Category Archives: राजनयिक-नेता

चेहरे पर झलकता आत्मविश्वास

अमेरिका में माउन्ट रशमोर पर बनाया गया थॉमस जेफरसन का चेहरा
अमेरिका में माउन्ट रशमोर पर बनाया गया थॉमस जेफरसन का चेहरा

यह बात उस समय की है जब अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन अपने कुछ साथियों के साथ एक उफ़नती हुई नदी को अपने-अपने घोड़ों पर बैठकर पार करने जा रहे थे. उस समय वहां नदी के किनारे एक अजनबी भी था जो नदी पार करना चाहता था लेकिन उसके पास घोड़ा नहीं था. जब उसने देखा कि जेफरसन और उनके साथी अपने घोड़ों को नदी में उतार रहे हैं तब वह जेफरसन के पास आया और उसने जेफरसन से अनुरोध किया कि वे उसे अपने साथ घोड़े पर बिठाकर नदी पार करा दें.

जेफरसन मूलतः सरलमना देहाती किसान थे और उन्होंने अजनबी का अनुरोध सहर्ष स्वीकार कर लिया. वे दोनों घोड़े पर बैठकर बिना किसी बाधा के नदी पार कर गए. वह अजनबी जब जेफरसन का धन्यवाद करके अपने रास्ते जाने लगा तब जेफरसन के एक अधिकारी ने उससे पूछा – “इतने सारे लोगों में से तुमने राष्ट्रपति को ही नदी पार कराने के लिए क्यों कहा?”

अजनबी यह जानकार हतप्रभ रह गया की स्वयं संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति ने नदी पार करने में उसकी मदद की थी. वह अधिकारी से बोला – “मैं आप लोगों को नदी पार करने की तैयारी करते काफी देर से देख रहा था. आप सभी के चेहरे पर मुझे ‘नहीं हो सकता’ लिखा दिख रहा था जबकि राष्ट्रपति के चेहरे पर ‘हाँ, हो जायेगा’ लिखा मैं स्पष्ट देख पा रहा था, इसीलिए मैंने नदी पार करवाने के लिए उन्हीं से मिन्नत की”.

चित्र साभार – फ्लिकर

(A story/anecdote about Thomas Jefferson – in Hindi)

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Franklin’s Lesson on the Value of Time – बेंजामिन फ्रेंकलिन और समय की कीमत

485px-Benjamin_Franklin_by_Joseph_Siffred_Duplessisबेंजामिन फ्रेंकलिन की किताबों की दुकान थी. एक दिन उनकी दुकान पर एक ग्राहक आया. कुछ किताबें देखने के बाद उसने दुकान के एक कर्मचारी से पूछा – “इस किताब की कीमत क्या है?”

कर्मचारी ने कहा – “एक डॉलर”.

ग्राहक ने कहा – “यह तो ज्यादा है. कुछ कम नहीं हो सकता क्या?”

कर्मचारी ने स्पष्ट कहा – “नहीं”.

ग्राहक ने कहा – “क्या बेन फ्रेंकलिन यहाँ हैं? मैं उनसे मिलना चाहता हूँ”.

वे अभी आने वाले हैं” – कर्मचारी ने कहा.

फ्रेंकलिन के आने के बाद ग्राहक ने उनसे पूछा – “इस किताब की कम-से-कम कीमत क्या होगी?”

फ्रेंकलिन ने कहा – “सवा डॉलर”.

ग्राहक ने आश्चर्य से कहा – “लेकिन आपकी दुकान के कर्मचारी ने तो इसकी कीमत एक डॉलर बताई है!”

“उसने ठीक बताया है. चौथाई डॉलर मेरे समय की कीमत है”.

ग्राहक ने आग्रह किया – “ठीक है. अब आप इसकी सही कीमत बता दीजिये”.

“अब डेढ़ डॉलर. आप लेने में जितनी देर करते जायेंगे, समय का मूल्य भी इसमें जुड़ता जायेगा”.

ग्राहक के पास अब कोई रास्ता न था. एक डॉलर के बदले डेढ़ डॉलर देकर उसने वह किताब खरीद ली. किताब के साथ ही उसे समय का मूल्य भी ज्ञात हो गया.

समय के महत्त्व को जानने वाले यही बेंजामिन फ्रेंकलिन अमेरिका के महान वैज्ञानिक, राजनीतिज्ञ और चिन्तक बने.

चित्र साभार : विकिपीडिया

(A motivational / inspiring anecdote of Benjamin Franklin – value of time – in Hindi)

This story from the life of Benjamin Franklin is a great reminder and perhaps even motivator for us to always place a value on our time, even if only to charge ourselves. Franklin not only understood the value of time, but he put a price upon it that made others appreciate its worth.

A customer who came one day to his little bookstore in Philadelphia, not being satisfied with the price demanded by the clerk for the book he desired, asked for the owner. “Mr. Franklin is very busy just now in the press room,” replied the clerk. The potential customer, however, who had already spent an hour aimlessly turning over books, insisted on seeing him. In answer to the clerk’s summons, Mr. Franklin hurried out from the newspaper office in the back of the store.

“What is the lowest price you can take for this book, sir?” asked the leisurely customer, holding up the volume. “A dollar and a quarter,” was the prompt reply. “A dollar and a quarter! Why, your clerk offered it to me for only a dollar just now.” “True,” said Franklin, “and I could have afforded to take a dollar before having to leave my work.”

The man, who seemed to be in doubt as to whether Mr. Franklin was in serious, said jokingly, “Well, come now, tell me your lowest price for this book.” “A dollar and a half,” was the grave reply. “A dollar and a half! Why, you just offered it for a dollar and a quarter.” “Yes, and I could have taken that price then, but I need a dollar and a half now.”

Without another word, the purchaser, disappointed with his attempt, laid the money on the counter and left the store. He had learned not only that he who squanders his own time is foolish, but that he who wastes the time of others is a thief.

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अब्राहम लिंकन की वकालत

वकालत से कमाई की दृष्टि से देखें तो lincolnअमेरिका के राष्ट्रपति बनने से पहले अब्राहम लिंकन ने बीस साल तक असफल वकालत की. लेकिन उनकी वकालत से उन्हें और उनके मुवक्किलों को जितना संतोष और मानसिक शांति मिली वह धन-दौलत बनाने के आगे कुछ भी नहीं है. उनके वकालत के दिनों के सैंकड़ों सच्चे किस्से उनकी ईमानदारी और सज्जनता की गवाही देते हैं.

लिंकन अपने उन मुवक्किलों से अधिक फीस नहीं लेते थे जो ‘उनकी ही तरह गरीब’ थे. एक बार उनके एक मुवक्किल ने उन्हें पच्चीस डॉलर भेजे तो लिंकन ने उसमें से दस डॉलर यह कहकर लौटा दिए कि पंद्रह डॉलर पर्याप्त थे. आमतौर पर वे अपने मुवक्किलों को अदालत के बाहर ही राजीनामा करके मामला निपटा लेने की सलाह देते थे ताकि दोनों पक्षों का धन मुकदमेबाजी में बर्बाद न हो जाये. इसके बदलें में उन्हें न के बराबर ही फीस मिलती था. एक शहीद सैनिक की विधवा को उसकी पेंशन के 400 डॉलर दिलाने के लिए एक पेंशन एजेंट 200 डॉलर फीस में मांग रहा था. लिंकन ने उस महिला के लिए न केवल मुफ्त में वकालत की बल्कि उसके होटल में रहने का खर्चा और घर वापसी की टिकट का इंतजाम भी किया.

लिंकन और उनके एक सहयोगी वकील ने एक बार किसी मानसिक रोगी महिला की जमीन पर कब्जा करने वाले एक धूर्त आदमी को अदालत से सजा दिलवाई. मामला अदालत में केवल पंद्रह मिनट ही चला. सहयोगी वकील ने जीतने के बाद फीस में बँटवारा करने की बात की लेकिन लिंकन ने उसे डपट दिया. सहयोगी वकील ने कहा कि उस महिला के भाई ने पूरी फीस चुका दी थी और सभी अदालत के निर्णय से प्रसन्न थे परन्तु लिंकन ने कहा – “लेकिन मैं खुश नहीं हूँ! वह पैसा एक बेचारी रोगी महिला का है और मैं ऐसा पैसा लेने के बजाय भूखे मरना पसंद करूँगा. तुम मेरी फीस की रकम उसे वापस कर दो.”

आज के हिसाब से सोचें तो लिंकन बेवकूफ थे. उनके पास कभी भी कुछ बहुतायत में नहीं रहा और इसमें उन्हीं का दोष था. लेकिन वह हम सबमें सबसे अच्छे मनुष्य थे, क्या कोई इस बात से इनकार कर सकता है?

लिंकन कभी भी धर्म के बारे में चर्चा नहीं करते थे और किसी चर्च से सम्बद्ध नहीं थे. एक बार उनके किसी मित्र ने उनसे उनके धार्मिक विचार के बारे में पूछा. लिंकन ने कहा – “बहुत पहले मैं इंडियाना में एक बूढ़े आदमी से मिला जो यह कहता था ‘जब मैं कुछ अच्छा करता हूँ तो अच्छा अनुभव करता हूँ, और जब बुरा करता हूँ तो बुरा अनुभव करता हूँ’. यही मेरा धर्म है’.

चित्र साभार : फ्लिकर

(A motivational / inspiring anecdote of Abraham Lincoln in Hindi)

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जॉर्ज वाशिंगटन नाविक नहीं बने

“मैं नाविक बनना चाहता हूँ” – जॉर्ज वाशिंगटन ने कहा – “नाविक बनकर मैं अनजाने देशों की यात्राएं करूँगा और अजीबोगरीब चीज़ें देखूंगा. एक दिन मैं किसी जहाज का कैप्टन भी बन जाऊँगा”.

उस समय जॉर्ज वाशिंगटन की उम्र सिर्फ चौदह साल थी.

जॉर्ज के बड़े भाई भी यही चाहते थे कि वह नाविक बने. उन्होंने सबसे कहा कि जॉर्ज जैसा बहादुर लड़का बहुत अच्छा नाविक बनेगा और एक-न-एक दिन वह कैप्टन और बहुत हुआ तो एडमिरल भी बन सकता है.

और इस बात पर सभी सहमत हो गए. जॉर्ज के भाई ने परिवार को बताया कि एक व्यापारी जहाज का कैप्टन इंग्लैंड की यात्रा पर निकलनेवाला था. कैप्टन जॉर्ज को अपने साथ ले जाने और नाविक बनने के गुर सिखाने के लिए तैयार भी हो गया.

लेकिन जॉर्ज की माँ उदास थीं. जॉर्ज के चाचा ने उसकी माँ को एक पत्र में लिखा – “उसे समुद्र में मत भेजो. अगर वह एक साधारण नाविक के रूप में अपने जीवन की शुरुआत करेगा तो कभी कुछ बड़ा और बेहतर नहीं बन पायेगा”.

परन्तु जॉर्ज ने भी ठान ली थी कि उसे नाविक ही बनना है. वह दृढप्रतिज्ञ और निश्चल था. उसने उन लोगों की बातों पर ध्यान नहीं दिया जो उससे घर में ही रूककर कुछ और करने की सलाह दे रहे थे.

जहाज में यात्रा प्रारंभ करने का दिन भी आ गया. बीच समुद्र में जहाज लंगर डाले खड़ा था. नदी में एक नाव जॉर्ज का इंतज़ार कर रही थी. एक बक्से में जॉर्ज के कपडे आदि सामान रखकर पहले ही नाव में पहुंचाए जा चुके थे. समुद्री यात्रा करने के रोमांच से जॉर्ज के पाँव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे.

“माँ, मैं जा रहा हूँ” – जॉर्ज ने कहा.

वह घर की दहलीज पर खड़ा होकर पूरे घर को देख रहा था. यात्रा में न जाने कितना समय लगनेवाला था. सभी प्रियजन उससे मिलने के लिए आए थे. उसे भीतर-ही-भीतर उदासी का अनुभव होने लगा.

“जाओ बेटा, अपना ख़याल रखना” – माँ ने कहा.

जॉर्ज ने माँ की आँखों में आंसू देखे. वह जानता था कि माँ उसे जाने देना नहीं चाहती थी. उससे माँ का दुःख देखा न गया.

कुछ पल वह सोचता हुआ खड़ा रहा. फिर वह एकदम मुड़ा और बोला – “माँ, मैंने अपना विचार बदल लिया है. मैं घर पर ही रहूँगा और वही करूँगा जो तुम चाहती हो”.

फिर उसने बाहर इंतज़ार कर रहे नौकर को बुलाया और उससे कहा – “टॉम, नदी तक जाओ और उनसे कहो कि मेरा बक्सा नीचे उतार दें. कैप्टन को सन्देश भेजो कि वह मेरा इंतज़ार न करे क्योंकि मैं अब नहीं जा रहा हूँ. मैं यहीं रहूँगा”.

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जॉर्ज वाशिंगटन के बारे में कौन नहीं जानता!? उनके बारे में कहा जाता है की ‘वे युद्ध में प्रथम थे, शांति में प्रथम थे, और अपने देशवासियों के ह्रदय में भी वे प्रथम थे”.

(A motivational / inspiring anecdote of George Washington – in Hindi)

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खलीफा और शायर की कहानी

बहुत समय पहले अरब में अल मंसूर नामक शासक था जो वहां का खलीफा भी था.

अल मंसूर को शायरी बहुत अच्छी लगती थी और वह शायरों से बार-बार उनका कलाम सुनने की फरमाइश करता था. जब कभी उसे किसी शायर की कोई नज़्म बहुत पसंद आती तो वह उसे ईनाम भी देता था.

एक दिन तालिबी नामक एक शायर खलीफा के पास आया और उसने खलीफा को अपनी एक लम्बी नज़्म सुनाई. नज़्म सुनाने के बाद उसने अदब से सर झुकाया और ईनाम मिलने का इंतज़ार करने लगा.

खलीफा ने शायर से पूछा – “तुम्हें कैसा ईनाम चाहिए?… तीन सौ सोने की शर्फियाँ या मेरी कही गई इल्म की तीन बातें?”

शायर खलीफा को खुश करना चाहता था इसलिए उसने कहा – “मेरे आका, धन-दौलत पाने के बजाय हर आदमी इल्म की बातें सुनना ज्यादा पसंद करेगा”.

खलीफा ने मुस्कुराते हुए कहा – “बहुत अच्छा. तो मेरी इल्म की पहली बात सुनो. अगर तुम्हारा कोट फट जाए तो उसमें पैबंद मत लगाओ. वह बदसूरत लगेगा”.

“या खुदा” – शायर ने मन मसोसकर सोचा – “सोने की सौ अशर्फियाँ हाथ से निकल गईं”.

खलीफा ने मुस्कुराते हुए फिर कहा – “अब मेरी इल्म की दूसरी बात सुनो. अपनी दाढ़ी में कभी भी ज्यादा तेल मत चुपडो. तुम्हारे कपड़े गंदे हो जायेंगे”.

“मेरी सोने की दो सौ अशर्फियाँ हाथ से नक़ल गईं” – शायर ने बहुत रंज से भीतर-ही-भीतर कहा.

खलीफा मंद-मंद मुस्कुराते हुए बोले – “और इल्म की तीसरी बात यह है कि…..”

“रहम करो खलीफा!” – शायर चिल्लाया – “इल्म की इस बात को अपने लिए ही रखो और मुझे इसके बदले में सोने की अशर्फियाँ दे दो!”

खलीफा बेतरह हंस दिए और वहां मौजूद हर शख्स भी हंस पड़ा. उन्होंने अपने खजांची को शायर को सोने की पांच सौ अशर्फियाँ देने के लिए कहा क्योंकि उसने वाकई बहुत अच्छी नज़्म सुनाई थी.

खलीफा अल मंसूर लगभग तेरह सौ साल पहले हुए थे. बग़दाद शहर उन्होंने ही बनवाया था.

(A story/anecdote about a caliph and a poet – in Hindi)

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