दो दरवाज़े

मरने के बाद आदमी ने स्वयं को दो दरवाजों के बीच खड़े पाया. एक पर लिखा था “लालसा”, और दूसरे पर “भय” लिखा था.

एक देवदूत उस तक आया और बोला, “तुम किसी भी द्वार को चुन सकते हो. दोनों ही नित्यता के मार्ग पर खुलते हैं”.

आदमी ने बहुत सोचा पर उसे तय करते नहीं बना. उसने देवदूत से ही पूछा, “मुझे कौन सा दरवाज़ा चुनना चाहिए?”

देवदूत ने मुस्कुराते हुए कहा, “उससे कोई फर्क नहीं पड़ता. दोनों ही यात्राओं की परिणति दुःख में होती है.”

Thanx to John Weeren for this story

10 Comments

Filed under Stories

10 Responses to दो दरवाज़े

  1. दोनों गुफाएँ दुख की घाटी में खुलती हैं. मन के तत्त्व का यथार्थ. बहुत खूब.

  2. नित्यता के मार्ग तक / पे गुजरने की परिणति दुःख !

    मृत्यु के बाद भी सुख का कोई विकल्प नहीं !

    तब तो अनित्यता ही भली !

  3. Nishant maine aapka naam Versatile blooger list ke liye diya hai please click the link to see more
    http://somkritya.wordpress.com/

  4. निष्काम कर्म और मन्यु में जियें,…………. तो मृत्यु के बाद….. लालसा और भय के नहीं बल्कि ….. आनंद और अभय के द्वार मिलेंगे :)

  5. वर्सेटाइल ब्लॉगर, बहुत सही!

  6. वाह…क्या बात कही…

    एकदम सत्य…

  7. लिंक का एक दरवाजा सोमा जी ने भी खोल दिया है आपके लिए, बधाई.

  8. क्या करना चाहिए ये भी बता देते तो बेहतर होता , ये भी ठीक है , कम से कम आदमी सोचेगा तो सही इन दो के अलावा कौन सा है सही रास्ता ,

टिप्पणी देने के लिए समुचित विकल्प चुनें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Connecting to %s