दर्पण : The Mirror

एक बहुत धनी युवक रब्बाई के पास यह पूछने के लिए गया कि उसे अपने जीवन में क्या करना चाहिए. रब्बाई उसे कमरे की खिड़की तक ले गए और उससे पूछा:

“तुम्हें कांच के परे क्या दिख रहा है?”

“सड़क पर लोग आ-जा रहे हैं और एक बेचारा अँधा व्यक्ति भीख मांग रहा है”.

इसके बाद रब्बाई ने उसे एक बड़ा दर्पण दिखाया और पूछा:

“अब इस दर्पण में देखकर बताओ कि तुम क्या देखते हो”.

“इसमें मैं खुद को देख रहा हूँ”.

“ठीक है. दर्पण में तुम दूसरों को नहीं देख सकते. तुम जानते हो कि खिड़की में लगा कांच और यह दर्पण एक ही मूल पदार्थ से बने हैं.”

“तुम स्वयं की तुलना कांच के इन दोनों रूपों से करके देखो. जब यह साधारण है तो तुम्हें सभी दिखते हैं और उन्हें देखकर तुम्हारे भीतर करुणा जागती है. और जब इस कांच पर चांदी का लेप हो जाता है तो तुम केवल स्वयं को देखने लगते हो.”

“तुम्हारा जीवन भी तभी महत्वपूर्ण बनेगा जब तुम अपने आँखों पर लगी चांदी की परत को उतार दो. ऐसा करने के बाद ही तुम अपने लोगों को देख पाओगे और उनसे प्रेम कर सकोगे”.

यह यहूदी नीति-कथा पाउलो कोएलो के ब्लॉग से ली गयी है.

(~_~)

A very rich young man went to see a Rabbi in order to ask his advice about what he should do with his life. The Rabbi led him over to the window and asked him:

‘What can you see through the glass?’

‘I can see men coming and going and a blind man begging for alms in the street.’

Then the Rabbi showed him a large mirror and said to him:

‘Look in this mirror and tell me what you see.’

‘I can see myself.’

‘And you can’t see the others. Notice that the window and the mirror are both made of the same basic material, glass.

‘You should compare yourself to these two kinds of glass. Poor, you saw other people and felt compassion for them.
‘Rich – covered in silver – you see yourself.

‘You will only be worth anything when you have the courage to tear away the coating of silver covering your eyes in order to be able to see again and love your fellow man.’

20 Comments

Filed under Paulo Coelho

20 responses to “दर्पण : The Mirror

  1. पर ये चांदी का लेप इतनी जल्दी उतरता भी नहीं है, बहुत मेहनत लगती है इस लेप को उतारने में ।

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  2. आँखों से परत हटने पर ही सब कुछ पारदर्शी हो जाता है …
    बहुत सही!

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  3. गजब, कितने सहज ढंग से समझा दिया गया।

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  4. वाह! गागर में सागर…

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  5. उस समय ऐसा करना हर किसी के लिए संभव नहीं है ये , काश ऐसा संभव हो सकता …..?

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  6. Beautiful, motivating story. Thanks.

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  7. एक आइना अन्दर भी है,उससे झाँको,सब दिख जायेगा !

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  8. एक बहुत ही ज्ञानवर्धक कहानी है. बहुत बहुत धन्यवाद.

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  9. ग्रेट! दर्पण पूरा है – फुल फीड के साथ!

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  10. चाँदी का लेप….जो दृष्य हटा कर व्यक्ति के दृष्टिकोण को सीमित कर देता है…बहुत खूब!

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  11. rajendra chandak

    aisa ek darpan har ek ke bhitar chipa hai. janana chahte ho to vipassana ka meditation course karen.

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  12. aapka kahani bahut parrnadayak hai.

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  13. uma shankar khatri

    In mirror what I see is my body, NOT myself. When there is no silver layer I can see other bodies also.

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  14. बहुत प्रेरक कथा.

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  15. Sarfaraz sayyed

    Yahi zindagi ki hakikat hai.

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  16. Zindagi main sabse badi jeet apne apko pahchanne wale ki hoti hai.

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