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Yajnadatta, the Mad Man – यज्ञदत्त का सर


बौद्ध सुरंगम सूत्र में श्रावस्ती के एक विक्षिप्त व्यक्ति यज्ञदत्त की कथा है. कथा में कहा गया है कि एक दिन यज्ञदत्त ने दर्पण में स्वयं की छवि देखकर यह सोचा कि दर्पण में दिख रहे व्यक्ति का सर है. यह विचार मन में आते ही यज्ञदत्त की रही-सही बुद्धि भी पलट गयी और वह सोचने लगा, “ऐसा कैसे हो सकता है कि इस व्यक्ति का सर तो है पर मेरा सर नहीं है. मेरा सर कहाँ चला गया?”

यज्ञदत्त घर के बाहर भागा और सड़क पर सभी से पूछने लगा, “क्या तुमने मेरा सर देखा है? मेरा सर कहाँ चला गया है?”

उसने सभी से ये बात पूछी और कोई भी उसे कुछ समझा नहीं सका. सभी ने उससे यही कहा, “तुम्हारे सर है तो? तुम किस सर की बात कर रहे हो?”.

लेकिन यज्ञदत्त कुछ समझ न पाया.

यज्ञदत्त के जैसी ही स्थिति में करोड़ों मनुष्य अपने अस्तित्व से अनजान हैं.

The Shurangama Sutra relates the story of Yajnadatta, the mad man of Shravasti, who one day looked in the mirror and noticed that the person reflected in it had a head.

At that point, he lost his reason and said, ‘How come that person has a head and I don’t? Where has my head gone?’ He then ran wildly through the streets asking everyone he met, ‘Have you seen my head? Where has it gone?’ He accosted everyone he met, yet no one knew what he was doing. ‘He already has a head,’ they said. ‘What’s he looking for another one for?’

There are a lot of people just like poor Yajnadatta.”

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मृत्यु से माया तक


एक युवा दंपत्ति अपने दो वर्षीय पुत्र के साथ रेगिस्तान में भटक गए और उनका भोजन समाप्त हो गया. उनका शिशु काल कवलित हो गया. अपना जीवन बचाने की चेष्टा में पति-पत्नी ने अपने मृत शिशु का मांस खाना ही ठीक समझा. उन्होंने यह हिसाब लगाया कि वे उसके छोटे-छोटे अंश खायेंगे और बचे हुए हिस्से को कंधे पर टांगकर सुखा लेंगे ताकि आगे की यात्रा में वह उनके काम आये. लेकिन मांस का हर टुकड़ा खाते समय उनके ह्रदय में अपार वेदना उपजती और वे घोर विलाप करते.

यह कथा सुनाने के बाद बुद्ध ने अपने शिष्यों से पूछा, “क्या उस दंपत्ति को अपने ही शिशु का भक्षण करने में सुख प्राप्त हुआ होगा?”

शिष्य ने कहा, “नहीं तथागत, यह संभव ही नहीं है कि उन्हें अपने ही शिशु के मांस के सेवन से कोई सुख मिला हो.”

बुद्ध बोले, “हाँ. फिर भी ऐसे असंख्य जन हैं जो अपने माता-पिता और संतति का भक्षण कर रहे हैं पर उन्हें इसका कोई बोध नहीं है”.

यह कथा भिक्षु तिक न्यात हन्ह ने एक प्रवचन में कही है.

ऐसी ही अप्रिय भावजनक कथा ‘संसार की विडम्बना’ मित्र राहुल सिंह ने कुछ दिन पहले पोस्ट की थी. यदि आपने वह पढ़ ली है तो आप आगे लिखी बात बेहतर समझ पायेंगे.

उपरोक्त बौद्ध कथाओं में तीन बातें उभरती हैं:

पहली यह कि आप किसी भी धार्मिक या दार्शनिक विचारधारा को मानें, यह प्रतीत होता है कि दुनिया में हर चीज़ किसी दूसरी चीज़ से किन्हीं रूप में सम्बद्ध है. जो कभी कुत्ता था वह आज भाई है, और जो आज पिता है वह आगे जाकर कुत्ते के रूप में उत्पन्न हो सकता है. पुनर्जन्म को दृढतापूर्वक माननेवाले पाठक इस स्थापना पर आपत्ति नहीं रखेंगे. जो पाठक पुनर्जन्म की संकल्पना से सहमत नहीं हैं, क्या वे इस सम्बद्धता को किसी अन्य स्तर पर निदर्शित कर सकते हैं? क्या इसे क्वांटम लेवल पर समझा जा सकता है जिसके अनुसार सृष्टि में उपस्थित हर कण पर अनंत बल कार्यशील हैं तथा उसके अनंत प्रयोजन हैं जो उसके भविष्य को निर्धारित करते हैं.

दूसरी बात यह कि पृथ्वी पर मौजूद सारा पदार्थ, जिसमें जीव और निर्जीव सभी वस्तुएं शामिल हैं, वे सभी सौ से भी अधिक ज्ञात रासायनिक तत्वों से मिलकर बने हैं. हाइड्रोजन, कार्बन, ऑक्सीजन, अन्य गैसें, धातुएं, व अधातु तत्व आदि. ये सभी तत्व अरबों वर्षों से रिसायकल होते रहे हैं. जो जल आप पी रहे हैं वह अरबों वर्ष पुराना है. जो फल आप पेड़ से तोड़कर खा रहे हैं वह ताज़ा है पर उन तत्वों से बना है जिनकी उत्पत्ति बिग बैंग के बाद तेरह अरब वर्ष पूर्व हुई थी. समस्त जीवित प्राणी मृत्यु के बाद मिट्टी में या वायुमंडल में मिल जाते हैं. या तो उन्हें कृमि खा लेते हैं या वे वृक्षों द्वारा अवशोषित कर लिए जाते हैं. कृमि मेढकों का शिकार बनते हैं, मेढकों को सरीसृप उदरस्थ कर लेते हैं, इसी तरह चक्र चलता रहता है. मिट्टी में उगनेवाले पौधे मृत प्राणियों और जंतुओं से पोषक तत्व खींचकर हमारे लिए खाद्य सामग्री बनाते हैं. इसकी पूर्ण संभावना है कि जो कुछ भी हम खा रहे हैं वह कभी-न-कभी किसी जीवित प्राणी (पशु या पौधे) का ही अंश था. पाठक इसे मांसाहार के लिए उचित तर्क के रूप में नहीं लें.

तीसरी बात यह कि ब्रह्माण्ड की समस्त वस्तुएं पहली और दूसरी बात से भी अधिक अमूर्त स्तर पर एक दूसरे से सम्बद्ध हैं. इसे माया की परिकल्पना से समझा जा सकता है, जिसके अनुसार यह विश्व केवल एक भ्रम है. माया के परदे के हटते ही ‘पुत्र’ और ‘मांस’ जैसे टैग बेमानी हो जाते हैं क्योंकि माया के रहते हम एक पदार्थ को दूसरे पदार्थ से पृथक नहीं देख पाते यहाँ तक कि किसी स्तर पर उनकी एकरूपता के बारे में सोचते भी नहीं हैं.

सुधी ब्लौगर श्री हंसराज सुज्ञ इस कथा को पब्लिश होने से पहले पढ़ चुके हैं. उनके अनुसार यह कथा का उद्देश्य हमारे भीतर जगुप्सा उत्पन्न करना है. यह मोह के प्रति जगुप्सा दर्शाती है क्योंकि सभी संबंध अनित्य है.  पुद्गल या पदार्थ या कण ही शाश्वत हैं. वे नष्ट नहीं होते, केवल अपना रूप बदलते रहते हैं. जिस प्रकार उर्जा के बारे में कहा जाता है कि यह कभी नष्ट नहीं होती, मात्र अपना स्वरूप बदलती है. हमारे शरीर के कण कभी किसी पेड़ या पक्षी के शरीर के अंश भी हो सकते है. उपयोगिता यह है कि बोध कथा अपने सटीक सार चिंतन पर पहुँचा भर दे. उपरोक्त बौद्ध कथा में तीन  जो बातें उभरती हैं, जिसका आपने उल्लेख किया है, वे सत्य हैं. मोह, माया, राग वश हम स्वीकार करें या नहीं पर यह सत्य है कि:

1 – रिश्ते नाते अनित्य हैं.

2 – पुद्गल (कण) शाश्वत हैं और पर्याय बदलते हैं.

3 – जगत नश्वर है, आत्मतत्व अमर है. प्रिय-अप्रिय सभी मानसिक सोच का विषय मात्र है.

“यह सत्य है कि सभी प्रकार के आहार पुद्गल, किसी न किसी  जीव के ग्रहण किए या छोड़े हुए ही तो हैं.  इस सत्य को जानते हुए भी मनीषि मांसाहार को भयंकरतम अपराध बताते हैं. वैसे भी मांसाहार दूषण के वास्तविक कारकों से अनभिज्ञ अज्ञानी इसे तर्क बनाकर प्रस्तुत करते ही है, इसमें कोई नई बात नहीं है. किन्तु  क्रूरताजन्य और अशान्ति कारकों से, पंचेन्द्रीय प्राणी के प्राण वियोग की भयंकर पीड़ा से मांसाहार दूषण है. और मृत का आहार अंततः हिंसा को प्रोत्साहित करता है इसीलिए निषेध उचित है. गहनता से चिंतन करेंगे तो यह साफ हो जाएगा कि जगत में सारी अशान्ति का कारण मांसाहार ही है.” ~ श्री हंसराज सुज्ञ.

इस पोस्ट पर पाठकों के विचार आमंत्रित हैं. इस कथा को पोस्ट करने से पहले मैंने मित्र राहुल सिंह से विमर्श किया था जिनके सुझाव को मानकर कथा की व्याख्या में कुछ संशोधन किये गए. पाठकों की प्रतिक्रिया का अनुमान इस प्रकार से लगाया जा रहा है:

पहला पाठक : यह कथा केवल मत विशेष के दृष्टिकोण को ही प्रचारित/व्याख्यायित कर रही है.

दूसरा पाठक: सही कहा. मैं पूर्णतः/आंशिक सहमत हूँ.

तीसरा पाठक: औचित्यहीन अविवेकी कथा, जो केवल रुग्ण/अन्धविश्वासी मष्तिष्क का प्रपंच/प्रलाप है.

चौथा पाठक: बकवास! सुबह-सुबह क्या पढ़वाते हो! I unsubscribe!

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गांठ : The Knots


एक दिन बुद्ध प्रातः भिक्षुओं की सभा में पधारे. सभा में प्रतीक्षारत उनके शिष्य यह देख चकित हुए कि बुद्ध पहली बार अपने हाथ में कुछ लेकर आये थे. उनके हाथ में एक रूमाल था. बुद्ध के हाथ में रूमाल देखकर सभी समझ गए कि इसका कुछ विशेष प्रयोजन होगा.

बुद्ध अपने आसन पर विराजे. उन्होंने किसी से कुछ न कहा और रूमाल में कुछ दूरी पर पांच गांठें लगा दीं.

सब उपस्थित यह देख मन में सोच रहे थे कि अब बुद्ध क्या करेंगे, क्या कहेंगे. बुद्ध ने उनसे पूछा, “कोई मुझे यह बता सकता है कि क्या यह वही रूमाल है जो गांठें लगने के पहले था?”

शारिपुत्र ने कहा, “इसका उत्तर देना कुछ कठिन है. एक तरह से देखें तो रूमाल वही है क्योंकि इसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है. दूसरी दृष्टि से देखें तो पहले इसमें पांच गांठें नहीं लगीं थीं अतः यह रूमाल पहले जैसा नहीं रहा. और जहाँ तक इसकी मूल प्रकृति का प्रश्न है, वह अपरिवर्तित है. इस रूमाल का केवल बाह्य रूप ही बदला है, इसका पदार्थ और इसकी मात्रा वही है.”

“तुम सही कहते हो, शारिपुत्र”, बुद्ध ने कहा, “अब मैं इन गांठों को खोल देता हूँ”, यह कहकर बुद्ध रूमाल के दोनों सिरों को एक दूसरे से दूर खींचने लगे. “तुम्हें क्या लगता है, शारिपुत्र, इस प्रकार खींचने पर क्या मैं इन गांठों को खोल पाऊंगा?”

“नहीं, तथागत. इस प्रकार तो आप इन गांठों को और अधिक सघन और सूक्ष्म बना देंगे और ये कभी नहीं खुलेंगीं”, शारिपुत्र ने कहा.

“ठीक है”, बुद्ध बोले, “अब तुम मेरे अंतिम प्रश्न का उत्तर दो कि इन गांठों को खोलने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?”

शारिपुत्र ने कहा, “तथागत, इसके लिए मुझे सर्वप्रथम निकटता से यह देखना होगा कि ये गांठें कैसे लगाई गयीं हैं. इसका ज्ञान किये बिना मैं इन्हें खोलने का उपाय नहीं बता सकता”.

“तुम सत्य कहते हो, शारिपुत्र. तुम धन्य हो, क्योंकि यही जानना सबसे आवश्यक है. आधारभूत प्रश्न यही है. जिस समस्या में तुम पड़े हो उससे बाहर निकलने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि तुम उससे ग्रस्त क्योंकर हुए. यदि तुम यह बुनियादी व मौलिक परीक्षण नहीं करोगे तो संकट अधिक ही गहराएगा”.

“लेकिन विश्व में सभी ऐसा ही कर रहे हैं. वे पूछते हैं, “हम काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, परिग्रह, आदि-आदि वृत्तियों से बाहर कैसे निकलें”, लेकिन वे यह नहीं पूछते कि “हम इन वृत्तियों में कैसे पड़े?”

* * * * * * * * * *

One day Buddha came into his assembly of the monks. It must have been just a morning like this. His sannyasins were sitting and waiting for him. They were puzzled because this was for the first time that Buddha had come with something in his hand – a handkerchief. They all looked at the handkerchief What was the matter? There must be something special in it. And Buddha sat on the platform and rather than starting speaking to the assembly he looked at the handkerchief, started tying a few knots in it, five knots in all.

The whole assembly watched – what is going on? And then he asked the assembly, ”Can anybody tell me: is this handkerchief the same as it was before the knots were tied?”

Sariputta said, ”This is a tricky question. In a way the handkerchief is the same because nothing has changed, in a way it is not the same because these five knots have appeared which were not there before. But as far as the inner nature of the handkerchief is concerned – its nature is concerned – it is the same; but as far as its form is concerned it is no more the same. The form has changed: the substance is the same.”

Buddha said, ”Right. Now I want to open these knots.” And he started stretching both ends of the handkerchief farther away from each other. He asked Sariputta. ”What do you think? By stretching farther will I be able to open the knots?”

He said, ”You will be making knots even more difficult to open because they will become smaller, more tighter. ’

Buddha said, ”Right. Then I want to ask the last question: what should I do so that I can open the knots, the tied knots? How I can untie them again?”

Sariputta said, ”Bhagwan, I would like first to come close and see how in the first place the knots have been tied. Unless I know how they have been tied it is difficult for me to suggest any solution.”

Buddha said, ”Right, Sariputta. You are blessed, because that is the most fundamental question to ask. If you are in a certain fix, the first thing is how you got into it rather than trying to get out of it. Without asking the most fundamental and the primary question, you will make things worse.”

And that’s what people are doing. They ask, ”How we can get out of our sexuality, greed, anger, attachment, jealousy, possessiveness, this and that?” without asking, ”How in the first place we get into them?”

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84th Problem – 84वीं समस्या


किसी व्यक्ति ने जब बुद्ध की ख्याति सुनी तो वह उनके दर्शन और अपनी समस्याओं के समाधान के लिए उनके पास गया. जैसा हम सबके जीवन में प्रायः होता है, वह किसान भी अनेक कठिनाइयों का सामना कर रहा था. उसे लगा कि बुद्ध उसे कठिनाइयों से निकलने का उपाय बता देंगे. उसने बुद्ध से कहा:

“मैं किसान हूँ. मुझे खेती करना अच्छा लगता है. लेकिन कभी वर्षा पर्याप्त नहीं होती और मेरी फसल बर्बाद हो जाती है. पिछले साल हमारे पास खाने को कुछ भी नहीं था. और फिर कभी ऐसा भी होता है कि बहुत अधिक वर्षा हो जाती है और हमारी फसल को नुकसान पहुँचता है.”

बुद्ध शांतिपूर्वक उसकी बात सुनते रहे.

“मैं विवाहित हूँ”, किसान ने कहा, “मेरी पत्नी मेरा ध्यान रखती है… मैं उससे प्रेम करता हूँ. लेकिन कभी-कभी वह मुझे बहुत परेशान कर देती है. कभी मुझे लगने लगता है कि मैं उससे उकता गया हूँ”.

बुद्ध शांतिपूर्वक उसकी बात सुनते रहे.

“मेरे बच्चे भी हैं”, किसान बोला, “वे भले हैं… पर कभी-कभी वे मेरी अवज्ञा कर बैठते हैं. और कभी तो…”

किसान ऐसी ही बातें बुद्ध से कहता गया. वाकई उसके जीवन में बहुत सारी समस्याएँ थीं. अपना मन हल्का कर लेने के बाद वह चुप हो गया और प्रतीक्षा करने लगा कि बुद्ध उसे कुछ उपाय बताएँगे.

उसकी आशा के विपरीत, बुद्ध ने कहा, “मैं तुम्हारी कोई सहायता नहीं कर सकता.”

“ये आप क्या कह रहे हैं?”, किसान ने हतप्रभ होकर कहा.

“सभी के जीवन में कठिनाइयाँ हैं”, बुद्ध ने कहा, “वास्तविकता यह है कि हम सबके जीवन में 83 कठिनाइयाँ हैं, मेरा, तुम्हारा, और यहाँ उपस्थित हर व्यक्ति का जीवन समस्याओं से ग्रस्त है. तुम इन 83 समस्याओं का कोई समाधान नहीं कर सकते. यदि तुम कठोर कर्म करो और उनमें से किन्हीं एक का उपाय कर भी लो तो उसके स्थान पर एक नयी समस्या खड़ी हो जायेगी. जीवन का कोई भरोसा नहीं है. एक दिन तुम्हारी प्रियजन चल बसेंगे, तुम भी एक दिन नहीं रहोगे. समस्याएँ सदैव बनी रहेंगीं और कोई भी उनका कुछ उपाय नहीं कर सकता.”

किसान क्रुद्ध हो गया और बोला, “सब कहते हैं कि आप महात्मा हो! मैं यहाँ इस आस में आया था कि आप मेरी कुछ सहायता करोगे! यदि आप इतनी छोटी-छोटी बातों का उपाय नहीं कर सकते तो आपकी शिक्षाएं किस काम की!?”

बुद्ध ने कहा, “मैं तुम्हारी 84वीं समस्या का समाधान कर सकता हूँ”.

“84वीं समस्या?”, किसान ने कहा, “वह क्या है?”

बुद्ध ने कहा, “यह कि तुम नहीं चाहते कि जीवन में कोई समस्या हो”.

* * * * * * * * * *

There is an old story about a man who came to see the Buddha because he had heard that the Buddha was a great teacher. Like all of us, he had some problems in his life, and he thought the Buddha might be able to help him straighten them out. He told the Buddha that he was a farmer. “I like farming,” he said, “but sometimes it doesn’t rain enough, and my crops fail. Last year we nearly starved. And sometimes it rains too much, so my yields aren’t what I’d like them to be.”

The Buddha patiently listened to the man.

“I’m married, too,” said the man. “She’s a good wife…I love her, in fact. But sometimes she nags me too much. And sometimes I get tired of her.”

The Buddha listened quietly.

“I have kids,” said the man. “Good kids, too…but sometimes they don’t show me enough respect. And sometimes…”

The man went on like this, laying out all his difficulties and worries. Finally he wound down and waited for the Buddha to say the words that would put everything right for him.

Instead, the Buddha said, “I can’t help you.”

“What do you mean?” said the man, astonished.

“Everybody’s got problems,” said the Buddha. “In fact, we’ve all got eighty-three problems, each one of us. Eighty-three problems, and there’s nothing you can do about it. If you work really hard on one of them, maybe you can fix it – but if you do, another one will pop right into its place. For example, you’re going to lose your loved ones eventually. And you’re going to die some day. Now there’s a problem, and there’s nothing you, or I, or anyone else can do about it.”

The man became furious. “I thought you were a great teacher!” he shouted. “I thought you could help me! What good is your teaching, then?”

The Buddha said, “Well, maybe it will help you with the eighty-fourth problem.”

“The eighty-fourth problem?” said the man. “What’s the eighty-fourth problem?”

Said the Buddha, “You want to not have any problems.”

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Teaching the Ultimate – सर्वोच्च सत्य


बहुत पुरानी बात है. जापान में लोग बांस की खपच्चियों और कागज़ से बनी लालटेन इस्तेमाल करते थे जिसके भीतर जलता हुआ दिया रखा जाता था.

एक शाम एक अँधा व्यक्ति अपने एक मित्र से मिलने उसके घर गया. रात को वापस लौटते समय उसके मित्र ने उसे साथ में लालटेन ले जाने के लिए कहा.

“मुझे लालटेन की ज़रुरत नहीं है”, अंधे व्यक्ति ने कहा, “उजाला हो या अँधेरा, दोनों मेरे लिए एक ही हैं”.

“मैं जानता हूँ कि तुम्हें राह जानने के लिए लालटेन की ज़रुरत नहीं है”, उसके मित्र ने कहा, “लेकिन तुम लालटेन साथ लेकर चलोगे तो कोई राह चलता तुमसे नहीं टकराएगा. इसलिए तुम इसे ले जाओ”.

अँधा व्यक्ति लालटेन लेकर निकला और वह अभी बहुत दूर नहीं चला था कि कोई राहगीर उससे टकरा गया.

“देखकर चला करो!”, उसने राहगीर से कहा, “क्या तुम्हें यह लालटेन नहीं दिखती?”

“तुम्हारी लालटेन बुझी हुई है, भाई”, अजनबी ने कहा.

* * * * * * * * * *

“In early times in Japan, bamboo-and-paper lanterns were used with candles inside. A blind man, visiting a friend one night, was offered a lantern to carry home with him. ‘I do not need a lantern,’ he said. ‘Darkness or light is all the same to me.’

‘I know you do not need a lantern to find your way,’ his friend replied, ‘but if you don’t have one, someone else may run into you. So you must take it.’

The blind man started off with the lantern and before he had walked very far someone ran squarely into him. ‘Look out where you are going!’ he exclaimed to the stranger. ‘Can’t you see this lantern?’

‘Your candle has burned out, brother,’ replied the stranger.”

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