Category Archives: कलाकार

माइकलेंजेलो की कलासाधना

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माइकलेंजेलो ने सिस्टाइन चैपल की छत पर ये चित्र सन् 1508 से 1512 मध्य बनाए

जिन लोगों को इटली के सिस्टाइन चैपल (गिरजाघर) में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है वे उसकी भीतरी छत पर अंकित कलाकृतियों को देखकर दांतों तले उंगली दबा लेते हैं. बाइबिल में वर्णित सृष्टि की पूरी कथा वहां पर चित्रों में अंकित है. ‘क्रियेशन ऑफ़ एडम’ चित्र विश्व के अत्यंत प्रसिद्द चित्रों में गिना जाता है और अद्भुत है. चैपल की छत पर तीन सौ से भी अधिक चित्र हैं जिनमें से कुछ तो अठारह फुट तक लम्बे हैं.

इन कलाकृतियों के महान चित्रकार माइकलेंजेलो का जन्म इटली में फ्लोरेंस के एक गरीब घर में हुआ था. वे चित्रकार के साथ अत्यंत कुशल मूर्तिकार भी थे. कहा जाता है कि वे मानव के शरीर की रचना के पूर्ण अध्ययन के लिए श्मशान से गडे मुर्दे भी उखाड़ लाते थे और उनकी चीर-फाड़ करके शरीर रचना का गहन अध्ययन करते थे. यह बहुत ही वीभत्स कर्म था और ऐसा करते समय कई बार तो उन्हें उलटी भी आ जाती थी. पागलपन की हद तक वे इस काम में जुटे रहे और इसके फलस्वरूप उनकी कला में शरीर की एक-एक नस और मांसपेशी का वास्तविक चित्रण हो पाया है.

439px-Michelango_Portrait_by_Volterraमाइकलेंजेलो को अपूर्व ख्याति, कीर्ति और धन-वैभव भी मिला. परन्तु अपनी कलासाधना में वे इतना डूब चुके थे कि उन्होंने कभी भी अच्छे बिस्तर पर सोने और अच्छा भोजन करने का आनंद नहीं लिया.वे दिनरात कला में ही जीते रहे. उनकी कला में शारीरिक लक्षण प्रधान है लेकिन कामभावना और वासना का चित्रण नहीं है.

सिस्टाइन चैपल में छत पर इतने विशाल पैमाने पर चित्रकारी करने का काम लगभग असंभव था. पांच सौ साल पहले आज की  तरह उपलब्ध उपयोगी वस्तुओं का अभाव था. माइकलेंजेलो कई वर्षों तक लकडी के मचानों पर पीठ के बल लेटकर चित्र बनाते रहे. इन चित्रों को देखकर उनकी श्रेष्ठ कला और असाधारण सामर्थ्य का प्रशंसक कौन नहीं बनेगा? माइकलेंजेलो के बाद अनेक महान चित्रकारों ने उनकी कला का अनुसरण किया लेकिन उनकी साधना की सीमा कोई न छू सका.

‘सर्वोत्तम’ (हिंदी रीडर्स डाइजेस्ट) के बहुत पुराने अंक से साभार

(A post about the art and toils of Michelangelo Buonarroti – in Hindi)

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माइकलएंजेलो का सबसे प्रसिद्द चित्र 'द क्रियेशन ऑफ़ एडम' (आदम का जन्म)

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कुंदनलाल सहगल की बेजोड़ मानवता

बोलती फिल्मों का दौर बीत जाने के बाद जिस आवाज़ को हिन्दुस्तानी जनता का अपार प्रेम मिला वह कुंदनलाल सहगल की आवाज़ थी. मैं खुशकिस्मत हूँ कि अपने परिवार में पुराने संगीत के प्रति लगाव होने के कारण मैं बचपन से ही उनकी अनूठी आवाज़ और स्वरलहरियों को सुनता रहा. उस अप्रतिम आवाज़ के आज बहुत कम ही कद्रदान बचे हैं. जब मेरी उम्र के नौजवान उनके गीतों का भरपूर मजाक मिमिक्री करके उड़ाते हैं तब मुझे भीतर बहुत टीस होती है. मुझे भय है कि आज से कुछ दसियों सालों बाद तो शायद उनके संगीत को पसंद करनेवाले लोग बचें ही नहीं. खैर.

k_l_saigalसमय के क्रूर पंजों ने सहगल को मात्र 42 वर्ष की छोटी अवस्था में ही हमसे वर्ष 1948 में छीन लिया. उस समय वे शोहरत की बुलंदी पर थे. उन्होंने बेहतरीन भजन और गज़लें भी गाईं. उनके बाद हिंदी पोपुलर संगीत जगत में एक से बढ़कर एक गायक हुए लेकिन सभी ने अपने गायन की शुरुआत उनकी नक़ल करके ही की. उनके गीतों के ओरिजनल रेकॉर्ड्स आज संगीत प्रेमियों के लिए बहुमूल्य निधि हैं.

स्कूली शिक्षा में सहगल का मन ज़रा भी न लगा. वे अक्सर स्कूल से भाग जाते थे. अपने परिवार की व्यापारी परंपरा के विपरीत उनमें व्यापार करके संपत्ति अर्जित करने की और परिग्रह की भावना बिलकुल भी नहीं थी. उन्होंने बहुत पैसा कमाया लेकिन सब अपने दोस्तों की सहायता और ज़रूरतमंदों को बांटने में लगा दिया. किसी की मदद करते समय उन्होंने यह नहीं पूछा कि मांगनेवाला किस जाति या वर्ग का है. ऊँच-नीच का भेदभाव उनमें ज़रा भी न था.

एक रात सहगल बारिश में भीगकर ठण्ड से थर-थर कांपते हुए घर लौटे. उनकी पत्नी आशारानी ने देखा कि वे केवल कच्छा-बनियान पहने हुए थे. पूछने पर पता चला कि उन्होंने अपने कपड़े रास्ते में किसी भिखारी को दे दिए थे जो ठण्ड से कांप रहा था. पहले के लोग कैसे होते थे!

सहगल की पत्नी आशारानी ने अपने ड्राईवर को कह रखा था कि वह स्टूडियो से उनका वेतन खुद लेकर घर तक पहुंचा दे. वे जानती थीं कि सहगल के जेब में होने पर आधे पैसे भी घर नहीं पहुंचेंगे.

(A motivational / inspiring anecdote of Kundan Lal Saigal / K L Sehgal – in Hindi)

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पिकासो के रोचक संस्मरण – भाग 2

पाब्लो पिकासो की महान सफलता उनके स्कूल शिक्षकों के लिए बहुत बड़ा आघात थी. पिकासो ने दस वर्ष की अवस्था में स्कूल छोड़ दिया था क्योंकि उन्हें पढने-लिखने में दिक्कत होती थी. वे वर्णमाला के अक्षर याद नहीं रख पाते थे.

* * * * *

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजियों ने पेरिस को अपने कब्जे में ले लिया था. पिकासो के पेरिस वाले अपार्टमेन्ट में एक दिन खुफिया गेस्टापो पुलिसवाले आ घुसे. उन्होंने कमरे की दीवार के सहारे खड़ी पेंटिंग ‘गेर्निका’ को देखा जिसमें स्पेनिश गृहयुद्ध के दौरान जर्मन लड़ाकू विमानों द्वारा बास्क राजधानी पर बमबारी का चित्रण किया गया है (यह चित्र इसी श्रृंखला की पहली कड़ी में देखें).

एक पुलिस अधिकारी ने गेर्निका को देखकर पिकासो से पूछा – “ये तुम्हारा काम है?”

“नहीं” – पिकासो ने कहा – “ये तुम्हारा काम है”.

* * * * *

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पिकासो के चित्र बड़ी ऊंची कीमत पर बिक रहे थे. एक धनी अमेरिकी महिला पिकासो के स्टूडियो में चित्र खरीदने के लिए आई.

एक अमूर्त पेंटिंग को देखकर उसने पिकासो से पूछा – “यह पेंटिंग क्या दिखाती है?”

पिकासो ने कहा – “दो लाख डॉलर”.

* * * * *

एक दिन पिकासो दक्षिणी फ्रांस में समुद्र तट पर अपने एक मित्र के साथ सुस्ता रहे थे. एक छोटा लड़का उनके पास एक कागज़ लेकर आया. पिकासो समझ गए कि लड़के के माता-पिता किसी बहाने उनका औटोग्राफ हासिल करना चाहते थे.

पिकासो ने लड़के का निवेदन नहीं ठुकराया, लेकिन उन्होंने कागज़ लेकर फाड़ दिया और लड़के की पीठ पर एक आकृति बनाकर अपने हस्ताक्षर कर दिए.

“मुझे लगता है” – पिकासो ने अपने मित्र से कहा – “अब वे उसे कभी नहीं नहलायेंगे.”

* * * * *

किसी ने एक बार पिकासो से पूछा कि उनकी सबसे प्रिय पेंटिंग कौन सी है.

पिकासो ने कहा – “अगली”.

* * * * *

१९०६ में पिकासो ने गर्त्रूद स्टीन नामक एक लड़की की पेंटिंग बनाई थी और वह उसे उपहार में दे दी. कई सालों बाद करोड़पति अमेरिकी कला संग्रहकर्ता अलबर्ट बार्न ने गर्त्रूद से पूछा कि वह पेंटिंग बनवाने के लिए उसने पिकासो को कितनी रकम दी.

“कुछ नहीं” – गर्त्रूद ने कहा – “उन्होंने तो वह मुझे उपहार में दे दी थी”. यह सुनकर अलबर्ट बार्न स्तब्ध रह गए.

बाद में गर्त्रूद ने पिकासो को इस बारे में बताया. पिकासो ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा – “वह नहीं समझ पायेगा कि उन दिनों बिक्री और उपहार में बहुत मामूली अंतर होता था.”

* * * * *

१९४० का समय था. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अपने शहरों पर जर्मन आक्रमण के भय से यूरोप में कलाकार पलायन करने से पहले अपनी कलाकृतियाँ बहुत कम दामों पर बेच रहे थे.

पेगी गुगेन्हीम नामक धनी अमेरिकी महिला नगर-नगर घूमते हुए महँगी कलाकृतियाँ औने-पौने दामों में खरीद रही थी. पिछले कुछ महीनों से वह प्रतिदिन एक पेंटिंग खरीदती आ रही थी. पिकासो के पेरिस वाले स्टूडियो में आने पर उसने कलाकार को अपने प्रशंसकों से घिरा पाया.

उसे वहां आया देखकर लोगों ने उसे रास्ता दिया. उसके हांथों में एक लिस्ट थी जो कला के जानकारों ने तैयार की थी. लिस्ट में खरीदने लायक कलाकृतियों के नाम लिखे थे. उसमें उन कलाकारों के नाम भी थे जिनकी पेंटिंग और शिल्प को खरीदने का वह निर्णय कर चुकी थी. यह सब उसके लिए एक सनक बन चुकी थी. पिकासो का नाम भी उस लिस्ट में था.

पिकासो ने उसे वहां आया देखा. बहुत देर तक तो वे उसे नज़रंदाज़ करते रहे, फिर उसके पास गए और उन्होंने उससे कहा – “मैडम, आप शायद गलत जगह आ गईं हैं. अंतर्वस्त्रों की दुकान सामनेवाली बिल्डिंग में है.”

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पिकासो के रोचक संस्मरण – भाग 1

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एक बार पिकासो की बातचीत एक अमेरिकन सेनाधिकारी से हो रही थी. बातों-बातों में अधिकारी ने पिकासो से कहा कि उसे अमूर्त चित्रकला पसंद नहीं है क्योंकि वह अयथार्थवादी होती है.

पिकासो ने इसका कोई जवाब नहीं दिया. बातों का दौर अधिकारी की प्रेमिका की ओर मुड़ गया. अधिकारी ने अपनी प्रेमिका का फोटोग्राफ अपनी जेब से निकलकर पिकासो को उत्साहपूर्वक दिखाया.

पिकासो वह फोटोग्राफ देखकर जोरों से बोल उठे – “हे भगवान! क्या वह वाकई इतनी छोटी है!?”

* * * * *

चित्रकार की ख्याति जब चरम पर पहुंच जाती है तो उसकी कला के जाली प्रतिरूप भी बाज़ार में मिलने लगते हैं जिन्हें वास्तविक चित्रकार द्वारा बनाया गया कहकर ऊंचे दामों पर बेचा जाता है.

एक ज़रूरतमंद चित्रकार ने पिकासो द्वारा तथाकथित बनाया गया चित्र कहीं से जुटा लिया और उसे सत्यापन के लिए पिकासो को दिखाया ताकि वह उसे बाज़ार में बेचकर पैसे बना सके.

पिकासो ने उस चित्र को देखकर कहा – “फर्जी है.”

बेचारे चित्रकार ने कुछ समय बाद पिकासो द्वारा तथाकथित बनाये गए दो और चित्र कहीं से प्राप्त कर लिए. उन चित्रों को देखकर भी पिकासो ने उनके फर्जी होने की बात कही.

वह चित्रकार अब आशंकित हो उठा और बोला – “ऐसा कैसे हो सकता है? मैंने अपनी आँखों से आपको इस दूसरे चित्र को बनाते हुए देखा है!”

पिकासो ने कहा – “तो क्या! मैं भी दूसरों की ही तरह फर्जी पिकासो बना सकता हूँ.”

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पिकासो ने एक बार अपने फ्रांस वाले भवन में महोगनी की एक आलमारी बनवाने के लिए एक कारपेंटर को बुलाया.

कारपेंटर को आलमारी का वांछित डिजाईन समझाने के लिए पिकासो ने कागज़ पर आलमारी के आकार और रूप का एक स्केच बनाकर कारपेंटर को दिया.

पिकासो ने कारपेंटर से पूछा – “इसपर कितना खर्च आएगा?”

कारपेंटर ने कहा – “कुछ नहीं. आप बस स्केच पर अपने सिग्नेचर कर दीजिये.”

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पिकासो के दक्षिणी फ्रांस वाले भवन में आनेवाले मेहमान यह देखकर अचंभित हो जाते थे कि भवन में कहीं भी किसी भी दीवार पर पिकासो के चित्र नहीं लगे थे. किसी ने एक बार इस बारे में पिकासो से पूछा – “कमाल है! आपके घर में आपके ही बनाये चित्र नहीं है! क्या आपको अपने बनाये चित्र अच्छे नहीं लगते?”

पिकासो ने कहा – “ऐसी बात नहीं है. मुझे मेरे चित्र बहुत प्रिय हैं लेकिन मैं उन्हें खरीदने की हैसियत नहीं रखता.”

* * * * *

एक बार एक प्रदर्शनी में पिकासो से एक महिला ने कहा – “मेरी बेटी भी आपके जैसे चित्र बना सकती है.”

“बधाई हो!” – पिकासो ने कहा – “आपकी बेटी तो जीनियस है!”

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पाब्लो पिकासो (1881-1973) महान स्पेनिश चित्रकार और शिल्पकार थे. उन्होंने जॉर्ज ब्राक के साथ मिलकर आधुनिक चित्रकला में घनवाद (cubism) का प्रारंभ किया. उन्हें निर्विवाद रूप से बीसवीं शताब्दी का महानतम चित्रकार माना जाता है. गेर्निका (1937) उनकी सर्वाधिक प्रसिद्द पेंटिंग है जिसमें स्पेनिश गृहयुद्ध के दौरान जर्मन लड़ाकू विमानों द्वारा बास्क राजधानी पर बमबारी का चित्रण किया गया है.

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पिकासो का चित्र ‘गेर्निका’

यह पिकासो के संस्मरणों की पहली किश्त है. दूसरी किश्त के लिए प्रतीक्षा करें.

चित्र विकीपीडिया से लिए गए हैं.

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कलाकार की करुणा

महान फ्रांसीसी मूर्तिकार ऑगस्त रोदाँ (August Rodin) को एक सरकारी इमारत का प्रवेश द्वार सुसज्जित करने के लिए कहा गया। उस द्वार पर और उसके इर्दगिर्द मूर्तियाँ लगाई जानी थीं।

ज्यों-ज्यों रोदाँ काम करते गए, दरवाजे का आकार भी बढ़ता गया। छोटी-बड़ी मूर्तियों की संख्या १५० से भी ज्यादा हो गई।सरकार उस द्वार पर अधिक धन खर्च नहीं करना चाहती थी। लेकिन रोदाँ पर सर्वश्रेष्ठ काम करने का जुनून सवार था। वे ऐसा द्वार बनाने में जुटे थे जो अद्वितीय हो। वे बीस साल तक काम करते रहे लेकिन द्वार फ़िर भी अधूरा था। इस बीच निर्माण की लागत कई गुना बढ़ गई।

फ्रांस की सरकार ने रोदाँ पर मुकदमा किया कि वे द्वार को शीघ्र पूरा करें अन्यथा पैसे लौटा दें। रोदाँ ने पूरे पैसे लौटा दिए और पूर्ववत काम करते रहे।

इस बीच उस द्वार की ख्याति देश-विदेश में फ़ैल चुकी थी। दूर-दूर से लोग उस द्वार को देखने के लिए आने लगे। इंग्लैंड के तत्कालीन सम्राट एडवर्ड सप्तम भी उसे देखने के लिए आए। दरवाजे के सामने लगी चिन्तक (The Thinker) की मूर्ति को देखकर वे मुग्ध हो गए। यह विश्व की सबसे प्रसिद्द और श्रेष्ठ मूर्तियों में गिनी जाती है। सम्राट की इच्छा हुई कि वे मूर्ति को करीब से देखें। उन्होंने एक सीढ़ी मंगवाने के लिए कहा।

वे सीढ़ी पर चढ़ने वाले ही थे कि रोदाँ ने उन्हें रोक दिया क्योंकि वहां एक चिड़िया ने घोंसला बना रखा था। रोदाँ नहीं चाहते थे कि चिड़िया के नन्हे बच्चे किसी भी वजह से परेशान हो जायें।

(रोदाँ और चिन्तक का चित्र विकिपीडिया से लिया गया है)

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