जीवन का आनंद

“इस साल मैंने अपने जीवन का पूरी तरह से आनंद लिया”, शिष्य ने गुरु से कहा.

“अच्छा?”, गुरु ने पूछा, “क्या-क्या किया तुमने?”

“सबसे पहले मैंने गोताखोरी सीखी”, शिष्य ने कहा, “फिर मैं दुर्गम पर्वतों पर विजय पाने के लिए निकला. मैंने रेगिस्तान में भी दिन बिताये. मैंने पैराग्लाइडिंग की, और आप यकीन नहीं करेंगे, मैंने…”

गुरु ने हाथ हिलाकर शिष्य को टोकते हुए कहा, “ठीक है, ठीक है, लेकिन यह सब करने के दौरान तुम्हें जीवन का आनंद उठाने का समय कब मिला?”

Thanx to John Weeren for this story

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17 Comments

Filed under Zen Stories

17 responses to “जीवन का आनंद

  1. Great…! Vast Meaning in a small incidence.!!

  2. गुरु और शिष्य में यही फ़र्क है ,
    बिना कुछ कहे जैसे सब कुछ कहती हुई चंद पंक्ति ,

  3. sunita goel

    Guru shisya ki ye kahani humko bhut kuch seekhati h

  4. परा और अपरा का फर्क.

  5. राह में आनन्द है,
    लक्ष्य अब तक मंद है..

  6. SHASHI DHAR MISHRA

    very good thought

  7. Rahul

    Can someone explain what the story tells?

    • PRAJJWAL GAVANDER

      SORRY but you don’t understand what this story tells. This story contains a hard meaning which cannot be easily understood….

  8. उन्मुक्त

    माफ कीजियेगा, मुझे तो गुरू की समझ पर हंसी आयी।

  9. जीवन का आनंद उठाने का समय ,सही है साहब !

  10. जय हो गुरुजी की!

  11. abhay

    ji ha aapki kahani acchi hai gyanvardk

  12. PRAJJWAL GAVANDER

    yeh sab toh upari khushi ke sadhan hai asli jeevan ka anand toh adhyatmik aur mansik(mental) shanti se milta hai !

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