Socrates and the Marketplace – बाज़ार में सुकरात

shopसुकरात महान दार्शनिक तो थे ही, उनका जीवन संतों की तरह परम सादगीपूर्ण था. उनके पास कोई संपत्ति नहीं थी, यहाँ तक कि वे पैरों में जूते भी नहीं पहनते थे. फ़िर भी वे रोज़ बाज़ार से गुज़रते समय दुकानों में रखी वस्तुएं देखा करते थे.

उनके एक मित्र ने उनसे इसका कारण पूछा.

सुकरात ने कहा – “जब मैं बाज़ार में घूमता हूं तो मुझे यह देखकर बहुत अच्छा लगता है कि दुनिया में कितनी सारी वस्तुएं हैं जिनके बिना मैं इतना खुश हूँ.”

* * * * * * * * * *

True philosopher that he as, Socrates believed that the wise person would instinctively lead a frugal life. He himself would not even wear shoes; yet he fell under the spell of the marketplace and would go there often to look at all the wares on display.

When one of his friends asked why, Socrates said: “I love to go there and discover how many things I am perfectly happy without.”

 

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20 Comments

Filed under दार्शनिक

20 Responses to Socrates and the Marketplace – बाज़ार में सुकरात

  1. वो जिनके घर मल्टीनैशनल कंपनी के गोदाम बन गए है वो अगर इस पढ़ कर कुछ समझे तो कुछ बात भी बने!

    वैसे संसारी लोग इसे पढ़े तो सुकरात जी को यही कहते ..तुम्हारी औकात नहीं चले है सैमसंग का स्मार्टफ़ोन लेने :-) मतलब औकात नहीं तो क्या जरूरत थी बाज़ार में टहलने की :-)

    -Arvind K.Pandey

    http://indowaves.wordpress.com/

  2. प्रवीण पाण्डेय

    यह बाजारों में भरा हुआ सामान इसी तरह से प्रसन्नता दे सकता है।

  3. कभी कुछ इसी तरह महसूस हुआ था मुझे, बीसेक साल पहले सिंहस्‍थ में भटकते हुए लगा था कि धर्म-सम्‍प्रदायों की इस जैसी माया और कहां.

  4. rana deep

    better and again better

  5. वाह!क्या बात है।

  6. Gdontanwar

    No words to say about socret…

  7. Rahul

    दुनिया में कितनी सारी वस्तुएं हैं जिनके बिना मैं इतना खुश हूँ
    thanks for the post

  8. दुबारे पढवा रहे हैं या रवि रतलामी जी के यहाँ पढा याद आ रहा है ?

    • दोबोरा पढ़वा रहा हूं, दो साल बाद.
      ज़रूरत पड़ने पर रवि जी का मसाला भी साभार उठाया जाएगा.

  9. देवेन्द्र सिंह भदोरिया

    बाज़ार की चीजों या संसार की बस्तुओ से खुशी नही मिला करती खुशी तो मन की सोच में होती हें

  10. DP Singh

    Be saro- saman hi behtar kat rahi hai jindagi,
    ghar bana to roj ghar lutne ka darr ho jayega….

  11. rajeshwari

    निशांतजी आपका ब्लॉग पढ़कर मुझे हमेशा यही लगता है की मुझे ये देर से मिला. मैंने कितना वक़्त बर्बाद कर दिया व्यर्थ की (so called ) समस्याओं के समाधान में, जो मैं कर भी नहीं पाई, बल्कि अपनी ज़िन्दगी को (और मेरे अपनों की ज़िन्दगी को भी) और मुश्किल बना कर रखा. खैर वक़्त को तो हम लौटा नहीं सकते लेकिन आपके द्वारा संकलित सीख को अब भी अगर अपनी ज़िन्दगी में उतर पायें तो जीवन कुछ हद तक सार्थक कर पाएंगे. शुक्रिया आपका.

  12. sudarshan singh

    na kuch khone ka bhay, na lootne ka dar, jingi kitani befiker yehi to sachchi khusi hai.

  13. बाहर की चीज़ों की निर्भरता और आकर्षण जितना कम होगा व्यक्ति उतना ही अपनी आंतरिक खुशी से जुड़ा रहेगा. सुकरात महान दार्शनिक हैं. अच्छी पोस्ट के लिए आभार.

  14. MANVI WAHANE

    GOOD! I LIKE THIS.THANKS FOR YOUR POST :)

  15. KARAN

    BEAUTIFUL THOUGHT………

  16. Banwali patel

    Bhoutik aur sansarik vastu bahut pralobhan deta hai.

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