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जेम्स वाट और भाप की शक्ति

250px-James_Watt_by_Henry_Howardस्कॉट्लैंड में रहने वाला एक छोटा बालक अपनी दादी की रसोई में बैठा हुआ था. चूल्हे पर बर्तन चढ़े हुए थे और वह उनमें खाना बनता देखते हुए बहुत सारी चीज़ों के होने का कारण तलाश रहा था. वह हमेशा ही यह जानना चाहता था कि हमारे आसपास जो कुछ भी होता है वह क्यों होता है.

“दादी” – उसने पूछा – “आग क्यों जलती है?”

यह पहला मौका नहीं था जब उसने अपनी दादी से वह सवाल पूछा था जिसका जवाब वह नहीं जानती थी. उसने बच्चे के प्रश्न पर कोई ध्यान नहीं दिया और खाना बनाने में जुटी रही.

चूल्हे में जल रही आग पर एक पुरानी केतली रखी हुई थी. केतली के भीतर पानी उबलना शुरू हो गया था और उसकी नाली से भाप निकलने लगी थी. थोडी देर में केतली हिलने लगी और उसकी नली से जोरों से भाप बाहर निकलने लगी. बच्चे ने जब केतली का ढक्कन उठाकर अन्दर झाँका तो उसे उबलते पानी के सिवा कुछ और दिखाई नहीं दिया.

“दादी, ये केतली क्यों हिल रही है?” – उसने पूछा.

“उसमें पानी उबल रहा है बेटा”.

“हाँ, लेकिन उसमें कुछ और भी है! तभी तो उसका ढक्कन हिल रहा है और आवाज़ कर रहा है”.

दादी हंसकर बोली – “अरे, वो तो भाप है. देखो भाप कितनी तेजी से उसकी नली से निकल रही है और ढक्कन को हिला रही है”.

“लेकिन आपने तो कहा था कि उसमें सिर्फ पानी है. तो फिर भाप ढक्कन को कैसे हिलाने लगी?”

“बेटा, भाप पानी के गरम होने से बनती है. पानी उबलने लगता है तो वो तेजी से बाहर निकलती है” – दादी इससे बेहतर नहीं समझा सकती थी.

बच्चे ने दोबारा ढक्कन उठाकर देखा तो उसे पानी ही उबलता हुआ दिखा. भाप केवल केतली की नली से बाहर आती ही दिख रही थी.

“अजीब बात है!” – बच्चा बोला – “भाप में तो ढक्कन को हिलाने की ताकत है. दादी, आपने केतली में कितना पानी डाला था?”

“बस आधा लीटर पानी डाला था, जेमी बेटा”

“अच्छा, यदि सिर्फ इतने से पानी से निकलनेवाली भाप में इतनी ताकत है तो बहुत सारा पानी उबलने पर तो बहुत सारी ताकत पैदा होगी! तो हम उससे भारी सामान क्यों नहीं उठाते? हम उससे पहिये क्यों नहीं घुमाते?”

दादी ने कोई जवाब नहीं दिया. उसने सोचा कि जेमी के ये सवाल किसी काम के नहीं हैं. जेमी बैठा-बैठा केतली से निकलती भाप को देखता रहा.

*     *     *     *     *     *

भाप में कैसी ताकत होती है और उस ताकत को दूसरी चीज़ों को चलाने और घुमाने में कैसे लगाया जाए, जेम्स वाट नामक वह स्कॉटिश बालक कई दिनों तक सोचता 800px-James_Watt's_Workshopरहा. केतली की नली के आगे तरह-तरह की चरखियां बनाकर उसने उन्हें घुमाया और थोड़ा बड़ा होने पर उनसे छोटे-छोटे यंत्र भी चलाना शुरू कर दिया. युवा होने पर तो वह अपना पूरा समय भाप की शक्ति के अध्ययन में लगाने लगा.

“भाप में तो कमाल की ताकत है!” – वह स्वयं से कहता था – “किसी दानव में भी इतनी शक्ति नहीं होती. अगर हम इस शक्ति को काबू में करके इससे अपने काम करना सीख लें तो हम इतना कुछ कर सकते हैं जो कोई सोच भी नहीं सकता. ये सिर्फ भारी वजन ही नहीं उठाएगी बल्कि बड़े-बड़े यंत्रों को भी गति प्रदान करेगी. ये विराट चक्कियों को घुमाएगी और नौकाओं को चलाएगी. ये चरखों को भी चलाएगी और खेतों में हलों को भी धक्का देगी. हजारों सालों से मनुष्य इसे प्रतिदिन खाना बनाते समय देखता आ रहा है लेकिन इसकी उपयोगिता पर किसी का भी ध्यान नहीं गया. लेकिन भाप की शक्ति को वश में कैसे करें, यही सबसे बड़ा प्रश्न है”.

एक के बाद दूसरा, वह सैकडों प्रयोग करके देखता गया. हर बार वह असफल रहता लेकिन अपनी हर असफलता से उसने कुछ-न-कुछ सीखा. लोगों ने उसका मजाक उड़ाया – “कैसा मूर्ख आदमी है जो यह सोचता है कि भाप से मशीनें चला सकता है!”

steam engineलेकिन जेम्स वाट ने हार नहीं मानी. कठोर परिश्रम और लगन के फलस्वरूप उन्होंने अपना पहला स्टीम इंजन बना लिया. उस इंजन के द्वारा उन्होंने भांति-भांति के कठिन कार्य आसानी से करके दिखाए. उनमें सुधार होते होते एक दिन भाप के इंजनों से रेलगाडियां चलने लगीं. लगभग 200 सालों तक भाप के इंजन सवारियों को ढोते रहे और अभी भी कई देशों में भाप के लोकोमोटिव चल रहे हैं.

(भाप के इंजन का चित्र फ्लिकर से, बाकी दोनों विकिपीडिया से)

(A motivational / inspiring anecdote of James Watt and the power of steam – in Hindi)

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विक्रम साराभाई की सरलता

Vikram_Sarabhai

वर्ष १९४८ में अहमदाबाद की महात्मा गाँधी विज्ञान अन्वेषणशाला में कुछ विद्यार्थी भौतिकी के महत्वपूर्ण प्रयोग कर रहे थे. यह प्रयोगशाला विक्रम साराभाई ने हाल में ही शुरू की थी. प्रयोग के दौरान भारी विद्युत प्रवाह के कारण एक बहुमूल्य यंत्र जल गया. वह यंत्र विदेश से मंगाया गया था और भारत में उपलब्ध नहीं था. यंत्र के अभाव में अनेक महत्वपूर्ण प्रयोग स्थगित करने पड़ जाते.

विद्यार्थी डर गए कि वे साराभाई को इस बारे में कैसे बताएं. साराभाई कुछ ही क्षणों में प्रयोगस्थल पर आनेवाले थे.

“वे आ रहे हैं. तुम बता दो कि यंत्र जल गया है”.

“हमने जानबूझ कर तो ऐसा नहीं किया! कहीं वे नाराज़ हो गए तो?”

“क्या करें, कैसे बताएं? मुझे डर लग रहा है”.

साराभाई ने उन्हें फुसफुसाते हुए सुन लिया. उन्होंने पूछा – “क्या बात है? कोई समस्या है क्या?”

“सर, प्रयोग के दौरान विद्युत मीटर जल गया. उसमें से भारी विद्युत प्रवाह हो गया. हम…”

“इतनी सी बात! परेशान मत हो. वैज्ञानिक अध्ययन और प्रयोगों में ऐसी घटनाएँ होती रहती हैं. विद्यार्थी गलतियों से ही तो सीखते हैं! अगली बार प्रयोग से पहले अच्छे से जांच कर लेना” – साराभाई बहुत सरलता से बोले.

उनके इस उत्तर को सुनकर दोनों युवा वैज्ञानिकों के मन में उनके प्रति असीम श्रद्धा भर गई. भविष्य में वे प्रयोगों के दौरान पर्याप्त सावधानी बरतने लगे.

साराभाई इस हानि पर न तो क्रोधित हुए और न ही उन्होंने इसके लिए दुःख व्यक्त किया.

भाग्यशाली विद्यार्थियों को ही ऐसा गुरु मिलता है.

(A motivational / inspiring anecdote of Vikram Sarabhai – in Hindi)

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राइट बंधु और विमानन की कहानी

मनुष्य में हमेशा से ही पक्षियों की भांति उड़ने की चाह रही है. एक पुरानी यूनानी कहानी में डीडेलस नामक एक मनुष्य मोम के पंख बनाता है और अपने पुत्र आइकेरस के साथ समुद्र के पार उड़ा करता है. वे दोनों सूरज के समीप नहीं उड़ते क्योंकि उनके मोम के पंखों के पिघलने का खतरा है. आइकेरस युवा और महत्वाकांक्षी है और वह एक दिन सूरज के पास पहुँचने का प्रयास करता है. सूरज की गर्मी से उसके पंख पिघल जाते हैं और वह समुद्र में गिरकर डूब जाता है.

लीलीएंथल नामक एक जर्मन व्यक्ति ने पहली बार उड़ने के तरीकों के बारे में गंभीरतापूर्वक सोचा. उसने पंख के आकार की एक मशीन बनाई. उसने स्वयं को मशीन से कसकर बाँध लिया. फिर वह पहाड़ी या ऊंची ईमारत की चोटी से कूद गया. पांच साल तक वह इस प्रकार ‘उड़ता’ रहा लेकिन वह कभी भी कुछ सेकंडों से ज्यादा नहीं उड़ सका. इस बीच उसने वायु की धाराओं और उड़ने की समस्याओं पर अच्छा शोध कर लिया. एक दिन जब वह जमीन से लगभग 50 फीट ऊपर उड़ रहा था तब उसकी मशीन हवा के तेज झोंके की चपेट में आ गई और वह नीचे गिरकर मर गया.

स्मिथसोनियन इंस्टिट्यूट के प्रोफेसर लैंग्ली नामक एक अमेरिकन ने भी अपने जीवन के अंतिम वर्षों में उड़ने से सम्बंधित विषयों पर बहुत काम किया और उन्होंने एक गतिशील मशीन भी बनाई लेकिन वे भी उससे एक बार में कुछ सौ मीटर से ज्यादा दूर नहीं उड़ पाए.

Orville_Wrightप्रोफेसर लैंग्ली के प्रयोगों ने लोगों का ध्यान अपनी और खींचा. बेहतर तकनीकी योग्यता रखनेवाले फ्रांसीसी और अंग्रेज वैज्ञानिकों ने भी उड़ने के विज्ञान पर बहुत काम किया लेकिन हवा से भारी और बाह्य ऊर्जा द्वारा चलायमान विमान की सहायता से उड़ने में सफलता प्राप्त करने का श्रेय दो अमेरिकी बंधुओं औरविल और विल्बर राइट को जाता है. राइट बंधुओं ने केवल हाईस्कूल तक शिक्षा पाई थी और उनमें कोई तकनीकी कौशल या योग्यता नहीं थी. उनके पास अपने काम के लिए आवश्यक धनराशि भी नहीं थी.

राइट बंधुओं का जन्म ओहियो के नगर डेटन में हुआ था. वे हमेशा यंत्रों में रूचि लेते थे और साइकिल मरम्मत की दूकान चलाते थे. वर्ष 1896 में लीलिएंथल की मृत्यु और किताबों में उड़ने के विषय में चल रहे प्रयोगों के बारे में पढ़कर उनमें इस बारे में रूचि जाग्रत हुई. उन्होंने बिना किसी सोचविचार के अपना वायुयान बनाने का निश्चय कर लिया.

प्रयोगों में लगाने के लिए उनके पास धन नहीं था. उन्हें तो इसके खतरों के बारे में भी ज्यादा पता नहीं था. उन्होंने तय किया कि वे पक्षियों की उड़ान का अध्ययन करेंगे और इसके साथ ही उन्होंने तब तक बन चुकी सारी उड़ान मशीनों का भी अध्ययन कर लिया.

राइट बंधुओं ने हमेशा अपनी मशीनें स्वयं बनाईं. सबसे पहले उन्होंने एक ग्लाइडर बनाया जिसे वे पतंग की तरह उड़ाते थे. इसे लीवरों की सहायता से जमीन पर रस्सियाँ बांधकर नियंत्रित किया जाता था. इस प्रकार उन्होंने उड़ान के सिद्धांतों का अध्ययन कर लिया और यह भी सीख लिया कि हवा में मशीन को कैसे चलायमान रखा जाए.

विल्बर राइट (1903)
विल्बर राइट (1903)

इसके बाद उन्होंने एक मानवयुक्त ग्लाइडर बनाया. इसे उन्होंने लीलिएंथल की ही भांति पहाड़ी से कूदकर उड़ाया. इस ग्लाइडर को हवा में तिराना तो आसान था लेकिन अपनी मनमर्जी से उसे उड़ाना और उसका संतुलन बनाए रखना मुश्किल था. सुरक्षा की दृष्टि से प्रयोग जारी रखने के लिए वे 1900 में नॉर्थ कैरोलाइना में एक एकांत स्थल में चले आये जहाँ ऊंची रेतीली पहाडियां थीं. इस प्रकार वे कठोर पथरीली जमीन पर गिरने से बच सकते थे. अगले दो सालों में उन्होंने लगभग दो हज़ार बार अपने ग्लाइडर में उड़ान भरी जिनमें से सबसे लम्बी उड़ान 600 फीट की दूरी तक गई.

इस प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण चरण था ग्लाइडर को प्रणोदित (propel) करना. 1903 में उन्होंने तरल ईंधन से चलनेवाली एक मोटर बनाई और उसका परीक्षण करने के लिए वे पुनः नॉर्थ कैरोलाइना गए. उन्हें यकीन था कि उनकी मशीन काम करेगी लेकिन उन्होंने इसकी कोई औपचारिक घोषणा नहीं की.

उनकी पहली उड़ान केवल 12 सेकंड के लिए ही थी लेकिन मानव के इतिहास में यह पहली उड़ान थी जिसमें एक मशीन ने स्वयं गति करके हवा से भारी विमान को मानव सहित उड़ा लिया. कुछ समय हवा में नियंत्रित रहने के बाद उनका विमान बिना किसी नुकसान के नीचे उतर गया. उसी दिन उन्होंने दो और प्रयास किये जो कुछ अधिक समय के थे. उनकी चौथी उड़ान 59 सेकंडों की थी और उसने बारह मील की रफ़्तार से चल रही हवा की दिशा में 835 फीट की दूरी तय की.

800px-First_flight2राइट बंधुओं ने यह सब मनबहलाव के लिए शुरू किया था लेकिन इसमें सफलता मिलने पर वे इसके प्रति गंभीर हो गए. 1905 तक वे अपने प्रयोगों में इतने पारंगत हो चुके थे कि उन्होंने 35 मील प्रति घंटे की रफ़्तार से 24 मील की उड़ान भरी. अचरज की बात यह है कि इस समय तक उनकी उपलब्धियों के बारे में किसी को भी पता नहीं चला और किसी भी समाचार पत्र या पत्रिका में इस बारे में कुछ नहीं छपा. जब लोगों ने उनकी 24 मील लंबी उड़ान के बारे में सुना तो बहुत कम लोगों ने इसपर विश्वास किया.

1908 में विल्बर राइट एक मशीन को फ्रांस ले गए. फ्रांसीसी समाचार पत्र ने विल्बर राइट को लंबी गर्दन वाले एक पक्षी के रूप में चित्रित किया और उनकी भोंडी सी दिखने वाली मशीन का भी मजाक उड़ाया. उसी दिन विल्बर ने हवा में 91 मिनट उड़कर 52 मील की दूरी तक उड़ने का कीर्तिमान बनाया. कुछ दिनों बाद उन्हें 2 लाख फ्रैंक का पुरस्कार दिया गया. इसके साथ ही फ्रांसीसी सरकार ने उन्हें 30 इंजन बनाने का आर्डर भी दे दिया.

जिस समय विल्बर फ्रांस में रिकॉर्ड बनाकर पुरस्कार प्राप्त कर रहे थे, औरविल वर्जीनिया के फोर्ट मेयर में सहयात्री को बिठाकर एक घंटे से भी लम्बी उडानें भर रहे थे.

1909 में विमानन के क्षेत्र में अभूतपूर्व उन्नति हुई. ब्लेरिओट नामक एक फ्रांसीसी ने अपने विमान से इंग्लिश चैनल को पार किया. इसके बाद इंजनयुक्त एक बड़े गुब्बारे ज़ेपेलिन ने 220 मील की दूरी तय की. औरविल राइट वर्जीनिया से नॉर्थ कैरोलाइना तक अपने विमान को उड़ा ले गए. NC-4 नामक एक अमेरिकी विमान ने 1919 में अटलांटिक सागर को पार किया. R-34 नामक एक अंग्रेज विमान ने कुछ दिनों बाद यही करिश्मा दोहराया.

आज तो प्रतिदिन हजारों विमान उड़ान भरते हैं और पायलट हर तरह के हैरतंगेज़ कारनामों को करके दिखाते हैं. एक मशीन में बैठकर उड़ना और ऊपर से पृथ्वी को देखना सबके लिए रोमांचित करनेवाला अनुभव होता है. राइट बंधुओं ने अपनी लगन और मेहनत के दम पर वह कर दिखाया जिसके सपने मानव चिरकाल से देखता रहा था और जिसे सच साबित करने के लिए न जाने कितने ही मेधावी और दुस्साहसी युवकों को अपने प्राण गंवाने पड़े. दुनियावालों की नज़रों से दूर बिना किसी यश या धन प्राप्ति की चाह के राइट बंधु अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सतत प्रयास करते रहे. अत्यंत विनम्र स्वभाव के राइट बंधुओं ने अपने अविष्कारों के बदले में किसी कीर्ति की अपेक्षा नहीं की. विमानन के इतिहास में उनका नाम सदा के लिए स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो गया.

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महान भौतिकशास्त्री ‘मैक्स प्लांक’

मैक्स प्लांक (23 अप्रैल, 1858 – 4 अक्तूबर, 1947) महान भौतिकशास्त्री थे जिन्होंने क्वांटम फिजिक्स की नींव रखी. वे बीसवीं शताब्दी के महानतम वैज्ञानिक थे और उन्हें 1918 में नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उन्होंने अपने जीवन के पश्च भाग में बहुत से कष्ट झेले और जर्मनी में नाजी हुकूमत के दौरान उनका पूरा परिवार तबाह हो गया. आइंस्टाइन की भांति बड़े वैज्ञानिक उनके लिए भी यह कहते हैं कि आज भी उनके सिद्धांतों को पूरी तरह से समझनेवाले लोग बहुत कम हैं.

पंद्रह वर्ष की उम्र में मैक्स प्लांक ने अपने विद्यालय के भौतिकी के विभागाध्यक्ष से कहा कि वे भौतिकशास्त्री बनना चाहते हैं. विभागाध्यक्ष ने प्लांक से कहा – “भौतिकी विज्ञान की वह शाखा है जिसमें अब नया करने को कुछ नहीं रह गया है. जितनी चीज़ें खोजी जा सकती थीं उन्हें ढूँढ लिया गया है और भौतिकी का भविष्य धूमिल है. ऐसे में तुम्हें भौतिकी को छोड़कर कोई दूसरा विषय पढ़ना चाहिए.” – वास्तव में यह मत केवल प्लांक के विभागाध्यक्ष का ही नहीं थे. उस काल के कुछ बड़े वैज्ञानिक भी ऐसा ही सोचते थे.

लेकिन प्लांक ने किसी की न सुनी. लगभग 25 साल बाद क्वांटम फिजिक्स का आविर्भाव हुआ और प्लांक ने इसमें बहुत बड़ी भूमिका निभाई. क्वांटम फिजिक्स के आते ही क्लासिकल फिजिक्स औंधे मुंह गिर गई.

* * * * *

1879 में प्लांक ने इक्कीस वर्ष की उम्र में भौतिकी में पीएचडी कर ली और बहुत कम उम्र में ही वे बर्लिन विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्रोफेसर बन गए. एक दिन वे यह भूल गए कि उन्हें किस कमरे में लेक्चर देना था. वे बिल्डिंग में यहाँ-वहां घूमते रहे और उन्होंने एक बुजुर्ग कर्मचारी से पूछा – “क्या आप मुझे बता सकते हैं कि प्रोफेसर प्लांक का लेक्चर आज किस कमरे में है?”

बुजुर्ग कर्मचारी ने प्लांक का कन्धा थपथपाते हुए कहा – “वहां मत जाओ, बच्चे. अभी तुम हमारे बुद्धिमान प्रोफेसर प्लांक का लेक्चर समझने के लिए बहुत छोटे हो.”

* * * * *

कहते हैं कि प्लांक के आने-जाने से लोग घड़ियाँ मिलाते थे. एक युवा भौतिकविद को इसपर विश्वास नहीं था इसलिए एक दिन वह उनके कमरे के बाहर खड़े होकर घड़ी के घंटे बजने की प्रतीक्षा करने लगा. जैसे ही घड़ी का घंटा बजा, प्लांक कमरे से बाहर निकले और गलियारे में से होते हुए चले गए. वह युवक उस कमरे तक गया जहाँ वे पढाने के लिए गए थे. जैसे ही प्लांक पढाकर चलने लगे, घड़ी ने अपने घंटे बजाए. गौरतलब है कि प्लांक अपने पास कोई भी घड़ी नहीं रखते थे.

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जिस कार्य की नींव प्लांक ने रखी, उसे अलबर्ट आइंस्टाइन ने आगे बढाया. आइंस्टाइन ने एक बार प्लांक के बारे में कहा – “मैं जितने भी भौतिकशास्त्रियों से मिला हूँ उनमें वे सर्वाधिक बुद्धिमान थे… लेकिन भौतिकी की उनकी सोच मुझसे मेल नहीं खाती क्योंकि 1919 के ग्रहणों के दौरान वे रात-रात भर जाग कर यह देखने का प्रयास करते थे कि प्रकाश पर गुरुत्वाकर्षण बल का क्या प्रभाव पड़ता है. यदि उनमें सापेक्षता के सिद्धांत की समझ होती तो वे मेरी तरह आराम से सोया करते.”

(Anecdotes of Max Plank – Physicist – Hindi)

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चित्रपहेली और अलेक्जेंडर ग्राहम बेल

पिछली पोस्ट में मैंने एक व्यक्ति का चित्र दिखाकर पाठकों से उसे पहचानने के लिए कहा था. कई लोगों ने सही-गलत उत्तर दिए और चित्र-पहेली को पसंद किया गया. ब्लौग के एक नियमित पाठक ने एक बेनामी कमेन्ट में मेरे ब्लौग की विषयवस्तु के साथ चित्र-पहेली के औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लगाया. मैं उनसे शत-प्रतिशत सहमत हूँ और अब मैं इस धीर-गंभीर ब्लौग में चित्र-पहेली जैसे पाठकजोडू और कमेन्टप्राप्तू प्रयोग नहीं करूँगा. चित्र-पहेली के पीछे मेरा उद्देश्य हांलाकि यह था कि किसी प्रख्यात व्यक्ति के चित्र के बहाने उनसे जुडी जानकारी और संस्मरण आपको पढाए जाएँ.

हिंदीज़ेन वस्तुतः गंभीर ब्लौग है, तब भी जब इसपर पिछले कुछ दिनों से आप सभी मुल्ला नसरुद्दीन के किस्सों का रसास्वादन कर रहे हैं क्योंकि मैं उन्हें चुटकुलों के रूप में नहीं लेता. इस पोस्ट के बहाने मैं आप सभी से सुझाव आमंत्रित करता हूँ कि आप सब यहाँ क्या पढना पसंद करेंगे. मुझे एक मित्र ने पंचतंत्र और हितोपदेश/जातक कथाओं का समावेश करने का सुझाव दिया है. उनका सुझाव उत्तम है लेकिन यह सब तो इन्टरनेट पर अन्यत्र उपलब्ध है. मैं अनुवादक हूँ, इसलिए मेरा यह प्रयास रहता है कि ज्ञान-विज्ञान की उस सामग्री का समावेश ब्लौग में करूँ जो हिंदी के पाठकों को अप्राप्य है. इन्टरनेट पर हिंदी के ये शुरूआती दिन हैं और अभी तो हिंदी में करोडों वेबपेज बनेंगे. आप सभी कभी कोई ऐसी सामग्री अंग्रेजी में पढें जिसे हिंदीज़ेन पर प्रस्तुत किया जा सकता हो तो उसके बारे में मुझे कृपया अवश्य सूचित करें.

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अब थोडी चर्चा कल की चित्र-पहेली के बारे में. चूँकि मैं आपको उस व्यक्तित्व के बारे में और उनसे जुड़े संस्मरणों के बारे में बताने का वादा कर चूका हूँ तो अपने वचन की लाज तो रखनी ही पड़ेगी.

समीर लाल जी, वैभव दीक्षित, गब्बर सिंह और दिनेशराय द्विवेदी जी ने क्रमशः पहेली में दिए गए व्यक्ति को ठीक पहचाना. वे हैं अलेक्जेंडर ग्राहम बेल. उन्होंने 1876 में टेलीफोन का आविष्कार किया था. उनसे पहले भी इस यंत्र की खोज करने के कई असफल प्रयास अन्य वैज्ञानिक कर चुके थे लेकिन सफलता बेल को मिली. बेल बचपन से ही कुशाग्र थे और छोटी उम्र में ही सरल यंत्रों को अपने-आप बनाने लगे थे. अपने युग के अन्य बहुत सारे वैज्ञानिकों के विपरीत उन्हें बहुत अच्छी शिक्षा और आर्थिक पृष्ठभूमि मिली हुई थी. उन्होंने मूक-बधिरों के लिए बहुत काम किया और विमानों के विकास में भी बहुत योगदान दिया.

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“वॉट्सन, यहाँ आओ, मुझे तुम्हारी ज़रुरत है” – ये शब्द विश्व में किसी ने पहली बार टेलीफोन पर कहे थे. उस दिन 10 मार्च  1876 को बेल अपने कमरे में और उनका सहायक वॉट्सन बिल्डिंग के ऊपरी तल पर अपने कमरे में यंत्रों पर काम कर रहे थे. बहुत दिनों से लगातार यंत्रों को जोड़ने पर भी उन्हें ध्वनि के संचारण में सहायता नहीं मिल रही थी.

1876_Bell_Speaking_into_Telephoneउस दिन पता नहीं तारों का कैसा संयोग बन गया. वे दोनों इससे अनभिज्ञ थे. काम करते-करते बेल की पैंट पर अम्ल गिर गया और उन्होंने वॉट्सन को मदद के लिए पुकारा. वॉट्सन ने उनकी आवाज़ को अपने पास रखे यंत्र से आते हुए सुना और… बाकी तो इतिहास है.

1915 में अंतरमहाद्वीपीय टेलीफोन लाइन बिछ गई और उसके उदघाटन के लिए बेल को बुलाया गया. बेल पूर्वी तट पर थे और उन्हें कहा गया कि वे कुछ कहकर लाइन का औपचारिक उदघाटन करें. दूसरे छोर पर वॉट्सन थे. जानते हैं बेल ने फोन पर क्या कहा!? “वॉट्सन, यहाँ आओ, मुझे तुम्हारी ज़रुरत है”. वॉट्सन का जवाब था – “सर, मैं आपसे 3000 किलोमीटर दूर हूँ और मुझे वहां आने में कई दिन लग जायेंगे!”

और “हैलो” शब्द किसने गढा? थॉमस एडिसन ने. बेल चाहते थे कि फोन उठाने या सुनने वाला व्यक्ति “अहोय” कहे लेकिन थॉमस एडिसन का “हैलो” लोगों की जुबां पर चढ़ गया.

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इतनी महान खोज करने के बाद भी सालों तक बेल अपनी खोज का महत्त्व नहीं समझ पाए. उनके अनुसार टेलीफोन आम आदमी के उपयोग की वस्तु कभी नहीं बन सकता था.

नेशनल जिओग्राफिक सोसायटी के संस्थापक और अपने भावी ससुर गार्डिनर ग्रीन हब्बार्ड को जब बेल ने अपना टेलीफोन यंत्र दिखाया तो हब्बार्ड ने उनसे कोई उपयोगी वस्तु बनाने के लिए कहा क्योंकि हब्बार्ड के अनुसार “ऐसे खिलौने में लोग भला क्यों रुचि लेंगे?”

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1919 में 72 साल की उम्र में बेल ने पानी पर चलने वाला एक यान हाइड्रोफोइल बनाया जिसने उस समय पानी पर रफ़्तार का विश्व रिकॉर्ड बनाया.

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बोस्टन विश्वविद्यालय में बेल बधिर लोगों को पढ़ाने का काम करते थे. सुप्रसिद्ध हेलन केलर और उनकी भावी पत्नी मेबेल हब्बार्ड भी उनकी छात्राएं थीं. मेबेल के साथ उनका 45 साल लम्बा सुखी वैवाहिक जीवन रहा. जीवन के अंतिम पड़ाव पर बीमारी की दशा में एक दिन अपने पति का हाथ थामकर मेबेल ने उनसे कहा – “मुझे छोड़कर मत जाओ”. बेल ने अपनी उँगलियों से ‘no’ बनाकर उन्हें इशारा किया. मेबेल ने उसी क्षण अंतिम सांस ली.

4 अगस्त 1922 को जब बेल की मृत्यु हुई तो उत्तरी अमेरिका के लाखों फोन बेल के सम्मान में एक मिनट के लिए बंद कर दिए गए.

विकलांगों की सेवा को बेल ने अपना ध्येय बना रखा था. वे पूरी ज़िन्दगी अपने रोगी भाई के लिए कृत्रिम फेफड़ा बनाने का प्रयास करते रहे.

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