Across the Street – सड़क के पार

यह बहुत प्रसिद्द ज़ेन-बौद्ध कहानी है जो इस ब्लॉग में दो साल पहले भी आई थी. इसमें लिखा है कि दो बौद्ध संन्यासी कहीं जा रहे हैं और कीचड़ से भरे मार्ग पर आ लगते हैं. उन्हें सड़क के किनारे एक किशोरी दिखती है जो सड़क पार करने से कतरा रही है कि उसके कपड़े कहीं गंदे न हो जाएँ.

पुराना संन्यासी किशोरी तक जाता है और उसका अभिवादन करता है. फिर वह उसे अपनी बांहों में उठाकर कीचड़ में डग भरता हुआ सड़क के दूसरी ओर ले जाकर छोड़ देता है. फिर दोनों संन्यासी अपने रास्ते चल पड़ते हैं.

उसी रात भोजन करते समय नए संन्यासी ने पुराने संन्यासी से कहा, “मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा. हम संन्यासी हैं और हमें स्त्रियों से बातें करना भी निषेध है, फिर भी आपने उस स्त्री को अपनी बाहों में उठा लिया!”

पुराने संन्यासी ने कहा, “मैंने तो उस लड़की को उसी समय सड़क के दूसरी ओर छोड़ दिया था. तुम उसे अभी भी उठाये घूम रहे हो”.

ऐसा ही है. हम विचारों और मान्यताओं से जकड़े हुए हैं. वे हमारे मन-मष्तिष्क को दुविधाओं और चिंताओं से ग्रस्त रखतीं हैं. हम सर्वथा उनके ही खंडन-मंडन के द्वंद्व में उलझे रहते हैं. इनके कारण हमारी आत्मोन्नति की राह में नित-नये अवरोध आते रहते हैं.

मैं स्वयं को प्रचलित अर्थों में आध्यात्मिक कहलाना पसंद नहीं करता. मेरे लिए आध्यात्मिकता किसी दर्शन या मत विशेष से सहयोजिता नहीं बल्कि मानव चेतना के सबसे शुद्ध सद्गुणों की स्थापना है. क्षमा, करुणा, दया, जागृति बोध, प्रेम, बंधुत्व, मैत्री, उपकार, अगर्व, और ऐसे ही अनेक सद्गुण आध्यात्मिकता का आधार हैं. इनमें भी करुणा और क्षमाशीलता का महत्व औरों से कहीं बढ़कर है क्योंकि चित्त में गहराई तक व्याप्त हो चुके अहंकार जन्य क्रोध के तिरोहण के उपरांत ही ऐसे सर्वहितकारी भाव उपजते हैं. स्वयं को दूसरों की स्थिति में रखकर विचार करना भी करुणा का ही एक प्रमुख लक्षण है. जब तक हम स्वयं को उनके स्थान पर नहीं रखेंगे, हम उनके दुःख और वेदना का अनुभव नहीं कर सकते. क्या स्वयं के प्रति करुणा भाव का जागना क्षमाशीलता नहीं है? इसमें किसी दूसरे व्यक्ति को उसके दुखों से मुक्त करने का नहीं बल्कि स्वयं को उस अप्रसन्नता से उबारने का यत्न है जो किसी घटना के प्रति खिन्नता होने या किसी व्यक्ति को क्षमा नहीं करने से उद्भूत हुई हो.

नए संन्यासी की ही भांति हम भी उन घटनाओं और विचारों का बोझ उठाये फिर रहे हैं जो अयथार्थ हैं. वे सहज मानवीय कमजोरियां हैं जिनका हमें कभी-कभी पता ही नहीं चल पाता. वे पैरों से बंधे हुए अदृश्य पाषाणखंड हैं जिनके साथ दुर्गम चढ़ाई करना असंभव है. इस तथ्य का भान बहुत कम ही होता है कि क्षमाशीलता का तात्पर्य केवल किसी अनुचित/अवैध कर्म को क्षमा कर देना ही नहीं है बल्कि उसे कार्य-कारण एवं कर्म सिद्धांत के हवाले छोड़कर आगे बढ़ जाना है. इसका अर्थ यह भी नहीं है कि अनुचित या अवांछित कर्म करनेवाले को किसी प्रकार का प्रोत्साहन या बुराई को आश्रय मिले. इस पोस्ट से जनित चिंतन का उद्देश्य बस इतना ही है कि हमें सतत यह होश बना रहे कि सड़क के दूसरी ओर पहुँचने के बाद बोझ को उतार देना है.

* * * * * * * * * *

Two monks were traveling together, an older monk and a younger monk. They noticed a young woman at the edge of a stream, afraid to cross.

The older monk picked her up, carried her across the stream and put her down safely on the other side. The younger monk was astonished, but he didn’t say anything until their journey was over. “Why did you carry that woman across the stream? Monks aren’t supposed to touch any member of the opposite sex.” said the younger monk.

The older monk replied “I left her at the edge of the river, are you still carrying her?”

13 Comments

Filed under Buddhist Stories, Zen Stories

13 Responses to Across the Street – सड़क के पार

  1. कई बार पढ़ी है यह कहानी …
    जब उद्देश्य उस पार उतारना है और आगे बढ़ना है तो फिर काहे की चिंता !
    सार्थक सन्देश!

  2. Thank you :)

    Allowing all to pass without holding onto. Yes, I agree a meaningful message.

  3. तालाब में डूबती लड़की को बचाने के लिए और फिर बुद्ध से शिकायत होने पर बुद्ध का कथन कि उसने वहां जैसे ही लड़की को कंधे से उतारा तुमने लपक कर अपने कंधे पर लाद लिया, दोषी तुम हो वह नहीं. कहानी को मैंने इस तरह सुना था.

  4. कहानी सुनी थी पहले। रामकृष्ण वचनामृत आदि में भी आई है। कहानी में भयंकर झगड़ा दिखा था।

  5. हम तो मन मे ढोते ही नहीं वरन अस्तित्व में चिपकाये घूमते हैं।

  6. प्रेरणादायक!

  7. बहुत सुन्दर पोस्ट! मजे आ गये!

  8. Dhanwant Singh

    kahani jo bhi rhi ho MANUSHYTV ke liye prernadayka H. Nishant ji ko sadhuwad.

  9. कथा के रूप कितने भी हों, निर्लिप्तता का महत्व कभी कम नहीं होगा, स्वयं के लिये भी, समाज के लिये भी। आभार!

  10. ऐसी ही कहानी एक और है – ओशो की सुनाई कई कहानियों में एक .
    एक पति पत्नी लकड़ियाँ काट कर गुज़ारा करते – रोज़ काटते – बेचते और खाना ला कर खाते | एक बार भारी बारिश के चलते कई दिन न जा पाए जंगल – तो भूखे ही सोते रहे | फिर जब धूप आई तो वे दोनों वन को गए , पति आगे था – पत्नी पीछे थी |
    पति को सोने का बहुत कीमती कुछ पडा दिखा – उसने सोचा- मैंने तो लालच त्याग दिया है – पर ये बेचारी कही लोभ में न आ जाए | तो वह मिट्टी डाल कर उसे छुपाने लगा | तब तक पत्नी पीछे से पहुँच गयी और पूछने लगी कि वह क्या कर रहा है | झूठ बोलते न थे – तो उसने सच कह दिया | पत्नी ने उसे कहा “तुम्हे अब तक सोने और पत्थर में फर्क दिख रहा है ?? तब तो तुमने सोना त्यागा ही नहीं कभी”

  11. विपुल गोयल

    विपुल गोयल

    मेरा तो ये मानना है की जिस तरह रथ का पहिया आने वाली जमींन से लगाव नहीं रखता और छूटने वाली जमीन से दुखी नहीं होता वैसे ही हमें पाप और पुण्य से दूर अपने कर्म करते रहना चाहिए. खाता पाप और पुण्य का कैसे nil होगा. जब हम पाप करेंगे नहीं और पिछले गलत कर्मो का हिसाब चुका देंगे. मेरा तो यही मानना है,

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