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Posts from the ‘बाल-कथाएं’ Category

बुद्ध प्रसंग


महर्षि रमण और उनके शिष्य अनासक्ति के विषय पर चर्चा कर रहे थे. महर्षि ने कहा – “भारतवर्ष में सदियों पहले ही किसी कवि ने अपने छंद में लिखा था ‘प्रभु, तुमने मुझे तन ढंकने के लिए कपड़ा और भोजन करने के लिए हाथ दिए हैं. इनके अतिरिक्त मुझे और किसकी आवश्यकता है? मेरे लिए यही पर्याप्त हैं?’ – संसार का समस्त वैभव चरणों में हो पर सोते समय सर के नीचे हाथ रखने में ही सुख मिलता है. महान शासक और सम्राट भी ऐसे ही सुख के लिए तरसते हैं. पहले मेरे पास बहुत कुछ था, अब मैं वीतरागी हूँ. मुझे दोनों दशाओं का अनुभव है. मेरे लिए हर प्रकार का स्वामित्व और परिग्रह बंधन ही है.”

“क्या भगवान् बुद्ध अनासक्त का श्रेष्ठ उदाहरण नहीं हैं?” – एक भक्त ने पूछा.

महर्षि रमण ने कहा – “हाँ. अपने राजमहल में विश्व के समस्त वैभव के बीच भी बुद्ध के ह्रदय में खालीपन था. उनकी उदासी को दूर करने के लिए उनके पिता ने उनके लिए विलासिता के सभी साधन उपलब्ध कराये. लेकिन बुद्ध को शांति नहीं मिली. आधीरात को वे अपनी पत्नी और पुत्र को छोड़कर चले गए. छः वर्षों तक वे कठोर तप का पालन करते रहे. ज्ञान प्राप्ति के पश्चात वे विश्व का कल्याण करने के लिए भिक्षु बनकर घूमते रहे. सच कहें तो भिक्षु बनने के बाद ही उन्हें वास्तविक सुख-शांति मिल सकी. इसके अतिरिक्त उन्हें और क्या चाहिए था?”

“क्या वे अपने नगर में भिक्षु बनकर कभी आये?” – एक श्रृद्धालु ने पूछा.

“हाँ. आये थे” – महर्षि बोले – “उनके लौट आने का समाचार सुनकर उनके पिता राजा शुद्दोधन हाथी-घोड़े और राजसी ठाठबाठ के साथ राजमार्ग पर उन्हें लेने पहुंचे. लेकिन बुद्ध तो वहां से परे पगडंडी के रास्ते से आ रहे थे. अपने साथ आने वाले भिक्षुओं को उन्होंने भिक्षा लेने के लिए नगर के भिन्न-भिन्न स्थानों में भेज दिया फिर वे अपने पिता के पास गए. उनके पिता को इसका भान नहीं था कि बुद्ध भिक्षुक के रूप में उनसे मिलेंगे. परन्तु बुद्ध की पत्नी यशोधरा ने उन्हें पहचान लिया. उसने उनके पुत्र राहुल को बुद्ध के सामने दंडवत होने के लिए कहा और स्वयं उनके चरण छुए. बुद्ध के पिता तभी उन्हें पहचान सके. उन्होंने इसकी कल्पना भी नहीं की थी कि वे अपने पुत्र को कभी इस रूप में देखेंगे. वे बहुत क्रोधित हो गए और बुद्ध से बोले – “यह तुमने क्या कर लिया है! ये वस्त्र क्यों पहने हैं? जिस व्यक्ति के चरणों में विश्व की सम्पदा होनी चाहिए वह एक भिक्षुक की भांति कैसे रह सकता है? बस, बहुत हो गया!”

“और वे क्रोध से जलती हुई आँखों से बुद्ध को देखते रहे. अपार करुणावान बुद्ध भी अपने पिता को देख रहे थे. बुद्ध ने उनसे कुछ नहीं कहा. उनके चेहरे की सौम्यता और शांति राजा शुद्दोधन के अंतस को भेदती जा रही थी. दृष्टियों के इस समर में उनके पिता परास्त हो गए. वे फूटकर रोते हुए अपने पुत्र के चरणों पर गिर गए. फिर उन्होंने भी अपने लिए गैरिक वस्त्र मांगे. अनासक्ति के महत्व को अनासक्त व्यक्ति ही पूरी तरह से जान सकता है” – महर्षि ने कहा. यह प्रसंग सुनाते समय उनके भाव उमड़ पड़े.

डेविड और गोलिएथ की कहानी


david-goliathकिसी गाँव में गोलिएथ नामक दैत्य बार-बार आकर वहां के निवासियों को खा जाता था.

एक दिन गाँव में डेविड नामक 15 वर्षीय गड़रिया अपने मित्र से मिलने के लिए आया. उसने अपने मित्र से पूछा – “तुम सभी मिलकर उस दैत्य का सामना क्यों नहीं करते?”

भयभीत मित्र ने डेविड से कहा – “लगता है कि तुमने अभी गोलिएथ को देखा नहीं है. वह इतना विशाल है कि हम उसे मार नहीं सकते!”

डेविड ने कहा – “अच्छा! यदि वह वाकई बहुत विशाल है तो इतना निश्चित है कि उसपर लगाया गया निशाना चूक नहीं सकता”.

और कहते हैं कि डेविड ने एक दिन गोलिएथ पर गुलेल से निशाना साधकर उसे गिरा दिया और पलक झपकते ही उसे अपनी तलवार से मार दिया.

इस कहानी में डेविड की शारीरिक शक्ति नहीं बल्कि उसके नज़रिए ने उसे गोलिएथ पर विजय दिलाई.

(A motivational / inspirational story of David and Goliath – in Hindi)

दो बंदरों की कहानी


कल मैंने आपको कुछ बंदरों की कहानी पढ़वाई थी जो कुँए में दिख रहे चंद्रमा को वास्तविक चंद्रमा समझकर उसे निकालने का प्रयास करते हैं लेकिन पेड़ की डाली टूट जाने के कारण बेचारे कुँए में गिरकर मर जाते हैं. कहानी का शीर्षक था ‘मूर्ख बंदर और चंद्रमा’. कहानी का ऐसा शीर्षक निष्प्रयोजन ही दिया गया था. वस्तुतः किसी भी जीव को मूर्ख नहीं कहना चाहिए. जिन जीवों जैसे गधा आदि को हम बहुधा मूर्ख कहते हैं वे मानव जाति के बहुत काम आते हैं और हर प्रकार के कष्टों को सहकर भी मानवों के लिए अति उपयोगी सिद्ध होते हैं!

बच्चों की कहानियों में आमतौर पर विभिन्न जंतुओं के लिए ‘चालाक लोमडी’, ‘धूर्त सियार’, ‘कपटी मगरमच्छ’ जैसी उपमाओं का प्रयोग किया जाता है लेकिन इसका उद्देश्य केवल कहानी को बच्चों (और बड़ों) के लिए रोचक और बोधगम्य बनाना होता है, किसी जन्तुविशेष को अन्य जंतुओं से हीन दिखाना या उसका अपमान करना नहीं.

इस ब्लौग में समय-समय पर अलग-अलग प्रकार की कथाओं के दौर चलते रहते हैं. प्रारंभ में इसमें ज़ेन, ताओ, सूफी कथाएँ प्रकाशित की गईं, फिर प्रेरक प्रसंग, संस्मरण, लेख आदि पोस्ट किये गए. आजकल मैं अपरिचित सी बाल-कथाओं का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ. इन्हें बड़े तथा बच्चे सभी पढ़कर आनंद उठा सकते हैं और इनसे शिक्षा भी ग्रहण कर सकते हैं.

प्रस्तुत है ‘दो बंदरों की कथा’

two monkeys
दो बंदर एक दिन घूमते-घूमते एक गाँव के समीप पहुँच गए और उन्होंने वहां सुन्दर व मीठे प्रतीत होने वाले फलों से लदा हुआ एक पेड़ देखा.

“इस पेड़ को देखो!” – एक बंदर ने दूसरे से चिल्लाकर कहा – “ये फल कितने सुंदर दिख रहे हैं. ये अवश्य ही बहुत स्वादिष्ट होंगे! चलो हम दोनों पेड़ पर चढ़कर फल खाएं”.

दूसरा बंदर बुद्धिमान था. उसने कुछ सोचकर कहा – “नहीं, नहीं. एक पल के लिए सोचो. यह पेड़ गाँव के इतने समीप लगा है और इसके फल इतने सुंदर और पके हुए हैं, लेकिन यदि ये अच्छे फल होते तो गाँव वाले इन्हें ऐसे ही क्यों लगे रहने देते? लोगों ने इन्हें अवश्य ही तोड़ लिया होता! लेकिन ऐसा लगता है कि किसी ने भी इन फलों को हाथ भी नहीं लगाया है. इन्हें मत खाओ. मुझे विश्वास है कि ये फल खाने लायक नहीं हैं”.

“कैसी बेकार की बातें कर रहे हो!” – पहले बंदर ने कहा – “मुझे तो इन फलों में कुछ बुरा नहीं दिख रहा. मैं तो फल खाने के लिए पेड़ पर चढूंगा”.

“जैसी तुम्हारी इच्छा” – बुद्धिमान बन्दर ने कहा – “मैं खाने के लिए कुछ और ढूंढता हूँ”.

पहला बंदर पेड़ पर चढ़कर फल खाने लगा और उसने जी भर के फल खाए. लेकिन वे फल उसका अंतिम भोजन बन गए क्योंकि फल स्वादिष्ट तो थे परन्तु जहरीले थे. दूसरा बंदर जब कहीं और से खा-पी कर आया तो उसने पेड़ के नीचे अपने मित्र को मरा हुआ पाया. उसे यह देखकर बहुत दुःख हुआ लेकिन वह तो पहले ही अपने मित्र को सावधान कर चुका था.

(चित्र यहाँ से लिया गया है)

मूर्ख बंदर और चंद्रमा


एक रात एक छोटा बंदर कुँए पर पानी पीने के लिए गया. जब उसने कुँए में झाँककर देखा तो उसे पानी में चंद्रमा झिलमिलाता हुआ दिखाई दिया. यह देखकर वह बहुत डर गया और दूसरे बंदरों को यह बात बताने के लिए दौड़ा.

“दोस्तों!” – वह चिल्लाया – “चंद्रमा पानी में गिर गया है!”

“कहाँ! किस जगह!” – दूसरे बंदरों ने पूछा.

“मेरे साथ आओ! मैं तुम्हें दिखलाऊँगा!” – छोटे बंदर ने कहा.

छोटा बंदर उन्हें कुँए तक ले गया. वे सभी झुंड बनाकर कुँए में झाँकने लगे.

monkeys
“अरे हाँ! चंद्रमा तो पानी में गिर गया है!” – वे चिल्लाये – “हमारा सुंदर चंद्रमा कुँए में गिर गया! अब रात में अँधेरा हो जायेगा और हमें डर लगेगा! अब हम क्या करें!?”

“मेरी बात सुनो” – एक बूढ़े बंदर ने कहा – “हम सिर्फ एक ही काम कर सकते हैं, हमें चंद्रमा को कुँए से निकालने की कोशिश करनी चाहिए”.

“हाँ! हाँ! ज़रूर!” – सभी उत्साह से बोले – “हमें बताओ कि ऐसा कैसे करें”.

“वो देखो कुँए के ऊपर पेड़ की एक डाली लटक रही है. हम सभी उससे लटक जायेंगे और चुटकियों में चंद्रमा को कुँए से निकाल लेंगे”.

“बहुत अच्छा तरीका है” – सब चिल्लाये – “चलो, डाली से लटकें”.

देखते ही देखते बहुत सारे बंदर उस पतली सी डाली से लटक गए और कुँए के भीतर झूलने लगे. उनमें से एक बंदर कुँए के भीतर पानी में हाथ डालकर चंद्रमा को निकालनेवाला ही था कि ऊपर पेड़ पर डाली चटक गई. सभी मूर्ख बन्दर कुँए में गिरकर पानी में डूब गए. चंद्रमा आकाश में स्थिर चमकता रहा.

(कहानी और चित्र यहाँ से लिए गए हैं)

आदमी और दैत्य


एक बार एक आदमी घने जंगल में रास्ता भटक गया. यहाँ-वहां रास्ता ढूंढ़ते-ढूंढ़ते उसे बहुत रात हो गई. सर्दी का महीना था और वह भूखा-प्यासा ठण्ड के मारे ठिठुरता हुआ अँधेरे में ठोकरें खाता रहा.

कहीं दूर उसे रौशनी दिखाई दी और वह उस और यह सोचकर चल दिया कि शायद वह किसी लकड़हारे की झोपड़ी होगी.

रौशनी एक गुफा के भीतर से आ रही थी. वह आदमी गुफा के भीतर घुस गया और उसने यह देखा कि वह एक दैत्य की गुफा थी.

“मैं इस जंगल में रास्ता भटक गया हूँ और बहुत थका हुआ हूँ” – आदमी ने दैत्य से कहा – “क्या मैं आपकी गुफा में रात भर के लिए ठहर सकता हूँ?”

“आओ और यहाँ आग के पास बैठ जाओ” – दैत्य ने कहा.

आदमी आग के पास जाकर बैठ गया. उसकी उँगलियाँ ठण्ड से ठिठुर रही थीं. वह अपनी उँगलियों पर अपने मुंह से गर्म हवा फूंककर उन्हें गर्माने लगा.

“तुम अपनी उँगलियों पर क्यों फूंक रहे हो?” – दैत्य ने पूछा.

“क्योंकि मेरी उँगलियाँ बहुत ठंडी हैं इसलिए मैं फूंक मारकर उन्हें गर्म कर रहा हूँ” – आदमी ने जवाब दिया.

“क्या इससे वे गर्म हो जायेंगीं? – दैत्य ने पूछा.

“हाँ. हम मनुष्य लोग ऐसा ही करते हैं” – आदमी ने जवाब दिया.

दैत्य ने कुछ नहीं कहा. कुछ देर बाद वह गुफा के भीतर गया और आदमी के लिए कटोरे में खाने की कोई चीज़ ले आया. खाना इतना गर्म था कि आदमी उसे खा नहीं सकता था. वह कटोरे में फूंक मारकर उसे ठंडा करने लगा.

“क्या खाना ठंडा है?” – दैत्य ने पूछा.

“नहीं. खाना तो बहुत गरम है” – आदमी ने जवाब दिया.

“तो तुम इसमें फूंक क्यों रहे हो?” – दैत्य ने पूछा.

“इसे ठंडा करने के लिए” – आदमी ने जवाब दिया.

“फ़ौरन मेरी गुफा से निकल जाओ!” – दैत्य आदमी पर चिल्लाया – “मुझे तुमसे डर लग रहा है. तुम एक ही फूंक से गर्म और ठंडा कर सकते हो!”

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