Category Archives: प्रेरक लेख

नीर-क्षीर विवेक

कुछ लोग कहते है कि हमें किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए. किसी को भला, किसी को बुरा कहना राग-द्वेष है. सही भी है, किसी की निंदा करना बुरा है. किन्तु भले और बुरे में सम्यक भेद करना उससे भी कहीं अधिक उत्तम है. भला-बुरा, हित-अहित और सत्यासत्य का विवेक रखकर, बुरा अहितकारी और असत्य का त्याग करना. भला, हितकारी और सत्य का आदर करना तो एक आवश्यक गुण ही है. जो जैसा है, उसे वैसा ही, बिना किसी अतिश्योक्ति के निरूपित करना, कहीं से भी बुरा कर्म नहीं है.

एक व्यापारी को एक अपरिचित व्यक्ति के साथ लेन-देन का व्यवहार करना था. रेफरन्स के लिए उसने, उसके परिचित और अपने एक मित्र को पूछा- “यह व्यक्ति कैसा है? इसके साथ लेन देन व्यवहार करनें में कोई हानि तो न होगी”.

उस व्यापारी का मित्र सोचने लगा – ‘मैं किसी के दोष क्यों बताऊँ? दोष दर्शाना तो निंदा है. मुझे तो उसकी प्रसंशा करनी चाहिए.’ इसप्रकार विचार करते हुए उसने उस धूर्त की प्रशंसा ही कर दी. सच्चाई और ईमानदारी के गुण, जो कि उसमें थे ही नहीं, उस धूर्त के लिए गढ़ दिए. मित्र की बात पर विश्वास करके व्यापारी ने उस धूर्त व्यक्ति के साथ व्यवहार कर दिया और कुछ ही समय में धूर्त सब कुछ समेट कर गायब हो गया. ठगा-सा व्यापारी अपने मित्र के पास जाकर कहने लगा- “मैने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था, तुमने मुझे बर्बाद कर दिया. तुम्हारे द्वारा की गई धूर्त की अनावश्यक प्रसंशा ने मुझे तो डुबो ही दिया. तुमने मुझ निरपराध को धोखा क्यों दिया? तुम तो मेरे मित्र-परिचित थे, तुमने उसकी सत्य हक़ीकत छुपा कर झूठी प्रसंशा क्यों की?”

प्रशंसक कहने लगा- “मैं आपका शत्रु नहीं मित्र ही हूँ, और सज्जन भी हूँ. कोई भी भला व्यक्ति, किसी के दोष नहीं देखता, निंदा करना तो पाप है. मैने तुम्हें हानि पहुंचाने के उद्देश्य से उसकी प्रशंसा नहीं की. बल्कि, यह सोचकर कि ‘सज्जन व्यक्ति सभी में गुण ही देखता है’, -मैने तत्काल प्रशंसा की”.

“तो क्या उसमें ईमानदारी और सच्चाई के गुण थे?”

“हाँ, थे न! वह पहले ईमानदारी प्रदर्शित करके ही तो अपनी प्रतिष्ठा जमाता था. वह सच्चाई व ईमानदारी से साख जमा कर प्रभावशाली व्यवहार से रहा करता था. धोखा तो मात्र उसने अंतिम दिन ही दिया जबकि लंबी अवधि तक वह नैतिक ही बना रहा. अधिकाल गुणों की उपेक्षा करना और थोड़े से दोषों को दिखाकर निंदा करना तो पाप है. भला मैं ऐसा पाप क्यों करूँ?” – उसने सफाई दी.

“वाह! भाई वाह! तुम्हारा चिंतन और गुणग्राहकता कमाल की है. तुम्हारी इस सज्ज्ननता ने, मेरी तो लुटिया ही डुबो दी. तुम्हारी गुणग्राहकता तो उस ठग की सहयोगी ही बन गई. उसकी ईमानदारी और सच्चाई तो प्रदर्शन मात्र थी, केवल धूर्तता के लिए ही थी. भीतर तो बेईमानी ही छुपी थी. मैने आज यह समझा कि तुम्हारे जैसे गुणग्राहक तो धूर्तों से भी अधिक खतरनाक होते है”. – व्यापारी अपने भाग्य को कोसता हुआ चला गया.

यदि कोई वैद्य या डॉक्टर रोगी में रोग के लक्षणों को उजागर न करे, या फिर रोग को उजागर करना बुरा माने, अथवा ऐसा करने को सेहत की श्रेष्ठता का बखान माने, अथवा सेहत और रोग के लक्षणों को समभाव से समान मानकर उनका विश्लेषण ही न करे तो निदान कैसे होगा? और अन्ततः वह रोग कारकों से बचने का परामर्श न दे. कुपथ्य से परहेज का निर्देश न करे. उपचार हेतु कड़वी दवा न दे तो रोगी का रोग से पिंड कैसे छूटेगा? ऐसा करता हुआ डॉक्टर कर्तव्यनिष्ट सज्जन कहलाएगा या मौत का सौदागर?

कोई भी समझदार व्यकितु कांटों को फूल नहीं कहता, विष को अमृत समझकर ग्रहण नहीं करता. गोबर और हलवे के प्रति समभाव रखकर कौन समाचरण करेगा? छोटा बालक यदि गोद में गंदगी कर कपड़े खराब कर दे तो कहना ही पड़ता है कि ‘उसने गंदा कर दिया’. न कि यह कहेंगे ‘उसने अच्छा किया’. इस प्रकार बुरा कहना बच्चे के प्रति द्वेष नहीं है. बुरे को बुरा कहना सम्यक् आचरण है.

संसार में अनेक मत-मतान्तर है. उसमें से जो हमें अच्छा, उत्तम और सत्य लगे, उसे मानें, तो यह हमारा अन्य के साथ द्वेष नहीं है बल्कि विवेक है. विवेकपूर्वक हितकारी को अंगीकार करना और अहितकारी को छोड़ना ही चेतन के लिए कल्याणकारी है.

भले बुरे में भेद कर, बुरे का त्याज्य और भले का अनुकरणीय विवेक करना ही, नीर-क्षीर विवेक है.

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गतानुगतिको … : लकीर का फकीर यह संसार

अपने छात्रजीवन में मैंने एक नीतिश्लोक पढ़ा था जो मुझे अपनी कमजोर स्मरणशक्ति के बावजूद आज भी याद है, शायद इसलिए कि उसमें व्यक्त विचार गंभीर एवं सार्थक हैं. श्लोक यूं है:

गतानुगतिको लोको न लोको पारमार्थिकः

बालुकालिङ्गमात्रेण गतं मे ताम्रभाजनम्.

इसकी व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है: यह संसार गतानुगतिक (पीछे-पीछे चलने वाला) अर्थात् लकीर का फकीर है. यहां लोग दूसरों के हित-अहित को ध्यान में रखकर कर्म नहीं करते. (इस लौकिक व्यवहार के कारण ही तो) मेरा तांबे का बर्तन महज बालू के (शिव)लिंग के कारण खो गया .

उक्त नीतिवचन का मूल स्रोत मुझे नहीं मालूम. मैंने इसे अपने पाठ्यक्रम के किसी पुस्तक में एक लघुकथा के संदर्भ में पढ़ा था. उस कथा के संक्षिप्त उल्लेख से इस श्लोक का तात्पर्य अधिक रोचक तरीके से समझा जा सकता है. कथा इस प्रकार है:

एक परिव्राजक (भ्रमणरत साधु) एक बार प्रातः एक नदी के किनारे पहुंचा. उसने उस नदी के पास ही कहीं एकांत में शौचादि कर्मों से निवृत्त होने का निर्णय लिया. तांबे का एक बर्तन ही उसकी कुल ‘संपत्ति’ थी जिसे वह छिपा के रखना चाहता था. उसे भय था कि उसकी अनुपस्थिति में उस बर्तन पर किसी चोर-उचक्के की नजर पड़ सकती है और वह उसे खो सकता है. अतः उसने एक तरकीब सोची. नदी के किनारे विस्तृत क्षेत्र में फैली बालू में उसने हाथ से एक गड्ढा बनाया . उसने उसमें अपना तांबे का बर्तन रखा और बालू से ढककर उसके ऊपर बालू का ही एक शिवलिंग बना दिया, ताकि उस स्थल की पहचान वह बाद में कर सके. आने-जाने वाले किसी को किसी प्रकार का शक न होने पावे इस उद्येश्य से उसने आसपास से फूल-पत्ते तोड़कर लिंग के ऊपर चढ़ा दिये, ताकि लोग पवित्र तथा पूज्य मानते हुए उसके साथ छेड़-छाड़ न कर सकें.

किंचित्‌ विलंब के बाद वह उस स्थल पर लौटा तो वहां का दृश्य देख स्तब्ध रह गया. उसने पाया कि इस बीच उस स्थान से गुजरने वाले लोगों ने भी एक-एक कर अनेकों लिंग वहां स्थापित कर दिये थे. कदाचित् परिव्राजक द्वारा स्थापित उस लिंग को देख लोगों ने सोचा कि वहां उस दिन बालुका-लिंग स्थापना के साथ उसकी पूजा का विधान है और तदनुसार अधिक सोच-विचार किये बिना उन्होंने भी वैसा ही किया. उनके इस रवैये का फल परिव्राजक को भुगतना पड़ा, जिसके लिए अपना ताम्रपात्र ढूंढ़ना कष्टप्रद हो गया. तब उसके मुख से उक्त नीतिवचन निकले.

किसी कथा को शब्दशः नहीं स्वीकारा जा सकता. महत्त्व तो उसमें निहित संदेश का रहता है. उक्त कथा इस तथ्य पर जोर डालती है कि मनुष्य समाज में कम ही लोग होते हैं जो किसी मुद्दे पर विवेकपूर्ण चिंतन के पश्चात् स्वतंत्र धारणा बनाते हैं और तदनुकूल व्यवहार करते हैं. अधिकतर लोग लकीर के फकीर बनकर व्यापक स्तर पर लोगों को जो कुछ करते हुए पाते हैं वही स्वयं भी करने लगते हैं. अंध नकल की यह प्रवृत्ति आम बात है. सामाजिक कुरीतियां ऐसे ही व्यवहार के दृष्टांत मानी जा सकती हैं. – योगेन्द्र जोशी

योगेन्द्र जोशी काशी हिंदू वि.वि. में भौतिकी पढ़ाते थे. अब स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर अपनी अभिरुचियों के अनुसार समय-यापन कर रहे हैं. उनके ब्लॉग “ज़िंदगी बस यही है” और “विचार संकलन” रोचक, ज्ञानवर्धक और पठनीय हैं.

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बोंसाई और हम

यह अंग्रेजी ब्लॉग बिकमिंग मिनिमलिस्ट्स के लेखक जोशुआ बेकर की अतिथि पोस्ट है.

“Never underestimate the power of dreams and the influence of the human spirit. We are all the same in this notion: The potential for greatness lives within each of us.” – William Rudolph

जब मैं छोटा था तब हमारा परिवार अक्सर ही बोंसाई वृक्षों की प्रदर्शनी देखने के लिए जाता था. हमारे समुदाय में बोंसाई वृक्ष उगानेवाले बहुत से सदस्य थे जो अपनी कला को निखारने के लिए एक-दूसरे से नियमित रूप से मिलते थे. हर साल लगनेवाले मेले में समूह के सदस्य अपने लगाए बोंसाई वृक्ष प्रदर्शित करते थे. प्रदर्शनी में आमतौर से सौ के लगभग वृक्ष रखे जाते थे और वे हर आकार-प्रकार, रंग-रूप और प्रजाति के होते थे. कुछ वाकई बहुत आकर्षक होते थे और कुछ अनगढ़ से, लेकिन उन्हें देखने के लिए बहुत लोग आते थे.

उन दिनों मुझे यह लगता था कि बोंसाई के वृक्ष विशेष प्रकार के वृक्ष होते थे और वे छोटे आकार में ही उगते थे. कुछ बड़ा होने पर ही मुझे यह पता चला कि वे छोटे वृक्ष उन प्रजातियों के बड़े वृक्षों से बहुत अलग नहीं हैं. यदि उन्हें भी स्वतन्त्र रूप से उगने दिया जाए तो वे भी विशालकाय हो जायेंगे. लेकिन उन्हें छोटे-छोटे उथले गमलों में उगाया जाता है. उनकी जड़ें बहुत बेरहमी से काट दी जातीं हैं और शाखाओं को मनचाहे आकार में छांट कर धातु के तारों से उमेठकर वृक्ष का रूप दे दिया जाता है. इस प्रकार, बोंसाई वृक्षों को उनके स्वाभाविक रूप में उगने नहीं दिया जाता है. उनके विकास के हर संभव प्रयास का दमन कर दिया जाता है. उन्हें कम-से-कम पानी और न के बराबर मिट्टी और खाद में पनपने की आदत डाली जाती है.

आज मुझे लगता है कि मैं बोंसाई बनाने की कला और सौंदर्य को समझने लगा हूँ, फिर भी मुझे इस कार्य में एक अजीब सी त्रासदी दिखती है. बोंसाई की कला विशालकाय और प्रभावशाली वृक्ष के रूप में पनपने की संभावना को कुचलकर उसे निर्ममता से सीमित कर देती है.

इसके साथ ही साथ मेरा ध्यान हम सबके जीवन में हर दिन घट रही ऐसी ही त्रासदियों की ओर भी जाता है. हमारे भीतर भी अपरिमित विकास और संभावनाओं के बीज हैं. हम सब अद्वितीय हैं और हमारे जीवन के पीछे विशेष प्रयोजन हैं.

हम यदि चाहें तो अपने और दूसरों के जीवन में महत्वपूर्ण सकारात्मक परिवर्तन लाकर इस दुनिया को बदलने की ताक़त रखते हैं, लेकिन अक्सर यही देखने में आता है कि हमारी आत्मोन्नति की राह में अनेक अवरोध खड़े हो जाते हैं.

लेकिन हमारे विकास की राह के अवरोध उथले गमले, मिट्टी, या काट-छांट आदि नहीं हैं. जिन चीज़ों की वज़ह से हमारी ज़िंदगी की राह थम जाती है वे ये हैं:

  • अस्वास्थ्यकर आदतें
  • मिथ्याभिमान
  • अदूरदर्शितापूर्ण उद्देश्य
  • उपभोगिता/विलासिता
  • संबंधों में छिछलापन
  • भीतर घर कर चुके डर
  • अतीत से असहज जुड़ाव

आपका और हमारा जीवन इस सृष्टि के लिए महत्वपूर्ण है. यह कितना ही अस्पष्ट क्यों न हो पर हममें से प्रत्येक जन के अस्तित्व का एक गहन प्रयोजन है. हमारे ऊपर इसका उत्तरदायित्व है कि हम अपने महत्व और मूल्य को कभी कम करके नहीं आकें और हर उस छोटे/बड़े बदलाव का संवाहक बनें जो हमारी और इस दुनिया की बेहतरी के लिए सामने आये.

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Idiot vs. Thinker – मूर्ख बनाम विचारक

कॉलिन विल्सन मशहूर अंग्रेज लेखक हैं और उन्होंने अपराध, रहस्य, और पराविद्या (औकल्ट) पर लगभग 100 से भी अधिक बेस्टसेलर किताबें लिखीं हैं. वर्तमान युग के महत्वपूर्ण दार्शनिकों में उनका नाम शामिल है और उनके प्रशंसक उन्हें जीनियस मानते हैं.

अपनी आत्मकथा के पहले चैप्टर में विल्सन ने बताया है कि अपनी जवानी की शुरुआत में उन्होंने जीवन का सबसे बड़ा चुनाव किया. उनके पिता लाइसेस्टर में जूता उद्योग में मामूली कामगार थे. विल्सन अलबर्ट आइन्स्टीन से प्रभावित थे और स्वयं को आइन्स्टीन के उत्तराधिकारी के रूप में देखते थे, लेकिन घरेलू कठिनाइयों की वज़ह से उन्हें स्कूल छोड़कर 16 वर्ष की उम्र में काम करना पड़ा. एक ऊन फैक्टरी में कुछ समय काम करने के बाद वे किसी प्रयोगशाला में सहायक बन गए. उन्होंने इस जीवन की कल्पना नहीं की थी और उनपर निराशा गहराती गयी. ऐसे में एक दिन उन्होंने आत्महत्या का निर्णय कर लिया.

वे हाइड्रोसायनिक एसिड पीने जा रहे थे तभी उनके मन में कुछ कौंध-सा गया. उन्होंने देखा कि उनके भीतर दो कॉलिन विल्सन थे: पहला, एक मूर्ख और ग्रंथियों का शिकार कॉलिन विल्सन; और दूसरा, विचारक और वास्तविक कॉलिन विल्सन.

विलसन ने आत्मकथा में लिखा, “उस दिन मूर्ख कॉलिन विल्सन ने दोनों को मार दिया होता”.

“उस एक क्षण में मेरा साक्षात्कार सत्य के अद्भुत और विहंगम विस्तार से हुआ जो सर्वव्याप्त और असीम है”.

* * * * * * * * * *

Colin Henry Wilson (born 26 June 1931) is a prolific English writer who first came to prominence as a philosopher and novelist. Wilson has since written widely on true crime, mysticism and other topics. He prefers calling his philosophy new existentialism or phenomenological existentialism.

In his autobiography, Wilson describes in the first chapter how he made his own choice. The son of working-class parents from Leicester – his father was in the boot and shoe trade – he was forced to quit school and go to work at 16, even though his ambition was to become “Einstein’s successor.” After a stint in a wool factory, he found a job as a laboratory assistant, but he was still in despair and decided to kill himself.

On the verge of swallowing hydrocyanic acid, he had an insight: there were two Colin Wilsons, one an idiotic, self-pitying teenager and the other a thinking man, his real self.

The idiot, he realized, would kill them both.

“In that moment,” he wrote, “I glimpsed the marvelous, immense richness of reality, extending to distant horizons.”

Achieving such moments of optimistic insight has been his goal and subject matter ever since, through more than 100 books, from his first success, “The Outsider,” published in 1956, when he was declared a major existentialist thinker at 24, to the autobiography.

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What is Your Four Minute Mile? – आपका लक्ष्य क्या है?

कई दशकों तक सभी यह मानते रहे कि कोई भी व्यक्ति 4 मिनट में 1 मील नहीं दौड़ सकता. लोगों ने कहा, “ऐसा हो ही नहीं सकता”! वैज्ञानिक और चिकित्सकों ने मानव शरीर की सीमाओं और क्षमताओं का आकलन करके यह बताया कि 4 मिनट में 1 मील दौड़ पाना संभव नहीं था. उनके अनुसार इसके लिए उपयुक्त गति तक पहुँचने से पहले ही शरीर धराशायी हो जाता. सभी ने यह मान लिया : 4 मिनट में 1 मील दौड़ना असंभव है.

लेकिन सबको इस बात पर यकीन नहीं था. 4 मिनट में 1500 मीटर (एक मील में 1600 मीटर होते हैं) दौड़ने का रिकार्ड तोड़ने के बाद रोजर बैनिस्टर को यह लगने लगा कि वह ऐसा कर सकता है. उसने अपने मन में यह ठान लिया कि वह 4 मिनट में 1 मील दौड़कर दिखाएगा. उसके आत्मविश्वास ने ही असंभव को संभव कर दिखाया. उसने यह रिकार्ड बनाने की दिशा में प्रयत्न करना शुरू कर दिया.

और 6 मई, 1954 के दिन यह संभव हो गया:

रोजर बैनिस्टर ने यह कर दिखाया. उसने 4 मिनट में 1 मील दौड़कर वह रिकार्ड बना दिया जिसे सब असंभव मानते थे. उसने दुनिया को बता दिया कि ऐसा भी हो सकता है. उसने अपनी दौड़ 3 मिनट और 59.4 सैकंड में पूरी की. इसके 6 हफ्ते बाद ही एक औस्ट्रेलियन जौन लैंड्री ने यह दौड़ 3 मिनट 58 सैकंड में पूरी की. 1957 की समाप्ति से पहले सोलह धावक 4 मिनट से कम में 1 मील दौड़ चुके थे. अब तो हजारों धावक 4 मिनट में 1 मील दौड़ चुके हैं. कुछ धावक तो हर दिन अभ्यास दौड़ में ऐसा कर लेते हैं. इस दौड़ का विश्व रिकॉर्ड मोरक्कन धावक हिचाम एल गेरोज़ के नाम है जिसने 7 जुलाई 1999 को 1 मील की दौड़ 3 मिनट 43.13 सेकंड में पूरी की. 1997 में कीनिया के डेनियल कोमेन ने 8 मिनट से कम में 2 मील की दौड़ पूरी की.

आपके जीवन का वह कौन सा लक्ष्य है जिसे सभी असंभव मानते हैं? लोग बहुत सी बातें करते होंगे और आपको बताते होंगे कि आप यह नहीं कर सकते या वह नहीं कर सकते. उनकी बातें सुनकर शायद आप भी वही मानने लगे होंगे. हो सकता है आपने जीवन में कभी कोई लक्ष्य बनाए हों जिन्हें आपने बीच रस्ते ही छोड़ दिया या उनकी राह में पहला कदम भी नहीं बढ़ाया. शायद आपने किसी ख़ास नौकरी की चाह की थी. आप कोई किताब लिखना चाहते थे. आपका लक्ष्य कोई सेल्स टार्गेट भी हो सकता है और किसी ख़ास हुनर में कामयाबी पाना भी. आपका ‘4 मिनट में 1 मील’ कोई ऐसी चीज़ हो सकती है जिसे बहुत से लोग पहले ही कर चुके हैं, लेकिन आप अभी भी इसे असंभव मानते हैं. आपको यह जान लेना है कि यह लक्ष्य असंभव नहीं है और आप यह कर सकते हैं. आप भी अपना ‘4 मिनट में 1 मील’ पूरा कर सकते हैं.

For years people believed it was impossible. It was impossible that a man could run a mile in under four minutes. Doctors and Scientists said that the human body could not possibly achieve such a feat; some suggested that the body would break apart before such a speed could be reached. Everyone agreed: the four minute mile was not possible.

Well, not quite everyone. After breaking the 1500m record (the mile is 1600m) Roger Bannister started to believe. He started to believe that the four minute mile could be broken. And that belief made all the difference.It led to increased training and an all out effort to break the barrier.

Then on May 6, 1954 this happened:

Roger Bannister had done it. He had broken the four minute mile; a barrier thought impossible. Now he had proven that it could be done. Other people now had the evidence that the four minute mile could be broken. Other people had the belief.

In the days and years that followed, that belief turned into results:

  • Just 46 days later Jim Landry of Australia broke the record again.
  • Less than two months after that both Landry and Bannister both broke four minutes in the same race
  • Since then thousands of people have run the mile in under four minutes
  • In the next 30 years the record was broken 16 more times
  • The record now stands at 3 minutes and 43 seconds
  • Even high school students have broken the four minute mile
  • In 1997 Daniel Komen of Kenya double the feet running TWO miles in LESS THAN EIGHT minutes.

Each of these feats took Roger Bannister breaking the record to show the way. To show them that it was possible. To break the barrier that others had put up. Once the barrier was broken by Bannister, everyone else followed suit.

What is your “Four Minute Mile”?

What is the thing in your life that everyone thinks is impossible? What is the thing that you keep hearing can’t be done? Maybe you even believe it. Perhaps it is a goal you have given up on, or a sales target you think can’t be achieved. It might be the next step to success in your field.

Your four minute mile might even be something that others have accomplished. It just might seem impossible to you. You need to treat this goal as a four minute mile, and know you can do it, that you can break your four minute mile.

“Every time I ran the mile I was aware of my own weakness, there was some opponent who could give me a hell of a fight, so I never went into a race with a sense of invincibility. I always had that feeling of fragility and nerves which made me run faster.” – Roger Bannister.

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