, उसे मैं अच्छी तरह समझ लेता हूं. हमारे काम में कुत्तों से बड़ी अड़चन पड़ती है. हम यदि उनकी बोली जान लें तो हमारा ख़तरा कम हो सकता है और मैं इस काम को बड़ी अच्छी तरह कर सकता हूं”.

दूसरा कहने लगा – “मेरी आंखों में ऐसी ताकत है कि जिसे अंधेरे में देख लूं, उसे फिर कभी नहीं भूल सकता. और दिन के देखे को अंधेरी रात में पहचान सकता हूं. बहुत से लोग हमें पहचानकर पकड़वा देते हैं. मैं ऐसे लोगों को तुरन्त भांप लेता हूं और अपने साथियों को सावधान कर देता हूं. इस तरह हमारी हिफ़ाज़त हो जाती है”.

तीसरा बोला – “मुझमें ऐसी ताकत है कि मज़बूत दीवार में सेंध लगा सकता हूं और यह काम मैं ऐसी फुर्ती और सफाई से करता हूं कि सोनेवालों की आंखें नहीं खुलतीं और घण्टों का काम पलों में हो जाता है”.

चौथा बोला – “मेरी सूंघने की ताकत इतनी खास है कि ज़मीन में गड़े हुए धन को वहां की मिट्टी सूंघकर ही बता सकता हूं. मैंने इस काम में इतनी कामयाबी पाई है कि मेरे दुश्मन भी मेरी बड़ाई करते हैं. लोग अमूमन धन को धरती में ही गाड़कर रखते हैं. इस वक्त यह हुनर बड़ा काम देता है. मैं इस इल्म का पूरा जानकार हूं. मेरे लिए यह काम बड़ा आसान है”.

पांचवे ने कहा – “मेरे हाथों में ऐसी ताकत है कि ऊंचे-ऊंचे महलों पर बिना सीढ़ी के चढ़ सकता हूं और ऊपर पहुंचकर अपने साथियों को भी चढ़ा सकता हूं. तुममें तो कोई ऐसा नहीं होगा, जो यह काम कर सके।”

इस तरह जब सब लोग अपने-अपने हुनर बता चुके तो नये चोर से बोले – “तुम भी अपना कमाल बताओ, जिससे हमें अन्दाज हो कि तुम हमारे काम में कितने मददगार हो सकते हो”. बादशाह ने जब यह सुना तो खुश हो कर कहने लगा – “मुझमें ऐसा इल्म है, जो तुममें से किसी में भी नहीं है. और वह इल्म यह है कि मैं गुनाहों को माफ़ कर सकता हूं. अगर हम लोग चोरी करते पकड़े जायें तो अवश्य सजा पायेंगे लेकिन मेरी दाढ़ी में यह खूबी है कि उसके हिलते ही सारे गुनाह माफ़ हो जाते हैं. तुम चोरी करके भी साफ बच सकते हो. देखो, कितनी बड़ी ताकत है मेरी दाढ़ी में.”

बादशाह की यह बात सुनकर सबने एक सुर में कहा – “भाई तू ही हमारा नेता है. हम सब तेरी ही इशारों पर काम करेंगे ताकि अगर कहीं पकड़े जायें तो बख्शे जा सकें. ये हमारी खुशकिस्मती है कि तुझ-जैसा हुनरमंद साथी हमें मिला”.

इस तरह मशवरा करके ये लोग वहां से चले. जब बादशाह के महल के पास पहुंचे तो कुत्ता भूंका. चोर ने कुत्ते की बोली पहचानकर साथियों से कहा कि यह कह रहा है कि बादशाह पास ही हैं इसलिए होशियार होकर चलना चाहिए. मगर उसकी बात किसीने नहीं मानी. जब नेता आगे बढ़ता चला गया तो दूसरों ने भी उसके संकेत की कोई परवाह नहीं की. बादशाह के महल के नीचे पहुंचकर सब रुक गये और वहीं चोरी करने का इरादा किया. दूसरा चोर उछलकर महल पर चढ़ गया और फिर उसने बाकी चोरों को भी खींच लिया. महल के भीतर घुसकर सेंध लगायी गई और खूब लूट हुई. जिसके जो हाथ लगा, समेटता गया. जब लूट चुके तो चलने की तैयारी हुई. जल्दी-जल्दी नीचे उतरे और अपना-अपना रास्ता लिया. बादशाह ने सबका नाम-धाम पूछ लिया था. चोर माल-असबाब लेकर चंपत हो गये.

बादशाह ने अपने मंत्री को आज्ञा दी कि तुम अमुक स्थान में तुरन्त सिपाही भेजो और फलां-फलां लोगों को गिरफ्तार करके मेरे सामने हाजिर करो. मंत्री ने फौरन सिपाही भेज दिये. चोर पकड़े गये और बादशाह के सामने पेश किये गए. जब इन लोगों ने बादशाह को देखा तो एक-दूसरे से कहा – “बड़ा गजब हो गया! रात चोरी में बादशाह हमारे साथ था.” और यह वही नया चोर था, जिसने कहा था कि “मेरी दाढ़ी में वह शक्ति है कि उसके हिलते ही अपराध क्षमा हो जाते हैं।”

सब लोग साहस करके आगे बढ़े और बादशाह के सामने सज़दा किया. बादशाह ने उनसे पूछा – “तुमने चोरी की है?”

सबने एक साथ जवाब दिया – “हां, हूजर. यह अपराध हमसे ही हुआ है।”

बादशाह ने पूछा – “तुम लोग कितने थे?”

चोरों ने कहा – “हम कुल छ: थे।”

बादशाह ने पूछा – “छठा कहां है?”

चोरों ने कहा – “अन्नदाता, गुस्ताखी माफ हो। छठे आप ही थे।”

चोरों की यह बात सुनकर सब दरबारी अचंभे में रह गये. इतने में बादशाह ने चोरों से फिर पूछा – “अच्छा, अब तुम क्या चाहते हो?”

चोरों ने कहा – “अन्नदाता, हममें से हर एक ने अपना-अपना काम कर दिखाया. अब छठे की बारी है. अब आप अपना हुनर दिखायें, जिससे हम अपराधियों की जान बचे।”

यह सुनकर बादशाह मुस्कराया और बोला – “अच्छा! तुमको माफ किया जाता है. आगे से ऐसा काम मत करना”.

जलालुद्दीन रूमी की किताब मसनवी से ली गई कहानी. स्रोत.

(A story from ‘Masanavi’ by Jalaluddin Rumi – in Hindi)

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अच्छा और बुरा गुलाम


एक बादशाह ने दो गुलाम सस्ते दाम में खरीदे. उसने पहले से बातचीत की तो वह गुलाम बड़ा बुद्धिमान और मीठा बोलने वाला मालूम हुआ. जब होंठ ही मिठास के बने हुए हों तो उनमें से शरबत के सिवाय और क्या निकलेगा? मनुष्य की मनुष्यता उसकी वाणी में भरी हुई ही तो है. बादशाह जब इस गुलाम की परीक्षा कर चुका तो उसने दूसरे को पास बुलाकर देखा तो पाया कि यह बहुत बदसूरत और गंदा है. बादशाह इसके चेहरे को देखकर खुश नहीं हुआ परन्तु उसकी योग्यता और गुणों की जांच करने लगा. पहले गुलाम को उसने नहा-धोकर आने के लिए कह दिया और दूसरे से कहा – “तुम अपने बारे में कुछ बताओ. तुम अकेले ही सौ गुलामों के बराबर हो. तुम्हें देखकर उन बातों पर यकीन नहीं होता जो तुम्हारे साथी ने तुम्हारे पीठपीछे कही हैं.”

गंदे गुलाम ने जवाब दिया – “उसने यदि मेरे बारे में कुछ कहा है तो सच ही कहा होगा. यह बड़ा सच्चा आदमी है. इससे ज्यादा भला आदमी मैंने और कोई नहीं देखा. यह हमेशा सच बोलता है. यह स्वभाव से ही सत्यवादी है इसलिए इसने जो मेरे संबंध में कहा है यदि वैसा ही मैं इसके बारे में कहूं तो झूठा दोष लगाना होगा. मैं इस भले आदमी की बुराई नहीं करुंगा. इससे तो यही अच्छा है कि मैं खुद को दोषी मान लूं. बादशाह सलामत, हो सकता है कि वह मुझमें जो ऐब देखता हैं वह मुझे खुद न दीखते हों।”

बादशाह ने कहा – “मैं तो चाहता हूं कि तुम भी इसकी कमियों का वैसा ही बखान करो जैसा इसने तुम्हारी कमियों का किया है जिससे मुझे इस बात का यकीन हो जाये कि तुम मेरी खुशी और सलामती चाहते हो और मुल्क को चलाने में मेरे काम आ सकते हो.”

गुलाम बोला – “बादशाह सलामत, इस गुलाम में सादगी और सच्चाई है. बहादुरी और बड़प्पन भी ऐसा है कि मौका पड़ने पर जान तक न्यौछावर कर सकता है। वह घमंडी नहीं है और अपनी गलतियों को खुद ही ज़ाहिर कर देता है. अपनी गलतियों को सामने लाना और ऐब ढूंढना हालांकि बुरा है तो भी वह दूसरे लोगों के लिए तो अच्छा ही है.”

बादशाह ने कहा – “अपने साथी की तारीफ़ में अति न करो और दूसरे की तारीफ़ करके खुद को तारीफ़ के काबिल नहीं बनाओ क्योंकि यदि मैंने तुम्हारा इम्तिहान लेने के लिए इसे बुला लिया तो तुम्हें शर्मिंदा होना पड़ेगा.”

गुलाम ने कहा – “नहीं, मेरे साथी की अच्छाइयां इससे भी सौ गुना हैं. जो कुछ मैं अपने दोस्त के बारे के संबंध में जानता हूं यदि आपको उसपर यकीन नहीं तो मैं और क्या अरज करूं!”

इस तरह बहुत सी बातें करके बादशाह ने उस बदसूरत गुलाम की अच्छी तरह परीक्षा कर ली और जब पहला गुलाम स्नान करके बाहर आया तो उसको अपने पास बुलाया. बदसूरत गुलाम को वहां से विदा कर दिया. उस सुंदर गुलाम के रूप और गुणों की प्रशंसा करके कहा – “पता नहीं, तुम्हारे साथी को क्या हो गया था कि इसने पीठ-पीछे तेरी खूब बुराई की!”

सुंदर गुलाम ने चिढ़कर कहा – “बादशाह सलामत, इस नामुराद ने मेरे बारे में जो कुछ कहा उसे ज़रा तफ़सील से मुझे बताइये.”

बादशाह ने कहा – “सबसे पहले इसने तुम्हारे दोगलेपन का जिक्र किया कि तुम सामने तो दवा हो लेकिन पीठ-पीछे दर्द हो.”

जब इसने बादशाह के मुंह से ये शब्द सुने तो इसका पारा चढ़ गया, चेहरा तमतमाने लगा और अपने साथी बारे में उसके मुंह में जो आया वह बकने लगा. वह बदसूरत गुलाम की बुराइयां करता ही चला गया तो बादशाह ने इसके होंठों पर हाथ रख दिया और कहा – “बस करो, हद हो गयी. उसका तो सिर्फ बदन ही गंदा है लेकिन तुम्हारी तो रूह भी गंदी है. तुम्हारे लिए तो यही मुनासिब है कि तुम उसकी गुलामी करो.”

[याद रखो, सुन्दर और लुभावना रूप होते हुए भी यदि मनुष्य में अवगुण हैं तो उसका मान नहीं हो सकता। और यदि रूप बुरा पर चरित्र अच्छा है तो उस मनुष्य के चरणों में बैठकर प्राण विसर्जन कर देना भी श्रेष्ठ है।]

जलालुद्दीन रूमी की किताब ‘मसनवी’ से लिया गया अंश. अन्य कथाएं यहां पढ़ें.

(A story from ‘Masnavi’ of Jalaluddin Rumi – in Hindi)

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इतना महंगा नाश्ता?


muslim cookयह मध्य-पूर्व की लोक कथा है.

एक बहुत बड़े मुल्क का सुलतान कहीं दूर की यात्रा पर एक गाँव से गुज़रा. रास्ते में वह एक बहुत मामूली चायघर में नाश्ता करने के लिए रुक गया. उसने खाने में आमलेट की फरमाइश की. चायघर के मालिक ने बहुत सलीके से उसे चायघर के मामूली बर्तनों में आमलेट परोसा. मालिक ने टूटे-फूटे टेबल कुर्सी और मैले बिछावन के लिए सुलतान से माफ़ी मांगी और कहा – “मुझे बेहद अफ़सोस है हुज़ूर-ए-आला कि यह मामूली चायघर आपकी इससे बेहतर खातिरदारी नहीं कर सकता”.

“कोई बात नहीं” – सुलतान ने उसे दिलासा दिया और पूछा – “आमलेट के कितने पैसे हुए?”

“आपके लिए सुलतान इसकी कीमत है सिर्फ सोने की हज़ार अशर्फियाँ” – चायघर के मालिक ने कहा.

“क्या!?” – सुलतान ने हैरत से कहा – “क्या यहाँ अंडे इतने मंहगे मिलते हैं? या फिर यहाँ अंडे मिलते ही नहीं हैं क्या?”

“नहीं हुज़ूर-ए-आला, अंडे तो यहाँ खूब मिलते हैं” – मालिक ने कहा – “लेकिन आप जैसे सुलतान कभी नहीं मिलते”.

चित्र साभार – फ्लिकर

(A folktale of Middle East – in Hindi)

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भिखारी का ईनाम : यहूदी लोक कथा


goldएक भिखारी को बाज़ार में चमड़े का एक बटुआ पड़ा मिला. उसने बटुए को खोलकर देखा. बटुए में सोने की सौ अशर्फियाँ थीं. तभी भिखारी ने एक सौदागर को चिल्लाते हुए सुना – “मेरा चमड़े का बटुआ खो गया है! जो कोई उसे खोजकर मुझे सौंप देगा, मैं उसे ईनाम दूंगा!”

भिखारी बहुत ईमानदार आदमी था. उसने बटुआ सौदागर को सौंपकर कहा – “ये रहा आपका बटुआ. क्या आप ईनाम देंगे?”

“ईनाम!” – सौदागर ने अपने सिक्के गिनते हुए हिकारत से कहा – “इस बटुए में तो दो सौ अशर्फियाँ थीं! तुमने आधी रकम चुरा ली और अब ईनाम मांगते हो! दफा हो जाओ वर्ना मैं सिपाहियों को बुला लूँगा!”

इतनी ईमानदारी दिखाने के बाद भी व्यर्थ का दोषारोपण भिखारी से सहन नहीं हुआ. वह बोला – “मैंने कुछ नहीं चुराया है! मैं अदालत जाने के लिए तैयार हूँ!”

अदालत में काजी ने इत्मीनान से दोनों की बात सुनी और कहा – “मुझे तुम दोनों पर यकीन है. मैं इंसाफ करूँगा. सौदागर, तुम कहते हो कि तुम्हारे बटुए में दो सौ अशर्फियाँ थीं. लेकिन भिखारी को मिले बटुए में सिर्फ सौ अशर्फियाँ ही हैं. इसका मतलब यह है कि यह बटुआ तुम्हारा नहीं है. चूंकि भिखारी को मिले बटुए का कोई दावेदार नहीं है इसलिए मैं आधी रकम शहर के खजाने में जमा करने और बाकी भिखारी को ईनाम में देने का हुक्म देता हूँ”.

बेईमान सौदागर हाथ मलता रह गया. अब वह चाहकर भी अपने बटुए को अपना नहीं कह सकता था क्योंकि ऐसा करने पर उसे कड़ी सजा हो जाती. इंसाफ-पसंद काजी की वज़ह से भिखारी को अपनी ईमानदारी का अच्छा ईनाम मिल गया.

चित्र साभार – फ्लिकर

(A Jewish folk tale in Hindi)

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