Category Archives: साहित्यकार

प्रेमचंद का कोट

Premchandहिंदी के महानतम कथाकार प्रेमचंद का जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण था. उनके पास एक पुराना कोट था जो फट गया था लेकिन वे उसी को पहने रहते थे.

उनकी पत्नी शिवरानी देवी ने कई बार उनसे नया कोट बनवाने के लिए कहा लेकिन प्रेमचंद ने हर बार पैसों की कमी बताकर बात टाल दी. एक दिन शिवरानी देवी ने उन्हें कुछ रुपये निकालकर दिए और कहा – “बाजा़र जाकर कोट के लिए अच्छा कपड़ा ले आइये.”

प्रेमचंद ने रुपये ले लिए और कहा – “ठीक है. आज कोट का कपड़ा आ जाएगा.”

शाम को उन्हें खाली हाथ लौटा देखकर शिवरानी देवी ने पूछा – “कोट का कपड़ा क्यों नहीं लाए?”

प्रेमचंद कुछ क्षणों के लिए चुप रहे, फिर बोले – “मैं कपड़ा लेने के लिए निकला ही था कि प्रैस का एक कर्मचारी आ गया. उसकी लड़की की शादी के लिए पैसों की कमी पड़ गई थी. उसने मुझे वह सब इतनी लाचारी और उदासी से बताया कि मुझसे रहा नहीं गया. मैंने कोट के रुपये उसे दे दिए. कोट तो फिर कभी बन सकता है लेकिन लड़की की शादी नहीं टल सकती.”

शिवरानी देवी मन मसोस कर धीरे से बोलीं – “वो नहीं तो तुम्हें कोई और मिल जाता. मैं पहले ही जानती थी कि तुम्हारे हाथों में पैसे देकर कोट कभी नहीं आ सकता.”

प्रेमचंद के चेहरे पर संतोष की मुस्कान खिली हुई थी.

चित्र साभार – विकीपीडिया

(A motivational / inspirational anecdote of Munshi Premchand – in Hindi)

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अमृता प्रीतम का एक प्रसंग

amrita-pritam1अपने लेखन के शुरुआती दिनों से जुड़ा एक प्रसंग अमृता प्रीतम ने एक पत्रिका के स्तम्भ में बताया:-

“वो दिन आज भी मेरी आँखों के सामने आ जाता है… और मुझे दिखती है मेरे पिता के माथे पर चढ़ी हुई त्यौरी. मैं तो बस एक बच्ची ही थी जब मेरी पहली किताब 1936 में छपी थी. उस किताब को बेहद पसंद करते हुए मेरी हौसलाफजाई के लिए महाराजा कपूरथला ने मुझे दो सौ रूपये का मनीआर्डर किया था. इसके चंद दिनों बाद नाभा की महारानी ने भी मेरी किताब के लिए उपहारस्वरूप डाक से मुझे एक साड़ी भेजी.

कुछ दिनों बाद डाकिये ने एक बार फिर हमारे घर का रुख किया और दरवाज़ा खटखटाया. दस्तक सुनते ही मुझे लगा कि फिर से मेरे नाम का मनीआर्डर या पार्सल आया है. मैं जोर से कहते हुए दरवाजे की ओर भागी – “आज फिर एक और ईनाम आ गया!”

इतना सुनते ही पिताजी का चेहरा तमतमा गया और उनके माथे पर चढी वह त्यौरी मुझे आज भी याद है.

मैं वाकई एक बच्ची ही थी उन दिनों और यह नहीं जानती थी कि पिताजी मेरे अन्दर कुछ अलग तरह की शख्सियत देखना चाहते थे. उस दिन तो मुझे बस इतना लगा कि इस तरह के अल्फाज़ नहीं निकालने चाहिए. बहुत बाद में ही मैं यह समझ पाई कि लिखने के एवज़ में रुपया या ईनाम पाने की चाह दरअसल लेखक को छोटा बना देती है.”

(A motivational / inspirational anecdote of Amrita Pritam – in Hindi)

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मूर्ख युवक का संकल्प

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राजा रवि वर्मा द्वारा बनाए इस चित्र में कालिदास की शकुंतला पलटकर राजा दुष्यंत को निहारते हुए देख रही है

मालव राज्य की राजकुमारी विद्योत्तमा अत्यंत बुद्धिमान और रूपवती थी. उसने यह प्रण लिया था कि वह उसी युवक से विवाह करेगी जो उसे शास्त्रार्थ में हरा देगा.

विद्योत्तमा से विवाह की इच्छा अपने मन में लिए अनेक विद्वान् दूर-दूर से आये लेकिन कोई भी उसे शास्त्रार्थ में हरा न सका. उनमें से कुछ ने अपमान और ग्लानि के वशीभूत होकर राजकुमारी से बदला लेने के लिए एक चाल चली. उन्होंने एक मूर्ख युवक की खोज प्रारंभ की. एक जंगल में उन्होंने एक युवक को देखा जो उसी डाल को काट रहा था जिसपर वह बैठा हुआ था.

विद्वानों को अपनी हार का बदला लेने के लिए आदर्श युवक मिल गया. उन्होंने उससे कहा – “यदि तुम मौन रह सकोगे तो तुम्हारा विवाह एक राजकुमारी से हो जायेगा”.

उन्होंने युवक को सुन्दर वस्त्र पहनाये और उसे शास्त्रार्थ के लिए विद्योत्तमा के पास ले गए. विद्योत्तमा से कहा गया कि युवक मौन साधना में रत होने के कारण संकेतों में शास्त्रार्थ करेगा.

विद्वानों ने युवक के मूर्खतापूर्ण सकेतों की ऐसी व्याख्या की कि विद्योत्तमा को अंततः अपनी हार माननी पड़ी और उसने युवक से विवाह कर लिया.

कुछ दिनों तक युवक मौन साधना का ढोंग करता रहा लेकिन एक दिन वह ऊँट को देखकर गलत उच्चारण कर बैठा. विद्योत्तमा को सच्चाई का पता चल गया कि उसका पति जड़बुद्धि है.

क्रोधित विद्योत्तमा ने अपने पति को प्रताड़ित और अपमानित करके महल से निकाल दिया. युवक ने संकल्प लिया कि वह उच्च कोटि का विद्वान बनकर ही महल में लौटेगा.

अपने संकल्प के अनुसार युवक ने विद्यारम्भ कर दिया और कठोर अध्ययन एवं परिश्रम के उपरांत महान विद्वान बना. कालांतर में यही युवक महाकवि कालीदास के नाम से प्रख्यात हुआ.

(A motivational / inspiring story of Mahakavi Kalidasa – in Hindi)

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प्रोत्साहन

450px-Nathaniel_Hawthorne_oldदुनिया में सफलता प्राप्ति के हजारों ऐसे किस्से हैं जो सिर्फ प्रियजन या मित्र से केवल प्रोत्साहन के दो शब्द पाकर ही लोगों की नज़रों में आ सके. यदि प्रोत्साहन के वे शब्द नहीं कहे गए होते तो सफलता संदिग्ध होती.

अंग्रेजी के महान लेखक नाथानिएल हौथोर्न की सफलता के पीछे उनकी पत्नी सोफिया की बहुत बड़ी भूमिका है. एक दिन भग्नहृदय नाथानिएल घर आए और उन्होंने सोफिया को बताया कि उन्हें कस्टमहाउस की नौकरी से निकाल दिया गया है. वे बोले – “मैं बहुत बदनसीब हूँ. मैं ज़िन्दगी में कभी कुछ हासिल नहीं कर सकता.”

सोफिया ने कहा – “इतने उदास मत हो. तुम इतने प्रतिभाशाली हो, तुम कोई किताब लिख सकते हो क्या? तुम्हें लिखना चाहिए.”

“लेकिन मैं किताब लिखने बैठ जाऊँगा तो हमारा घर कैसे चलेगा?”

सोफिया ने आलमारी के भीतर से पैसों से भर बटुआ निकाला. नाथानिएल सकते में थे.

“इतना धन तुम्हारे पास कहाँ से आया?”

“मैं हमेशा से यह जानती हूँ कि तुम जीनियस हो. मुझे पता था कि एक-न-एक दिन तुम किताब ज़रूर लिखोगे. हर हफ्ते तुम घरखर्च के लिए मुझे जो पैसे देते थे उसीमें से थोड़ा-थोड़ा बचाकर मैंने इतनी रकम बना ली है. इतने से हम एक साल तक घर चला लेंगे.”

अपने ऊपर पत्नी का इतना गहरा विश्वास और समर्पण देखकर नाथानिएल लेखन कार्य में जुट गए. साल ख़त्म होने से पहले उन्होंने विक्टोरियन युग का महान उपन्यास ‘The Scarlet Letter’ लिख दिया.

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जॉर्ज बर्नार्ड शा के रोचक किस्से

इस ब्लौग के नियमित पाठक श्री सुशील कुमार छौक्कर ने जॉर्ज बर्नार्ड शा के किस्सों की फरमाइश की है. असाधारण प्रतिभाशाली महान लेखक शा के खब्तीपन के सैंकडों किस्से बिखरे हुए हैं और इस बात का पता नहीं चलता कि उनमें से कौन से वास्तविक हैं और कौन से लोगों द्वारा गढे गए. आज मैं कुछ ज्यादा ही फ्री हूँ इसलिए सुशील कुमार छौक्कर जी की फरमाइश अभी पूरी कर देता हूँ. आगे कभी शा के और कई किस्से दूसरी पोस्ट में पेश करूँगा. आज के लिए ये पांच किस्से:-

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जॉर्ज बर्नार्ड शा को एक इलैक्ट्रिक शेविंग मशीन बनाने वाले ने अपने इलैक्ट्रिक रेज़र का विज्ञापन करने के लिए संपर्क किया. वह चाहता था कि विज्ञापन में शा अपनी दाढ़ी साफ़ करते हुए दिखें. दाढ़ी शा की शख्सियत से जुड़ चुकी थी और उनकी खास पहचान बन चुकी थी. शा ने मशीन निर्माता को बताया कि उनके पिता ने भी हमेशा दाढ़ी रखी और इसके पीछे एक बहुत विशेष कारण था.

“मैं उस समय लगभग पांच साल का था” – शा ने कहा – “और मैं अपने पिता के पास खडा हुआ था. वे दाढ़ी बना रहे थे. मैंने उनसे पूछा, “डैडी, आप दाढ़ी क्यों बनाते हैं?”, पिताजी ने कुछ पलों के लिए मेरी ओर देखा और अपना रेज़र खिड़की से बाहर फेंकते हुए वे बोले, “बेटा, दाढ़ी बनाने की वास्तव में कोई ज़रुरत नहीं होती”, और उस दिन के बाद उन्होंने कभी दाढ़ी नहीं बनाई.”

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अपने नब्बेवें जन्मदिन पर आयोजित कार्यक्रम में शा को स्कॉट्लैंड यार्ड पुलिस के मशहूर जासूस फेबियन ने सुझाव दिया कि उस मौके के उपलक्ष्य में शा की उँगलियों की छाप लेनी चाहिए ताकि वह हमेशा-हमेशा के लिए संरक्षित हो जाय.

शा की उँगलियों की छाप सबके सामने ली गई लेकिन वह आश्चर्यजनक रूप से बहुत अस्पष्ट आई. यह देखकर शा ने वहां मौजूद लोगों से चुटकी लेते हुए कहा – “यदि मुझे यह पहले पता होता तो मैंने कोई और पेशा अख्तियार किया होता.”

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ब्रौडवे थियेटर में प्रसिद्द नाटककार सर सेड्रिक हार्डविक ‘सीज़र एंड क्लियोपेट्रा’ नाटक का निर्देशन कर रहे थे. शा भी वहां उपस्थित थे. सेड्रिक अपने किशोरवय पुत्र को शा से मिलाने ले गए.

जब वे विदा लेने लगे तो शा ने सेड्रिक के पुत्र से कहा – “लड़के, एक दिन तुम अपने पोते-पोतियों को यह बताओगे कि तुमने जॉर्ज बर्नार्ड शा को देखा हुआ है” – और ज़रा सा ठहरकर शा मुस्कुराते हुए बोले – “और वे कहेंगे ‘ये किस चिड़िया का नाम है!’”

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एमजीएम स्टूडियो एक मालिक सैमुअल गोल्डविन बर्नार्ड शा के कई नाटकों पर फिल्म बनाने के अधिकार खरीदना चाहते थे. इससे जुड़ी राशि पर लम्बी बहस होने के बाद शा ने अंततः गोल्डविन के प्रस्ताव को ठुकरा दिया. उन्होंने गोल्डविन से बड़े तल्ख़ अंदाज़ में कहा – “हमारे बीच कोई समझौता नहीं हो सकता मिस्टर गोल्डविन क्योंकि आप सिर्फ कला में रूचि रखते हैं और मैं सिर्फ पैसे में.”

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एक दिन पुरानी सेकंड-हैण्ड किताबों की दूकान में शा को उनकी ही एक किताब की प्रति मिल गई जिसपर उन्होंने अपने हाथ से अपने एक मित्र के लिए लिखा हुआ था -”प्रति श्री….. आदर सहित, जॉर्ज बर्नार्ड शा.”

शा ने फ़ौरन वह किताब खरीद ली और उसी मित्र को वह किताब उसी नोट के नीचे यह लिखकर भेज दी – “नवीनीकृत आदर के साथ, जॉर्ज बर्नार्ड शा.”

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