कविता – सौ बातों की एक बात है – रमानाथ अवस्थी

सौ बातों की एक बात है.

रोज़ सवेरे रवि आता है
दुनिया को दिन दे जाता है
लेकिन जब तम इसे निगलता
होती जग में किसे विकलता
सुख के साथी तो अनगिन हैं
लेकिन दुःख के बहुत कठिन हैं

सौ बातो की एक बात है.

अनगिन फूल नित्य खिलते हैं
हम इनसे हँस-हँस मिलते हैं
लेकिन जब ये मुरझाते हैं
तब हम इन तक कब जाते हैं
जब तक हममे साँस रहेगी
तब तक दुनिया पास रहेगी

सौ बातों की एक बात है.

सुन्दरता पर सब मरते हैं
किन्तु असुंदर से डरते हैं
जग इन दोनों का उत्तर है
जीवन इस सबके ऊपर है
सबके जीवन में क्रंदन है
लेकिन अपना-अपना मन है

सौ बातो की एक बात है.

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10 Comments

Filed under गीत-ग़ज़ल-कविता

10 Responses to कविता – सौ बातों की एक बात है – रमानाथ अवस्थी

  1. mahi

    bahut sunder kavita.

  2. जीवन का मर्म छुपा है इन पंक्तियों में

  3. आजकल हिन्दिज़ेन्न blog का मूड / माहौल बहुत बदला सा लगता है …

  4. वाह! अपने चित्र से इस कविता को जोड़कर मुग्ध हो रहा हूँ।:)

  5. बहुत ही सुलझी हुयी कविता..

  6. यथार्थ का ज्ञान करने वाली कविता के लिए बहुत बहुत धन्यवाद |

  7. इस जग में तो ये अनंत बातों की एक बात है , अति सुन्दर पंक्तियाँ ,

  8. Sau baaton ki ek baat hai aur ghazab ki baat hai

  9. khubsurat yathrth ya kah dete hain meri jindagi ke karib

  10. बहुत सुन्दर कविता है. जीवन का मर्म बताती है यह कविता.
    घुघूतीबासूती

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