Category Archives: दार्शनिक

The Rumor Mill – तीन छन्नियां

प्राचीन यूनान में सुकरात अपने ज्ञान और विद्वता के लिए बहुत प्रसिद्द था. सुकरात के पास एक दिन उसका एक परिचित व्यक्ति आया और बोला, “मैंने आपके एक मित्र के बारे में कुछ सुना है.”

“दो पल रुको”, सुकरात ने कहा, “मुझे कुछ बताने से पहले मैं चाहता हूँ कि हम एक छोटा सा परीक्षण कर लें जिसे मैं ‘तीन छन्नियों का परीक्षण’ कहता हूँ”.

“तीन छन्नियाँ? कैसी छन्नियाँ?”, परिचित ने पूछा.

“हाँ”, सुकरात ने कहा, “मुझे मेरे मित्र के बारे में कुछ बताने से पहले हमें यह तय कर लेना चाहिए कि तुम कैसी बात कहने जा रहे हो. किसी भी बात को जानने से पहले मैं यह तीन छन्नियों का परीक्षण करता हूँ. इसमें पहली छन्नी सत्य की छन्नी है. क्या तुम सौ फीसदी दावे से यह कह सकते हो कि जो बात तुम मुझे बताने जा रहे हो वह पूर्णतः सत्य है?

“नहीं”, परिचित ने कहा, “दरअसल मैंने सुना है कि…”

“ठीक है”, सुकरात ने कहा, “इसका अर्थ यह है कि तुम आश्वस्त नहीं हो कि वह बात पूर्णतः सत्य है. चलो, अब दूसरी छन्नी का प्रयोग करते हैं जिसे मैं अच्छाई की छन्नी कहता हूँ. मेरे मित्र के बारे में तुम जो भी बताने जा रहे हो क्या उसमें कोई अच्छी बात है?

“नहीं, बल्कि वह तो…”, परिचित ने कहा.

“अच्छा”, सुकरात ने कहा, “इसका मतलब यह है कि तुम मुझे जो कुछ सुनाने वाले थे उसमें कोई भलाई की बात नहीं है और तुम यह भी नहीं जानते कि वह सच है या झूठ. लेकिन हमें अभी भी आस नहीं खोनी चाहिए क्योंकि छन्नी का एक परीक्षण अभी बचा हुआ है. और वह है उपयोगिता की छन्नी. जो बात तुम मुझे बतानेवाले थे, क्या वह मेरे किसी काम की है?”

“नहीं, ऐसा तो नहीं है”, परिचित ने कहा.

“बस, हो गया”, सुकरात ने कहा, “जो बात तुम मुझे बतानेवाले थे वह न तो सत्य है, न ही भली है, और न ही मेरे काम की है, तो मैं उसे जानने में अपना कीमती समय क्यों नष्ट करूं?”

* * * * * * * * * *

In ancient Greece, Socrates was reputed to hold knowledge in high esteem. One day an acquaintance met the great philosopher and said, “Do you know what I just heard about your friend?”

“Hold on a minute,” Socrates replied. “Before telling me anything I’d like you to pass a little test. It’s called the Triple Filter Test.”

“Triple filter?”

“That’s right,” Socrates continued. “Before you talk to me about my friend, it might be a good idea to take a moment and filter what you’re going to say. That’s why I call it the triple filter test. The first filter is Truth. Have you made absolutely sure that what you are about to tell me is true?”

“No,” the man said, “actually I just heard about it and…”

“All right,” said Socrates. “So you don’t really know if it’s true or not. Now let’s try the second filter, the filter of goodness. Is what you are about to tell me about my friend something good?”

“No, on the contrary…”

“So,” Socrates continued, “you want to tell me something bad about him, but you’re not certain it’s true. You may still pass the test though, because there’s one filter left: the filter of usefulness. Is what you want to tell me about my friend going to be useful to me?”

“No not really …”

“Well,” concluded Socrates, “if what you want to tell me is neither true nor good nor even useful, why tell it to me at all?” This is why Socrates was a great philosopher & held in such high esteem.

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तीन उत्तर – Three Answers

चेन ज़िकिन ने कन्फ्यूशियस के पुत्र से पूछा, “क्या तुम्हारे पिता ने तुम्हें ऐसा कुछ भी सिखाया है जो हम नहीं जानते?”

“नहीं”, कन्फ्यूशियस के पुत्र ने कहा, “लेकिन एक बार जब मैं अकेला था तो उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं कविता पढ़ता हूँ या नहीं. मेरे ‘ना’ करने पर वे बोले कि मुझे कविता पढ़ना चाहिए क्योंकि यह आत्मा को दिव्य प्रेरणा के पथ पर अग्रसर करती है”.

“और एक बार उन्होंने मुझसे देवताओं को अलंकृत करने की रीतियों के बारे में पूछा. मैं यह नहीं जानता था इसलिए उन्होंने मुझे इसका अभ्यास करने के लिए कहा   ताकि देवताओं को अलंकृत करने से मैं स्वयं का बोध भी कर सकूं. लेकिन उन्होंने यह देखने के लिए मुझपर नज़र नहीं रखी कि मैं उनकी आज्ञाओं का पालन कर रहा हूँ या नहीं.”

वहां से चलते समय चेन ज़िकिन ने मन-ही-मन में कहा:

“मैंने उससे एक प्रश्न पूछा और मुझे तीन उत्तर मिले. मैंने काव्य के बारे में कुछ जाना. मुझे देवताओं को अलंकृत करने के विषय में भी ज्ञान मिला. और मैंने यह भी सीखा कि ईमानदार व्यक्ति दूसरों की ईमानदारी की छानबीन नहीं करते”.

Chen Ziqin asked Confucius’s son: “does your father teach you something that we don’t know?”

The other answered: “No. Once, when I was alone, he asked if I read poetry. I said no, and he told me to read some, because poetry opens the soul to the path of divine inspiration.

“On another occasion he asked whether I practiced the rituals of adoration of God. I said no, and he told me to do so, because the act of adoring would make me understand myself. But he never kept an eye on me to see if I was obeying him.”

When Chen Ziqin left, he said to himself:

“I asked one question and was given three answers. I learned something about poetry. I learned something about the rituals of adoration. And I learned that an honest man never spies on the honesty of others.”

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Real Beauty – वास्तविक सौंदर्य

हर सुबह घर से निकलने के पहले सुकरात आईने के सामने खड़े होकर खुद को कुछ देर तक तल्लीनता से निहारते थे.

एक दिन उनके एक शिष्य ने उन्हें ऐसा करते देखा. आईने में खुद की छवि को निहारते सुकरात को देख उसके चेहरे पर बरबस ही मुस्कान तैर गयी.

सुकरात उसकी ओर मुड़े, और बोले, “बेशक, तुम यही सोचकर मुस्कुरा रहे हो न कि यह कुरूप बूढ़ा आईने में खुद को इतनी बारीकी से क्यों देखता है!? और मैं ऐसा हर दिन ही करता हूँ.”

शिष्य यह सुनकर लज्जित हो गया और सर झुकाकर खड़ा रहा. इससे पहले कि वह माफी मांगता, सुकरात ने कहा, “आईने में हर दिन अपनी छवि देखने पर मैं अपनी कुरूपता के प्रति सजग हो जाता हूँ. इससे मुझे ऐसा जीवन जीने के लिए प्रेरणा मिलती है जिसमें मेरे सद्गुण इतने निखरें और दमकें कि उनके आगे मेरे मुखमंडल की कुरूपता फीकी पड़ जाए”.

शिष्य ने कहा, “तो क्या इसका अर्थ यह है कि सुन्दर व्यक्तियों को आईने में अपनी छवि नहीं देखनी चाहिए?”

“ऐसा नहीं है”, सुकरात ने कहा, “जब वे स्वयं को आईने में देखें तो यह अनुभव करें कि उनके विचार, वाणी, और कर्म उतने ही सुन्दर हों जितना उनका शरीर है. वे सचेत रहें कि उनके कर्मों की छाया उनके प्रीतिकर व्यक्तित्व पर नहीं पड़े”.

Every morning, before leaving his home, the great philosopher Socrates used to stand in front of a mirror and gaze attentively at his reflection for several minutes.

One day, a disciple came upon him doing this, and was unable to suppress a smile at the sight of his master examining himself so closely.

Socrates turned to him and said, “You are smiling, no doubt, at the sight of this ugly old fellow staring at himself in the mirror, are you not? I do this everyday.”

Shamed, the disciple bowed his head, but before he could beg pardon, Socrates continued: “On seeing myself in the mirror everyday, I become aware of my own ugliness. This strengthens my resolve to live in a way that the virtue of my work may outshine the unattractiveness of my countenance.”

The disciple exclaimed, “Master, do you mean to say that those who are good looking should not look in a mirror at all?”

“Nothing of the sort” said Socrates. “They should also keep looking in the mirror to remind themselves to think, speak and behave in a way that is as beautiful and striking as they are. May not their actions cast a shadow over their pleasing appearance.”

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Idiot vs. Thinker – मूर्ख बनाम विचारक

कॉलिन विल्सन मशहूर अंग्रेज लेखक हैं और उन्होंने अपराध, रहस्य, और पराविद्या (औकल्ट) पर लगभग 100 से भी अधिक बेस्टसेलर किताबें लिखीं हैं. वर्तमान युग के महत्वपूर्ण दार्शनिकों में उनका नाम शामिल है और उनके प्रशंसक उन्हें जीनियस मानते हैं.

अपनी आत्मकथा के पहले चैप्टर में विल्सन ने बताया है कि अपनी जवानी की शुरुआत में उन्होंने जीवन का सबसे बड़ा चुनाव किया. उनके पिता लाइसेस्टर में जूता उद्योग में मामूली कामगार थे. विल्सन अलबर्ट आइन्स्टीन से प्रभावित थे और स्वयं को आइन्स्टीन के उत्तराधिकारी के रूप में देखते थे, लेकिन घरेलू कठिनाइयों की वज़ह से उन्हें स्कूल छोड़कर 16 वर्ष की उम्र में काम करना पड़ा. एक ऊन फैक्टरी में कुछ समय काम करने के बाद वे किसी प्रयोगशाला में सहायक बन गए. उन्होंने इस जीवन की कल्पना नहीं की थी और उनपर निराशा गहराती गयी. ऐसे में एक दिन उन्होंने आत्महत्या का निर्णय कर लिया.

वे हाइड्रोसायनिक एसिड पीने जा रहे थे तभी उनके मन में कुछ कौंध-सा गया. उन्होंने देखा कि उनके भीतर दो कॉलिन विल्सन थे: पहला, एक मूर्ख और ग्रंथियों का शिकार कॉलिन विल्सन; और दूसरा, विचारक और वास्तविक कॉलिन विल्सन.

विलसन ने आत्मकथा में लिखा, “उस दिन मूर्ख कॉलिन विल्सन ने दोनों को मार दिया होता”.

“उस एक क्षण में मेरा साक्षात्कार सत्य के अद्भुत और विहंगम विस्तार से हुआ जो सर्वव्याप्त और असीम है”.

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Colin Henry Wilson (born 26 June 1931) is a prolific English writer who first came to prominence as a philosopher and novelist. Wilson has since written widely on true crime, mysticism and other topics. He prefers calling his philosophy new existentialism or phenomenological existentialism.

In his autobiography, Wilson describes in the first chapter how he made his own choice. The son of working-class parents from Leicester – his father was in the boot and shoe trade – he was forced to quit school and go to work at 16, even though his ambition was to become “Einstein’s successor.” After a stint in a wool factory, he found a job as a laboratory assistant, but he was still in despair and decided to kill himself.

On the verge of swallowing hydrocyanic acid, he had an insight: there were two Colin Wilsons, one an idiotic, self-pitying teenager and the other a thinking man, his real self.

The idiot, he realized, would kill them both.

“In that moment,” he wrote, “I glimpsed the marvelous, immense richness of reality, extending to distant horizons.”

Achieving such moments of optimistic insight has been his goal and subject matter ever since, through more than 100 books, from his first success, “The Outsider,” published in 1956, when he was declared a major existentialist thinker at 24, to the autobiography.

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Socrates and the Marketplace – बाज़ार में सुकरात

shopसुकरात महान दार्शनिक तो थे ही, उनका जीवन संतों की तरह परम सादगीपूर्ण था. उनके पास कोई संपत्ति नहीं थी, यहाँ तक कि वे पैरों में जूते भी नहीं पहनते थे. फ़िर भी वे रोज़ बाज़ार से गुज़रते समय दुकानों में रखी वस्तुएं देखा करते थे.

उनके एक मित्र ने उनसे इसका कारण पूछा.

सुकरात ने कहा – “जब मैं बाज़ार में घूमता हूं तो मुझे यह देखकर बहुत अच्छा लगता है कि दुनिया में कितनी सारी वस्तुएं हैं जिनके बिना मैं इतना खुश हूँ.”

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True philosopher that he as, Socrates believed that the wise person would instinctively lead a frugal life. He himself would not even wear shoes; yet he fell under the spell of the marketplace and would go there often to look at all the wares on display.

When one of his friends asked why, Socrates said: “I love to go there and discover how many things I am perfectly happy without.”

 

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