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ज़िंदगी को कीजिए ‘रीसेट’ – Press the Reset Button On Your Life

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ज़िंदगी हमें हर समय किसी-न-किसी मोड़ पर उलझाती रहती है. हम अपने तयशुदा रास्ते से भटक जाते हैं और मंजिल आँखों से ओझल हो जाती है. ऐसे में मैं हमेशा से यही ख्वाहिश करता आया हूँ कि काश मेरे पास ज़िंदगी को नए सिरे से शुरू करने के लिए कोई रीसेट बटन होता जैसा मोबाइल या कम्प्युटर में होता है, और ऐसा सोचनेवाला शायद मैं अकेला शख्स नहीं हूँ.

यकीनन, हमारे पास बीते समय में लौटने के लिए कोई टाइम मशीन नहीं है लेकिन कुछ तो ऐसा है जिससे हम अपने जीवन को रीसेट या रीबूट कर सकते हैं.

और ऐसा करने के लिए कोई खास दिन जैसे नया साल या जन्मदिन या और कोई किसी खास मौके की राह तकना वक़्त की बर्बादी ही होगी. आज यह पल ही वह सबसे बेहतर अवसर है जब हम अपने अतीत को पीछे छोड़कर एक नयी शुरुआत कर सकते हैं.

हमारी मुख्य समस्या यह है कि हम अपने नए लक्ष्यों के बारे में सोचकर उत्साहित तो बहुत हो जाते हैं लेकिन उन्हें जीवन में उतारने का लिए ज़रूरी मेहनत नहीं करते. फिर कुछ समय बीतते-बीतते हमें यह अहसास हो जाता है कि हम कुछ भी हासिल नहीं कर पाए. हम कहाँ चूक कर बैठे?

ऐसे में हमें इस बात को मन में बिठाना चाहिए कि कुछ हासिल करने के लिए मेहनत करने और अनुशासित रहने से भी ज़रूरी यह है कि हम भली-भांति सोच-विचार कर अपने लक्ष्य बनाएं. यदि हम अपनी सामाजिक हैसियत बढ़ाने (जैसे ज्यादा पैसा कमाने या नया सामान खरीदने) के लिए लक्ष्य बना रहे हैं तो शायद हमारा हौसला जल्द ही पस्त पड़ जाएगा क्योंकि हम इसे पूरे दिल से नहीं बनाते क्योंकि ये वे बातें हैं जो हम दूसरों को प्रभावित करने के लिए करना चाहते हैं.

इसलिए सबसे पहला चरण यह है कि हम अपने दिल के भीतर टटोलें और उस चीज़ की पहचान करें जो हमारे लिए सबसे कीमती है. और फिर उसे पाने के लिए आगे बढ़ें. सोचें कम, करें ज्यादा.

अपनी ज़िंदगी को रीसेट करने के लिए आप इन सुझावों को भी अपना सकते हैं:

स्वास्थ्य:-

बेहतर स्वास्थ्य की ओर: आज और इसी वक़्त से अपने खानपान की आदतों में सुधार कीजिये. यदि आपने शाकाहारी बनने या वीगन डाईट अपनाने का तय किया है तो इसे अमल में लाइए. प्रोसेस्ड फ़ूड, जंक फ़ूड, चिप्स, सॉफ्ट ड्रिंक्स, कैंडी वगैरह को अपने आहार से बाहर कीजिये.

मास्टर क्लींजिंग आजमाइए: दस दिनों की डिटॉक्सीफिकेशन डाईट से आपका स्वास्थ्य रीबूट होगा और आपके आहार में बदलाव आएगा. मैं ऐसा तीन बार कर चुका हूँ. इससे शरीर और मन के बीच तादात्म्य स्थापित होता है. जब हमारी ऊर्जा भोजन को पचाने में खर्च नहीं होती है तो हमारा शरीर स्वयं को व्यवस्थित करने लगता है. उपवास करके देखिये और आप जान जायेंगे कि हम अपने समय का कितना बड़ा हिस्सा खाना बनाने और खाने में लगा देते हैं.

सरल-सहज जीवन:-

जंजाल से छुटकारा: अपने आसपास फैले सामान और कबाड़ को उलटिए पलटिये और उनकी तीन ढेरियाँ बनाइये – रिसाइकल, दान, और उपयोग. जिन वस्तुओं को आपने बहुत समय से इस्तेमाल नहीं किया है उन्हें उनकी कंडीशन के अनुसार या तो फेंक दीजिये, या किसी को दे दीजिये, या बेच दीजिये. इसी तरह अपनी मेज की दराज, आलमारी, गैरेज, और शेल्फ की सफाई कीजिये.

अपने मन को विस्तार दें: हम बहुत सारा समय अपने माहौल को व्यवस्थित करने में लगाते हैं लेकिन अपने उस स्पेस की अनदेखी करते हैं जिसमें हमारा सबसे ज्यादा समय बीतता है, और वह है हमारा मन. अपने मन को रीबूट करने के लिए उन नकारात्मक विश्वासों से छुटकारा पाइए जो आपको कमजोर बनाते हैं. अपने मन से उन बातों को बाहर निकालिए जो आपको आगे नहीं ले जातीं. हद से ज्यादा दूसरों की परवाह मत कीजिये, अहंकार वश लिए गए अनावश्यक संकल्पों को पूरा करने में मत जुटें.

घर-परिवार-संबंध:-

जुड़ाव और मेलमिलाप रखिये: हमारी ज्यादातर महत्वाकांक्षाओं के केंद्र में हम ही होते हंन लेकिन इनके लिए हमें अपने संबंधों की अवहेलना नहीं करनी चाहिए. अपने परिवार और बच्चों के साथ बिताये गए लम्हे कभी व्यर्थ नहीं जाते. अपने माता-पिता से और अधिक जुड़ने का प्रयास कीजिये क्योंकि उन्हें हर बीतते दिन के साथ आपकी अधिक ज़रुरत होती है. किसी व्यक्ति से पुराना वैरभाव हो तो खुद आगे बढ़कर उसे दूर कीजिये. किसी कड़वी बात को भुलाने और किसी को माफ़ करने के लिए किसी मौके की तलाश नहीं कीजिए.

रोमांटिक बनिए: अपने कैरियर, नौकरी-बिजनेस, और स्वास्थ्य को केंद्र में रखकर बनाए गए लक्ष्यों को पूरा करने की आपाधापी में ज़िंदगी से रोमांस पीछे छूट जाता है. इसे ज़िंदगी में वापस लाना आसान है. अपने प्रियजन के साथ वक़्त बिताइए, कहीं सैर पर जाइए. उनके लिए कोई उपहार खरीदिये. साथ बैठकर कॉफ़ी पीना और फिल्म देखना भी शुरुआत के लिए कुछ बुरा नहीं है.

रुपये-पैसे, खर्चे, कमाई:-

अपने बैंक अकाउंट का जायजा लें: छुट्टियों या त्यौहारों के दौरान खर्चे आसमान छूने लगते हैं. जब सभी उपहारों का आदान-प्रदान कर रहे हों तो खुद को काबू में रखना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में मॉल्स और दुकानों में बम्पर सेल और ऑफर भी बड़े लुभावने मिलते हैं. लेकिन ऐसे समय पर ही अपने खर्च पर ध्यान देने की ज़रुरत होती है. अपने ज़रूरी खर्चों के लिए बचत करना, फालतू के खर्चों को नियंत्रित करना, और आड़े वक़्त के लिए पैसे बचाकर रखना ही सबसे अच्छी नीति है.

अपने हुनर और काबिलियत को निखारें: पेन और पेपर लें. पेपर के बीच एक लाइन खींचकर दो कॉलम बनायें. पहले कॉलम में अपने पिछले तीस दिनों के सारे गैरज़रूरी खर्चे लिखें जैसे अनावश्यक कपड़ों, शौपिंग, जंक फ़ूड, सिनेमा, मौज-मजे में खर्च की गयी रकम. हर महीने चुकाए जाने वाले ज़रूरी बिलों की रकम इसमें शामिल न करें. अब दूसरे कॉलम में उन चीज़ों के बारे में लिखें जिन्हें आप पैसे की कमी के कारण कर नहीं पा रहे हैं. शायद आप किसी वर्कशौप या कोचिंग में जाना चाहते हों या आपको एक्सरसाइज बाइक खरीदनी हो. आप पहले कॉलम में किये गए खर्चों में कटौती करके दुसरे कॉलम में शामिल चीज़ों के लिए जगह बना सकते हैं.

फिटनेस:-

फिटनेस के लिए ज़रूरी लय बनाए रखें: आप कई तरह के फिटनेस प्रोग्राम और लक्ष्य तय कर सकते हैं. बदलते हुए वातावरण और तनावपूर्ण जीवन के कारण अब यह बहुत ज़रूरी हो गया है कि हम नियमित रूप से किसी शारीरिक गतिविधि में शामिल हों. इसके लिए यह ज़रूरी है कि हम फिटनेस के लिए की जाने वाली गतिविधियों जैसे सुबह की सैर, जॉगिंग, योग आदि की लय को बनाए रखें. यदि हम अनुशासित रहकर अपनी गतिविधि को नियमित रूप से करेंगे तो इसका लाभ हमें तो मिलेगा ही बल्कि हमारे करीबी भी अपनी फिटनेस बनाए रखने के लिए प्रेरित होंगे. इस लक्ष्य को हासिल करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि हम किसी ऐसे ग्रुप में शामिल हो जाएँ जो किसी निश्चित स्थान पर रोज़ एकत्र होता है.

बोनस टिप: हम कई अवसरों पर खुद को पीछे कर देते हैं क्योंकि हमें कुछ पता नहीं होता या हम यह नहीं जानते कि शुरुआत कहाँ से करें. ऐसे में “मैं नहीं जानता” कहने के बजाय “मैं यह जानकर रहूँगा” कहने की आदत डालें. यह टिप दिखने में आसान है पर बड़े करिश्मे कर सकती है. इसे अपनाकर आप बिजनेस में आगे रहने के लिए ज़रूरी आक्रामकता दिखा सकते हैं. आप योजनाबद्ध तरीके से अपनी किताबें छपवा सकते हैं. और यदि आप ठान ही लें तो पूरी दुनिया घूमने के लिए भी निकल सकते हैं. संकल्प लें कि आप जानकारी नहीं होने को अपनी प्रगति की राह का रोड़ा नहीं बनने देंगे.

आभासी दुनिया से बाहर निकलना: ईमेल, फेसबुक, ट्विटर, चैट, मोबाइल और शेयरिंग की दुनिया में यह बहुत संभव है कि आप वास्तविक दुनिया से दूर होते जाएँ. ये चीज़ें बुरी नहीं हैं लेकिन ये वास्तविक दुनिया में आमने-सामने घटित होनेवाले संपर्क का स्थान नहीं ले सकतीं. लोगों से मेलमिलाप रखने, उनके सुख-दुःख में शरीक होने से ज्यादा कनेक्टिंग और कुछ नहीं है. आप चाहे जिस विधि से लोगों से जुड़ना चाहें, आपका लक्ष्य होना चाहिए कि आप लम्बे समय के लिए जुड़ें. दोस्तों की संख्या नहीं बल्कि उनके साथ की कीमत होती है.

इस तरह आप ऊपर बताये गए सुझावों और तरीकों को अपने जीवन में अमल में लाकर अपनी ज़िंदगी को एक नए और खुशनुमा मोड़ पर लाने के लिए रीसेट कर सकते हैं. और मैं यह एक बार और कहूँगा – इसके लिए सबसे अच्छा दिन है ‘आज’, और सबसे अच्छा वक़्त है ‘अभी’.

(लियो बबौटा के लेख “How to Press the Reset Button On Your Life” का हिंदी अनुवाद)

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आख़री सफ़र

(अमरीकन लेखक केंट नेर्बर्न ने आध्यात्मिक विषयों और नेटिव अमरीकन थीम पर कई पुस्तकें लिखीं हैं. नीचे दिया गया प्रसंग उनकी एक पुस्तक से लिया गया है)

बीस साल पहले मैं आजीविका के लिए टैक्सी चलाने का काम करता था. घुमंतू जीवन था, सर पर हुक्म चलानेवाला कोई बॉस भी नहीं था.

इस पेशे से जुडी जो बात मुझे बहुत बाद में समझ आई वह यह है कि जाने-अनजाने मैं चर्च के पादरी की भूमिका में भी आ जाता था. मैं रात में टैक्सी चलाता था इसलिए मेरी टैक्सी कन्फेशन रूम बन जाती थी. अनजान सवारियां टैक्सी में पीछे बैठतीं और मुझे अपनी ज़िंदगी का हाल बयान करने लगतीं. मुझे बहुत से लोग मिले जिन्होंने मुझे आश्चर्यचकित किया, बेहतर होने का अहसास दिलाया, मुझे हंसाया, कभी रुलाया भी.

इन सारे वाकयों में से मुझे जिसने सबसे ज्यादा प्रभावित किया वह मैं आपको बताता हूँ. एक बार मुझे देर रात शहर के एक शांत और संभ्रांत इलाके से एक महिला का फोन आया. हमेशा की तरह मुझे लगा कि मुझे किन्हीं पार्टीबाज, झगड़ालू पति-पत्नी-प्रेमिका, या रात की शिफ्ट में काम करनेवाले कर्मचारी को लिवाने जाना है.

रात के ढाई बजे मैं एक छोटी बिल्डिंग के सामने पहुंचा जिसके सिर्फ ग्राउंड फ्लोर के एक कमरे की बत्ती जल रही थी. ऐसे समय पर ज्यादातर टैक्सी ड्राईवर दो-तीन बार हॉर्न बजाकर कुछ मिनट इंतज़ार करते हैं, फिर लौट जाते हैं. लेकिन मैंने बहुत से ज़रूरतमंद देखे थे जो रात के इस पहर में टैक्सी पर ही निर्भर रहते हैं इसलिए मैं रुका रहा.

यदि कोई खतरे की बात न हो तो मैं यात्री के दरवाजे पर पहुँच जाता हूँ. शायद यात्री को मेरी मदद चाहिए, मैंने सोचा.

मैंने दरवाजे को खटखटाकर आहट की. “बस एक मिनट” – भीतर से किसी कमज़ोर वृद्ध की आवाज़ आई. कमरे से किसी चीज़ को खसकाने की आवाज़ आ रही थी.

लम्बी ख़ामोशी के बाद दरवाज़ा खुला. लगभग अस्सी साल की एक छोटी सी वृद्धा मेरे सामने खड़ी थी. उसने चालीस के दशक से मिलती-जुलती पोशाक पहनी हुई थी. उसके पैरों के पास एक छोटा सूटकेस रखा था.

घर को देखकर यह लग रहा था जैसे वहां सालों से कोई नहीं रहा है. फर्नीचर को चादरों से ढांका हुआ था. दीवार पर कोई घड़ी नहीं थी, कोई सजावटी सामान या बर्तन आदि भी नहीं थे. एक कोने में रखे हुए खोखे में पुराने फोटो और कांच का सामान रखा हुआ था.

“क्या तुम मेरा बैग कार में रख दोगे?” – वृद्धा ने कहा.

सूटकेस कार में रखने के बाद मैं वृद्धा की सहायता के लिए पहुंचा. मेरी बांह थामकर वह धीमे-धीमे कार तक गयी. उसने मुझे मदद के लिए धन्यवाद दिया.

“कोई बात नहीं” – मैंने कहा – “मैंने आपकी सहायता उसी तरह की जैसे मैं अपनी माँ की मदद करता.”

“तुम बहुत अच्छे आदमी हो” – उसने कहा और टैक्सी में मुझे एक पता देकर कहा – “क्या तुम डाउनटाउन की तरफ से चल सकते हो?”

“लेकिन वह तो लम्बा रास्ता है? – मैंने फ़ौरन कहा.

“मुझे कोई जल्दी नहीं है” – वृद्धा ने कहा – “मैं होस्पिस जा रही हूँ”.
(होस्पिस में मरणासन्न बूढ़े और रोगी व्यक्ति अपने अंतिम दिन काटते हैं.)

मैंने रियर-व्यू-मिरर में देखा. उसकी गीली आंखें चमक रहीं थीं.

“मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है” – उसने कहा – “डॉक्टर कहते हैं कि मेरा समय निकट है”.

मैंने मीटर बंद करके कहा – “आप जिस रास्ते से जाना चाहें मुझे बताते जाइए”.

अगले दो घंटे तक हम शहर की भूलभुलैया से गुज़रते रहे. उसने मुझे वह बिल्डिंग दिखाई जहाँ वह बहुत पहले लिफ्ट ऑपरेटर का काम करती थी. हम उस मोहल्ले से गुज़रे जहाँ वह अपने पति के साथ नव-ब्याहता बनकर आई थी. मुझे एक फर्नीचर शोरूम दिखाकर बताया कि दसियों साल पहले वहां एक बालरूम था जहाँ वह डांस करने जाती थी. कभी-कभी वह मुझे किसी ख़ास बिल्डिंग के सामने गाड़ी रोकने को कहती और अपनी नम आँखों से चुपचाप उस बिल्डिंग को निहारते रहती.

सुबह की लाली आसमान में छाने लगी. उसने अचानक कहा – “बस, अब और नहीं. मैं थक गयी हूँ. सीधे पते तक चलो”.

हम दोनों खामोश बैठे हुए उस पते तक चलते रहे जो उसने मुझे दिया था. यह पुराने टाइप की बिल्डिंग थी जिसमें ड्राइव-वे पोर्टिको तक जाता था. कार के वहां पहुँचते ही दो अर्दली आ गए. वे शायद हमारी प्रतीक्षा  कर रहे थे. मैंने ट्रंक खोलकर सूटकेस निकाला और उन्हें दे दिया. महिला तब तक व्हीलचेयर में बैठ चुकी थी.

“कितने रुपये हुए” – वृद्धा ने पर्स खोलते हुए पूछा.

“कुछ नहीं” – मैंने कहा.

“तुम्हारा कुछ तो बनता है” – वह बोली.

“सवारियां मिलती रहती हैं” – मैं बोला.

अनायास ही पता नहीं क्या हुआ और मैंने आगे बढ़कर वृद्धा को गले से लगा लिया. उन्होंने मुझे हौले से थाम लिया.

“तुमने एक अनजान वृद्धा को बिन मांगे ही थोड़ी सी ख़ुशी दे दी” – उसने कहा – “धन्यवाद”.

मैंने उनसे हाथ मिलाया और सुबह की मद्धम रोशनी में बाहर आ गया. मेरे पीछे एक दरवाज़ा बंद हुआ और उसके साथ ही एक ज़िंदगी भी ख़ामोशी में गुम हो गयी.

उस दिन मैंने कोई और सवारी नहीं ली. विचारों में खोया हुआ मैं निरुद्देश्य-सा फिरता रहा. मैं दिन भर चुप रहा और सोचता रहा कि मेरी जगह यदि कोई बेसब्र या झुंझलाने वाला ड्राईवर होता तो क्या होता? क्या होता अगर मैं बाहर से ही लौट जाता और उसके दरवाज़े तक नहीं जाता?

आज मैं उस घटनाक्रम पर निगाह डालता हूँ तो मुझे लगता है कि मैंने अपनी ज़िंदगी में उससे ज्यादा ज़रूरी और महत्वपूर्ण कोई दूसरा काम नहीं किया है.

हम लोगों में से अधिकांश जन यह सोचते हैं कि हमारी ज़िंदगी बहुत बड़ी-बड़ी बातों से चलती है. लेकिन ऐसे बहुत से छोटे दिखनेवाले असाधारण लम्हे भी हैं जो हमें खूबसूरती और ख़ामोशी से अपने आगोश में ले लेते हैं.

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नीर-क्षीर विवेक

कुछ लोग कहते है कि हमें किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए. किसी को भला, किसी को बुरा कहना राग-द्वेष है. सही भी है, किसी की निंदा करना बुरा है. किन्तु भले और बुरे में सम्यक भेद करना उससे भी कहीं अधिक उत्तम है. भला-बुरा, हित-अहित और सत्यासत्य का विवेक रखकर, बुरा अहितकारी और असत्य का त्याग करना. भला, हितकारी और सत्य का आदर करना तो एक आवश्यक गुण ही है. जो जैसा है, उसे वैसा ही, बिना किसी अतिश्योक्ति के निरूपित करना, कहीं से भी बुरा कर्म नहीं है.

एक व्यापारी को एक अपरिचित व्यक्ति के साथ लेन-देन का व्यवहार करना था. रेफरन्स के लिए उसने, उसके परिचित और अपने एक मित्र को पूछा- “यह व्यक्ति कैसा है? इसके साथ लेन देन व्यवहार करनें में कोई हानि तो न होगी”.

उस व्यापारी का मित्र सोचने लगा – ‘मैं किसी के दोष क्यों बताऊँ? दोष दर्शाना तो निंदा है. मुझे तो उसकी प्रसंशा करनी चाहिए.’ इसप्रकार विचार करते हुए उसने उस धूर्त की प्रशंसा ही कर दी. सच्चाई और ईमानदारी के गुण, जो कि उसमें थे ही नहीं, उस धूर्त के लिए गढ़ दिए. मित्र की बात पर विश्वास करके व्यापारी ने उस धूर्त व्यक्ति के साथ व्यवहार कर दिया और कुछ ही समय में धूर्त सब कुछ समेट कर गायब हो गया. ठगा-सा व्यापारी अपने मित्र के पास जाकर कहने लगा- “मैने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था, तुमने मुझे बर्बाद कर दिया. तुम्हारे द्वारा की गई धूर्त की अनावश्यक प्रसंशा ने मुझे तो डुबो ही दिया. तुमने मुझ निरपराध को धोखा क्यों दिया? तुम तो मेरे मित्र-परिचित थे, तुमने उसकी सत्य हक़ीकत छुपा कर झूठी प्रसंशा क्यों की?”

प्रशंसक कहने लगा- “मैं आपका शत्रु नहीं मित्र ही हूँ, और सज्जन भी हूँ. कोई भी भला व्यक्ति, किसी के दोष नहीं देखता, निंदा करना तो पाप है. मैने तुम्हें हानि पहुंचाने के उद्देश्य से उसकी प्रशंसा नहीं की. बल्कि, यह सोचकर कि ‘सज्जन व्यक्ति सभी में गुण ही देखता है’, -मैने तत्काल प्रशंसा की”.

“तो क्या उसमें ईमानदारी और सच्चाई के गुण थे?”

“हाँ, थे न! वह पहले ईमानदारी प्रदर्शित करके ही तो अपनी प्रतिष्ठा जमाता था. वह सच्चाई व ईमानदारी से साख जमा कर प्रभावशाली व्यवहार से रहा करता था. धोखा तो मात्र उसने अंतिम दिन ही दिया जबकि लंबी अवधि तक वह नैतिक ही बना रहा. अधिकाल गुणों की उपेक्षा करना और थोड़े से दोषों को दिखाकर निंदा करना तो पाप है. भला मैं ऐसा पाप क्यों करूँ?” – उसने सफाई दी.

“वाह! भाई वाह! तुम्हारा चिंतन और गुणग्राहकता कमाल की है. तुम्हारी इस सज्ज्ननता ने, मेरी तो लुटिया ही डुबो दी. तुम्हारी गुणग्राहकता तो उस ठग की सहयोगी ही बन गई. उसकी ईमानदारी और सच्चाई तो प्रदर्शन मात्र थी, केवल धूर्तता के लिए ही थी. भीतर तो बेईमानी ही छुपी थी. मैने आज यह समझा कि तुम्हारे जैसे गुणग्राहक तो धूर्तों से भी अधिक खतरनाक होते है”. – व्यापारी अपने भाग्य को कोसता हुआ चला गया.

यदि कोई वैद्य या डॉक्टर रोगी में रोग के लक्षणों को उजागर न करे, या फिर रोग को उजागर करना बुरा माने, अथवा ऐसा करने को सेहत की श्रेष्ठता का बखान माने, अथवा सेहत और रोग के लक्षणों को समभाव से समान मानकर उनका विश्लेषण ही न करे तो निदान कैसे होगा? और अन्ततः वह रोग कारकों से बचने का परामर्श न दे. कुपथ्य से परहेज का निर्देश न करे. उपचार हेतु कड़वी दवा न दे तो रोगी का रोग से पिंड कैसे छूटेगा? ऐसा करता हुआ डॉक्टर कर्तव्यनिष्ट सज्जन कहलाएगा या मौत का सौदागर?

कोई भी समझदार व्यकितु कांटों को फूल नहीं कहता, विष को अमृत समझकर ग्रहण नहीं करता. गोबर और हलवे के प्रति समभाव रखकर कौन समाचरण करेगा? छोटा बालक यदि गोद में गंदगी कर कपड़े खराब कर दे तो कहना ही पड़ता है कि ‘उसने गंदा कर दिया’. न कि यह कहेंगे ‘उसने अच्छा किया’. इस प्रकार बुरा कहना बच्चे के प्रति द्वेष नहीं है. बुरे को बुरा कहना सम्यक् आचरण है.

संसार में अनेक मत-मतान्तर है. उसमें से जो हमें अच्छा, उत्तम और सत्य लगे, उसे मानें, तो यह हमारा अन्य के साथ द्वेष नहीं है बल्कि विवेक है. विवेकपूर्वक हितकारी को अंगीकार करना और अहितकारी को छोड़ना ही चेतन के लिए कल्याणकारी है.

भले बुरे में भेद कर, बुरे का त्याज्य और भले का अनुकरणीय विवेक करना ही, नीर-क्षीर विवेक है.

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गतानुगतिको … : लकीर का फकीर यह संसार

अपने छात्रजीवन में मैंने एक नीतिश्लोक पढ़ा था जो मुझे अपनी कमजोर स्मरणशक्ति के बावजूद आज भी याद है, शायद इसलिए कि उसमें व्यक्त विचार गंभीर एवं सार्थक हैं. श्लोक यूं है:

गतानुगतिको लोको न लोको पारमार्थिकः

बालुकालिङ्गमात्रेण गतं मे ताम्रभाजनम्.

इसकी व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है: यह संसार गतानुगतिक (पीछे-पीछे चलने वाला) अर्थात् लकीर का फकीर है. यहां लोग दूसरों के हित-अहित को ध्यान में रखकर कर्म नहीं करते. (इस लौकिक व्यवहार के कारण ही तो) मेरा तांबे का बर्तन महज बालू के (शिव)लिंग के कारण खो गया .

उक्त नीतिवचन का मूल स्रोत मुझे नहीं मालूम. मैंने इसे अपने पाठ्यक्रम के किसी पुस्तक में एक लघुकथा के संदर्भ में पढ़ा था. उस कथा के संक्षिप्त उल्लेख से इस श्लोक का तात्पर्य अधिक रोचक तरीके से समझा जा सकता है. कथा इस प्रकार है:

एक परिव्राजक (भ्रमणरत साधु) एक बार प्रातः एक नदी के किनारे पहुंचा. उसने उस नदी के पास ही कहीं एकांत में शौचादि कर्मों से निवृत्त होने का निर्णय लिया. तांबे का एक बर्तन ही उसकी कुल ‘संपत्ति’ थी जिसे वह छिपा के रखना चाहता था. उसे भय था कि उसकी अनुपस्थिति में उस बर्तन पर किसी चोर-उचक्के की नजर पड़ सकती है और वह उसे खो सकता है. अतः उसने एक तरकीब सोची. नदी के किनारे विस्तृत क्षेत्र में फैली बालू में उसने हाथ से एक गड्ढा बनाया . उसने उसमें अपना तांबे का बर्तन रखा और बालू से ढककर उसके ऊपर बालू का ही एक शिवलिंग बना दिया, ताकि उस स्थल की पहचान वह बाद में कर सके. आने-जाने वाले किसी को किसी प्रकार का शक न होने पावे इस उद्येश्य से उसने आसपास से फूल-पत्ते तोड़कर लिंग के ऊपर चढ़ा दिये, ताकि लोग पवित्र तथा पूज्य मानते हुए उसके साथ छेड़-छाड़ न कर सकें.

किंचित्‌ विलंब के बाद वह उस स्थल पर लौटा तो वहां का दृश्य देख स्तब्ध रह गया. उसने पाया कि इस बीच उस स्थान से गुजरने वाले लोगों ने भी एक-एक कर अनेकों लिंग वहां स्थापित कर दिये थे. कदाचित् परिव्राजक द्वारा स्थापित उस लिंग को देख लोगों ने सोचा कि वहां उस दिन बालुका-लिंग स्थापना के साथ उसकी पूजा का विधान है और तदनुसार अधिक सोच-विचार किये बिना उन्होंने भी वैसा ही किया. उनके इस रवैये का फल परिव्राजक को भुगतना पड़ा, जिसके लिए अपना ताम्रपात्र ढूंढ़ना कष्टप्रद हो गया. तब उसके मुख से उक्त नीतिवचन निकले.

किसी कथा को शब्दशः नहीं स्वीकारा जा सकता. महत्त्व तो उसमें निहित संदेश का रहता है. उक्त कथा इस तथ्य पर जोर डालती है कि मनुष्य समाज में कम ही लोग होते हैं जो किसी मुद्दे पर विवेकपूर्ण चिंतन के पश्चात् स्वतंत्र धारणा बनाते हैं और तदनुकूल व्यवहार करते हैं. अधिकतर लोग लकीर के फकीर बनकर व्यापक स्तर पर लोगों को जो कुछ करते हुए पाते हैं वही स्वयं भी करने लगते हैं. अंध नकल की यह प्रवृत्ति आम बात है. सामाजिक कुरीतियां ऐसे ही व्यवहार के दृष्टांत मानी जा सकती हैं. – योगेन्द्र जोशी

योगेन्द्र जोशी काशी हिंदू वि.वि. में भौतिकी पढ़ाते थे. अब स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर अपनी अभिरुचियों के अनुसार समय-यापन कर रहे हैं. उनके ब्लॉग “ज़िंदगी बस यही है” और “विचार संकलन” रोचक, ज्ञानवर्धक और पठनीय हैं.

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बोंसाई और हम

यह अंग्रेजी ब्लॉग बिकमिंग मिनिमलिस्ट्स के लेखक जोशुआ बेकर की अतिथि पोस्ट है.

“Never underestimate the power of dreams and the influence of the human spirit. We are all the same in this notion: The potential for greatness lives within each of us.” – William Rudolph

जब मैं छोटा था तब हमारा परिवार अक्सर ही बोंसाई वृक्षों की प्रदर्शनी देखने के लिए जाता था. हमारे समुदाय में बोंसाई वृक्ष उगानेवाले बहुत से सदस्य थे जो अपनी कला को निखारने के लिए एक-दूसरे से नियमित रूप से मिलते थे. हर साल लगनेवाले मेले में समूह के सदस्य अपने लगाए बोंसाई वृक्ष प्रदर्शित करते थे. प्रदर्शनी में आमतौर से सौ के लगभग वृक्ष रखे जाते थे और वे हर आकार-प्रकार, रंग-रूप और प्रजाति के होते थे. कुछ वाकई बहुत आकर्षक होते थे और कुछ अनगढ़ से, लेकिन उन्हें देखने के लिए बहुत लोग आते थे.

उन दिनों मुझे यह लगता था कि बोंसाई के वृक्ष विशेष प्रकार के वृक्ष होते थे और वे छोटे आकार में ही उगते थे. कुछ बड़ा होने पर ही मुझे यह पता चला कि वे छोटे वृक्ष उन प्रजातियों के बड़े वृक्षों से बहुत अलग नहीं हैं. यदि उन्हें भी स्वतन्त्र रूप से उगने दिया जाए तो वे भी विशालकाय हो जायेंगे. लेकिन उन्हें छोटे-छोटे उथले गमलों में उगाया जाता है. उनकी जड़ें बहुत बेरहमी से काट दी जातीं हैं और शाखाओं को मनचाहे आकार में छांट कर धातु के तारों से उमेठकर वृक्ष का रूप दे दिया जाता है. इस प्रकार, बोंसाई वृक्षों को उनके स्वाभाविक रूप में उगने नहीं दिया जाता है. उनके विकास के हर संभव प्रयास का दमन कर दिया जाता है. उन्हें कम-से-कम पानी और न के बराबर मिट्टी और खाद में पनपने की आदत डाली जाती है.

आज मुझे लगता है कि मैं बोंसाई बनाने की कला और सौंदर्य को समझने लगा हूँ, फिर भी मुझे इस कार्य में एक अजीब सी त्रासदी दिखती है. बोंसाई की कला विशालकाय और प्रभावशाली वृक्ष के रूप में पनपने की संभावना को कुचलकर उसे निर्ममता से सीमित कर देती है.

इसके साथ ही साथ मेरा ध्यान हम सबके जीवन में हर दिन घट रही ऐसी ही त्रासदियों की ओर भी जाता है. हमारे भीतर भी अपरिमित विकास और संभावनाओं के बीज हैं. हम सब अद्वितीय हैं और हमारे जीवन के पीछे विशेष प्रयोजन हैं.

हम यदि चाहें तो अपने और दूसरों के जीवन में महत्वपूर्ण सकारात्मक परिवर्तन लाकर इस दुनिया को बदलने की ताक़त रखते हैं, लेकिन अक्सर यही देखने में आता है कि हमारी आत्मोन्नति की राह में अनेक अवरोध खड़े हो जाते हैं.

लेकिन हमारे विकास की राह के अवरोध उथले गमले, मिट्टी, या काट-छांट आदि नहीं हैं. जिन चीज़ों की वज़ह से हमारी ज़िंदगी की राह थम जाती है वे ये हैं:

  • अस्वास्थ्यकर आदतें
  • मिथ्याभिमान
  • अदूरदर्शितापूर्ण उद्देश्य
  • उपभोगिता/विलासिता
  • संबंधों में छिछलापन
  • भीतर घर कर चुके डर
  • अतीत से असहज जुड़ाव

आपका और हमारा जीवन इस सृष्टि के लिए महत्वपूर्ण है. यह कितना ही अस्पष्ट क्यों न हो पर हममें से प्रत्येक जन के अस्तित्व का एक गहन प्रयोजन है. हमारे ऊपर इसका उत्तरदायित्व है कि हम अपने महत्व और मूल्य को कभी कम करके नहीं आकें और हर उस छोटे/बड़े बदलाव का संवाहक बनें जो हमारी और इस दुनिया की बेहतरी के लिए सामने आये.

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