परिवर्तन

ज़ेन शिष्य ने गुरु से पूछा, “मैं दुनिया को बदलना चाहता हूँ? क्या यह संभव है?”

गुरु ने पूछा, “क्या तुम दुनिया को स्वीकार कर सकते हो?”

शिष्य ने कहा, “नहीं, मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता. यहाँ युद्ध, गरीबी, और न जाने कितनी ही बुरी बातें हैं!”

गुरु ने कहा, “जब तक तुम दुनिया को स्वीकार करना नहीं सीख लो तब तक तुम इसे बदल भी नहीं सकोगे”.

Thanx to John Weeren for this story

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Comments

  1. says

    सबसे कठिन है स्वयं को परिवर्तित करना।
    जो खुद को सुधार नहीं सकते दुनिया बदलने निकलते हैं!

    आजकल “परिवर्तन” शब्द fasionable हो गया है, courtesy ममता बैनर्जी । पर उच्चारण “पोरिबर्तन” बन गया है ।

    जी विश्वनाथ

  2. says

    मुझे तो यह कांसेप्ट ही बड़ा confusing लगता है | क्या हम दुनिया को बदल सकते भी हैं ? जिसने दुनिया बनाई – वह कोई है ? या नहीं है ?

    यदि है – तो क्या वह हमसे कहीं अधिक ज्ञानी और सशक्त न होगा ? यदि उसे इसे बदलना सही लगता, और वह इसे बदलना चाहता – तो क्या यह ऐसी ही होती – या फिर कुछ अलग होती ? और यदि वह इसे ऐसी ही चाहता है – तो क्या हमारी यह बदलाव की इच्छा उसकी समझ से बड़ी है ? हो भी – तो क्या हमारी सशक्तता जो उससे बहुत कम है – उस शक्ति से यह संभव है ?

    और यदि यह दुनिया किसी ने नहीं बनाई है – बस ऐसे ही बन गयी है – तो फिर इसे बदलने के प्रयास कितने meaningful होंगे ? what started as an accident , is always an accident – whats the point of trying to change it ?

  3. says

    मेरा मानना ये है दोस्तों की इंसान को सबसे पहले अपने आप को बदलना चाहिए
    दुनिया अपने आप बदल जाएगी …कयौकी दुनिया आपसे ही शुरु होती है …..

  4. prakash wahurwagh says

    duniya badalne jaana tarkqueeb hai khud se dur bhagane ki……….khud ko badalna jyada kathin hai…duniya se.

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